प्रस्तावना

                                आधुनिक उपन्यासों में प्रेम के विविध रूपों का चित्रण हुआ है। हर उपन्यास प्रेम की एक नई कहानी कहता है।असल जिंदगी में सच्चे प्रेम को पाना जितना मुश्किल है उसी प्रकार नये उपन्यासों में भी व्यक्ति को सरलता से प्रेम नहीं मिलता है। यही कारण है कि संघर्षों के बिना मिला प्रेम सच्चा भी नहीं लगता है। आज के जमाने में एक दूसरे पर विश्वास करना बहुत बड़ी बात है। आज हर रिश्ते में मिलावटी पान देखने को मिलता है। ऐसे में प्रेम की तो बुनियाद ही विश्वास है। भाग दौड़ भरी जिंदगी में भले ही लोगों के पास प्रेम करने का समय ना हो लेकिन प्रेम अपनी जगह व्यक्ति के जीवन में बना ही लेता है। प्रेम की पराकाष्ठा उसे किसी भी हाल में पाने में नहीं, बल्कि पूरे मान सम्मान के साथ पाने में है। इसी कारण प्रेम पर इतने उपन्यास आज के युग में भी देखने को मिलते हैं। उन्हीं में से कुछ उपन्यासों को लेकर मैंने अपने इस विषय पर जानकारियां एकत्रित करने का एक प्रयास किया है। यहां दिव्य प्रकाश दुबे जी के तीन उपन्यासों पर अपना मत प्रस्तुत किया है। जो तीनों ही है तो प्रेम कहानी पर लिखा गए उपन्यास लेकिन फिर भी उसमें हमें प्रेम के विविध रूप देखने को  मिलते हैं। प्रेम शब्द है तो बहुत छोटा लेकिन इसके मर्म को समझने के लिए मन के अतः स्थल को छूना होता है तथा दिल की गहराइयों से महसूस करना होता है।

बीज शब्द : प्रेम, उपन्यास, जीवन, शादी, खुश आदि ।

विश्लेषण

                                  दिव्य प्रकाश दुबे ने सात बेस्ट सेलर किताबें लिखी है। जिसमें से तीन मुसाफिर कैफे, अक्टूबर जंक्शन और इब्नेबतूती को लेकर में अपना यह विषय लिख रही हूं। वह ‘स्टोरीबाजी’ नाम से कहानी सुनाते हैं। दिव्य प्रकाश आवाज की दुनिया का एक जाना पहचाना नाम बन चुके हैं। मणिरत्नम की मशहूर फिल्म ‘पोंनियिन सेल्वन 1 और पोंनियिन सेल्वन 2’ के संवाद लिख चुके हैं। 10 साल कॉर्पोरेट दुनिया में मार्केटिंग तथा एक लीडिंग चैनल में कंटेंट एडिटर के रूप में कार्य  करने के बाद अब वह एक फुल टाइम लेखक है। वह मुंबई में रहते हैं। कई नए लेखकों के साथ राइटर्स रूम के अंतर्गत फिल्म, वेब सीरीज और ऑडियो शो विकसित करते हैं।

                          संदीप और चित्रा के लिए 10 अक्टूबर को एक दिन या एक तारीख नहीं है। बल्कि साल भर का सफर खत्म कर शांत बैठने का एक दिन हुआ करता है। यहां प्रेम का ऐसा रूप देखने को मिलता है जिसमें एक दूसरे से बहुत सारी कसमें वादे नहीं है, किसी से कोई शर्त या सवाल नहीं है, आशाओं,अपेक्षाओं और सपनों का तो नामोनिशान तक नहीं है। यह दिन दोनों के लिए चुपचाप सुकून से बैठने का समय होता है। इस समय वह कम ही बोलते थे। बल्कि एक दूसरे को सुनने की कोशिश ज्यादा करते थे। दोनों ही अपनी जिंदगी में बहुत ही अलग-अलग तरह से काम कर रहे होते हैं।

                          सुदीप स्टार्टअप कंपनी का मालिक था। तो सुधा एक लेखिका थी। सुदीप को पैसों की कोई कमी नहीं थी। सुधा को अपना गुजारा करने के लिए घोस्ट राइटिंग करनी पड़ती है। दोनों ही बहुत अलग माहौल में साल भर रहते थे। शायद इसी कारण उनके बीच में साल भर को लेकर कोई विशेष बात कभी नहीं होती थी। हमारी दो जिंदगियां होती है एक जो हम हर दिन जीते हैं दूसरी जो हम हर दिन जीना चाहते हैं। 1

                            दोनों ही उसे मुलाकात में काफी खुशी का अनुभव करते थे। यही कारण था कि हर साल 10 अक्टूबर को मिलने के बाद अगले साल 10 अक्टूबर को मिलने का वादा करके अलग हो जाते थे। वह खास दिन केवल तारीख पर नहीं आता बल्कि उस तारीख के कई दिन पहले से लेकर उस तारीख के कई दिन बाद तक आता है।2 इस बीच में कभी एक दूसरे के बारे में जानने की कोशिश तक नहीं करते थे। अपनी-अपनी दुनिया में अपना-अपना काम करते रहते थे।

                        इस उपन्यास में हम यह देख सकते हैं कि प्यार हमेशा जिंदगी में उथल-पुथल या बहुत सारी कठिनाइयों के साथ ही नहीं आता है। व जीवन के उथल-पुथल में ठहराव लेकर भी आता है। प्यार हमेशा शर्तों की सीमाएं लिए हुए हो यह आवश्यक नहीं है। प्यार किसी भी सीमा से मुक्त होकर भी सामने वाले को सुख और संतोष दे सकता है। यह इस उपन्यास में मुख्य रूप से दिखाया गया है। साथ ही सच्चा प्रेम शारीरिक सुख का आदी नहीं है। यह वह मोमेंटो था, जब चित्रा सुदीप के पास आ सकती थी। उसको कुछ पूछ सकती थी, बता सकती थी। वह गले लगा सकती थी। उसको समझा सकती थी कि कोई बात नहीं सब एक दिन ठीक हो जाएगा। सब कुछ एक दिन ठीक हो जाएगा-इस उम्मीद पर एक नहीं, न जाने कितनी दुनिया चल रही होगी। 3 यहां हर समय एक दूसरे को देखते रहने की कोई लालसा नहीं है। यहां प्रेम में दृढ़ विश्वास देखने को मिलता है। साल के एक दिन का इंतजार उनके आपसी सामंजस्य को दिखाता है। साल के उस एक दिन बीते साल के विषय में दोनों एक दूसरे से कोई सवाल नहीं पूछते यह उनके आपसी विश्वास को दिखाता है।

                         मुसाफिर कैफे जैसा कि नाम से ही जाहिर है यह एक ऐसा उपन्यास है जिसमें चंदर और सुधा जिंदगी के मुसाफिर थे जो जाने अनजाने हमसफर बन जाते हैं। यह प्रेम जिंदगी के तीसरे पड़ाव पर जाकर यह जान पता है कि यह दोनों ही एक दूसरे के बिना अधूरे हैं। हालांकि चंदर और सुधा शादी की सही उम्र में, एक दूसरे से शादी करने के लिए एक दूसरे से मिलते तो है लेकिन तब शायद समय सही नहीं था। दोनों ही स्वतंत्र होकर निर्णय लेने में सक्षम थे फिर भी वह शादी नहीं करते हैं। डिवोर्स एक्सपर्ट वकील, वह हर दिन इतनी सारी शादियों को टूटता हुआ देखती है कि उसे शादी पर विश्वास ही नहीं है। उसका मानना था लोगों को लाइफ से क्या चाहिए यह उन्हें पता ही नहीं है। इसीलिए लोग शादी करते हैं। ऐसी थी सुधा, एक वजह तो यह थी कि उसके अपने पेरेंट्स की शादी कभी सही नहीं चली। इसके अलावा सुधा वकील थी तो वह रोज कोर्ट में डिवोर्स देख-देख कर शादी को लेकर कभी शॉर नहीं हो पाई। उसको शादी से डर लगता था।4

                         दूसरी तरफ चंदर जो अभी शादी नहीं करना चाहता था परिवार के दबाव में आकर वह सुधा से मिलने आया था। अर्थात दोनों ही शादी के लिए तैयार नहीं थे। ऐसे में उनका दोस्ती का रिश्ता बहुत ही स्वतंत्र और सुखद रिश्ता था। दोनों अपनी हर बात एक दूसरे को बता चुके थे। उनके पास एक दूसरे को बताने के लिए और कुछ भी नहीं था। कुछ न होने पर साथ बैठना उनको अच्छा लगता था। एक दूसरे के साथ समय बिताने में उन दोनों को खुशी मिलती थी। सुबह जब चंदर सोकर उठा तब पहली बार समझ में आया कि जब घर में दो लोग होते हैं तब घर कैसा महकता है, कैसा शोर करता है। खैर, सुधा ने न्यूज़पेपर से बॉलीवुड वाला पेज निकाल कर बाकी पेपर इधर-उधर फेंका हुआ था। 5

                           लेकिन इन सब के बावजूद भी करीब एक साल साथ रहने के बाद भी सुधा शादी के लिए नहीं मानती है। चंदर उसको समझने की हर संभव कोशिश करता है। इस बीच सुधा गर्भवती भी हो जाती है लेकिन तब भी सुधा शादी के लिए नहीं मानती है। एक दिन हार मानकर चंदर मसूरी चला जाता है। चंदर गया मन को शांत करने के लिए था लेकिन वहां जाकर भी सुधा को भुला नहीं पता है। वहां उसकी दोस्ती पम्मी से होती है। यहां सुधा ने फोन पर बताया था कि उसका मिसकैरेज हो गया हालांकि चंद्र जानता था सुधा झूठ बोल रही है लेकिन वह अब वापस मुंबई नहीं जाना चाहता था। किसी के जाने के बाद हम इस उम्मीद में नॉर्मल बिहेव करने लगते हैं कि एक दिन नॉर्मल दिखाने का नाटक करते-करते सही में ठीक वैसे ही नॉर्मल हो जाएगा जैसे कभी कुछ हुआ ही नहीं था। गलतियां छोटे-छोटे निशाना इसलिए छोड़कर जाती है ताकि हम अपनी सब गलतियां भूल न जाए। गलतियां सुधारनी जरूर चाहिए लेकिन मिटानी नहीं चाहिए। गलतियां वह पगड़डियाँ होती है जो बताती रहती है कि हमने शुरू कहां से किया था। 6

                           सुधा और चंदर अब अपनी दुनिया में मशहूर हो गए थे। सुधा को एक बेटा था जिसके साथ वह मुंबई में ही रहती थी और बहुत बड़ी वकील बन गई थी। चंदर और पम्मी मिलकर मुसाफिर कैफे चलाते थे जहां मुसाफिरों को सिर्फ चाय नहीं बल्कि चाय के साथ किताबें पढ़ने को दी जाती थी। वह सुकून से बैठ और सोच सकते थे ऐसा माहौल बनाया था।

                         सुधा और चंदर के जीवन में अधूरा सा कुछ था इसी कारण वह दोनों एक दूसरे को भुला नहीं पाए थे और ना ही अपने जीवन में आगे बढ़ पाए थे। आखिरकार दस साल बाद सुधा चंदर से मिलने मसूरी आती है। और पाती है कि चंदर भी किसी और के साथ जीवन में आगे नहीं बढ़ा है। बल्कि वह भी सुधा के लौटने का इंतजार कर रहा है। अब सुधा, चंदर, पम्मी और अक्षर एक साथ मसूरी में रहने लगे तीनों बहुत खुश थे। अक्षर वह तो बहुत खुश था। चंदर को समझ आ चुका था जिंदगी की किताब में और नहीं केवल और केवल नई शुरुआत मैटर करती है। सुधा ने अपनी नई लॉ फर्म  खोल ली थी। वह साल में तीन-चार महीने मसूरी में रहती और एक महीने के लिए अकेले कहीं घूमने जाती। अपना मुसाफिर कैफे ढूंढने। हमारे सब जवाब हमारे पास खुद हैं, यह बात समझने के लिए अपने हिस्से भर की दुनिया भटकनी पड़ती ही है। बिना भटके मिली हुई मंजिले और जवाब दोनों ही नकली होते हैं। वैसे भी जिंदगी की मंजिल भटकना है कहीं पहुंचना नहीं। 7

                       इस उपन्यास में सुधा का एक लड़की के रूप में अलग ही स्वभाव सामने आता है वह चाहती थी स्वतंत्र और उन्मुक्त होकर जीवन जीना जहां उसे किसी प्रकार के बंधन में ना बांधना पड़े और वह जब शादी कर तो ऐसे लड़के से करें जो उसके लिए देवदास बन जाए। ऐसा लड़का चाहती थी जो उसकी खुशी के लिए खुद को हर समय बदलता रहे। इसीलिए इस उपन्यास में प्यार की ऐसी परिपक्वता देखने को मिलती है जो साधारणतः अन्य प्रेम के उपन्यासों में नहीं देखने मिलती है। इतने साल तक एक दूसरे से दूर रहकर भी एक दूसरे से प्यार करना और जब मिले तो कोई सवाल उनके बीच नहीं था। यही इस उपन्यास को प्रेम के उपन्यासों में विशिष्ट बनाती है।

                     दिव्य प्रकाश दुबे जी का ही एक अन्य उपन्यास है इब्नेबतूती। इस उपन्यास की सबसे बड़ी विशेषता यही थी कि जहां माता-पिता अपने बच्चों के लिए जीवनसाथी ढूंढ रहे हैं वहां राघव अपनी माँ के लिए एक साथी चाहता है। एक ऐसा साथी जिसे माँ अपने मन की हर बात खुलकर कह सके। राघव के पिता जब वह 4 साल का था तब उसके पापा एक एक्सीडेंट में मर गए थे। तब से राघव और उसकी माँ ही एक परिवार था। लेकिन अब राघव को पढ़ने के लिए बाहर जाना है और उसकी माँ अकेली रह जाएगी यही सोचकर वह अपनी माँ के लिए एक साथी की तलाश शुरू करता है।

                      राघव को आलोक के बारे में पता चलता है जब उसकी माँ 20 साल की लड़की थी। और किसी से प्यार करती थी लेकिन नाना उनकी शादी के लिए नहीं माने क्योंकि वह अलग जाति का था। किसी औरत ने कहा था की माँ बनने के साथ ही याद आ जाती है। तमाम भूली हुई कहानी। हर माँ के पास अनगिनत कहानी होती है। जितनी वह सुनती जाती है, उतनी ही कहानी बची रह जाती है। 8 हालांकि उसके बाद शालू सब कुछ भूल जाने का दिखाकर अपनी शादी में आगे बढ़ जाती है। लेकिन आलोक के लिखे खत और टॉफी वह अभी भी संभाल कर रखे हुए थी जिसका पता किसी को नहीं था। इसी कारण राघव आलोक को ही ढूंढने की कोशिश करने लगता है। बहुत कोशिशें के बाद आखिरकार वह मिल ही लेता है आलोक से। जब वह पढ़ने के लिए जा रहा होता है तो अपनी माँ और आलोक को साथ देखकर उसे तसल्ली होती है कि उसकी माँ अकेली नहीं है। माँ अब उनके साथ है जिसके साथ वह अपने मन की हर बात कह सकेगी जैसे पहले कहती थी। सब इतना तेजी से हुआ कि तुम्हें बताने का समय ही नहीं मिला। समय ऐसे बीत रहा है जैसे टेप रिकॉर्डर में लगे कैसेट को कोई फॉरवर्ड पर लगाकर भूल जाए। सोचा था कि तुम्हें शादी में जरूर बुलाएंगे लेकिन अब भी गुस्सा बहुत है। थिएटर के दिन, हिंदू कॉलेज के दिन याद आते हैं। हमारा पीसीएस में सिलेक्शन हो गया है, कृषि विभाग मिला है। 9

                  यहां शालू के अधूरे प्यार को उसका बेटा वापस ढूंढ कर ला देता है। आजकल के नवयुवक पारंपरिक रूढ़िवादी समाज से अलग सोच विचार रखने वाले युवक हैं। वह समय की आवश्यकता के अनुसार खुद को बदलना जानते हैं। और आधुनिक युग से तालमेल बिठाने में अपने माता-पिता की भी सहायता करते हैं। उसके लिए नया कार्य करना आसान न भी हो तब भी वह करने की हर संभव कोशिश जरूर करते हैं। शालू को जाति की वजह से अपना प्यार नहीं मिलता है। लेकिन जब पुत्र माँ के लिए साथी ढूंढता है तो वह जाति-पाति सबको मिटा देता है। उसके लिए उसकी माँ की खुशी ही सबसे जरूरी होती है। “ तो हम कह रहे थे कि कोई ऐसा होना चाहिए न, जो अच्छा दोस्त हो तुम्हारा। मेरा मतलब है कि एक खास दोस्त होता है ना। जरूरी नहीं कि उसे बॉयफ्रेंड ही बोला जाए। 10

निष्कर्ष                                                                                                                                                                                     कह सकते हैं बदलते समाज का प्रभाव हिंदी उपन्यासों पर और हिंदी उपन्यासों में चित्रित प्रेम पर भी पड़ा है। आज प्रेम भी अपनी परिपक्व स्थिति में है। पुराने समय में प्रेम को भले ही अग्नि परीक्षा देनी पड़ी हो लेकिन आज के समाज में भी प्रेम का महत्व कम नहीं हुआ है। आज भी प्रेम को अपनी पूर्णता को पाने के लिए कड़ी से कड़ी परीक्षा देने में भी आज के युवक भी पीछे नहीं हटते हैं। जहां भी उपन्यासों में सच्चा प्रेम दिखाया गया है उन सभी जगह पर प्रेमियों में सहनशक्ति, क्षमाशीलता, परिवार का आदर, आत्मसम्मान, सामने वाले की भावनाओं का सम्मान, ठहराव और समझदारी के बहुत सारे उदाहरण देखने को मिल जाते हैं। अर्थात आज भी उपन्यासों में चित्रित प्रेम के विविध रूपों में प्रेम का महत्व ही देखने को मिलता है।

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संदर्भ ग्रंथ सूची

  1. अक्टूबर जंक्शन, दिव्य प्रकाश दुबे, पृष्ठ संख्या 152
  2. अक्टूबर जंक्शन, दिव्य प्रकाश दुबे, पृष्ठ संख्या 7
  3. अक्टूबर जंक्शन, दिव्य प्रकाश दुबे, पृष्ठ संख्या 38
  4. मुसाफिर कैफे, दिव्य प्रकाश दुबे, पृष्ठ संख्या 113,
  5. मुसाफिर कैफे, दिव्य प्रकाश दुबे, पृष्ठ संख्या 28
  6. मुसाफिर कैफे, दिव्य प्रकाश दुबे, पृष्ठ संख्या 119
  7. मुसाफिर कैफे, दिव्य प्रकाश दुबे, पृष्ठ संख्या 143
  8. इब्नेबतूती, दिव्य प्रकाश दुबे, पृष्ठ संख्या 18
  9. इब्नेबतूती, दिव्य प्रकाश दुबे, पृष्ठ संख्या 120
  10. इब्नेबतूती, दिव्य प्रकाश दुबे, पृष्ठ संख्या 60

 

उपसंदर्भ ग्रंथ सूची

  1. पीली छतरी वाली लड़की, उदय प्रकाश
  2. एक ब्रेक के बाद, अलका सरावगी
  3. डरी हुई लड़की, ज्ञान प्रकाश विवेक

 

                                                                

   शोधार्थी : सजनी एंथोनी

   शोध निदेशक : डॉक्टर संजय एल मदार

   शोध संस्थान दक्षिण भारत हिंदी प्रचार सभा एर्नाकुलम, केरल