भोजपुरी लोकगीत भारतीय साहित्य तथा भारतीय संस्कृति की अमूल्य निधि है | ये गीत भोजपुरी भाषी समाज की सांस्कृतिक आत्मा है | इसमें ग्रामीण जीवन, सामजिक मूल्यों और जन भावनाओं को अत्यंत ही सरलता से अभिव्यक्त किया गया है | पारिवारिक मूल्यों, अपनी सभ्यता तथा संस्कृति के प्रति सजग रहने वाला भोजपुरी समाज का चित्रण भोजपुरी साहित्य में यथार्थ रूप में हुआ है | भोजपुरी लोक साहित्य काफी समृद्ध है | हरेक पर्व-त्यौहार, रीति-रिवाज़, ऋतु, श्रम, संस्कार आदि से संबंधित लोकगीतों की रचना तो हुई ही है साथ-ही-साथ जन की भावना, उनकी पीड़ा, उनके कष्ट, हर्ष, विषाद आदि को काफी सरलता से प्रकट किया गया है | ये लोकगीत ग्रामीण जीवन का इतिहास तथा सांस्कृतिक पहचान है | उनका ये इतिहास तथा सांस्कृतिक पहचान संगीतबद्ध होकर लोकगीत के रूप में अभिव्यक्त हुआ है |
भोजपुरी लोकगीत के सृजन, गायन तथा संरक्षण में स्त्रियों का बहुमूल्य योगदान है | इन गीतों के माध्यम से स्त्रियों ने अपने जीवन की व्यथा, अनुभवों, भावनाओं तथा संघर्षों को अत्यनत ही सरल भाषा में प्रस्तुत की है | ये गीत उनके जीवन की वास्तविक अभिव्यक्ति है | पितृसत्तात्मक सामाजिक संरचना में भोजपुरी समाज की अधिकांश स्त्रियों को किसी-न-किसी प्रकार से शारीरिक तथा मानसिक रूप से प्रताड़ित किया जाता रहा है | आज भी भोजपुरी समाज के कई परिवारों में बेटियों को लिंगगत भेद-भाव का सामना करना पड़ता है | माता-पिता के प्रति पूर्ण श्रद्धा तथा समर्पण होने के बावजूद भी बेटियों को भेद-भाव का शिकार होना पड़ता है | इस भेद-भाव के कारण वे भावनात्मक रूप से काफी आहत होती है | प्रारंभ में तो वे समझ नहीं पाती कि जिस माँ ने नौ महीनें अपनी कोख में रखा तथा जिस पिता ने पाल-पोस कर बड़ा किया, वे ही उसके साथ इस तरह का व्यहवार क्यों कर रहे हैं| देखा जाये तो स्त्रियों का संघर्ष जन्म लेते ही शुरू हो जाता है |
बीज शब्द : लोकगीत, स्त्री संघर्ष, लिंगगत भेद-भाव, अनमेल विवाह, पलायन,
मूल आलेख :
भारत में स्त्रियों की स्थिति सदैव एक जैसी नहीं रही है | प्राचीन काल में जहाँ महिलाओं को पुरुष के बराबर अधिकार था तो वहीं मध्यकाल में उनका जीवन काफी निम्न स्तर का हो गया | सती प्रथा, देवदासी प्रातः, बाल-विवाह, पर्दा-प्रथा, अनमेल-विवाह आदि जैसी अनेक कुप्रथाओं ने स्त्रियों की स्थिति को नारकीय बना दिया | स्त्रियों की ऐसी स्थिति कई सदियों तक रही | आज भी बिहार, झारखण्ड, ओड़िसा आदि राज्यों में कहीं-कहीं बालिका भ्रूण हत्या, बाल-विवाह, अनमेल-विवाह देखने को मिल जाता है | आज़ादी के पश्चात स्त्रियों के उत्थान हेतु उसे कई संवैधानिक अधिकार प्राप्त हुए बावजूद इसके आज भी भारत के कई प्रदेशों में स्त्रियों की स्थिति काफी दयनीय है | भोजपुरी प्रदेश की स्त्रियाँ आज भी अपने अस्तित्व की लड़ाई लड़ रही हैं | उनके जीवन का विश्लेषण करे तो स्पष्ट होता है कि जन्म से लेकर मृत्यु तक उन्हें अपने अस्तित्व तथा अधिकारों के लिए संघर्ष करना पड़ता है | भोजपुरी समाज में जहाँ बेटे के जन्म को उत्सव के रूप में मनाया जाता है, वहीं बेटी के जन्म लेने पर पूरे परिवार में शोक की लहर दौड़ जाती है | गरीबी, बढती मंहगाई तथा बेटियों को पराया धन मानने वाली मानसिकता ही बेटियों के संघर्ष का प्रमुख कारण है | भोजपुरी लोकगीत में एक प्रसंग है जहाँ बेटी के जन्म लेने पर उसकी माँ कहती है कि यदि उसे मालूम होता कि बेटी का जन्म होगा तो उसे जन्म लेने से पहले ही कोख में ही मार देती | गीत इस प्रकार है –
“जाहु हम जनिती धियवा कोखी रे जनमिहे,
पिहितों में मरीच थराई रे|
मरीच के झाके झुके धियवा मरि रे जाईति,
छुटी जाईते गरुवा संताप रे |”
बेटियों की माँ-बाप द्वारा की जाने वाली इस निर्मम ह्त्या को आधार बनाकर भोजपुरी में अनेक गीत लिखे गए हैं | एक ऐसी ही बेटी अपनी माँ से कहती है-
मुंहवो न देखली तोर ए माई, देखली ना दुनिया जहानवा |
कवना करनवा तू मरलू ए माई, गरभे में हमार जानवा |
भोजपुरी समाज की यह विडम्बना है कि बेटी के जन्म लेते ही उसे दोयम दर्जा दे दिया जाता है | बचपन से ही भेदभाव का दंश झेलना पड़ता है | बेटी जिस परिवार को अपना समझती है वही परिवार उसे पराया धन समझकर सौतेला व्यवहार करता है | परिवार के व्यवहार द्वारा उसे हमेशा इस बात का बोध कराया जाता है कि वह परिवार के लिए सिर्फ बोझ के अलावा कुछ नहीं है | इस भेद-भाव के कारण बेटियां भावनात्मक रूप से काफी टूट जाती हैं | अपनी इस पीड़ा को वे गीत के माध्यम से व्यक्त करते हुए कहती है –
काहे कइला हो बाबूजी दू रंग नीतिया
बेटा के जनमला पर सोहर बधइया,
हमर बेरिया, काहे मातम मनइला हमर बेरिया
काहे कइला हो बाबूजी दू रंग नीतिया
बेटा के पढावे खातिर भेजवाला इस्कूलिया,
हमर बेरिया काहे बर्तन मंजवला हमर बेरिया
काहे कइला हो बाबूजी दू रंग नीतिया
भारतीय संस्कृति विशेषकर हिन्दू धर्म में कन्यादान को सबसे बड़ा पुण्य माना जाता है | ऐसी मान्यता है कि कन्यादान करने से माता-पिता को मोक्ष की प्राप्ति होती है | किन्तु यह कितना बड़ा विरोधाभास है कि जिस कन्या के जन्म लेने पर पूरे परिवार में मातम छा जाता है, उस कन्या का आदान करने पर माता-पिता को मोक्ष प्राप्ति की प्रबल अभिलाषा होती है | भोजपुरी प्रदेशों में कन्या का विवाह परिवार के लिए चिंता का विषय होता है | इन प्रदेशों में अधिकांश परिवार मध्यम वर्गीय अथवा निम्न मध्यम वर्ग से आते हैं जिनकी आमदनी बहुत कम होती है | कम आय होने के कारण अपनी बेटी के लिए योग्य वर ढूंढना काफी मुश्किल हो जाता है | शादी में देरी होने के कारण माता-पिता जल्दबाजी में बेटी की शादी किसी अयोग्य वर से कर देते हैं | विवाह से पूर्व जहाँ स्त्रियों का संघर्ष उसके ही परिवार में होता है वहीं विवाह के पश्चात् तो उनके जीवन का वास्तविक संघर्ष प्रारंभ होता है | ससुराल में सास-ससुर, ननद, भाभी, देवर के द्वारा की जाने वाली हिंसा, यदि पति बेरोजगार तथा शराबी हो तो उस कारण उत्पन्न समस्या आदि न जाने कितनी अनगिनत समस्याओं से स्त्री को संघर्ष करना पड़ता है | ससुराल वालों द्वारा की जाने वाली हिंसा कभी-कभी इतनी अधिक बढ़ जाती है कि बेटी की जान तक चली जाती है | इस प्रसंग को लोकगीत में बड़े ही मार्मिक ढंग से प्रस्तुत किया गया है | बेटी की मृत्यु के पश्चात पिता कहता है-
“जानती जे जारल जइबू आग के दहेज़ में
पाप नाहीं करती ए बेटी ससुरा में भेज के ||
कटले तू होइबू रनिया, बड़ा रे बिपतिया |
रोवते बीतल होई, दिनवा और रतिया ||
माई का के कूकल होइबू दुखवा अंगेद के |
पाप नाहीं करती ए बेटी ससुरा में भेज के ||
एकरा से निम्मन रहे, सासन अंगरेज के |
पाप नाहीं करती ए बेटी ससुरा में भेज के ||”
दहेज और आर्थिक मजबूरी के कारण अनमेल विवाह का प्रचलन काफी पुराना है | आज भी भोजपुरी समाज में अनमेल विवाह प्रमुख समस्याओं में से एक है | अनमेल विवाह से तात्पर्य ऐसे विवाह से है जहाँ दो लोगों की सामाजिक, आर्थिक, शैक्षिक पृष्ठभूमि में काफी अंतर होता है | अधिकांश मामलों में दूल्हा तथा दुल्हन की आयु में ज़मीन-आसमां का अंतर होता है | गरीब माँ-बाप धन के अभाव में अपनी बेटी की शादी ऐसे वृद्ध व्यक्ति से करा देते हैं जिनकी या तो पत्नी मर चुकी होती हैं या फिर जिनकी युवावस्था में शादी नहीं हुई होती है | उन दिनों विवाह से पूर्व कन्या से राय नहीं ली जाती थी और न ही माता-पिता द्वारा चुने गए वर का विरोध कर पाती थी | विवाह कराके माँ-बाप अपनी जिम्मेदारियों से मुक्त हो जाते हैं लेकिन बेटी का सम्पूर्ण जीवन नारकीय हो जाता है | कन्या की मानसिक पीड़ा की कल्पना करना भी अत्यंत मुश्किल है जब उसे पत्नी धर्म का पूर्ण रूप से निर्वाहन करना पड़ता है | लड़कियों की इस पीड़ा का मार्मिक चित्रण भोजपुरी लोकगीतों में हुआ है | इसी सन्दर्भ में एक लोकगीत प्रस्तुत है –
“भइ गइली काल हम; पूरब में कौन कसूर कइली बाबूजी |
जेहि लागि दुनियाँ से भइली कम; बर देखि घर ना सोहत बाटे हो बाबूजी |
सिकुरल जैसे चाम सूखल चुवेला आम; मुंहवा फटलका लेदरवा हो बाबूजी |
आँख से सूझत कम, हरदम खिंचत दम; मथवा के बरवा हो बाबूजी |
मुंहवा में दांत नाहीं लार चुवे गाल माही; बावला पर भीतरी समुन्द्र हो बाबूजी |
पति कर देखि गति, पागल भइल मति; रोई-रोई करिला बिहान मोर बाबूजी |
प्रवासन भोजपुरी प्रदेश में सदियों से एक गंभीर समस्या रही है | आज भी लोग रोज़गार की तलाश में अपने घरों को छोड़कर दूसरे राज्य की ओर प्रस्थान कर रहे हैं | इसका सबसे प्रमुख कारण है रोज़गार के अवसर की कमी | परिवार का भरण-पोषण सही ढंग से हो सके इसलिए परिवार के पुरुष रोज़गार की तलाश में अपना घर-बार छोड़ कर अन्य राज्यों में जाकर मजदूरी करते हैं | पति के परदेस चले जाने के बाद पत्नी की भी स्थिति अच्छी नहीं रहती है | एक तो परिवार की सारी ज़िम्मेदारी उसके कंधों पर आ जाती है दूसरा पति के विरह में उसे दिन-रत जलना पड़ता है | कभी-कभी तो नई-नई शादी के बाद ही पति नई नवेली दुल्हन को छोड़कर परदेस कमाने चला जाता है | पत्नी के लाख मना करने के बावज़ूद भी पति चला जाता है | यह स्थिति उस नई-नवेली दुल्हन के लिए किसी सजा से कम नहीं होती है | कितने ही सपनों को लेकर वह अपने ससुराल आती है और ससुराल आते ही पति का परदेस चले जाना उसके सारे सपनों तथा अरमानों को तोड़ देता है | पत्नी पति के वियोग में लौ के समान जलने लगती है | उसे रह-रह कर अपने पति की याद आती रहती है | स्त्रियों की इस पीड़ा का चित्रण भोजपुरी लोकगीतों में यथार्थ रूप में हुआ है –
“तरसल भर सावन ई हियरा
पियऊ नाही अइलें ना |
रिमझिम बरखा जियरा जरवलस
कुहूकी कुहूकी तलफे जियरा |
पिया नाही घरवा ||
कुछ-कुछ करिया बदरा गरजे
चमके बिजुरिया हियरा लरजे
पुरवा हहरे बुझल दियारा |
पिया नाही घरवा ||”
बाँझ स्त्री को भोजपुरी समाज में शुभ नहीं माना जाता है | लोगों का ऐसा मानना है कि यदि सुबह-सुबह कोई बाँझ स्त्री दिख जाए तो व्यक्ति का सारा दिन ख़राब हो जाता है | भोजपुरी समाज में किसी स्त्री का महत्व तभी है जब उसके पुत्र हों | जिस स्त्री को जितना अधिक पुत्र हो उसे उतना अधिक भाग्यशाली समझा जाता है तथा परिवार एवं समाज में उसे उतना ही अधिक सम्मान मिलता है | भोजपुरी लोकगीतों में बाँझ स्त्री की वेदना को काफी मार्मिक ढंग से दिखाया गया है | परिवार तथा समाज द्वारा उसे बहिष्कृत कर दिया जाता है | कोई भी उसे स्वीकार नहीं करना चाहता | इसी प्रसंग को लोकगीत के माध्यम से प्रस्तुत किया गया है –
“सासु मोरि कहेली बझिनियाँ, ननद ब्रजबासिन हो,
ए ललना, जिनकर बारी बिआही, उहो घर से निकालले हो |
बाघिन! जिनके हम बारी बिआही ऊहो घर से निकालली हो |
बाघिन! हमरा के जो खाई लीहितू बिपतिया से छुटितीं हो ||
जहवाँ से तू चली अइलू लबटि तहवाँ जावहु हो |
बंझिन! तोहरा के जो हम खाइबि हमहूँ बाँझ होखबि हो ||
भोजपुरी समाज में विधवा स्त्रियों की स्थिति बहुत ही दयनीय है | पति की मृत्यु चाहे जिस कारण हुई हो लेकिन इसका सारा दोष स्त्री के ऊपर ही थोप दिया जाता है | समाज में उसे पापिन, अभागिन समझा जाता है | लोग न केवल उसे घृणा की दृष्टि से देखते हैं बल्कि जितने भी मांगलिक कार्य होते हैं उससे उसे बहिष्कृत कर दिया जाता है | विधवा स्त्रियों के लिए श्रृंगार करना भी निषेध है | विधवा होने के पश्चात् स्त्री का सारा जीवन बहुत ही कठिन और चुनौतीपूर्ण हो जाता है | लोग उसके दर्द व उसकी पीड़ा को न समझकर उसे ही कोसते रहते हैं | स्त्री का कोई संतान न हो उसपर से यदि उसके पति की मृत्यु हो जाए तो उस स्त्री का जीवन बहुआयामी चुनौतियों से भर जाता है | रिश्तेदारों को वह बोझ लगने लगती है | यदि उसके पास धन-संपत्ति नहीं है तो परिवार में उसे सम्मानजनक स्थान भी नहीं मिल पाता है | और यदि धन-संपत्ति है तो लोग उसे हड़पने की फिराक में रहते हैं | कभी-कभी तो धन हड़पने के बाद विधवा को घर से निकाल दिया जाता है | विधवाओं की इस दुर्दशा का चित्रण भिखारी ठाकुर ने अपने नाटक विधवा-विलाप में बड़े ही मार्मिक ढंग से किया है –
“कवन कसूर कइली, घर से निकालल गइलीं;
छूटल जात बा नइहर-ससुरवा हो बबुआ !
पर पति साथ रति, कबहूँ ना भइल मति;
धनवा करनवा तेयाग मत हो बबुआ !
बबुआ समुझा मन, तोहरे ह सब धन;
काकी करिहन जूठवा के आसारा हो बबुआ !
दिन-रात दूनो साम, घरवा के करबि काम;
लुगरी फींचबि हम पतोह के हो बबुआ !
भारतीय समाज में स्त्री का जीवन दो भागों में विभाजित होता है | एक विवाह से पूर्व का जीवन तथा दूसरा विवाह के बाद का जीवन | इन दोनों अवस्थाओं में उसे अनेक प्रकार की पारिवारिक, सामाजिक, आर्थिक और मानसिक समस्याओं तथा चुनौतियों का सामना करना पड़ता है | पितृसत्तात्मक सामाजिक संरचना तथा स्त्रियों को लेकर समाज की रूढ़िवादी सोच ने स्त्रियों के जीवन को पूरी तरह से नियंत्रित कर लिया है | नियंत्रण इस क़दर कि उसे उसके ही अधिकारों से वंचित करके परिवार तथा समाज के प्रति उसके कर्तव्य एवम् त्याग का पाठ पढा दिया जाता है | स्त्रियों का जीवन किसी भी अवस्था में कष्टप्रद तथा संघर्षों से भरा ही होता है | जहाँ विवाह से पूर्व कन्या भ्रूण-हत्या, शिक्षा से वंचित, सामाजिक असुरक्षा जैसी चुनौतियों का सामना करती हैं वहीं शादी के बाद घरेलू हिंसा, पति-वियोग तथा बाँझपन तथा इस कारण सामाजिक तिरस्कार की पीड़ा आदि से होकर गुजरना पड़ता है | स्त्रियों ने अपने जीवन के इन संघर्षों को लोकगीतों के माध्यम से वाणी दी है | जबतक समाज की पितृसत्तात्मक संरचना तथा स्त्रियों के प्रति रूढ़िवादी विचारों में परिवर्तन नहीं आएगा तब तक स्त्रियों की स्थिति में शायद ही किसी प्रकार का परिवर्तन हो | आवश्यकता है एक ऐसे संवेदनशील समाज का निर्माण करे जहाँ स्त्रियों को भी सामान अधिकार, सामान सम्मान और समाज में सक्रिय भागीदारी का अवसर प्राप्त हो |
सन्दर्भ ग्रन्थ :
1.भोजपुरी लोकसाहित्य का अध्ययन, डॉ. कृष्णदेव उपाध्याय, पृष्ठ सं. 245, 1960
2.बिदेसिया, भिखारी ठाकुर, वाणी प्रकाशन, नई दिल्ली, पृ. सं. 14
3.लोकगीतों के सन्दर्भ और आयाम, डॉ. शांति जैन,विश्वविद्यालय प्रकाशन, पृष्ठ सं. 2, 1964
4.लोकगीतों के सन्दर्भ और आयाम, डॉ. शांति जैन,विश्वविद्यालय प्रकाशन, पृष्ठ सं. 3, 1964
5.भोजपुरी लोकसाहित्य का अध्ययन, डॉ. कृष्णदेव उपाध्याय, पृष्ठ सं. 244, 1960
6.भोजपुरी लोकगीत भाग 1, डॉ. कृष्णदेव उपाध्याय, हिंदी साहित्य सम्मलेन, प्रयाग
7.लोकसाहित्य के प्रतिमान, डॉ. कुंदनलाल उप्रेती, भारत प्रकाशन मंदिर, अलीगढ
8.बिदेसिया, भिखारी ठाकुर, वाणी प्रकाशन, नई दिल्ली, पृ. सं. 14
9.भोजपुरी लोकसाहित्य का अध्ययन, डॉ. कृष्णदेव उपाध्याय, पृष्ठ सं. 217, 1960
10.भोजपुरी लोक-संस्कृति, डॉ. कृष्णदेव उपाध्याय, हिंदी साहित्य सम्मलेन, पृष्ठ सं. 62





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