सार-
भारतीय लोक संस्कृति विश्व की सबसे प्राचीन अर्थात् आदिम संस्कृतियों में से एक है जो अपनी विविधता और समृद्धि के लिए जानी जाती है | भारत में लोक उत्सव का आयोजन केवल मनोरंजन हेतु नहीं किया जाता है अपितु ये उत्सव समाज को जोड़ने और जीवन मूल्यों को जीवित रखने का माध्यम बनते हैं | इन उत्सवों के माध्यम से समाज के विभिन्न वर्गों के लोग एक साथ, एक स्थान पर आते हैं और अपनी खुशियों, दुखों और जरूरतों को साझा करते हैं | इन उत्सवों के द्वारा लोग अपनी संस्कृति और जीवन मूल्यों को आने वाली पीढ़ियों तक पहुँचाते हैं | इन उत्सवों में लोग अपने अधिकारों, कर्तव्यों और सामाजिक समस्याओं के प्रति जागरूक होते हैं और उन समस्याओं को समझकर उसके समाधान ले लिए मिलकर प्रयास करते हैं | इससे सामाजिक जनचेतना का विकास होता है | इन उत्सवों से क्षेत्रीय लोगों को आर्थिक लाभ होता है | लोग इन उत्सवों के अवसर पर अपने दैनिक जीवन की व्यस्तताओं और तनावों को भूलकर आनंद और उत्साह के साथ भाग लेते हैं और एक नई ऊर्जा ग्रहण करते हैं | इन उत्सवों में सामूहिक लोकनृत्य, लोकगीत, नाटक, मेले और विभिन्न सांस्कृतिक कार्यक्रम आयोजित किए जाते हैं | ये उत्सव लोगों के बीच के भेद-भाव को मिटाकर आपसी प्रेम, सहयोग और एकता की भावना को मजबूत करते हैं |
प्रस्तावना-
भारत में हिंदुओं के रंग-बिरंगे पर्व, त्योहार, उत्सव और मेले सामाजिक जीवन का एक अभिन्न अंग है | भारत में कोई भी त्योहार बिना कारण अथवा उद्देश्य से नहीं मनाया जाता | इन उत्सवों के पीछे धार्मिक, सांस्कृतिक और वैज्ञानिक कारण जुड़े हुए होते हैं | पारंपरिक रूप से प्रत्येक त्योहार पर विशेष प्रकार के पकवान बनाए जाते हैं जो हमारे स्वास्थ्य की दृष्टि से आवश्यक होते हैं | उदाहरण के लिए जनवरी माह में जब बहुत ठंड होती है मकर संक्रांति का त्योहार मनाया जाता है | इस समय हमारा रक्त गाढ़ा हो जाता है | गुड़ रक्त को पतला करता है और इसमें लोह तत्त्व भी होता है | अत: इस त्योहार में तिल-गुड़ के लड्डू, गुड़ के चावल, पूरण पोली आदि बनाए जाते हैं |
भारत की आत्मा गाँवों में बस्ती है क्योंकि 80% भारत ग्रामीण है | लोक उत्सव अर्थात् लोगों द्वारा मनाया जाने वाला उत्सव है | भारत में सालभर उत्सव मनाए जाते हैं | भारतीय लोग अपनी संस्कृति से प्रेम करते हैं और प्रकृति की पूजा करते हैं इसी कारण प्रत्येक ऋतू में प्रत्येक राज्य में भिन्न-भिन्न उत्सव मनाए जाते हैं | आदिवासी अपने जंगलों की, पहाड़ों में रहने वाले लोग अपने पहाड़ों, नदियों, पेड़ों को पूजा करते हैं | हमारे यहाँ फसल बोने से लेकर फसल काटने तक के उत्सव हैं | जैसे मकर संक्रांति, बैसाखी, लोहड़ी, पोंगल, भोगली, बिहू आदि किसानों और फसलों से जुड़े उत्सव हैं | इन उत्सवों पर सूर्यदेव का आभार प्रकट करने हेतु पूजा-अर्चना की जाती है और विशेष प्रकार के पकवान बनाए जाते हैं | लोक उत्सवों का पूर्ण अनुभव और आनंद तो गाँवों में ही प्राप्त होता है | गावों की प्रकृति, रहन-सहन, चूल्हे का खाना और बोली आदि आपको नई ऊर्जा से भर देते हैं |
कुछ उत्सव पूरे भारत में मनाए जाते हैं तो कुछ क्षेत्रीय स्तर पर भिन्न-भिन्न नामों से मनाए जाते हैं जैसे “केरल में ‘ओणम’ चार दिन का फसली त्योहार है, मेघालय में ‘वांगला महोत्सव’ दो दिन का गारो जनजाति के बीच सूर्यदेव की पूजा-अर्चना के लिए मनाया जाता है | गुड़ी पाडवा’ महाराष्ट्र में, ‘विशु’ केरल में, ‘उगादी’ कर्नाटक, आंध्रप्रदेश, तेलंगना, ‘पुथांडु’ तमिलनाडु में, ‘बिहु’ आसाम में, ‘मडई’ छतीसगढ़ में, ‘नवरेह’ कश्मीर में, ‘बैसाखी’ उत्तर भारत में, नववर्ष के रूप में धूम-धाम से मनाया जाता है |”1 बंगाल का दुर्गा पूजा का उत्सव विश्व में धूम-धाम से मनाया जाता है | इन उत्सवों के माध्यम से भारत की प्रत्येक क्षेत्र की अनूठी संस्कृति एवं सांस्कृतिक विरासत को देखा और समझा जा सकता है | उदहारण के लिए महाराष्ट्र में “पालकी” एक लोक उत्सव है जो सावन के आगमन से पूर्व होता | यहाँ सब कृषक खेत जोतकर संत तुकाराम और संत ज्ञानेश्वर महाराज की पालकियाँ लेकर पैदल यात्रा करते हैं, भजन कीर्तन करते हुए भिन्न-भिन्न शहरों और गाँवों से होकर श्री विठठल जी के पंढरपुर देवस्थान तक जाते हैं और अच्छे सावन की प्रार्थना करते हैं | ऐसे लोक उत्सवों में कोई भेद-भाव नहीं करता केवल भक्ति में लीन होकर 258 किलोमीटर की पैदल यात्रा करते हैं, ऐसे उत्सव ही सामाजिक एकता और सौहाद्र के प्रतीक हैं |
इसी प्रकार से उत्तराखंड में प्रत्येक 12 वर्षों में माँ नंदादेवी की यात्रा निकाली जाती है | माँ नंदा देवी हिमालय की पुत्री है | किसी कारण उन्हें 12 वर्षों तक अपनी माँ के घर में रहना पड़ा था | 12 वर्षों बाद उन्हें धूम-धाम से भेजा गया | तब से आज तक प्रत्येक 12 वर्षों में यह यात्रा निकाली जाती है | इसमें चोसिंघया खाडू (चार सिंग वाला भेड़) यात्रा के आगे चलता है और सब उसके पीछे-पीछे 280 किलोमीटर पैदल चलते हैं | होमकुण्ड से आगे की यात्रा खाडू अकेले करता है | आगे उसके साथ क्या होता है यह कोई नहीं जानता किंतु मान्यता है की खाडू कैलाश पहुँच जाता है | इसी प्रकार दिपावाली दीपों का त्योहार है | होली रंगों के माध्यम से सामाजिक भेदभाव को मिटाने का संदेश देती है | ‘होलिका का दहन’ बुराई पर अच्छाई की जीत को दर्शाता है | ‘कोणार्क महोत्सव’ ओडिशा में नृत्य और रेत कला का, ‘राजा परबा’ ओडिशा में नारीत्व का तीन दिवसीय त्योहार आदि हैं | इन उत्सवों से सामूहिक एकता और सांस्कृतिक गौरव की भावना जागृत होती है और समाज की सांस्कृतिक धरोहर को जीवित रखने के साथ इसे आने वाली नई पीढ़ियों को हस्तान्तरित किया जाता है |
लोक का अर्थ-
लोक शब्द का मूल अर्थ है- ‘देखने वाला’ | इसलिए लोक शब्द का प्रयोग पूरे जन समुदाय के लिए होता है | ऋग्वेद में लोक के लिए जन शब्द का प्रयोग हुआ है | लोक शब्द अत्यंत प्राचीन है |
डॉ. कृष्णदेव उपाध्याय के अनुसार “‘ऋग्वेद’ शिष्ट-संस्कृति का परिचायक है तो ‘अथर्ववेद’ लोक संस्कृति का | ‘अथर्ववेद’ ‘ऋग्वेद’ का पूरक है | अथर्ववेद के विचारों का धरातल जनजीवन से है तो ऋग्वेद का विशिष्ट जन-जीवन है |”2
आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी के अनुसार- “लोक शब्द का अर्थ जनपद या ग्राम्य नहीं है बल्कि नगरों और गाँव में फैली हुई वह समस्त जनता है जिसके व्यवहारिक ज्ञान का आधार पोथियाँ नहीं है |”3
डॉ. वासुदेव शरण अग्रवाल के अनुसार “लोक को जीवन का समुद्र माना जा सकता है और उसमें भूत-भविष्य-वर्तमान सभी कुछ संचित रहता है | यह राष्ट्र का अमर स्वरूप है | लोक ज्ञान और संपूर्ण अध्ययन में अब शास्त्रों का पर्यायवास है |”4
परिभाषा के आधार पर कह सकते हैं कि लोक शब्द अत्यंत प्राचीन है और यह केवल ग्रामीणों के लिए नहीं है | यह शब्द उन सभी लोगों से संबंधित है जो अपने जीवन में रचे-बसे सभी विश्वासों, प्रथाओं, रीति-रिवाज, आस्थाओं, परंपराओं के अनुसार कार्य करते हैं |
चेतना का अर्थ-
चेतना समस्त सृष्टि का आधार है | चेतना शब्द की अवधारणा अत्यंत प्राचीन है | यह सामाजिक वातावरण के संपर्क में विकसित होती है | चेतना शब्द का अधिक प्रयोग मनोविज्ञान और दर्शन के क्षेत्र में किया जाता है | चेतना का संबंध मानव की आंतरिक शक्ति अर्थात ‘चित’ से है | मनुष्य अपनी मानसिक और बौद्धिक क्षमता से सही-गलत का निर्णय लेता है और अपने विवेक और व्यवहार से स्वयं को अथवा अपनी परिस्थितियों को नियंत्रित करता है, इस व्यवहार को नियंत्रित करने की शक्ति को चेतना कहा जा सकता है | मनुष्य की चेतना उसके अनुभव, उसकी शिक्षा, उसकी संस्कृति और सामाजिक वातावरण से विकसित होती है | इस चेतना का विकास होना अत्यंत आवश्यक हो जाता है क्योंकि यह समाज के विकास और सुधार में अपनी महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है |
राजस्थानी हिंदी शब्द कोश के अनुसार “ चेतना, बुद्धि, समझ, ज्ञान, चेतनाता, ज्ञानात्मक मनोवृति, जीवन शक्ति, शक्ति, होश |”5
हिंदी साहित्य कोश के संपादक धीरेंद्र वर्मा के अनुसार “चेतन मानस की प्रमुख विशेषता चेतना है, अर्थात वस्तुओं, विषयों, व्यवहारों का ज्ञान |”6
मानक हिंदी कोश के लेखक रामचंद्र वर्मा के अनुसार “चेतना मन की वह वृत्ति या शक्ति है जिससे जीव या प्राणी को आंतरिक अनुभूतियों, भावों, विचारों और ब्रह्म घटनाओं तत्वों या बातों का अनुभव या भाव होता है |”7
चेतना मानव की वह शक्ति है जिससे प्रेरित होकर वह देखता, सुनता, समझता और अनेक विषयों का चिंतन करता है | इसके अभाव में वह कोई काम नहीं कर सकता | चेतना मनुष्य को वास्तविक रूप में जीवित रखती है | चेतना मानव मस्तिष्क का वह गुण है जिसके द्वारा हमें अपने आसपास की घटनाओं का बोध होता है और हम विश्व को जानने का प्रयत्न करते हैं | चेतना मानव की उपस्थिति का वह तत्व है जिसके कारण उसे सभी प्रकार की अनुभूतियाँ होती हैं |
समाजिक जनचेतना का अर्थ-
सामाजिक जनचेतना के अंर्तगत लोगों को अपने अधिकारों और कर्तव्यों का बोध होना होता है | जब आपको किसी कार्य को करने का अधिकार मिल जाता है अथवा आपको अपनी इच्छानुसार काम करने की स्वीकृति प्राप्त होती है तो स्वाभाविक रूप से उस स्वीकृति के साथ कुछ कर्तव्य जुड़े हुए होते हैं जिनका पालन करना अनिवार्य हो जाता है | हमारे दैनिक जीवन से एक उदाहरण- सड़क पर चलने का अथवा गाड़ी चलाने का अधिकार हमें जन्म से ही मिल जाता है जिसे हम थोड़े बहुत प्रयास से सीख कर जीवनभर प्रयोग करते हैं | इसमें स्वाभाविक रूप से कर्तव्य जुड़ा है कि हमें सड़क पर चलने अथवा गाड़ी चलाने के नियमों का ज्ञान हो और हम पूर्ण ईमानदारी से उन नियमों का पालन करें और सड़क पर कचरा ना फेंके, इधर-उधर ना थूके आदि | क्योंकि सड़क पर चलने का अधिकार केवल हमें ही नहीं अपितु समाज के सभी प्राणियों को प्राप्त हुआ है | अत: हमें हमारे अतिरिक्त दूसरों का ध्यान रखना होता है | यही सामाजिक जनचेतना है जिसमें हम अपने व्यवहार पर नियंत्रण रख कर दूसरों को सहयोग देना होता है जिससे दूसरों का जीवन भी सुचारू रूप से चल सके | समाज व्यक्ति अथवा परिवार का एक ऐसा संगठन होता है जिसमें सब के हित की कामना होती है और समान उद्देश्यों एवं आदर्शों को प्राप्त करने के लिए समाज का प्रत्येक व्यक्ति स्वेच्छा से सहयोग करता है | मनुष्य को एक सामाजिक प्राणी कहा जाता है क्योंकि समाज के बाहर मनुष्य का कोई अस्तित्व नहीं होता है |
डॉ. रत्नाकर पांडे के अनुसार “ यह चेतना प्रत्येक व्यक्ति में विद्यमान रहती है परंतु रूढ़ि, अशिक्षा, अभावों के कारण दुष्प्रभावित व कुंठित हो जाती है | इस दुष्प्रभाव से मुक्त रहना और कुण्ठा को अपनी अंततृप्त से तिरोहित करना ही सामाजिक चेतना है |”8
डॉ. गुप्ता के अनुसार “ सामाजिक चेतना एक बहुरूप परिघटना है जो निरंतर विकसित और परिवर्तित होती रहती है |”9
सामाजिक जनचेतना के अंतर्गत आर्थिक, सामाजिक, सांस्कृतिक, राजनीतिक, धार्मिक, राष्ट्रीय तथा समाज में प्रचलित परंपरागत जीवन मूल्यों, नियमों, अधिकारों और अपने कर्तव्यों को देखा और समझा जाता है | सामाजिक जनचेतना को कुछ बिन्दुओं से समझा जा सकता है | यथा-
- समाज में फेली हुई रूढ़ियों, अंधविश्वास, भेद-भाव, दहेज प्रथा, बाल विवाह, स्त्री भ्रूण हत्या, कुरीतियों के प्रति जन-जन को जागरुक करना | जिससे लोग इन रूढ़ियों, कुरीतियों और अनावश्यक मान्यताओं को छोड़ सके | जैसे बाल विवाह के दुष्परिणामों के प्रति लोगों को जागरूक किया गया | जिसका सकारात्मक परिणाम हुआ किंतु आज बाल विवाह पर पूरी तरह से रोक होने के बावजूद भी कहीं-कहीं कुछ लड़कियों के विवाह जल्दी होने की सूचनाएँ मिलती रहती हैं | इसलिए आवश्यक है कि इस प्रकार के जागरूकता अभियानों को सभी सहयोग करें और समाज में एक सकारात्मक परिवर्तन लाया जाए |
- लोगों में अधिकारों और कर्तव्यों की समझ होना भी आवश्यक है | जब व्यक्ति अपने अधिकारों के प्रति जागरुक होगा, उन्हें अच्छे से समझेगा तब वह सोच-समझकर अन्याय और शोषण के विरुद्ध आवाज उठा पाएगा | उदाहरण के लिए लोगों को वोट करने का अधिकार है | उनका कर्तव्य है कि समाज से जुड़ें और समाज में चल रही गतिविधियों की समीक्षा करें और तब वोट दें | अपना अमूल्य वोट किसी कुपात्र को ना बेचें | इस प्रकार अपने देश के विकास में सहयोग करें |
- जब लोग समाज में घट रही किसी घटना अथवा किसी समस्या पर मिलकर काम करते हैं तो स्वाभाविक रूप से समाज में सकारात्मक परिवर्तन देखने को मिलते हैं | उदाहरण के लिए अपने पर्यावरण को हरा-भरा बनाने हेतु लोगों को पेड़ लगाने के लिए जागरूक किया गया | लोगों ने स्कूल, कॉलेज, सड़कों और अपने क्षेत्र की पहाड़ी आदि में पेड़ लगाए | साक्षरता अभियान के माध्यम से स्कूल के छात्रों के सहयोग से अशिक्षित महिलाओं को पढ़ना-लिखना सिखाना जिससे अशिक्षित महिलाएँ अपने निजी पत्र, समाचार पत्र, पढ़ सकती हैं और कम से कम अपने हस्ताक्षर कर सकती हैं | वो अंगूठा छाप की श्रेणी से बाहर आई हैं | यह अशिक्षित महिला के लिए एक बड़ी उपलब्धि बनी है | ऐसे ही स्वछता के प्रति लोगों को जागरूक किया गया | लोगों ने इसमें बढ़-चढ़ कर भाग लिया जिससे सार्वजानिक स्थानों को साफ करने का प्रयास किया गया | इस अभियान के अंतर्गत शहर की नदियों, स्टेशन, अस्पताल और सड़कों आदि की सफाई की जा रही है | ऐसे कई अभियान हैं जो समाज को सकारात्मक सोच दे रहे हैं और समाज के लिए काम कर रहे हैं |
- समाजिक एकता और भाई-चारे का सही रूप देखने को मिलता है जब समाज अथवा कोई देश किसी प्राकृतिक आपदा या संकट में फँस जाता है | ऐसे समय लोग स्वयं से आगे आकर मदद करते हैं और जरूरतमंदों को सहायता मिलती है | इस समय लोग मिलकर काम करते हैं, इन समस्याओं का मिलकर समाधान निकलते हैं | हाल ही में करोना के समय विश्व को एक साथ मिलकर एक-दूसरे को सहयोग करते देखा गया | इससे भेद-भाव की सीमाएँ अपनी पतनावस्था की और अग्रसर होती हैं जिससे समाज मजबूत और संगठित होता है |
कह सकते हैं कि समाज में जब जागरूकता होगी तब लोग अपनी बुद्धि और विवेक से निर्णय लेंगे और समाज को एक नई सकारात्मक सोच की दिशा में लेकर जाएँगे | समाज में तब रूढ़ियों, अंधविश्वासों, भेद-भाव, कुप्रथाओं, कुरीतियों के लिए कोई स्थान नहीं रहेगा | इसलिए आवश्यक है कि समाज के विकास हेतु समाज में हो रही गतिविधियों के प्रति लोगों में जागृत लाने के लिए लोगों को शिक्षित किया जाए |
उत्सव और समाजिक जनचेतना का संबंध –
भारत उत्सवों, पर्वों और त्योहारों का देश है | प्रत्येक उत्सव घर की साफ-सफाई और सजावट से जुड़ा हुआ है | घर-घर में पकवान बनते हैं | नए-नए कपड़े खरीदे जाते हैं | एक-दूसरे को उपहार भेट किए जाते हैं | जो लोग पढ़ाई, नौकरी आदि के कारण घर से दूर हैं, वे उत्सव के समय अपने घर-परिवार से मिलने जाते हैं | लोग देश-विदेश से यात्रा करते हैं | उत्सव के समय व्यापारी, होटल, यातायात के व्यापारियों आदि को लाभ होता है | उत्सव से जुड़े सामान की माँग बढ़ने से देश की आर्थिक स्थिति को विकसित करने में देश के प्रत्येक नागरिक का सहयोग होता है | इस प्रकार उत्सव मानव जीवन का अभिन्न अंग बन जाते हैं | उत्सव के माध्यम से समाज के लोग एकत्रित होते हैं और आपसी संबंधों को मजबूत बनाते हैं | उत्सव और जनचेतना के संबंध को कुछ बिन्दुओं से समझ सकते है | यथा-
- उत्सव समाज के लोगों को एक साथ लाने और आपसी संबंधों को मजबूत करने का अवसर प्रदान करते हैं | इन अवसरों पर लोग एक दूसरे से मिलते हैं, शुभकामनाएँ देते हैं और अपने सुख-दुख साझा करते हैं | उत्सवों में लोग सामाजिक समस्याओं, नैतिक मूल्यों और सामूहिक जिम्मेदारियों पर विचार विमर्श करते हैं | इससे समाज में जागरूकता और संवेदना बढ़ती है |
- उत्सव में लोग अपने पूरे परिवार के साथ शामिल होते हैं | यहाँ नई पीढ़ी के बच्चे पुरानी पीढ़ियों से चली आ रही मान्यताओं, अपने समाज की परंपराओं, रीति-रिवाजों और नैतिक मूल्यों से परिचित होते हैं | बच्चों ने अपने परिवार वालों से जो सुना हुआ होता है, उसका कुछ अनुभव वे इन उत्सवों के माध्यम से प्राप्त कर पाते हैं | इस प्रकार हमारी संस्कृति और परंपराएँ जीवित रहती हैं | इन उत्सवों को समाज के सभी वर्गों के लोग मिलकर आयोजित करते हैं | अत: इन उत्सवों से लोगों के बीच भाई-चारे और एकता को बल मिलता है |
- कई बार उत्सवों के माध्यम से सामाजिक सुधार के संदेश भी दिए जाते हैं | इसके लिए विभिन्न सांस्कृतिक कार्यकर्मों का आयोजन किया जाता है जिसमें लोकनृत्य गरबा और डांडिया आदि, लोकगीत, नाटकों, रैली, भाषणों और अभियानों के द्वारा लोगों को शिक्षित किया जाता है | जैसे गणेशोत्सव के समय पर्यावरण संरक्षण, स्वछता, शिक्षा के महत्व और महिला सशक्तिकरण पर आधारित कार्यकर्मों का आयोजन किया जाता है |
निष्कर्षत: उत्सव केवल मनोरंजन के साधन नहीं अपितु सामाजिक जनचेतना को जागृत करने का सशक्त माध्यम भी है | उत्सव समाज में एकता, सहयोग, जागरूक और सांस्कृतिक मूल्यों को सशक्त और संगठित बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं | भारतीय लोकउत्सव हमारी सांस्कृति धरोहर हैं | होली, नवरात्रि, दिवाली, गणेशोत्सव, ओणम जैसे उत्सव सामाजिक एकता और खुशी से भरा हुआ वातावरण देते हैं | सांस्कृतिक संगठनों, सरकार और डिजिटल माध्यमों ने भी उत्सवों को सुचारू रूप से चलाने और इस अमूल्य धरोहर को भविष्य की नई पीढ़ी तक पहुँचाने में बड़ा योगदान दिया है | अतः उत्सव भारतीय समाज की एकता विविधता और सांस्कृतिक गौरव के प्रतीक हैं | इनके संरक्षण के द्वारा हम न केवल अपनी जड़ों से जुड़े रहते हैं अपितु विश्व मंच पर भारतीय लोक संस्कृति की एक अनूठी पहचान को भी प्रदर्शित करते हैं | अत: कह सकते हैं लोक उत्सव सामाजिक जनचेतना के लिए अतिआवश्यक हैं बशर्ते उन्हें मनाते समय सामाजिक निति-नियमों का मुल्यों का उल्लंघन न हो जाए |
संदर्भ-
- भारतीय संस्कृति, राजेंद्र प्रसाद शर्मा/श्याम नारायण प्रधान, पृ75
- लोक साहित्य एवं लोक संस्कृति, डॉ. शिखा रस्तोगी, पृ23, B.A.सेमेस्टर 6 की पुस्तक
- वहीं 23
- वहीं 23
- राजस्थानी हिंदी शब्द कोश, स.आ. बद्रीप्रसाद साकरिया, पृ390
- हिंदी साहित्य कोश, 1 सं0, धीरेन्द्र वर्मा, पृ 316
- मानक हिंदी कोश, खंड दूसरा, रामचंद्र वर्मा, पृ 274
- हिंदी साहित्य सामाजिक चेतना, डॉ.रत्नाकर पांडेय, पृ 168
- यशपाल के उपन्यास-सामाजिक कथ्य, डॉ.चमन लाल गुप्ता, पृ17





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