डॉ. बालशौरि रेड्डी उन शीर्षस्थ साहित्यकारों में अग्रगण्य हैं, जिन्होंने दक्षिण में हिन्दी की सेवा के लिए अपना तन और मन अर्पित किया। वे एक सफल उपन्यासकार, कहानीकार, आलोचक, बाल साहित्यकार, अनुवादक और संपादक हैं। ‘शबरी’, ‘ज़िंदगी की राह’, ‘बैरिस्टर’, ‘दावानल’, ‘कालचक्र’ आदि प्रसिद्ध उपन्यास हैं। ‘बैसाखी’ उनका कहानी संग्रह हैं। ‘तमिलनाडु’, ‘कर्नाटक’ आदि उनकी आलोचनात्मक रचनाएँ हैं। उन्होंने हिंदी से तेलुगु में और तेलुगु से हिन्दी में कई रचनाओं का अनुवाद भी किया। वे तेईस वर्षों तक ‘चन्दामामा’ बाल पत्रिका के संपादक भी थे।
‘धरती मेरी माँ’ डॉ. बालशौरि रेड्डी का सन् 1960 में रचित एक सामाजिक उपन्यास है। ‘वसुधैव कुटुम्बकम्’ की अंतर्राष्ट्रीय सामाजिक चेतना इस उपन्यास की विशेषता है। बाह्य अनेकता में आंतरिक एकता के साथ कर्तव्य और प्रेम में मैत्री भी इसमें हम देख सकते हैं।
‘धरती मेरी माँ’ की कथावस्तु इस प्रकार है – हरिचरणदास उत्तर प्रदेश के गाजीपुर में रहते थे। उनके हाई स्कूल का मित्र थे रूपनारायण। दोनों को जिआलॉजिकल सर्वे ऑफ इण्डिया के खनिज विभाग में नौकरी मिली। एक दिन हरिचरण और रूपनारायण यूरेनियम और ताँबे की खोज करने के लिए बंगाल के नाहर कटिया और सिंगबन में गए। धीरे-धीरे उस इलाके की भील जाति से दोनों का परिचय हुआ। सोनी नामक एक भील कन्या पर रूपनारायण आकृष्ट हो गये। वहाँ की गहरी खुदाई में बहुत जल स्रोत निकले। पहाड़ी प्रदेशों में पानी का अभाव था। इसलिए सिंगबन के लोगों को यह कुआँ अत्यन्त सहायक था। रूपनारायण और सोनी के प्रयत्न के कारण भील बस्ती में कई परिवर्तन आये। उसने अपनी प्रेमिका सोनी के साथ खेती के लिए अपने को समर्पित किया।
हरिचरण को भारत सरकार से आदेश मिलने के कारण तुरन्त फ्रान्स जाना पड़ा। वहाँ उन्होंने भूगर्भ संबन्धी कई परीक्षण शुरू किये। वे अपने प्रोफ़ेसर ब्राउन की बेटी मेरी के अंग्रेज़ी अध्यापक भी थे। धीरे- धीरे दोनों के बीच में रागात्मक संबन्ध उतपन्न हो गया। हरिचरण अपना अनुसंधान समाप्त करके भारत लौटते समय मेरी ने उससे अपने प्रणय के बारे में कहा।
भारत लौटने के बाद हरिचरण ने मेरी को विवाह करने का निश्चय किया। उन्होंने विवाह के लिए अपने माता – पिता की अनुमति माँगी। हरिचरण पर उनको प्रगाढ़ विश्वास था। उन्होंने कहा – “बेटा! तुमको जहाँ पसंद आवे, वहीं शादी कर लो। हम तुमको खुश देखना चाहते हैं।”1 विवाह के बारे में हरिचरण को कुछ शर्तें भी था। वे थीं – भारतीय नागरिकता प्राप्त करना, उनके सम्मिलित परिवार की एक सदस्या के रूप में रहना, विवाह के लिए माता-पिता की अनुमति मिलना, भावि जीवन भारत में ही बिताना आदि। विवाह भारत में ही होगा। मेरी ने इन शर्तोँ को स्वीकार किया। दोनों परिवारों की अनुमति से दिल्ली में उनका विवाह संपन्न हुआ। अपनी जन्म भूमि छोड़ने में मेरी को अत्यंत दु:ख थी। बाद में वह यह सोचकर अपने आप को सहम लिया कि धरती ही उसकी माँ है चाहे वह भारत हो या फ्रांस हो।
पिता शेरसिंह की अनुमति से रूपनारायण के साथ सोनी का विवाह हुआ। दोनों के अथक परिश्रम के फलस्वरूप रूपनगर एक शहर बना। अपने समाज सुधार संबंधी कार्यों से रूपनारायण केंद्रीय सरकार के मंत्री बन गए। मेरी ने भारत को अपनी माता के रूप में स्वीकार किया। यहाँ उपन्यास समाप्त होता है।
‘धरती मेरी माँ’ में लोक जीवन की विशेषताएँ
लोक जीवन के लिए निम्न लिखित विशेषताएँ होना आवश्यक है।
धरती के प्रति आदर
भारत के अधिकांश लोग कृषक या निम्न मध्यवार्गीय परिवार के हैं। भारतीय संस्कृति में परंपरागत मूल्यों को विशेष स्थान है। पारिवारिक संबन्धों को वे ज़्यादा महत्व देते हैं, लेकिन पाश्चात्य संस्कृति में पारिवारिक संबन्ध भी हमारे समान सुदृढ़ नहीं है। पाश्चात्य लोग कपड़ा बदलने के समान विवाह करते और विच्छेद भी करते है।
‘धरती मेरी माँ’ की मेरी एक विदेशी नारी थी। वह हरिचरण के प्रोफेसर ब्राउन की बेटी थी। उसने हरिचरण को प्रेम किया। विवाह के लिए दोनों माता-पिताओं की सहमति भी मिली। हरिचरण के निर्देश में मेरी ने भारतीय नागरिकता प्राप्त की। वह भारत में भावि जीवन व्यतीत करने के लिए हरिचरण के साथ आयी। भारत का भौगोलिक वातावरण मेरी को असहनीय होने लगा।
‘फैशन की नगरी पेरिस में पैदा होकर पली हुई नारी के लिए जंगल का जीवन अभिशाप-सा प्रतीत हुआ। धीरे-धीरे वह विरक्त-सी रहने लगी। वह कभी सोचती कि मैं ने गलत कदम तो नहीं उठाया। मुझे सुख ही क्या मिलता है? जंगलों में पड़े सड़ते रहने में यह ज़िन्दगी कपूर की तरह गल जाएगी।
यह तो सभ्य समाज में पैदा होकर असभ्य और जंगली जीवन बिताना है। यहाँ न कोई सुविधा है और न अच्छा खान-पान है। यह भी क्या कोई ज़िन्दगी है? उसने पेरिस के साथ की तुलना की। उसे असन्तोष ही हुआ।’2
कभी-कभी हरिचरण को भूगर्भ संबन्धी अनुसंधान के लिए घर से दूर जाना पड़ा। उस समय मेरी ने भी उसकी पैरवी की। एक दिन हरि के साथ मेरी जंगल में थी। उस समय भयंकर तूफान के कारण उसका गर्भपात भी हुआ।
एक भूगर्भशास्त्री के रूप में हरिचरण का यश विश्व भर में फैल गया। उनकी कार्य कुशलता के प्रति विश्व के कई भागों से विख्यात भूगर्भशास्त्रियों के पत्र घर में आने लगे। यह पढ़कर मेरी का मन पछतावा से भर गया। हरि की अनुपस्थिति में उसने भूगर्भ शास्त्र से संबंधित कई पत्रिकाएँ और पुस्तकें पढ़ी। उसको मालूम हुआ कि सुख त्याग और तपस्या में है। मेरी ने अपने पिता को एक पत्र भी लिखा – ‘हम लोग पेरिस को अपना स्थायी निवास किसी भी हालत में बनाना नहीं चाहते। यद्यपि इस संबंध में मैं ने अपने पति से सलाह नहीं ली है तथापि मेरा यह दृढ विचार है कि मैं भारत की नारी हूँ, भारत मेरा घर है। ज़मीन – जायदाद के लोभ में पड़कर मैं पेरिस आने को तैयार नहीं हूँ। पेरिस के जीवन में क़ुतूहल, अभिलाषा और संकल्प भरे थे। भारत के जीवन में साधना, श्रम और सिद्धि है। सिद्धि में जो आनन्द है वह अवर्णनीय है।
मेरी धमनियों में जो रक्त बह रहा है उसमें इंगलैंड और फ्रांस का समन्वयात्मक रूप है तो मेरी संतान में भारतीय रक्त का भी संगम हुआ है। इस प्रकार हममें विश्व की सारी विशेषताएँ आ गई हैं। मानव सब एक हैं। उनके सुख-दुःख समान हैं। उनकी आत्माएँ एक हैं।’3
मेरी ने भारत को अपने देश के रूप में स्वीकार किया। आज भारत के कई लोग हमारी संस्कृति के महत्व न जानकर पाश्चात्य संस्कृति के पीछे पागल होकर जाते हैं। इस प्रकार के लोगों को मेरी का चरित्र एक चुनौती है।
गाँवों का विकास
हरिचरण और रूपनारायण बंगाल के नाहर कटिया और सिंगबन में गए। वहाँ की भील जाति के लोगोँ से दोनों का परिचय हो गया। पहाड़ी में पानी का अभाव था। वहाँ की गहरी खुदाई में बहुत जल स्रोत निकले। सिंगबन के लोगोँ को यह कुआँ अत्यंत सहायक था। रूपनारायण और सोनी के प्रयत्न के कारण भील बस्ती में कई परिवर्तन आये। ‘प्रांरभ में कृषि विभाग द्वारा एक ट्रैक्टर मँगवाया गया, ज़मीन समतल की गयी, मेडे बनाई गईं और नहरें खोदी गईं । सिंचाई द्वारा ज़मीन को तर किया गया’4
रूपनारायण ने भील बस्ती में पानी, बिजली, खाद, अस्पताल आदि की सुव्यवस्था की। धीरे-धीरे उन्होंने सोनी के साथ खेती के लिए अपने को समर्पित किया।
प्रकृति के साथ जुड़ाव
‘धरती मेरी माँ’ प्रकृति से संबंधित एक उपन्यास है। हरिचरणदास और रूपनारायण दो विख्यात भूगर्भशास्त्री थे। दोनों को भारत के ग्रामीण वातावरण पसंद थे। एक दिन उन दोनों बंगाल के नाहरकटिया और सिंगबन में गए। वहाँ रूपनारायण ने सोनी नामक भील युवती को विवाह करना चाहा। दोनों के प्रयत्न के कारण भील बस्ती एक नगर के समान बन गयी। रूपनारायण सोनी के साथ एक अच्छा कृषक बन गया।
हरिचरण ने एक विदेशी लड़की मेरी को प्रेम किया। हरिचरण के निर्देशानुसार मेरी ने भारतीय नागरिकता प्राप्त की। विवाह के बाद मेरी को भारत का वातावरण असहनीय होने लगा। ‘वह कभी सोचती कि मैं ने गलत कदम तो उठाया। मुझे सुख ही क्या मिलता है? जंगलों में पड़े सड़ते रहने में यह ज़िन्दगी कपूर की तरह गल जाएगी। यह तो सभ्य समाज में पैदा होकर असभ्य और जंगली जीवन बिताना है। यहाँ न कोई सुविधा है, और न अच्छा खान-पान है। यह भी क्या कोई जिन्दगी है? उसने पेरिस के साथ भारत की तुलना की। उसे असन्तोष ही हुआ।’5 हरिचरण के कठिन प्रयत्न के कारण कृष्णा नदी से मद्रास तक आसानी से जल पहुंचने का प्रबंध किया गया। मेरी को अपनी करनी पर पछतावा आया। ‘मम्मी! मुझे आज मालूम हुआ कि विश्व का कल्याण और समृद्धि, शारीरिक और बौद्धिक श्रम के साथ मानसिक पवित्रता पर निर्भर है। स्वार्थ की पूर्ति से तात्कालिक दैहिक सुख प्राप्त होता है किन्तु सेवा और त्याग से आत्मिक सुख मिलता है, जो मनुष्य को ऊँचा उठाता है।’6
अपने जीवन से मेरी ने यह समझा कि शारीरिक तृप्ति से ज्यादा सुख त्याग और तपस्या में है। उपन्यास के अंत में उसने पेरिस और भारत को एक समान पसंद किया। पेरिस
और भारत धरती के दो भाग हैं। इसलिए उसने धरती को अपनी माता के रूप में माना। मेरी वास्तव में प्रेम और त्याग के प्रतीक है। डॉ. वैजयन्ती की राय में – “धरती मेरी माँ’ की सोनी अपनी निर्भीकता एवं सेवा भाव से और मेरी अपने अनन्य प्रेम एवं कर्तव्यपरायणता से पाठक को अपनी ओर आकृष्ट करती है।’7
दलितों के उद्धार
‘धरती मेरी माँ’ की सोनी एक भील युवती थी। वह अनपढ़ और काली थी। नहाना और कपड़ा धोना उसको पसंद नहीं था। सोनी के पैरों में लोहे के कड़े थे। वह जूता नहीं पहनती थी। उसके केश में तेल का अंश भी नहीं था।
रूपनारायण जिआलॉजिकल सर्वे ऑफ इण्डिया के कर्मचारी थे। भील युवती होते हुए भी सोनी के प्रति उनके मन में विशेष आकर्षण था। ‘रूपनारायण कभी एकांत में बैठकर सोचता कि आखिर इस लड़की के साथ मेरा क्या संबन्ध है? यह तो जंगली, उजड्ड, गँवार, काली और अनपढ़ है पर उसे जवाब नहीं मिलता था। दिल कहता, चाहे कोई हो, वह मानवी है। मानव-सहज स्नेह, प्रेम, दया, करुणा आदि भावों से उसका दिल लबालब भरा हुआ है। मानव का मापदण्ड़ उसका बाहरी परिवेश नहीं, बल्कि उसकी आंतरिक स्निग्धता और कोमलता पूर्ण मानवता है।’8
रूपनारायण के साथ सोनी का विवाह हुआ। उनके प्रयत्न के कारण सोनी की आदत और वेश-भूषा बदल गयी। उसका प्रिय वेश साड़ी था। उसके हाथ में घड़ी और वैनिटी बेग भी था। वह पढ़ने लगी थी। उसने रूपनारायण के साथ अपनी भील बस्ती को एक छोटा शहर बनाया।
‘उन दोनों के अथक परिश्रम से संथालों की चार बस्तियों के लिए स्कूल, अस्पताल, डाक घर, सहकारी बैंक, हाट इत्यादि का प्रबन्ध हो गया।………………….उस नई बस्ती में नल, बिजली का भी प्रबन्ध किया गया। कुछ समय के पश्चात् वहाँ ट्रकें व लारियाँ भी आने लगी, खरीद-फरोख्त का काम तेज़ी से चलने लगा।
देखते-देखते वह बस्ती शहर का रूप लेने लगी। आसपास के सभी देहातियों ने मिलकर उस बस्ती का नामकरण ‘रूपनगर’ किया।’9 सोनी राज्य महिला मण्डल की कार्यकारिणी समिति की सदस्या भी बन गयी।
डॉ. बालशौरि रेड्डी ने सोनी के माध्यम से दलितों को ही नहीं सभी पाठकों के मन में एक नयी ऊर्जा प्रदान की है। अपने कर्म के सहारे सभी उन्नत बन सकते हैं। इसमें धर्म या जाति या लिंग एक बाधा नहीं है। दलित या लिंग के नाम पर एक व्यक्ति को समाज की मुख्य धारा से दूर हटाना उचित नहीं है। उत्तर भारत के कई गाँवों में आज भी जाति व्यवस्था शक्त है। दलितों के उद्धार के लिए लड़ना सभी नागरिकों का कर्तव्य है।
संदर्भ सूची
- डॉ. बालशौरि रेड्डी, धरती मेरी माँ, पृष्ठ संख्या : 145
- डॉ. बालशौरि रेड्डी, धरती मेरी माँ, पृष्ठ संख्या : 151
- डॉ. बालशौरि रेड्डी, धरती मेरी माँ, पृष्ठ संख्या : 163-164
- डॉ. बालशौरि रेड्डी, धरती मेरी माँ, पृष्ठ संख्या : 72
- डॉ. बालशौरि रेड्डी, धरती मेरी माँ, पृष्ठ संख्या : 151
- डॉ. बालशौरि रेड्डी, धरती मेरी माँ, पृष्ठ संख्या : 160
- डॉ. वैजयंती, ‘डॉ. बालशौरि रेड्डी के उपन्यासों में चित्रित नारी के विविध रूप’,
‘केरल ज्योति’, अगस्त 2010, पृष्ठ संख्या : 17
- डॉ. बालशौरि रेड्डी, धरती मेरी माँ, पृष्ठ संख्या : 77-78
- डॉ. बालशौरि रेड्डी, धरती मेरी माँ, पृष्ठ संख्या : 140





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