लोक साहित्य में लोकगीत , लोकथाएँ , लोककथन , लोकनाट्य ,पहेलियाँ , कहावतें एवं लोकोक्तियों का समावेश होता है।

       लोकसाहित्य वह साहित्य है , जो जनमानस द्वारा रचा गया है। लोकसाहित्य का निर्माता सामान्य जन होते है, लोक साहित्य पीढ़ी – दर – पीढ़ी मौखिक रूप से सदियों से चला आ रहा है। लोक साहित्य समाज की सामूहिक भावना और सांस्कृतिक भावनाओं का समन्वय होता है। लोक साहित्य की भाषा ग्राम्य लोकजीवन से आती है।

         लोक साहित्य हिंदी साहित्य ही नहीं बल्कि प्रत्येक प्रांत की मातृभाषा की वह धारा है , जो सामान्य जनता के जीवन अनुभव और परम्पराओं को अभिव्यक्त करती है।

      लोक साहित्य का रचेता कोई एक व्यक्ति नहीं होता है, बल्कि लोक साहित्य यह जनसामान्य के हृदय की उपज होती है। लोक साहित्य में जन समूह की भावनाएँ प्रबल मात्रा में होती है। लोक साहित्य जनसामान्य को सच्चाई , ईमानदरी , नैतिकता एवं श्रम का पाठ पढ़ाती है।

     लोक साहित्य समाज की संस्कृति और लोक पंरम्पराओं का संरक्षण करती है। नैतिक शिक्षा एवं सामाजिक शिक्षा लोक साहित्य का प्रमुख उद्देश्य होता है।

       भारत के भूमि पर जितने भी राज्य हैं; उन राज्यों में बोलचाल की भाषा में लोकगीत , लोककला , लोक संस्कृति उन्नत रूप में दिखाई देती है। लोक साहित्य में जन की भावनाएँ , अनुभव और सांस्कृतिक परम्पराएँ सजीव रूप में दिखाई देती है।

       लोक साहित्य में पर्यावरणीय चेतना का अर्थ है , प्रकृति , पेड़ – पोधों , जल , भूमि , पशु – पक्षियों और प्राकृतिक संसाधनों के प्रति जागरुकता एवं संरक्षण की भावना निर्माण करना।

       लोक परम्पराओं में पीपल , बरगद , तुलसी , नीम , जैसे पेडों की पूजा की जाती रही है , इसके पिछे पर्यावरण संरक्षण की भावना दिखाई देती है। लोक कथाएँ यह स्पष्ट करती है कि जल ही जीवन का आधार है। लोक साहित्य में नदियों , कुओं , तालाबों एवं तीर्थों का महत्व विशद किया है। लोक कथाओं में पशु – पक्षियों के प्रति संवेदना प्रकट की गयी है , जैसे गाय-बैल , पक्षी , हिरण आदि के प्रति दयाभाव प्रकट किया गया है। लोकगीतों में सावन , वसंत , फसल और खेती का वर्णन मिलता है जो मनुष्य के प्रकृति के साथ गहरे संबंधों को अभिव्यक्त करता है। इसलिए ऋतु और कृषि से संबंधीत तथा तीज – त्यौहार पर गाये जानेवाले ढेंरों लोकगीत दिखाई देते है।

     पर्यावरण हमारे जीवन का मूल आधार है। मानव आदिकाल से ही सृष्टि का उपयोग अपने जीवन निर्वाह के लिए करता रहा है। आज मनुष्य ने जीवन में जो कुछ प्राप्त उपलब्धी प्राप्त की है उसमें पर्यावरण का अधिक महत्व है। मानव जीवन की सभ्यता एवं संस्कृति के विकास में पर्यावरणीय चेतना का अनन्य साधारण महत्व रहा है।

     जब से सृष्टि की उत्पत्ति हुई तब से प्रकृति पुजा मनुष्य करता रहा है , आकाश , पृथ्वी , सूर्य – चंद्र , आँवला , तुलसी , नीम , बेल , बरगद , पीपल इसकी पुजा 6000 वर्षों से मनुष्य करता रहा है।

      पर्यावरण का प्रभाव मानव जीवन के सभी पहलुओं पर पड़ता है जैसे सामाजिक , सांस्कृतिक , राजनैतिक , आर्थिक , मनोवैज्ञानिक दृष्टि से मानव जीवन पर प्रभाव लक्षित होता है।

     आधुनातन युग में वायु प्रदुषण , जल प्रदुषण , मृदा प्रदुषण , समुद्री प्रदुषण , ध्वनि प्रदुषण इन समस्याओं के साथ – साथ रेडिओधर्मी प्रदुषण ,ई- कचरा प्रदुषण जैसी पर्यावरणीय समस्याओं से केवल राष्ट्र ही नहीं बल्कि पूरा विश्व जुझ रहा है।

    वैदिक साहित्य में पर्यावरण के साथ तादात्म्य स्थापित किया गया दिखाई देता है। हमारें धार्मिक अनुष्ठानों में पेड़ – पौधों का महत्व पाया जाता है। हमारें ऋषि – मुनि जानते थे कि पृथ्वी , जल , अग्नि , वायु तथा आकाश इन पाँच तत्वों से मानव देह निर्मित हुआ है। यदि यह पाँच तत्व प्रदूषित हो जाए तो उसका दुष्परिणाम मानव शरीर के साथ – साथ वन्य जीवन तथा जैव विविधता पर होगा।

     हमारे जीवन की खुशहाली पर्यावरण पर निर्भर है। पर्यावरण प्रदुषण तथा पर्यावरण असन्तुलन के विनाशकारी संकट से बचने के लिए पर्यावरण की सुरक्षा की आवश्यकता मानव अनुभव कर रहा है। स्वस्थ जीवन के लिए शुद्ध वायु , शुद्ध जल एवं शुद्ध मिट्टी की आवश्यकता है। ऋग्वेद में प्रकृति के पेड़ – पौधों तथा सूर्य – चंद्र , अग्नि की पुजा में प्रार्थना या नमस्कार की विधि दिखाई देती है। वराह पुराण में ईश्वर ने और  कुराण में भी अल्लाह ने कहा है कि जो चिजें हमारें लिए बनायी है इसके अपव्यय की सख्त मनाही है इस्लाम में इसका निषेध किया गया है। जैन धर्म में हरे वृक्षों एवं पल्लवित पुष्पों को तोड़ना निषिद्ध माना गया है। वैदिक ऋषियों ने प्रकृति सभी कारक तत्वों को ईश्वर की संज्ञा देकर प्रकृति के महत्व को प्रतिपादित किया है।

      भारतीय परम्परा के अनुसार भूमि माता के समान है और हम सब उनकी सन्ताने हैं । प्रकृति को स्त्री के रूप में देखने की परम्परा बहुत प्राचीन है । सिन्दु – घाटी की सभ्यता के अवशेषों से पता चलता है कि उस युग के लोगों को वृक्ष कितने प्रिय थे ।

      पर्यावरणीय चेतना की गूँज हमे महाराष्ट्र लोकगीतों में सुनाई देती है।

      ” ये रे ये रे पावसा

         तुला देतो पैसा

         पैसा झाला खोटा

         पाऊस आला मोठा”

संत तुकाराम के अंभगों से पर्यावरणीय चेतना प्राप्त होती है।

   ” वृक्षवल्ली आम्हां सोयरी वनचरे , पक्षी ही सुस्वरे आळवीती”

इन पक्तियों में पर्यावरण महत्व परिलक्षित होता है।

    भारत में लोक एवं लोक में भारत – इस विषय संपन्न हो रही अंतरराष्ट्रीय ई- वेबिनार में जो चर्चा विमर्श होगा अतः उसका लाभ सृष्टि  सरंक्षण के लिए होगा।

    सृष्टि का संवर्धन एवं संरक्षण मानव जीवन की महत्वपूर्ण पहल है। सारा विश्व सृष्टि के संवर्धण में अपना योगदान दें ।

संदर्भ ग्रंथ:-

 1 . लोक साहित्य की रूपरेखा – डॉ. हजारी प्रसाद द्विवेदी

  1. लोक संस्कृति और पर्यावरण – डॉ. विद्यानिवास मिश्र
  2. भारतीय लोक साहित्य -डॉ . कृष्णदेव उपाध्याय
  3. पर्यावरण और हिंदी साहित्य -डॉ. नामवर सिंह
प्रा. विभुते आर . व्ही.
हिंदी विभागाध्यक्ष, भाई किशनराव देशमुख
महाविद्यालय, चाकूर, जिला लातूर (महाराष्ट्र)