सारांश ग्रामीण जीवन शैली भारतीय समाज की मूल संरचना का आधार है। इस जीवन-शैली में कहावतें (लोकोक्तियाँ) केवल भाषाई अलंकार नहीं, बल्कि लोक-अनुभव, परंपरा, नैतिकता और सामाजिक व्यवहार की जीवंत […]
ग्रामीण जीवन शैली में कहावतें – ममता
सारांश प्रस्तुत शोध पत्र भारतीय ग्रामीण जीवन शैली में कहावतों की भूमिका और महत्त्व को रेखांकित करता है। भारत की मूल संस्कृति उसके गाँवों में निहित है यह किसी लिखित […]
लोकसाहित्य में भारतीय संस्कृति (हिंदी साहित्य के संदर्भ में) – राजलक्ष्मी जी
भूमिका भारतीय संस्कृति विश्व की प्राचीनतम और समृद्ध संस्कृतियों में से एक मानी जाती है। इसकी विशेषता इसकी विविधता, सहिष्णुता, आध्यात्मिकता और समन्वय की भावना में निहित है। भारत […]
राजस्थान के प्रतिबंधित गीतों और कविताओं में लोक प्रतिरोध का स्वर – रामप्यारी
शोध सार भारतीय साहित्यिक परंपरा में लोक साहित्य जनजीवन की अनुभूतियों का सजीव दस्तावेज माना जाता है। लोक का संबंध उस जीवन से है जिसे समाज प्रत्यक्ष रूप में जीता […]
संत मलूकदास के काव्य में लोक संस्कृति और लोक भाषा – रीना आर्य
सारांश – संत मलूकदास भक्तिकाल के संत परंपरा के प्रमुख कवि हैं। उनके काव्य में नैतिकता, भक्ति, सामाजिक चेतना और लोक जीवन का गहरा संबंध दृष्टिगोचर होता है। प्रस्तुत शोध […]
आधुनिक हिंदी उपन्यासों में चित्रित प्रेम के विविध रूप – सजनी एंथोनी
प्रस्तावना आधुनिक उपन्यासों में प्रेम के विविध रूपों का चित्रण हुआ है। हर उपन्यास प्रेम की एक नई कहानी कहता है।असल जिंदगी में सच्चे प्रेम को पाना जितना मुश्किल […]
लोकगीतों का भाव-कला तत्त्व और तीसरी कसम के गीतों का दृश्य विधान – सिमरन सिंह
शोध सार यह शोध-अध्ययन मुख्य रूप से इस बात पर केंद्रित है कि भारतीय लोकगीत हमारे लोकजीवन, सांस्कृतिक पहचान और मानवीय भावनाओं के अत्यंत महत्वपूर्ण वाहक हैं। लोकगीत केवल मनोरंजन […]
वैश्वीकरण के दौर में भारतीय लोक संस्कृति – प्रिंस गुप्ता
शोध-सारांश : प्रस्तुत शोध-पत्र में वैश्वीकरण के संदर्भ में भारतीय लोक संस्कृति के स्वरूप, उसके परिवर्तनशील आयामों तथा समकालीन चुनौतियों का विश्लेषण किया गया है। वैश्वीकरण ने संचार, तकनीक, बाजार […]
बंजारा बोली की सत्ता और महत्ता – प्रा. सूर्यकांत रामचंद्र चव्हाण
सारांश – भारत की भाषाई विविधता में बंजारा बोली एक विशिष्ट स्थान रखती है। यह बोली न केवल बंजारा समुदाय की पहचान है, बल्कि उनकी सांस्कृतिक धरोहर और सामाजिक एकता […]
लोक साहित्य में स्त्री संघर्ष: एक मूल्यांकन – भारती जैन
प्रस्तावना लोक साहित्य किसी भी समाज की सांस्कृतिक चेतना का जीवंत और उर्जावान दर्पण होता है। यह वह साहित्य है जो लोक-मानस की सहज अभिव्यक्ति है और मौखिक परंपरा के […]






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