हर मौसम अपने संग अपने तरह के विमर्श और अपनी तरह की चिंताएं लेकर आता है । जैसे इस समय पर जब हिन्दी दिवस का उत्सव मनाया जा रहा है तो यह जानना आवश्यक है कि भारत जैसे देश में इसकी दशा और दिशा क्या है? कहीं हिन्दी बहुसंख्यकवाद का शिकार तो नहीं हो रही है ? क्या हिन्दी समाज में लोकतांत्रिक मूल्यों का विकास हो रहा है ? क्या वह संवेदनशील मनुष्य जिसकी कल्पना हमारे पूर्वज साहित्यकारों ने की थी वह आज दिखाई देता है ? ऐसे अनेक प्रश्नों के साथ ही हम यह हिन्दी दिवस मना रहे हैं ।

अकादमिक जगत और साहित्यिक जगत में यह बड़े धूमधाम से मनाई जाएगी लेकिन हम उपरोक्त प्रश्नों से मुक्त नहीं होंगे । हिन्दी मीडिया और साहित्यिक पेज संवेदनशील खबरों को उत्पाद बनाकर बेंचना चाहते हैं और वह खबरें जो आवश्यक हैं वह कहीं रिपोर्ट में खो जाती हैं । जैसे गांधी जी ने नमक सत्याग्रह किया क्योंकि नमक वह आवश्यक वस्तु है जो जीवन के लिए आवश्यक है जिसपर कर यानि किसी प्रकार का प्रतिबंध नहीं लगाया जा सकता, वह जीने के लिए एक मूल तत्व था । उसी प्रकार वर्तमान समय की आवश्यकताएं बढ़ गई हैं । आज संविधान है जिसमें हमारे मूल अधिकार हैं । क्या हम अपने मूल तत्वों की प्राप्ति कर पा रहे हैं ? साफ हवा, साफ पानी, स्वच्छ वातावरण की बात हो या गरिमापूर्ण जीवन जीने का हक से लेकर इंटरनेट तक पहुँच का अधिकार ये आखिर कहाँ हैं ? हम विश्व में सबसे ज्यादा इंटरनेट पर रोक लगाने वाले देश हैं और उस पर भी तर्क यह कि ये कानून बनाए रखने में मदद करता है जबकि सच्चाई पूरे देश को पता है और अब मणिपुर की घटना से पूरा विश्व हमारी आजादी का यह तमाशा देख रहा है । पर्यावरण की चिंता पर कार्य करने को योजनाएं इतनी तेजी से बन रही हैं कि अभी ठोस कार्य नमूना उपलब्ध नहीं है । दिल्ली के बाढ़ ने हमारे शहरी अवसंरचना की पोल खोल दी । ऐसे में यह देखना और समझना ज़रूरी है कि हमें चहुँमुखी विकास पर ध्यान देने कि आवश्यकता है । पर्यावरण, मशीन और शहर एक साथ सतत रूप से विकसित हों ।

हिन्दी साहित्य अपने आरंभ से ही मानव स्वातंत्र्य के साथ साथ संवैधानिक स्वतंत्रता का भी हिमायती रहा है । उसका सरोकार हमेशा समाज में रह रहे सबसे निचले पायदान पर बैठे मनुष्य से रहा है । एक साहित्यिक पत्रिका पूर्णरूपेण साहित्यिक तभी हो सकेगी जब वह समाजिक, राजनीतिक, आर्थिक, सांस्कृतिक और पर्यावरण आदि को चिंताओं को भी स्वयं में समावेश करके चले । हिन्दी दिवस पर इन्हीं सब चिंताओं और विचारों के साथ सहचर का यह अंक आपके समक्ष प्रस्तुत है ।

 

डॉ. आलोक रंजन पाण्डेय