भारत में लोक और लोक में भारत भारतीय संस्कृति और उसकी परंपराओं का निर्माण अनेक कारकों से हुआ है। इन कारकों में जितना क्षेत्रीय विविधता की भूमिका है, उतनी हीउनकी […]
बंजारा लोक साहित्य का भाषावैज्ञानिक अध्ययन – जेतलाल नामदेव राठौड़, डॉ. एस. के. मोहम्मद शाकिर एस. के. बाशिर
सारांश:- भारतीय लोक संस्कृति में विविध जाति, धर्म एवं समाज के प्रति लोक साहित्य पाया जाता है। मराठी लोक साहित्य, हिंदी लोक साहित्य, अहिराणी लोक साहित्य, राजस्थानी लोक साहित्य […]
भारतीय ज्ञान परंपरा और लोक साहित्य – डॉ.लिट्टी योहन्नान
सार (Abstract) प्रस्तुत शोध-लेख भारतीय ज्ञान परंपरा और लोक साहित्य के अंतर्संबंधों का विस्तृत अध्ययन प्रस्तुत करता है। भारतीय ज्ञान परंपरा एक समग्र, जीवनोपयोगी और लोकमंगलकारी दृष्टि प्रदान करती है, […]
भारतीय अध्यात्म, दर्शन एवं संस्कृति के बोलते चित्र: लोक साहित्य का दार्शनिक एवं सांस्कृतिक विश्लेषण – डॉ. उमा शंकरभाई शर्मा
सार (Abstract) भारतीय लोक साहित्य भारतीय अध्यात्म, दर्शन और संस्कृति का सजीव एवं गतिशील प्रतिबिंब है। यह केवल मनोरंजन या मौखिक परंपरा का साधन नहीं, बल्कि जीवन-दृष्टि, नैतिक मूल्यों, आध्यात्मिक […]
‘कुमाऊनी लोकसाहित्य में स्त्री संघर्ष’ – गीता तिवारी
सारांश: अबला जीवन हाय! तुम्हारी यही कहानी आंचल में है दूध और आंखों में पानी”1 लोक साहित्य में स्त्री संघर्ष का चित्रण अत्यंत सजीवता एवं यथार्थता के साथ अभिव्यक्त हुआ है। ‘कुमाउनी लोक साहित्य में स्त्री संघर्ष’ शोध पत्र में पितृसत्तात्मक समाज के बीच महिलाओं के बहुआयामी संघर्ष को दर्शाया जाएगा । कुमाऊनी लोक साहित्य के अंतर्गत लोकगीतों, लोककथाओं,लोकगाथाओं, कहावतों, लोकनाट्यों, मुहावरें आदि […]
लोक की बोलियों का मानवीय जीवन मूल्यों के संरक्षण में विशेष योगदान – नविता मीना
लोक की बोलियाँ किसी भी समाज की सांस्कृतिक पहचान और जीवन शैली की सजीव अभिव्यक्ति होती हैं। ये बोलियाँ केवल संवाद का माध्यम ही नहीं हैं, बल्कि समाज के अनुभवों, […]
राजस्थान के लोक नृत्य का अध्ययन – डॉ. शिवकुमार
राजस्थान नाम आते ही हमारे मन में रेगिस्तान की उड़ती रेत और टीले, राजपूत की वीरता, आलीशान किले और महल, यहां के मेले, त्यौहार, खान-पांन, रंगीन वेशभूषा ,ढ़लोक ,गीत और […]
लोक कथाएँ बाल साहित्य की अमूल्य धरोहर – डॉ. नीलू सिंह
भारतीय ज्ञान परम्परा हजारों वर्ष पुराना एक जीवंत और अद्भुत खजाना है। जो वेदों, उपनिषदों और लोक साहित्य के माध्यम से विकसित हुआ है। भारत में लोक का अर्थ ‘जनमानस […]
क्षेत्रीय अस्मिता और लोकनृत्य – डॉ प्रदीप रेवाप्पा सरवदे और प्राजक्ता उमेश अभ्यंकर
सारांश: भारत विविधताओं से संपन्न देश है। खान-पान, रहन-सहन, बोली-भाषा आदि भिन्नताएँ होने पर भी भारत में एकता,अखंडता नजर आती है। भाषा की तरह लोक नृत्य के माध्यम से […]
लोक जीवन शैली पर आधुनिकता का प्रभाव (साहित्य और सिनेमा के संदर्भ में एक अध्ययन) – प्रिया
प्रस्तावना भारतीय समाज की सांस्कृतिक संरचना में लोक जीवन का अत्यंत महत्वपूर्ण स्थान रहा है। लोक जीवन केवल ग्रामीण परिवेश या पारंपरिक जीवन शैली का पर्याय नहीं है, बल्कि यह […]






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