संपादकीय

वाद-विवाद के मूल में अपने तर्कों के द्वारा अपने पक्ष को रखने पर बल दिया जाता है। वाल्टर बेजहॉट ने कहा है ”अनुकरण की संस्कृति अधिकतर समाजों में पायीं जाती […]

प्रो. गजेंद्र पाठक से सहचर टीम की आत्मीय बातचीत

सहचर टीम – नमस्कार,आपके पास बक्सर,दिल्ली के किरोड़ीमल कॉलेज और जे.एन. यू. और हैदराबाद के अनुभव हैं,आपने इन चार अलग – अलग जगहों को जिया है। बक्सर ठेठ भोजपुरी का […]

हिन्दी कथा साहित्य : बाजारवाद और उपभोक्तावाद – डॉ. कमलिनी पाणिग्राही

आज भूमण्डलीकरण के दौर में उपभोक्तावादी संस्कृति के कारण सारा विश्व बाज़ार के रूप में स्थापित हो चुका है। बाज़ारवाद से आज समाज का कोई वर्ग, क्षेत्र अछूता नहीं है। […]

तुलसी की नारी चेतना – डॉ. सुनील ति‍वारी / रश्‍मि‍ पाण्‍डेय (शोधार्थी)

तुलसी की नारी संबंधी भावना उनके दार्शनि‍क मतवाद पर आधारि‍त थी। उन्‍होंने शंकराचार्य के समान माया का केवल अवि‍धारूप ही नहीं देखा था वरन् उसका दूसरा पक्ष जो जगत को […]

स्वयं प्रकाश की लोककथात्मक कहानियों में जनपक्षधरता – बीरज पाण्डेय

प्रत्येक भाषा का अपना साहित्य होता है जो लोक कथाओं, लोक गीतों, मुहावरों व कहावतों तथा समसामयिक सृजन के रूप में विद्यमान रहता है। इनमें लोक कथाओं की अपनी विशिष्ट […]

मुक्तिबोध की रचनाएँ: परिपूर्ण क्षणों की अपूर्ण अभिव्यक्तियाँ – सौरभ कुमार यादव

मुक्तिबोध, हिंदी साहित्य के क्षेत्र में एक ऐसा नाम है, जिसका लोहा हर कोई मानता है या कहिये कि हर किसी को मानना पड़ता है। कविता, कहानी, आलोचना हर क्षेत्र […]

स्‍वातंत्र्योत्‍तर हिंदी उपन्‍यास : स्‍त्री आकांक्षा, मुक्‍ति‍ एवं वि‍द्रोह का स्‍वर – डॉ. सुनील ति‍वारी/ रजनी पांडेय (शोधार्थी)

भारतीय समाज में परि‍वर्तन की प्रक्रि‍या वि‍द्यमान है। नारी की दशा एवं दि‍शा में परि‍वर्तन कोई अचानक उत्‍पन्‍न  अवधारणा नहीं बल्‍कि‍ एक लंबे संघर्ष का परि‍णाम है। आजादी से पूर्व […]

लोकगीतों में स्त्री की दशा एवं दिशा – साक्षी सिंह

(अवधी लोकगीतों के विशेष सन्दर्भ में)  लोक, अर्थात किसी क्षेत्र विशेष के निवासी एवं उनकी जीवन शैली, जिस पर कि उस क्षेत्र की ऐतिहासिक, भौगोलिक एवं परंपरागत विशेषताओं का प्रभाव […]

शरद सिंह के उपन्यास ‘पिछले पन्ने की औरतें‘ में उपेक्षित आदिवासी समाज का चित्रण – रक्षा रानी

समाज का वह वर्ग जो अपने अधिकारों से वंचित रहा हो और शोषण का शिकार होता है, वह आदिवासी वर्ग है। इस वर्ग को समाज में न तो स्वीकार किया […]

हिंदी कविता का समकालीन परिदृश्य –   डॉ. रूचिरा ढींगरा

साहित्य अपने सर्जक के देशकाल जनित अनुभवों की अभिव्यक्ति होता है। उसकी समकालीनता ही उसे शाश्वतता प्रदान करती है। साहित्य की अन्यविधाओं कीअपेक्षा कविता में यह अधिक समग्रता से रूपायित […]