सारांश – भारत की भाषाई विविधता में बंजारा बोली एक विशिष्ट स्थान रखती है। यह बोली न केवल बंजारा समुदाय की पहचान है, बल्कि उनकी सांस्कृतिक धरोहर और सामाजिक एकता का भी आधार है। इस शोधलेख का उद्देश्य बंजारा बोली की सत्ता अर्थात अस्तित्व और महत्ता को भाषाई, सांस्कृतिक तथा ऐतिहासिक दृष्टि से समझना है। बंजारा बोली भारत की आदिवासी और घुमंतू संस्कृति की पहचान है। इसकी सत्ता इस समुदाय की सामाजिक, सांस्कृतिक और ऐतिहासिक धरोहर को जीवित रखती है, जबकि इसकी महत्ता लोकगीतों, कथाओं, रीति-रिवाजों और सामुदायिक एकता में झलकती है।
बीज शब्द – लोक साहित्य, बंजारा, सिंधु संस्कृति, गोरबोली, गोरमाटी, इंडो-आर्यन, लेंगी, सांस्कृतिक विविधता, राजस्थानी भाषा, जीवट जिंदादिली, पणि, सांस्कृतिक धरोहर आदि।
प्रस्तावना – बंजारा समाज सदियों से न केवल भारतवर्ष के इतिहास बल्कि जिप्सी बंजारों (भ्रमणशील वृत्ति के कारण) के माध्यम से पूरे विश्व में अपनी अक्षुण्ण परंपराओं और जीवन पद्धति की निरंतरता के कारण वह अपने अतीत का संबंध विश्व की उसे महान प्राचीन सिंधु सभ्यता से स्थापित करता है, जिस संस्कृति ने मानव सभ्यता के इतिहास में अपना विशेष प्रभाव छोड़ा है। बंजारा समाज जहाँ एक ओर जीवन के विभिन्न संस्कारों और परंपराओं के माध्यम से अपना अतीत प्राचीनतम् सिंधु संस्कृति में तलाशता है तो वहीं दूसरी ओर अपनी जीवट जिंदादिली, ओतप्रोत स्वाभिमान आदि के कारण अपने लोकगीतों के माध्यम से राजस्थान के उन वीर योद्धाओं को अपने कंठों में जिंदा बसाय रखा है, जिन्होंने मातृभूमि और स्वाभिमान के लिए अपनी जिंदगी को निछावर कर दिया था। एक ओर वह व्यापार (लदहरा के रूप में) के परंपरा के कारण ऋग्वेदकालीन आर्यशत्रु ‘पणि’ और ‘अहि’ जैसे अनार्यों में अपना अतीत खंगोलता है तो दूसरी ओर अपनी-‘गोरमाटी’ अस्मिता के कारण ‘गोरवंश’ से संबंध स्थापित करते हुए अपनी ‘गोरबोली’ के उद्गम स्रोतों से आर्य भाषा परिवार में राजस्थानी भाषा की बोली के रूप में खोजता है। ऐसे अनुठी जीवनशैली, जिसकी संस्कृति में अतीत की जीती-जागती तस्वीरें अंकित होती है, उस बंजारा समाज को महज़ लदहरा या लोकसाहित्य तक सीमित नहीं रख सकते। बल्कि उसकी अपनी परंपरा और स्वतंत्र जीवन शैली के विचार निरंतरता की शाश्वत जीवन पद्धति के योगदान को भारतीय सभ्यता के इतिहास में स्वीकारना आवश्यक है।
मुख्य भाग – सदियों से जीवन परिचालन करनेवाले बंजारा समाज को विभिन्न ऐतिहासिक कालखंडों में अनेक रियासतों के अधिनस्त अपना जीवनयापन करना पड़ा है। अर्थात उन सभी का प्रभाव बंजारा समाज, संस्कृति और बोलीभाषा पर भी पड़ता रहा। इसलिए बंजारा समाज, संस्कति तथा बंजारा बोली का अन्योन्याश्रित संबंध होने के कारण बंजारा समाज की ऐतिहासिक पृष्ठभूमि को समझना अत्यंत आवश्यक है। भौगोलिक विस्तार के रूप में महाराष्ट्र, आंध्र प्रदेश, तेलंगाना, कर्नाटक, मध्यप्रदेश और राजस्थान में बंजारा समुदाय इस बोली का प्रयोग करता है। बंजारा, लभान, लमाण, लंबाडा, लंबाडी आदि विभिन नामाभिधान स्थान विशेष और इतिहास ने देने के बावजूद भी वह अपनी ‘गोरमाटी’ संस्कृति को कैसे स्थायी बनाय रखा है, उसे भी समझना ऐतिहासिक दृष्टि से आवश्यक है।
किसी भी भाषा का वास्तविक एवं प्राकृतिक जीवन उनकी बोलियों में ही सन्निहित रहता है। बोली, व्यक्ति बोली और भाषा के मध्य की कड़ी है। यही बोली अनुकूल परिवेश पाकर बाद में शिक्षा, साहित्य और समाज की मुख्य धारा बन जाती है तो वह अपने विस्तृत आकार में किसी समुदाय की भाषा बन जाती है। जब भी कभी भाषा रूढ़ीबद्ध होने लगती है तो बोली अपनी अमित शब्द भंडार से उसे प्रवाहमान बना देती है। बोली और भाषा के संबंधों पर भाषाविद् एफ. मैक्समूलर अपने ग्रंथ ‘द साइंस ऑफ लैंग्वेज’ में अपने विचार रखते हैं। इस ग्रंथ का हिंदी अनुवाद डॉ. उदय नारायण तिवारी ने ‘भाषा विज्ञान’ इस शीर्षक से किया है। मैक्स मूलर लिखते हैं, “बोली सदैव साहित्यिक भाषा की नहर की अपेक्षा उसकी सहायक एवं पोषक होती है, जो भी हो विभिन्न बोलियां वस्तुतः साहित्यिक भाषाओं के समानांतर धाराएं हैं। जो अति प्राचीनकाल से प्रवाहमान है। इन्हीं परंपराओं में से कभी-कभी एक धारा साहित्य रचना के परिणाम स्वरूप कुछ समय के लिए महत्वपूर्ण स्थान प्राप्त कर लेती है।”1
अदम्य साहस की वृत्ति, स्वाभिमान और अपार मेहनत की पराकाष्ठा लोक साहित्य और लोक संस्कृति का पूर्ण ईमानदारी के साथ वैश्वीकरण के संजाल में भी अपने जीवन पद्धति का अनिवार्य अंग मानकर जीवन यापन करनेवाली बंजारा जनजाति अपना ऐतिहासिक संबंध राजस्थान की उसे वीर धरती से भी जोड़ती है, जहां राजपूत के तलवारों की झनझनाहट से वीरता का इतिहास लिखा गया। पूरे भारत में बंजारे कहीं भी मिलते हैं तो एक दूसरे को गोरमाटी अर्थात बंजारा बोली में ही अपने विचारों को अभिव्यक्त करते हैं। इस बंजारा बोली का ‘लभानी’ बोली के रूप में सर्वप्रथम प्रयोग सर जॉर्ज ग्रियर्सन करते हैं, जहां वे उसका संबंध राजस्थान से जोड़ते हैं। वे अपने ग्रंथ ‘भारत भाषा-सर्वेक्षण (खंड 1, भाग 1)’ में लिखते हैं, “लभानी और बंजारी बंजारा लोगों की बोली है। बंजारा भ्रमणशील जाती है और संपूर्ण पश्चिमी तथा दक्षिणी भारत इनके भ्रमण का क्षेत्र है। इनका दूसरा नाम लभान भी है। भारतवर्ष के अन्यान्य भागों में ये उसी क्षेत्र की बोली का व्यवहार करते हैं, जहां इन्हें निवास करना पड़ता है।”2
बंजारों की व्यापारिक पृष्ठभूमि में बंजारा समुदाय ऐतिहासिक रूप से व्यापार और परिवहन से जुड़ा रहा है। उनकी बोली में उस दौर की शब्दावली और अनुभवों की झलक मिलती है। विभिन्न क्षेत्रों में भ्रमण करने के कारण इस बोली में अनेक भाषाओं का प्रभाव दिखाई देता है। बंजारा समुदाय ने प्रकृति संरक्षण, परंपराओं की रक्षा और सामाजिक विकास में योगदान दिया है, जिसे उनकी बोली और संस्कृति में देखा जा सकता है। जो एक प्रकार से उनका राष्ट्रीय योगदान है। बंजारों का ऐतिहासिक महत्व इसलिए भी है की वह संघर्ष और अनुभवों का दस्तावेज है। भाषावैज्ञानिक अध्ययन के रूप में यह बोली भाषावैज्ञानियों के लिए भाषाई मिश्रण और विकास का रोचक उदाहरण है। उसका ऐतिहासिक महत्व इस दृष्टि से भी है कि उनका लोक साहित्य पीढ़ी-दर-पीढ़ी आज भी जिंदा है। मौखिक परंपरा के अंतर्गत इसका लिखित साहित्य सीमित है, परंतु मौखिक परंपरा अत्यंत समृद्ध है।
भाषाई परिवार के अंतर्गत बंजारा बोली इंडो-आर्यन भाषाओं से प्रभावित है। इसमें हिंदी, मराठी, गुजराती और राजस्थानी के शब्दों का मिश्रण मिलता है। ध्वन्यात्मक विशेषताओं में इसमें स्वर और व्यंजन उच्चारण की विशिष्टता है, जो इसे अन्य बोलियों से अलग करती है। व्यापार, यात्रा और लोकजीवन से जुड़े अनेक शब्द इस बोली में पाए जाते हैं। भाषाई भूमिका उसके सामुदायिक पहचान में निहित है। सामाजिक एकता में यह बोली समुदाय के भीतर संवाद और एकजुटता का माध्यम है। वह लोककला और लोक साहित्य का संवाहक है। बंजारा बोली की महत्ता उसके भावनाओं और जीवनशैली की अभिव्यक्ति में निहित है। बंजारा बोली भी इस रूप में राजस्थानी बोली की उपबोली के माध्यम से हिंदी की विभिन्न बोलियां में अपना विशेष स्थान रखती है। भारतीय आर्य भाषाओं में वैदिक संस्कृति से लेकर पाली, प्राकृत, अपभ्रंश एवं राजस्थानी बोली में बंजारा बोली के उद्गम स्थान को खोजने एवं उसका भाषा वैज्ञानिक अध्ययन करना यह न केवल बोली के लिए महत्वपूर्ण है बल्कि उसे बोली के भाषा के लिए भी महत्वपूर्ण होता है; क्योंकि किसी बोली के भाषा वैज्ञानिक अध्ययन करने से ही उस बोली के भाषा के मूल रूप तक पहुंचा जा सकता है।
सांस्कृतिक इतिहास की सामग्री तो लोक साहित्य में ही सुरक्षित रहती है। संस्कृति के भग्नावशेष के आधार पर, जो लोक साहित्य में छपे पड़े रहते हैं, उस पर ही सांस्कृतिक इतिहास का प्रासाद खड़ा किया जा सकता है। लोक साहित्य में अपार ज्ञान राशि एवं नीतियों का अक्षय कोश विद्यमान रहता है। लोक साहित्य एक मौखिक विश्वविद्यालय की भांति ज्ञान एवं नीति की शिक्षा प्रदान करने के दायित्व का निर्वहन करता है। अगर शिष्ट सहित को समाज का प्रतिबिंब कहा जाता है तो लोक साहित्य तो समाज की आत्मा का उज्ज्वल प्रतिबिंब कहा जाना चाहिए। क्योंकि “लोक-मस्तिष्क ने अपने इतिहास की कड़ियां अपने गीतों में, अपनी कथाओं में जोड़ी हैं, लोकगाथाएं तो एक रूप से इतिहास के प्रचुर सामग्री से संपन्न है। उनमें अतिरंजना भले ही हो, किंतु इतिहास के विद्यार्थियों को कुछ ऐसे तथ्य अवश्य मिल जाएंगे, जो प्रसिद्ध इतिहास लेखकों की दृष्टि से छूट गए हैं।”3 लोक साहित्य में लोकगीत जीवन के वे आख्यान होते हैं जिसमें लोकजीवन परंपरा की ऐतिहासिक पृष्ठभूमि झलकती है। लोकगीत इतिहास को खंगोलकर उस समय की लोकजीवन प्रणाली को खोजने में मदद करते हैं। ये उस समाज का आईना है जिसमें जीवन की प्रत्येक गतिविधि अनायास रूप से प्रतिबिंबित होती है। सामुदायिक एकता के रूप में बंजारा बोली समुदाय को जोड़ने का माध्यम है, जिससे उनकी पहचान और परंपरा सुरक्षित रहती है। यह बोली समुदाय के भीतर संवाद और संपर्क का माध्यम है। शैक्षिक और सामाजिक महत्व के रूप में बंजारा बोली का अध्ययन आदिवासी समाज की समझ और भारतीय संस्कृति की गहराई को जानने में मदद करता है।
बंजारों में विवाह संस्कार के अंतर्गत सगाई इस संस्कार में सबसे पहले टांडे का नायक, कारभारी तथा अन्य पंच उपस्थित रहते हैं। आरंभ में ही एक-दूसरे से कुशलक्षेम पूछा जाता है। जिसे ‘कसळ पूछेर’ कहा जाता है। यहाँ एक दूसरे की सकुशलता का संप्रेषण होता है। यह राजा भोज की सभा है, जिसमें सारे पंच बैठे हुए हैं। ये सारे भाई बड़े-बड़े उमराव के सामने सव्वा-सव्वा के बराबर है। एक-दूसरे पर भरोसा रखना चाहिए। क्योंकि जिंदगी का भरोसा नहीं है। जैसे जल जमीन से बहते हुए अपने अंतिम स्थान तक पहुँचता है। वैसे ही हमारी जिंदगी की डोर अपने हाथों में नहीं है। टिटोड़ी, (टिव-टिव आवाज करनेवाला पक्षी) की आवाज हमारे लिए किसी भी संकटों की सूचना है। इसीलिए जिंदगी का भरोसा नहीं है। तो आप सभी खुश हो? दूसरी ओर से भगवान की कृपा से हम सब खुश है की आवाज आती है-
“पंच पंचायत, राजा भोजेर सभा ।
भाई संगळ कचेरी, पचारी जगत ।
एकेती एक सवाई, बडे-बडे उमराव ।
जळ कसळ, तळ कसळ कसळ पोवनी पात ।
राज डोर वरेंळहात ।
भाईर तो भरोसो मान
हेरी मन धाक ।
टिटोड़ी समदर वळंची।
गो तारो परवान
सव आनंद छ?”4
इस प्रकार से सकुशलता पूछने के वाद लड़की देखने की रस्म पूरी की जाती है। रिश्ता पक्का होने पर एक-दूसरे से मिठाई बाँटी जाती है।
दिवाली के समय दीपक लगाने के पश्चात् सभी बंजारन लड़कियाँ एकत्रित होकर गीत गाती हुई दीपक लेकर नायक के घर की ओर प्रस्थान करती है। लड़कियाँ अपने-अपने पास मिट्टी का दीपक और उसमें अरंडी का एवं अन्य कोई भी तेल डालकर रुई की बाती भिगोकर जलाती हैं। लड़कियाँ दीपक को बुझने नहीं देतीं और साथ ही समूह के साथ गान करती हुई निकलती हैं। जिसमे हगर- घर दीया जलाने को कहती है –
“रात अंधेरी ये घर-घर दीवलो बाळ लीजो ।
रात अंधेरि ये मारे बापूर कीजोए
घर-घर दीवलो बाळ दीजो ।
मारे विरात कीजोए
कुतरा भसिये तो हो कर दीजो।
रात अंधेरी ये घर-घर
दीवलो बाळ दीजो ।”5
होली का उत्सव तो बंजारों का सबसे प्रिय उत्सव है। होली खेलनेवाले उत्साह से भरे हुए हैं। कभी-कभार… होली खेलने वाली महिलाएं भी उनके साथ शामिल हो जाती हैं और लेंगी (होली के गीत) भी खिल उठते हैं-
“धूम मची धूम मचीरे बणजारा ।।
भूरीया लायो सतार बणजारा ।
भूरीया प धूमे मचीर बणजारा ।।”6
अर्थात होली का नाच पूरे जोश में चल रहा था। वो नथ लेकर आया! भला कौन लेता? इसलिए उसने हंगामा खड़ा कर दिया।
सांस्कृतिक विविधता के रूप में यह बोली भारतीय भाषाई विविधता का हिस्सा है और बहुभाषी समाज में अपनी अलग पहचान बनाए रखती है। सांस्कृतिक संरक्षण के दृष्टि से बंजारा बोली लोककला, नृत्य और संगीत की आत्मा है। यह बोली लोकगीतों, नृत्यों और पारंपरिक कथाओं के माध्यम से पीढ़ी-दर-पीढ़ी जीवित है, जो उनका सांस्कृतिक धरोहर है। बंजारा बोली का अस्तित्व मुख्यतः लोकगीतों, कहावतों और कथाओं में है, जो पीढ़ी दर पीढ़ी मौखिक रूप से संप्रेषित होती रही है। बंजारा बोली में गाए जानेवाले विभिन्न संस्कारविषयक गीत और नृत्य समुदाय की भावनाओं और जीवनशैली को व्यक्त करते हैं तथा समुदाय की सांस्कृतिक पहचान हैं। यह बोली लोककथाओं और कहावतों के माध्यम से जीवन-मूल्यों को संप्रेषित करती है। धार्मिक अनुष्ठान के अंतर्गत पूजा-पाठ और धार्मिक उत्सवों में बंजारा बोली का प्रयोग होता है। क्योंकि “विश्व और मानव की रहस्यमय पहली को सुलझाने के लिए, उसकी प्राचीनतम रूपों की खोज के लिए और जहाँ इतिहास के पृष्ठ मुक हैं, शिलालेख और ताम्रपत्र मलीन हो गए हैं, वहाँ उस तमसाछन्न स्थिति में लोक साहित्य ही दिशा निर्देश करता है। लोक साहित्य का गम्भीर अध्ययन ही मौलिक एवं प्रामाणिक ख़ोज के लिए अत्यंत आवश्यक है। आदिमानव की प्रवृत्तियों को मानने का सबसे सफल प्रामाणिक एवं रोचक साधन लोक साहित्य ही तो हैं।”7
आधुनिक संदर्भ में आज यह बोली पहचान और सांस्कृतिक पुनरुत्थान का साधन बन रही है, जो आज समुदाय की पहचान और गौरव का प्रतीक है। चुनौतियों के रूप में देखा जाए तो शहरीकरण और शिक्षा के कारण युवा पीढ़ी अन्य भाषाओं की ओर झुक रही है, जो बंजारा बोली के लिए सबसे बड़ी चुनौति है। इसके अलावा लिखित साहित्य का अभाव इसकी स्थायित्व को चुनौती देता है। इन चुनौतिओं पर अगर समाधान निकालना हो तो ऐसे समय पर पुनरुत्थान की आवश्यकता है। सांस्कृतिक उत्सवों और शैक्षिक कार्यक्रमों के माध्यम से इस बोली को पुनर्जीवित किया जा सकता है। इसलिए इस बोली को विश्वविद्यालयों और शोध संस्थानों द्वारा दस्तावेजीकरण करने की आवश्यकता है। साथ में लोकसाहित्य का संकलन और प्रकाशन भी जरूरी है। लगातार सांस्कृतिक उत्सवों में बंजारा बोली का प्रयोग किया जाना चाहिए और स्थानीय विद्यालयों में बंजारा बोली शिक्षा का माध्यम बने।
निष्कर्ष रूप में देखा जाय तो बंजारा बोली केवल भाषा नहीं, बल्कि एक जीवंत सांस्कृतिक धरोहर है। इसकी सत्ता समुदाय की पहचान को सुरक्षित रखती है और इसकी महत्ता भारतीय संस्कृति को समृद्ध करती है। भारतीय विविधता में बंजारा बोली की सत्ता उसके अस्तित्व का प्रमाण है और उसकी महत्ता भारतीय संस्कृति की बहुरंगी छटा का प्रतीक। यह बोली न केवल बंजारा समुदाय की पहचान है, बल्कि भारत की ‘एकता में विविधता’ की अवधारणा को भी सशक्त बनाती है।
संदर्भ ग्रंथ सूची –
- भाषा-विज्ञान (The Science of Language) – एफ. मैक्समूलर (अनु. उदय नारायण तिवारी), प्रथम संस्करण जनवरी 1970, मोतीलाल बनारसीदास प्रकाशन, जवाहरनगर दिल्ली-07, पृ. 44
- भारत भाषा-सर्वेक्षण (खंड 1, भाग 1) – सर जॉर्ज अब्राहम ग्रियर्सन (अनु. उदय नारायण तिवारी), द्वितीय संस्करण, प्रकाशन शाखा, सूचना विभाग, उत्तर प्रदेश, पृ. 337
- लोकसाहित्य : सिद्धांत और प्रयोग – डॉ. श्रीराम शर्मा, नवीनतम संस्करण, विनोद पुस्तक मंदिर आग्रा, पृ. 317
- बंजारा लोकगीतों का भाषिक अध्ययन – सूर्यकांत चव्हाण, संस्करण 2018, शैलजा प्रकाशन, कानपुर, पृ. 36
- बंजारा लोकगीतों का सांस्कृतिक अध्ययन – डॉ. गणपत राठोड, प्रथम संस्करण 2022, चंद्रलोक प्रकाशन, कानपुर, पृ. 112
- गोरवट – आत्माराम राठोड, प्रथम आवृत्ति 2006, साहित्य अकादमी, नई दिल्ली, पृ. 124
- लोकसाहित्य : सिद्धांत और प्रयोग – डॉ. श्रीराम शर्मा, नवीनतम संस्करण, विनोद पुस्तक मंदिर आग्रा, पृ. 314





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