मन एकाकी सा

मन एकाकी सा विस्मृत विस्मृत

लगा सोचने काल चक्र गति

वो निश्चिन्त कुलाचें भरता बचपन

माँ का प्यार, था कैसा पावन

अतीत के धूमिल होते पल क्षिन

पल भर कहाँ ठहरता जीवन

कुछ क्षण बीते फिर आया यौवन

क्रीडा हमसे काल ये करता

हर दाव जीतता, हार गये हम

मन एकाकी सा…

मैं सोच रहा हूँ, ये जीवन क्या है?

हार जीत का भ्रम क्यों पाला है?

गर सीख सकें हम बचपन से

हो आह्लादित, कर खुद को समर्पित

मन एकाकी सा…

संकल्प का सूर्योदय

बीत गया इक और बसंत

फिर पतझड़ का मौसम आया

फिर दिन बीते वर्ष भी गया

सोच रहा हूँ क्या खोया मैंने क्या पाया?

हे ! समय कभी गर समय मिले तो

साथ बैठना बात हमें कुछ करनी हैं

सुख, दुःख, प्रलाप हो या शीतोष्ण भयंकर

क्या ये कर्मो के प्रतिफल हैं?

क्या कर्म के बंधन से

मैं मुक्त कभी हो पाउँगा ?

या मार वक्त का पड़ते ही

छिन्न-भिन्न हो जाऊंगा?

पर मन में है उमंग

है नव जीवन

संचित मन में उगते सूरज की आभा है

एक नया दिवस है, नया वर्ष है

चरम बिंदु पर जाना है

हे प्रभु ! धन्यवाद करो स्वीकार

ये जीवन मुझपे क़र्ज़ रहा

हो हर प्रयास अब चरम लक्ष्य

ये मेरा दृढ़ संकल्प रहा |