अनुक्रमणिका

अनुक्रमणिका संपादकीय डॉ. आलोक रंजन पांडेय शोधार्थी बंजारा लोक साहित्य का भाषावैज्ञानिक अध्ययन – जेतलाल नामदेव राठौड़, डॉ. एस. के. मोहम्मद शाकिर एस. के. बाशिर भारतीय ज्ञान परंपरा एवं लोक […]

संपादकीय

भारत में लोक और लोक में भारत भारतीय संस्कृति और उसकी परंपराओं का निर्माण अनेक कारकों से हुआ है। इन कारकों में जितना क्षेत्रीय विविधता की भूमिका है, उतनी हीउनकी […]

बंजारा लोक साहित्य का भाषावैज्ञानिक अध्ययन – जेतलाल नामदेव राठौड़, डॉ. एस. के. मोहम्मद शाकिर एस. के. बाशिर

मानव जीवन से ही लोक साहित्य का उदय मौखिक रूप से हुआ है।दस्तावेजीकरण के माध्यम से देखा जाए तो भारतीय लोक साहित्य की परंपरा अत्यंत प्राचीन और समृद्ध रही है। […]

भारतीय ज्ञान परंपरा और लोक साहित्य – डॉ.लिट्टी योहन्नान

भारतीय सभ्यता विश्व की प्राचीनतम सभ्यताओं में से एक है, जिसकी पहचान उसकी समृद्ध ज्ञान परंपरा से होती है। भारत में ज्ञान को केवल सूचना या बौद्धिक उपलब्धि नहीं माना […]

‘कुमाऊनी लोकसाहित्य में स्त्री संघर्ष’ – गीता तिवारी

अबला जीवन हाय! तुम्हारी यही कहानी आंचल में है दूध और आंखों में पानी”1 लोक साहित्य में स्त्री संघर्ष का चित्रण अत्यंत सजीवता एवं यथार्थता के साथ अभिव्यक्त हुआ है। ‘कुमाउनी लोक साहित्य में स्त्री संघर्ष’  शोध पत्र  में पितृसत्तात्मक समाज  के बीच महिलाओं के बहुआयामी संघर्ष को दर्शाया जाएगा । कुमाऊनी लोक साहित्य के अंतर्गत लोकगीतों, लोककथाओं,लोकगाथाओं, कहावतों, लोकनाट्यों,  मुहावरें आदि के […]

लोक की बोलियों का मानवीय जीवन मूल्यों के संरक्षण में विशेष योगदान – नविता मीना

लोक की बोलियाँ किसी भी समाज की सांस्कृतिक पहचान और जीवन शैली की सजीव अभिव्यक्ति होती हैं। ये बोलियाँ केवल संवाद का माध्यम ही नहीं हैं, बल्कि समाज के अनुभवों, […]

राजस्थान के लोक नृत्य का अध्ययन – डॉ. शिवकुमार

ग्रामीण संस्कृति में हमारा पूरा भारत झलकता है । क्योंकि मानवीय मूल्य, रीति रिवाज ,परंपरा और लोककला गांव से जुड़े हुए हैं ।भारत को जानना है तो पहले गांव को […]

लोक कथाएँ बाल साहित्य की अमूल्य धरोहर – डॉ. नीलू सिंह

भारतीय ज्ञान परम्परा हजारों वर्ष पुराना एक जीवंत और अद्‌भुत खजाना है। जो वेदों, उपनिषदों और लोक साहित्य के माध्यम से विकसित हुआ है। भारत में लोक का अर्थ ‘जनमानस […]

क्षेत्रीय अस्मिता और लोकनृत्य – डॉ प्रदीप रेवाप्पा सरवदे और प्राजक्ता उमेश अभ्यंकर

‘लोक’ शब्द का सहजता से प्रयोग किया जाता है। ‘लोक’ शब्द स्थान, संसार, सर्वसाधारण, समाज जैसे अर्थों को इंगित करता है। कभी-कभी विशेष अर्थ की ओर संकेत करता है, जैसे- […]

लोक जीवन शैली पर आधुनिकता का प्रभाव (साहित्य और सिनेमा के संदर्भ में एक अध्ययन) – प्रिया

प्रस्तावना भारतीय समाज की सांस्कृतिक संरचना में लोक जीवन का अत्यंत महत्वपूर्ण स्थान रहा है। लोक जीवन केवल ग्रामीण परिवेश या पारंपरिक जीवन शैली का पर्याय नहीं है, बल्कि यह […]