प्रस्तावना

भारत केवल एक राष्ट्र नहीं, बल्कि एक ज्ञान-प्रधान सभ्यता है। इसकी सभ्यता का विकास राजनैतिक सत्ता या सैन्य शक्ति से अधिक, ज्ञान, दर्शन और सांस्कृतिक चेतना के माध्यम से हुआ है। भारतीय ज्ञान परंपरा की सबसे बड़ी विशेषता इसकी निरंतरता है—यह परंपरा वेदकाल से लेकर आधुनिक युग तक विभिन्न रूपों में जीवित रही है। इस निरंतरता को बनाए रखने में लोक साहित्य की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण रही है।

लोक साहित्य भारतीय समाज की सामूहिक चेतना का वह स्वर है, जिसमें सामान्य जन का अनुभव, विश्वास, संघर्ष और जीवन-दर्शन समाहित है। यह ज्ञान का वह रूप है जो शास्त्रों से निकलकर खेतों, जंगलों, गांवों, मेलों और उत्सवों तक पहुँचा। जहाँ शास्त्र बौद्धिक अनुशासन प्रदान करते हैं, वहीं लोक साहित्य उस ज्ञान को जीवनोपयोगी और व्यवहारिक बनाता है।

भारतीय सभ्यता विश्व की प्राचीनतम और निरंतर प्रवाहित सभ्यताओं में से एक है। इसकी विशिष्टता केवल इसकी भौगोलिक या राजनीतिक निरंतरता में नहीं, बल्कि इसकी ज्ञान परंपरा में निहित है, जो सहस्राब्दियों से मौखिक, सांकेतिक और व्यवहारिक रूपों में संरक्षित रही है। यह ज्ञान परंपरा केवल शास्त्रों तक सीमित नहीं रही, बल्कि लोक साहित्य के माध्यम से जनसामान्य के जीवन में रची-बसी रही है।

लोक साहित्य भारतीय ज्ञान परंपरा का वह जीवंत रूप है, जिसमें दर्शन, नैतिकता, अध्यात्म, सामाजिक मूल्य और जीवन-बोध सहज रूप में अभिव्यक्त होते हैं। जहाँ एक ओर वेद, उपनिषद, स्मृतियाँ और दर्शनशास्त्र भारतीय बौद्धिक परंपरा का शास्त्रीय पक्ष प्रस्तुत करते हैं, वहीं लोकगीत, लोककथाएँ, कहावतें, लोकोक्तियाँ और लोकनाट्य उसी ज्ञान को जनसुलभ बनाते हैं।

यह लेख भारतीय ज्ञान परंपरा और लोक साहित्य के अंतर्संबंधों का समग्र अध्ययन प्रस्तुत करता है। इस लेख में भारतीय ज्ञान परंपरा और लोक साहित्य के पारस्परिक संबंध, दार्शनिक आधार, सामाजिक भूमिका तथा समकालीन संदर्भों में उसकी प्रासंगिकता का विस्तृत विश्लेषण किया गया है।

  • भारतीय ज्ञान परंपरा का स्वरूप

भारतीय ज्ञान परंपरा अत्यंत व्यापक और प्राचीन है। इसका प्रारंभ वैदिक काल से माना जाता है। इस परंपरा में ज्ञान को केवल बौद्धिक या सैद्धांतिक विषय नहीं माना गया, बल्कि इसे जीवन के समग्र विकास से जोड़ा गया है।

भारतीय परंपरा में ज्ञान को तीन स्तरों पर समझा गया है—

  1. आध्यात्मिक ज्ञान
  2. नैतिक और दार्शनिक ज्ञान
  3. व्यावहारिक और सामाजिक ज्ञान

वेदों में ज्ञान को मुक्ति का मार्ग माना गया है। उपनिषदों में “आत्मा” और “ब्रह्म” के संबंध पर गहन विचार किया गया है। भारतीय दर्शन में ज्ञान का उद्देश्य केवल बौद्धिक जिज्ञासा को संतुष्ट करना नहीं बल्कि मानव जीवन को सार्थक बनाना है।

भारतीय ज्ञान परंपरा का एक महत्वपूर्ण पहलू यह है कि इसमें “वसुधैव कुटुम्बकम्” और “सर्वे भवन्तु सुखिनः” जैसे सार्वभौमिक आदर्शों को महत्व दिया गया है।[1]

इसी कारण भारतीय ज्ञान परंपरा में मानव, प्रकृति और समाज के बीच संतुलन और समन्वय को महत्वपूर्ण माना गया है।

  • भारतीय ज्ञान परंपरा: अर्थ और दार्शनिक दृष्टि

भारतीय परंपरा में ज्ञान का अर्थ केवल सूचना या तर्क नहीं है। यहाँ ज्ञान का तात्पर्य है—आत्मबोध, जीवनबोध और सत्यबोध। उपनिषदों में ज्ञान को मोक्ष का साधन माना गया है—

“सा विद्या या विमुक्तये”[2]

अर्थात् वही विद्या है जो मनुष्य को अज्ञान और बंधन से मुक्त करे। भारतीय ज्ञान परंपरा जीवन को समग्र रूप में देखने की परंपरा है, जिसमें भौतिक और आध्यात्मिक दोनों पक्षों का संतुलन है।

2.1 पुरुषार्थ सिद्धांत

भारतीय ज्ञान परंपरा चार पुरुषार्थों पर आधारित है—

  • धर्म
  • अर्थ
  • काम
  • मोक्ष

यह सिद्धांत लोक साहित्य में भी प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से विद्यमान है। लोककथाएँ धर्म और नैतिकता का संदेश देती हैं, लोकगीत जीवन के काम और अर्थ पक्ष को अभिव्यक्त करते हैं, और आध्यात्मिक लोककथाएँ मोक्ष की अवधारणा से जुड़ी होती हैं।

  • भारतीय ज्ञान परंपरा के प्रमुख स्रोत

भारतीय ज्ञान परंपरा बहुस्तरीय और बहुआयामी है। इसके प्रमुख स्रोत निम्नलिखित हैं—

  • वेद, उपनिषद, ब्राह्मण और आरण्यक ग्रंथ
  • दर्शनशास्त्र (षड्दर्शन)
  • महाकाव्य—रामायण और महाभारत
  • पुराण साहित्य
  • बौद्ध एवं जैन दर्शन
  • लोक परंपराएँ और लोक साहित्य

इन सभी स्रोतों में ज्ञान का उद्देश्य लोककल्याण, नैतिकता और आत्मविकास रहा है।

  • लोक साहित्य: अर्थ, स्वरूप और विशेषताएँ

लोक साहित्य वह साहित्य है जो लोक द्वारा, लोक के लिए और लोक में रचा गया है। यह साहित्य मौखिक परंपरा के माध्यम से पीढ़ी-दर-पीढ़ी आगे बढ़ता है। इसमें किसी एक लेखक की नहीं, बल्कि पूरे समाज की सहभागिता होती है।

डॉ. हजारीप्रसाद द्विवेदी के अनुसार—

“लोक साहित्य लोकमानस की सहज, स्वाभाविक और सामूहिक अभिव्यक्ति है।”[3]

4.1 लोक साहित्य की प्रमुख विशेषताएँ

  • मौखिक परंपरा पर आधारित
  • जनभाषा में रचित
  • सामूहिक अनुभव का परिणाम
  • नैतिक और जीवनोपयोगी
  • समय और समाज के अनुसार परिवर्तनशील

4.2 लोक साहित्य की परिभाषा

लोक साहित्य वह साहित्य है जो—

  • लोक द्वारा रचा गया हो
  • मौखिक परंपरा से संप्रेषित हो
  • सामूहिक चेतना की अभिव्यक्ति हो

4.3 लोक साहित्य के प्रकार

भारतीय लोक साहित्य अनेक रूपों में विद्यमान है—

  • लोकगीत (जन्म, विवाह, ऋतु, श्रम गीत)
  • लोककथाएँ और दंतकथाएँ
  • लोकनाट्य (नौटंकी, तमाशा, यक्षगान)
  • लोकोक्तियाँ और कहावतें
  • पहेलियाँ और कथन

ये सभी रूप ज्ञान को अनौपचारिक लेकिन प्रभावशाली ढंग से संप्रेषित करते हैं।

Ø 5. लोक साहित्य की अवधारणा

लोक साहित्य वह साहित्य है जो किसी समाज की जनता द्वारा रचा जाता है और मौखिक परंपरा के माध्यम से पीढ़ी दर पीढ़ी आगे बढ़ता है। यह साहित्य किसी एक लेखक की रचना नहीं होता, बल्कि सामूहिक अनुभवों का परिणाम होता है।

लोक साहित्य के प्रमुख रूप निम्नलिखित हैं—

  1. लोकगीत
  2. लोककथाएँ
  3. लोकगाथाएँ
  4. कहावतें और मुहावरे
  5. लोकनाट्य

लोक साहित्य की सबसे महत्वपूर्ण विशेषता यह है कि यह जनजीवन से गहराई से जुड़ा होता है। इसमें ग्रामीण जीवन, कृषि संस्कृति, पारिवारिक संबंध, सामाजिक मूल्य और धार्मिक विश्वासों का सहज चित्रण मिलता है।

लोक साहित्य केवल मनोरंजन का साधन नहीं है, बल्कि यह समाज की सामूहिक स्मृति और सांस्कृतिक पहचान का माध्यम भी है।[4]

  • लोक साहित्य के प्रमुख रूप

6.1 लोकगीत

लोकगीत मानव जीवन के प्रत्येक चरण से जुड़े होते हैं—जन्म, विवाह, श्रम, ऋतु, पर्व और मृत्यु। इनमें सामाजिक संरचना, स्त्री-पुरुष संबंध और जीवन-दर्शन स्पष्ट रूप से दिखाई देता है।

6.2 लोककथाएँ और दंतकथाएँ

लोककथाएँ भारतीय ज्ञान परंपरा की कथात्मक अभिव्यक्ति हैं। इनमें कर्मफल, सत्य की विजय, त्याग और करुणा जैसे मूल्य निहित होते हैं।

6.3 लोकनाट्य

रामलीला, नौटंकी, यक्षगान जैसे लोकनाट्य शास्त्रीय कथाओं को लोकजीवन से जोड़ते हैं और ज्ञान को दृश्य रूप में प्रस्तुत करते हैं।

6.4 कहावतें और लोकोक्तियाँ

कहावतें भारतीय लोकज्ञान का संक्षिप्त लेकिन गहन रूप हैं, जैसे—

“जैसा करोगे, वैसा भरोगे।”[5]

  • 7. भारतीय ज्ञान परंपरा और लोक साहित्य का अंतर्संबंध

लोक साहित्य भारतीय ज्ञान परंपरा का लोकाभिमुख रूपांतरण है। शास्त्रों में निहित दार्शनिक सिद्धांत लोक साहित्य में कथाओं, गीतों और प्रतीकों के माध्यम से व्यक्त होते हैं।

7.1 कर्म सिद्धांत

कर्म सिद्धांत भारतीय दर्शन का मूल तत्व है। लोक साहित्य में यह नैतिक कथाओं के रूप में प्रकट होता है, जहाँ प्रत्येक कर्म का फल निश्चित माना गया है।[6]

7.2 धर्म और कर्तव्य

लोक साहित्य में धर्म का अर्थ केवल पूजा-पाठ नहीं, बल्कि सत्य, करुणा और सामाजिक उत्तरदायित्व है।

7.3 आत्मा और पुनर्जन्म

कई लोककथाओं में आत्मा की अमरता और पुनर्जन्म की अवधारणा मिलती है, जो उपनिषदिक दर्शन से जुड़ी हुई है।

7.4 शास्त्र से लोक तक ज्ञान का प्रवाह

भारतीय समाज में ज्ञान केवल आश्रमों या गुरुकुलों तक सीमित नहीं रहा। वह लोक के जीवन में—

  • कथाओं के रूप में
  • गीतों के माध्यम से
  • प्रतीकों और मिथकों द्वारा

प्रवाहित होता रहा। उदाहरणस्वरूप, उपनिषदों के ब्रह्म-आत्मा सिद्धांत लोककथाओं में “आत्मा की यात्रा” के रूप में दिखाई देते हैं।

7.5 लोक साहित्य: शास्त्रीय ज्ञान का लोकतंत्रीकरण

लोक साहित्य ने—

  • जटिल दार्शनिक अवधारणाओं को सरल बनाया
  • ज्ञान को वर्गविशेष तक सीमित होने से रोका
  • स्त्री, श्रमिक और वंचित वर्गों को अभिव्यक्ति दी

इस प्रकार लोक साहित्य ज्ञान का लोकतंत्रीकरण करता है।[7]

Ø 8. भारतीय ज्ञान परंपरा और लोक साहित्य का संबंध

भारतीय ज्ञान परंपरा और लोकसाहित्य के बीच गहरा संबंध है। भारतीय शास्त्रीय ग्रंथों में जो जीवनमूल्य और दार्शनिक विचार प्रस्तुत किए गए हैं, वे लोकसाहित्य के माध्यम से आम जनता तक पहुँचे।

उदाहरण के लिए—

  • रामायण और महाभारत की कथाएँ लोककथाओं और लोकनाट्यों में व्यापक रूप से प्रचलित हैं।
  • भक्ति आंदोलन के संतों—कबीर, तुलसीदास, मीरा, सूरदास—की शिक्षाएँ लोकगीतों और भजनों के माध्यम से जनसाधारण तक पहुँचीं।

इस प्रकार लोकसाहित्य भारतीय ज्ञान परंपरा का लोकव्यापी स्वरूप है।[8]

 

  • लोक साहित्य में दार्शनिक तत्व

लोक साहित्य में गहन दार्शनिक तत्व निहित होते हैं। भले ही यह साहित्य सरल और सहज भाषा में व्यक्त होता है, लेकिन इसमें जीवन के गहरे सत्य छिपे होते हैं।

9.1 कर्म और भाग्य का सिद्धांत

भारतीय लोककथाओं में कर्म और भाग्य की अवधारणा बार-बार दिखाई देती है। लोककथाएँ यह संदेश देती हैं कि मनुष्य को अपने कर्मों के अनुसार ही फल प्राप्त होता है।

कर्म का सिद्धांत भारतीय दर्शन का मूल तत्व है। लोककथाओं में यह इस रूप में मिलता है—

“जैसा करोगे, वैसा भरोगे।”

यह कथन कर्मफल सिद्धांत का लोक रूप है।[9]

9.2 पुनर्जन्म और आत्मा

कई लोककथाओं में आत्मा का पुनर्जन्म, पूर्वजन्म के कर्म और नियति की चर्चा मिलती है, जो उपनिषदिक दर्शन से जुड़ी है।

9.3 अद्वैत और समता

लोक साहित्य में जाति, वर्ग और धन से ऊपर मानवता और करुणा को महत्व दिया गया है, जो अद्वैत वेदांत की लोक-अभिव्यक्ति है।

9.4 नैतिक मूल्यों का महत्व

लोककथाओं और लोकगीतों में सत्य, अहिंसा, दया, करुणा, त्याग और परोपकार जैसे नैतिक मूल्यों को महत्व दिया गया है।

9.5 प्रकृति के साथ संबंध

भारतीय लोकसाहित्य में प्रकृति के साथ गहरा संबंध दिखाई देता है। पेड़-पौधे, नदियाँ, पर्वत, पशु-पक्षी आदि लोकगीतों और कथाओं में महत्वपूर्ण स्थान रखते हैं।

यह दृष्टिकोण भारतीय दर्शन में वर्णित प्रकृति और मानव के समन्वय की भावना को व्यक्त करता है।

Ø 10. सांस्कृतिक दृष्टि से लोक साहित्य

लोकसाहित्य किसी समाज की संस्कृति का जीवंत दस्तावेज होता है। इसमें समाज के रीति-रिवाज, त्योहार, परंपराएँ और जीवनशैली का विस्तृत चित्रण मिलता है।

10.1 त्योहार और परंपराएँ

भारतीय लोकगीतों में विभिन्न त्योहारों—होली, दीपावली, नवरात्रि, विवाह, जन्म आदि—का वर्णन मिलता है।

10.2 लोकनाट्य और लोककलाएँ

भारत के विभिन्न क्षेत्रों में अनेक लोकनाट्य परंपराएँ विकसित हुई हैं, जैसे—

  • नौटंकी
  • तमाशा
  • यक्षगान
  • भवाई

इन लोकनाट्यों में धार्मिक कथाएँ, ऐतिहासिक घटनाएँ और सामाजिक संदेश प्रस्तुत किए जाते हैं।[10]

10.3 सांस्कृतिक एकता

भारत विविधताओं का देश है, लेकिन लोकसाहित्य इन विविधताओं के बीच सांस्कृतिक एकता स्थापित करता है।

  • लोक साहित्य और सामाजिक चेतना

लोक साहित्य समाज का केवल मनोरंजन नहीं करता, बल्कि सामाजिक मार्गदर्शन भी करता है। यह—

  • सामाजिक कुरीतियों पर प्रहार करता है
  • नैतिक मूल्यों को सुदृढ़ करता है
  • सामूहिक पहचान का निर्माण करता है

लोक साहित्य में नायक अक्सर साधारण व्यक्ति होते हैं, जो नैतिक आचरण और परिश्रम से महान बनते हैं।

Ø 12. सामाजिक दृष्टि से लोक साहित्य

लोक साहित्य समाज के विभिन्न पहलुओं को उजागर करता है। इसमें सामाजिक संबंधों, संघर्षों और मूल्यों का चित्रण मिलता है।

12.1 सामाजिक संबंध

लोकगीतों में परिवार, विवाह, भाई-बहन, माता-पिता आदि संबंधों का भावपूर्ण चित्रण मिलता है।

12.2 सामाजिक न्याय और समानता

कई लोककथाएँ सामाजिक अन्याय के विरुद्ध आवाज उठाती हैं और समानता का संदेश देती हैं।

12.3 स्त्री की भूमिका

लोक साहित्य में स्त्री की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण है। विवाह गीत, सोहर गीत, कजरी आदि में स्त्री के अनुभवों और भावनाओं का चित्रण मिलता है।

 

  • लोक साहित्य और नैतिक शिक्षा

लोक साहित्य का एक प्रमुख उद्देश्य नैतिक शिक्षा देना है—

  • सत्य
  • अहिंसा
  • करुणा
  • सहअस्तित्व

लोककथाओं के नायक अक्सर साधारण व्यक्ति होते हैं, जो अपने नैतिक आचरण से महान बनते हैं।

  • स्त्री चेतना और लोक साहित्य

लोक साहित्य में स्त्री की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण है। स्त्री-गीतों में—

  • पीड़ा और संघर्ष
  • मातृत्व और करुणा
  • विरह और आत्मसम्मान

की सशक्त अभिव्यक्ति मिलती है। शक्ति-पूजा और देवी-आराधना लोक साहित्य में स्त्री को सृजनात्मक शक्ति के रूप में प्रस्तुत करती है।

लोक साहित्य में स्त्री केवल पात्र नहीं, बल्कि अनुभव की वाहक है—

  • स्त्री गीतों में पीड़ा और प्रतिरोध
  • लोककथाओं में बुद्धिमान नायिकाएँ
  • मातृशक्ति की आराधना

यह भारतीय ज्ञान परंपरा में शक्ति-तत्व की अभिव्यक्ति है।

  • लोक साहित्य और पर्यावरणीय ज्ञान

भारतीय लोक साहित्य में प्रकृति के प्रति गहरा सम्मान दिखाई देता है—

  • वृक्षों और नदियों की पूजा
  • पशु-पक्षियों के प्रतीक
  • प्रकृति के साथ सहजीवन

यह लोकज्ञान आज के पर्यावरण संकट के संदर्भ में अत्यंत प्रासंगिक है।[11]

  • आधुनिक युग में लोक साहित्य की प्रासंगिकता

वैश्वीकरण और तकनीकी युग में लोक साहित्य—

  • सांस्कृतिक पहचान को सुरक्षित रखता है
  • स्थानीय ज्ञान को संरक्षित करता है
  • वैकल्पिक विकास-दृष्टि प्रस्तुत करता है

आज आवश्यकता है कि लोक साहित्य को शिक्षा, शोध और सांस्कृतिक नीति का अभिन्न अंग बनाया जाए।

Ø 17. आधुनिक समय में लोक साहित्य का महत्व

आधुनिक युग में वैश्वीकरण और तकनीकी विकास के कारण पारंपरिक लोकसंस्कृति पर प्रभाव पड़ा है। फिर भी लोक साहित्य आज भी महत्वपूर्ण है क्योंकि—

  1. यह सांस्कृतिक पहचान को बनाए रखता है।
  2. यह समाज के नैतिक मूल्यों को संरक्षित करता है।
  3. यह नई पीढ़ी को अपनी जड़ों से जोड़ता है।

आज कई विश्वविद्यालयों और शोध संस्थानों में लोकसाहित्य का अध्ययन किया जा रहा है।

Ø 18. संरक्षण और संवर्धन की आवश्यकता

लोकसाहित्य मौखिक परंपरा पर आधारित होने के कारण इसके लुप्त होने का खतरा है। इसलिए इसके संरक्षण के लिए निम्न प्रयास आवश्यक हैं—

  • लोकगीतों और लोककथाओं का दस्तावेजीकरण
  • लोककलाकारों को प्रोत्साहन
  • शैक्षणिक पाठ्यक्रमों में लोकसाहित्य का समावेश
  • डिजिटल माध्यमों के द्वारा संरक्षण

  • निष्कर्ष

भारतीय ज्ञान परंपरा और लोक साहित्य एक ही सांस्कृतिक धारा के दो रूप हैं। शास्त्र ज्ञान को दार्शनिक ऊँचाई प्रदान करते हैं, जबकि लोक साहित्य उसे जीवन की धरातल पर उतारता है। लोक साहित्य भारतीय ज्ञान परंपरा का जीवंत, लोकमूलक और निरंतर प्रवाहित स्वरूप है।

अतः भारतीय ज्ञान परंपरा को समझने, संरक्षित करने और भविष्य तक पहुँचाने के लिए लोक साहित्य का अध्ययन और संरक्षण अनिवार्य है।

भारतीय ज्ञान परंपरा और लोक साहित्य एक-दूसरे के पूरक हैं। जहाँ शास्त्र ज्ञान को दार्शनिक ऊँचाई प्रदान करते हैं, वहीं लोक साहित्य उसे जीवन की धरातल पर उतारता है। लोक साहित्य भारतीय ज्ञान परंपरा का जीवित दस्तावेज है, जो आज भी समाज को दिशा देता है।

यदि भारतीय ज्ञान परंपरा को समझना है, तो लोक साहित्य को उसके मूल स्रोत के रूप में स्वीकार करना अनिवार्य है।

भारतीय ज्ञान परंपरा और लोकसाहित्य एक-दूसरे के पूरक हैं। भारतीय दर्शन और शास्त्रीय ज्ञान ने लोकजीवन को दिशा दी, जबकि लोकसाहित्य ने इन विचारों को जनसाधारण तक पहुँचाने का कार्य किया।

लोकसाहित्य में निहित दार्शनिक, सांस्कृतिक और सामाजिक तत्व भारतीय समाज की गहरी समझ प्रदान करते हैं। यह केवल अतीत की धरोहर नहीं बल्कि वर्तमान और भविष्य के लिए भी प्रेरणा का स्रोत है।

आज आवश्यकता है कि हम भारतीय ज्ञान परंपरा और लोकसाहित्य के संरक्षण और अध्ययन को अधिक महत्व दें ताकि हमारी सांस्कृतिक विरासत आने वाली पीढ़ियों तक सुरक्षित रह सके।

  • संदर्भ-ग्रंथ सूची

 

  1. वाल्मीकि — रामायण
  2. वेदव्यास — महाभारत
  3. राधाकृष्णन, डॉ. सर्वपल्ली — Indian Philosophy
  4. द्विवेदी, हजारीप्रसाद — लोक साहित्य और संस्कृति
  5. दिनकर, रामधारी सिंह — संस्कृति के चार अध्याय
  6. शर्मा, रामकुमार — भारतीय लोक साहित्य
  7. देसाई, नर्मदा प्रसाद — लोक जीवन और दर्शन
  8. राधाकृष्णन, एस. भारतीय दर्शन। नई दिल्ली: राजपाल एंड संस।
  9. हजारीप्रसाद द्विवेदी. भारतीय संस्कृति की रूपरेखा। दिल्ली: राजकमल प्रकाशन।
  10. रामविलास शर्मा. भारतीय संस्कृति और हिंदी साहित्य। नई दिल्ली: वाणी प्रकाशन।
  11. रामनरेश त्रिपाठी. लोक साहित्य की रूपरेखा। इलाहाबाद: साहित्य भवन।
  12. श्यामसुंदर दास. हिंदी साहित्य का इतिहास। वाराणसी: नागरी प्रचारिणी सभा।
  13. कपिल कपूर. भारतीय ज्ञान परंपरा। नई दिल्ली: भारतीय भाषा संस्थान।

[1] राधाकृष्णन, एस. भारतीय दर्शन, राजपाल एंड संस, नई दिल्ली, 1999।

[2] ईशोपनिषद, श्लोक 11

[3] द्विवेदी, हजारीप्रसाद — लोक साहित्य और संस्कृति, पृ. 15

[4] रामनरेश त्रिपाठी, लोक साहित्य की रूपरेखा, साहित्य भवन, इलाहाबाद, 2005।

[5] कपिल कपूर. भारतीय ज्ञान परंपरा। नई दिल्ली: भारतीय भाषा संस्थान।

[6] दिनकर, रामधारी सिंह — संस्कृति के चार अध्याय, पृ. 64

[7] श्यामसुंदर दास. हिंदी साहित्य का इतिहास। वाराणसी: नागरी प्रचारिणी सभा।

[8] रामनरेश त्रिपाठी. लोक साहित्य की रूपरेखा। इलाहाबाद: साहित्य भवन।

[9] शर्मा, रामधारी सिंह दिनकर, संस्कृति के चार अध्याय, पृ. 62

[10] रामविलास शर्मा. भारतीय संस्कृति और हिंदी साहित्य। नई दिल्ली: वाणी प्रकाशन।

[11] गुप्ता, कपिलदेव — लोक साहित्य और पर्यावरण, पृ. 120

तबस्सुमबानु अल्लारखा मलेक
दर्शनशस्त्र विभाग
नलिनी-अरविन्द एंड टी.वी. पटेल आर्ट्स कॉलेज
tabassummalek95@gmail.com
वल्लभ विध्यानगर