अनुक्रमणिका

संपादकीय डॉ. आलोक रंजन पाण्डेय बातों – बातों में श्यामा प्रसाद मुखर्जी महाविद्यालय की प्रधानाचार्या डॉ. साधना शर्मा जी से सहचर टीम की आत्मीय बातचीत शोधार्थी लोक-गीतों में नारीस्वर – […]

श्यामा प्रसाद मुखर्जी महाविद्यालय की प्रधानाचार्या डॉ. साधना शर्मा जी से सहचर टीम की आत्मीय बातचीत

प्रश्न 1. हिंदी भाषा के वैश्विक परिदृश्य पर आपके क्या विचार हैं ? उत्तर – हिंदी भाषा का जो वैश्विक परिदृश्य है, वैसे तो भारत में जो अपनी हिंदी की […]

लोक-गीतों में नारीस्वर – डॉ. राजरानी शर्मा

लोकगीत लोक साहित्य की सशक्त और प्रधान विधा है। लोकगीत सरल, मधुर होते हैं जिनमें सुर, लय, तान और गेयता का स्वाभाविक प्रवाह होता है। लोक गीत सामूहिक जन चेतना […]

कृष्णभक्त मीरा के काव्य में स्त्री प्रेम – डॉ. दिग्विजय कुमार शर्मा

कृष्ण की भक्ति में लीन मीरा के साहित्य में स्त्री और काव्य का अनोखा संबंध है क्योंकि काव्य के लिए स्त्री प्राणस्वरूपा होती है। काव्य संवेदना और अनुभूति का विषय […]

देव की विशिष्ट स्त्री-दृष्टि (रस विलास के सन्दर्भ में) – बबली गुर्जर

हिन्दी साहित्य के इतिहास का आदिकाल और रीतिकाल हमेशा से सवालों के घेरे में रहा है। जहां आदिकाल ग्रन्थों की प्रमाणिकता को लेकर तो वही रीतिकाल अपनी विषय सामग्री को […]

रहीम कृत दोहावली में उनका धर्म-भक्ति विषयक दृष्टिकोण – रेखा

रहीम का जन्म लाहौर (अब पाकिस्तान) में 17 दिसम्बर , सन १८५६ को हुआ । उनकी माता का नाम सुल्ताना बेग़म था । पिता बैरम खां मुग़ल बादशाह हुमायूँ के […]

सूर के काव्य में कृषक जीवन की अभिव्यक्ति और हिंदी आलोचना – अनिल कुमार

                   “प्रभु  जू , यौँ  किन्ही हम खेती ।                      बंजर    भूमि, गाउ   हर जोते, अरु   जेती की तेती । […]

मानवीय मूल्य, मर्यादा एवं आदर्श के रूप में राम (रामकथा के विशेष संदर्भ में) – युगल किशोर यादव

आज मानव जीवन अनेक विसंगतियों एवं विडम्बनाओं से जूझ रही हैं। एक समय हुआ करता था जब लोग प्रेम, स्नेह, सद्भावना के साथ जीवन यापन किया करते थे। एक दूसरे […]