हां यही बुजुर्ग पेड़ हैं गांव का…
हां यही बुजुर्ग पेड़ हैं गांव का…
इमली का…सबका पसंदीदा
नाम सुनते ही जिव्हा लपलपाती है ना!
आपकी ही नहीं,हमारे दादा-दादी,
दादा-परदादी की भी
अनेकों कहानियां जुड़ी है इस पेड़ के साथ…
उन दिनों की बात है…
कोई यातायात के साधन नहीं थे..
गांव नजर आने से पहले
इस पेड़ के दर्शन हो जाते थे
मॉं की उंगली पकड़कर पैदल चले आते थे
हमारे छोटे-छोटे पैर दर्द से कराह उठते थे।
तब मॉ कहती कि…देख इमली का पेड़
दिखाऽऽ! दिखाऽऽ! न
बस वही गांव…है
मेरी तरह सभी
पैदल संवारी तसल्ली पा लेते थे कि,
अब नजदीक आ गया है।
चंद समय में पहुंच जाएंगे
गांव में प्रवेश होने से पहले
इमली के पेड़ से पहली मुलाकात होती थी
सबके स्वागत हेतु बांहें फैलाए खडा हैं
बडा डेरेदार, ऊंची कद काठी का
उतना ही विस्तीर्ण गोलाकार
अनेकों पीढ़ियों का आधार।
समीप ही जिला परिषद की सरकारी
पाठशाला हैं…बच्चों का डेरा हमेशा लगा रहता,
यह पेड़ बच्चों के लिए दादा की तरह था।
हंसते- मस्ती करते बच्चों का अड्डा था ।
वृद्धों के गपशप का मुक्त ठिकाना था।
धुप में अनिवासियों का आशियाना था।
हां यही बुजुर्ग पेड़ हैं गांव का…
इमली का…
यहां कोई पछपात
जात-पात,कुल,संप्रदायों का तो कतई नहीं
तीनों मौसमों को झेलता
धुप में घनी छांव देता …
पतझड़ में उसकी सारी धमनियां
दिख पड़ती थी, बुजुर्ग दादा की तरह
छांलो का सफेद पण दादी के,
सफेद बालों का दर्शन करा जाता था।
अजब गजब किस्से हैं इसके
हां यही बुजुर्ग पेड़ हैं गांव का…
इमली का…
जुन के माह में कोमल-कोमल पत्तियों से
सबको अपनी ओर मोह लेता
टहनियों पर आये फुल
तो बच्चों के पसंदीदा थे।
शाखों की पत्तियां चाहे कितनी भी खींच लो
कलियों, फुलों को कितना भी तोड लो
कोई तक उफ! नहीं…
इमलियों का तो क्या कहना…
पेड पर चढ़कर तोड़ लो
या पत्थरबाजी कर लो
कोई शिकायत…नहीं
जिसको जैसा स्वाद चाहे वैसा…
खट्टा!! उतना ही मीठा…
हां यही बुजुर्ग पेड़ हैं गांव का…
इमली का…
इस पेड़ पर अनेकों आरोप हुए…
इस पर भूत सवार रहता है…
इसकी टहनियां बिजली के तारों को
बांधा पहूंचा रही है।
तुफान से उखड़ पड़ेगा तो
किसी की जान जा सकती है।
कुल्हाड़ियां चली
पहले टहनियों को छांट दिया
फिर भी पनपता रहा
दर्द … आरोपों को झेलता
चुपचाप मौनता से…
फिर एक दिन आरा मशीन से
सिर को धड़ से
अलग कर दिया गया ।
बची केवल ठुठी जड
बिना सिर, भुजाओं, संवेदनाओं से
कटी जड़ों से
खुब पीप का रिसाव हो रहा है
अब कोनों वकत नाहीं है
इस मशिनवादी दौर मे
देखें कौन?
चल पड़े हैं चाकु,कुल्हाड़ियां,खंजर
आरा मशिने…बुल्डोजर लेकर
कटे जा रहे हैं इमली,बरगद,पीपल भी
हमारे बुजुर्ग भी
संवेदनाओं, जड़ों से ।
हां यही…हो रहा है चारों ओर
हां यही बुजुर्ग पेड़ हैं गांव का…
इमली का…
यादें…
बाबा की यादें बिखरी हुई है,
घर भर में, दरों दीवारों में,
खेत, खलिहानों और मेड़ों में
सहेजकर लगायें गये पेड़ों में।
बाबा के बीना घर सुनसान सा है।
परिंदें बिना घरौंदा अधुरा सा है।
अपलक तह से आसमां की ओर
देखता हूं , तो पाता हूं
आसमान जगमगा रहा है।
एक सितारा चमककर कह रहा है।
पगले निराश, हताश मत होना…
मैं तुम्हें आसमान से देख रहा हूं।
बाबा अपने लगाया हुआ।
बरगद का पेड़ अब बड़ा होकर
धूप में खुद तपकर
सबको घनी छांव दे रहा है।
जैसे आप करते थे, वहीं अनुभव
करा रहा है …
अक्सर खेतों को जाता हूं।
खेतों में हर जगह बाबा को पाता हूं।
घांस-पात उखाड़ते
मीट्टी के कण-कण को बचाते
ज़मीन के ज़र्रे ज़र्रे को संभालते
गैय्या को चराते बाबा…
हल चलाते हुए पसीने से लथपथ
ये दिन भी निकल जायेंगे हौसला
रख, ढांढस बंधाते बाबा…
बाबा , आपने सच ही कहा था
दीन, दिन गुजर गये हैं।
रह गयी है
आप और आपकी यादें
है मेरे आस-पास बिखरी हुई
जब भी हैरान-परेशान हो जाता हूं।
बाबा को याद कर लेता हूं…





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