भारतीय ज्ञान परंपरा एवं लोक साहित्य: एक दार्शनिक, सांस्कृतिक और सामाजिक अध्ययन – तबस्सुमबानु अल्लारखा मलेक

प्रस्तावना भारत केवल एक राष्ट्र नहीं, बल्कि एक ज्ञान-प्रधान सभ्यता है। इसकी सभ्यता का विकास राजनैतिक सत्ता या सैन्य शक्ति से अधिक, ज्ञान, दर्शन और सांस्कृतिक चेतना के माध्यम से […]

भारतीय ज्ञान परंपरा एवं लोक साहित्य :एक विस्तृत अध्ययन – कुमारी आकांक्षा 

शोध सार : भारतीय संस्कृति की सबसे बड़ी विशेषता इसकी समृद्ध ज्ञान परंपरा है। भारतीय ज्ञान परंपरा केवल पुस्तकों तक सीमित नहीं रही है बल्कि, यह भारत के लोगों के […]

लोक उत्सव और सामाजिक जनचेतना – राखी प्रवीण कोटला, डॉ. हनुमंत दशरथ जगताप

सार- भारतीय लोक संस्कृति विश्व की सबसे प्राचीन अर्थात् आदिम संस्कृतियों में से एक है जो अपनी विविधता और समृद्धि के लिए जानी जाती है | भारत में लोक उत्सव […]

असमिया विवाह गीतों में प्रतिफलित परंपरागत ज्ञान – डॉ. अर्चना हज़ारीका

भूमिका:           असम पूर्वोत्तर भारत के आठ राज्यों में से एक है । यह पूर्वोत्तर का प्रवेश द्वार है ।  यहाँ अनेक जाति – जनजाति के लोग निवास करते हैं  और […]

लोकसाहित्य में अभिव्यक्त पर्यावरणीय चेतना – प्रा. विभुते आर . व्ही.

लोक साहित्य में लोकगीत , लोकथाएँ , लोककथन , लोकनाट्य ,पहेलियाँ , कहावतें एवं लोकोक्तियों का समावेश होता है।        लोकसाहित्य वह साहित्य है , जो जनमानस द्वारा रचा गया […]

‘धरती मेरी माँ’ में लोक चेतना – डॉ. रेंजी कोशी

डॉ. बालशौरि रेड्डी उन शीर्षस्थ साहित्यकारों में अग्रगण्य हैं, जिन्होंने दक्षिण में हिन्दी की सेवा के लिए अपना तन और मन अर्पित किया। वे एक सफल उपन्यासकार, कहानीकार, आलोचक, बाल […]

स्त्रियों के संघर्ष की गाथा : भोजपुरी लोकगीत – सौरभ कुमार

भोजपुरी लोकगीत भारतीय साहित्य तथा भारतीय संस्कृति की अमूल्य निधि है | ये गीत भोजपुरी भाषी समाज की सांस्कृतिक आत्मा है | इसमें ग्रामीण जीवन, सामजिक मूल्यों और जन भावनाओं […]

समझ (लघुकथा) – डॉ. सौरभ कुमार झा

एक बार एक युवक अपनी असफलताओं से बहुत परेशान था। उसे लगता था कि दुनिया के सभी लोग उससे बेहतर हैं। वह हर दिन दूसरों की सफलता देखकर दुखी हो […]

डॉ.गोविंद गुंडप्पा शिवशेट्टे की कविताएं

 हां यही बुजुर्ग पेड़ हैं गांव का… हां यही बुजुर्ग पेड़ हैं गांव का… इमली का…सबका पसंदीदा नाम सुनते ही जिव्हा लपलपाती है ना! आपकी ही नहीं,हमारे दादा-दादी, दादा-परदादी की […]

वीरेंद्र की कविताएं

मन एकाकी सा मन एकाकी सा विस्मृत विस्मृत लगा सोचने काल चक्र गति वो निश्चिन्त कुलाचें भरता बचपन माँ का प्यार, था कैसा पावन अतीत के धूमिल होते पल क्षिन […]