शोध सार
भारतीय साहित्यिक परंपरा में लोक साहित्य जनजीवन की अनुभूतियों का सजीव दस्तावेज माना जाता है। लोक का संबंध उस जीवन से है जिसे समाज प्रत्यक्ष रूप में जीता है, इसलिए लोक साहित्य में सामाजिक यथार्थ, जनभावनाएँ और ऐतिहासिक चेतना परिलक्षित होती हैं। औपनिवेशिक काल में अभिव्यक्ति और विचारों पर नियंत्रण की प्रवृत्ति विशेष रूप से विकसित हुई। ब्रिटिश शासन ने राष्ट्रवादी विचारों और जनजागरण को सीमित करने के उद्देश्य से अनेक दमनकारी कानून लागू किए। इनमें वर्नाक्युलर प्रेस एक्ट, 1878 विशेष रूप से उल्लेखनीय था, जिसके माध्यम से भारतीय भाषाओं के समाचार-पत्रों और प्रकाशनों पर कठोर नियंत्रण स्थापित किया गया। इसके अतिरिक्त भारतीय दंड संहिता की धारा 124ए (राजद्रोह) का प्रयोग सरकार विरोधी लेखन, भाषण और साहित्य को अपराध घोषित करने के लिए किया गया। इसी प्रकार सी कस्टम्स एक्ट, 1878 और क्रिमिनल लॉ अमेंडमेंट एक्ट, 1908 के माध्यम से सरकार को ऐसे साहित्य को जब्त करने और उसके प्रसार को रोकने का अधिकार दिया, जिसे औपनिवेशिक शासन के विरुद्ध माना जाता था। इन कानूनों का प्रभाव केवल ब्रिटिश शासित क्षेत्रों तक ही सीमित नहीं रहा, बल्कि अनेक देशी रियासतों में भी साहित्य और संगठनों पर नियंत्रण स्थापित किया गया। इस संदर्भ में ‘प्रभात फेरी गायन व नारे’, कन्हैयालाल सेठिया की ‘अग्निवीणा’, ‘किसानों का बिगुल’ तथा ‘मारवाड़ी राष्ट्रीय गीत’ जैसी काव्य-रचनाएँ विशेष रूप से उल्लेखनीय हैं। इन रचनाओं की व्यापक लोकप्रियता और जनजागरणकारी प्रभाव के कारण प्रशासन ने इनके प्रसार पर प्रतिबंध लगाया। इन काव्य-रचनाओं में किसान जीवन, औपनिवेशिक शोषण, राष्ट्रीय चेतना और जनप्रतिरोध का सशक्त चित्रण मिलता है। प्रस्तुत शोध-पत्र अध्ययन की सुविधा की दृष्टि से तीन खंडों में विभाजित किया है। पहले खंड में औपनिवेशिक सत्ता के विरुद्ध प्रतिरोध के स्वरों का अध्ययन किया है, दूसरे खंड में सामंती और आर्थिक शोषण के विरुद्ध उभरती जनचेतना का विश्लेषण किया है तथा तीसरे खंड में इन रचनाओं में निहित सामाजिक परिवर्तन और स्वाधीनता संग्राम के प्रतिरोधात्मक स्वरों का विवेचन किया है। इस प्रकार यह शोध-पत्र औपनिवेशिक सत्ता और सामंती व्यवस्था के विरुद्ध कविता एवं लोकगीतों के माध्यम से व्यक्त जनप्रतिरोध के स्वरों को समझने का प्रयास करता है।
बीज शब्द: लोक, प्रतिरोध, प्रतिबंधित, स्वाधीनता, जनचेतना, किसान, सामंती शोषण, औपनिवेशिक शासन, जनसंघर्ष, लोकभाषा, राष्ट्रीय चेतना, देशभक्ति।
मूल आलेख
साहित्य और सत्ता के संबंध सदैव जटिल रहे हैं। जब भी साहित्य ने अन्यायपूर्ण सत्ता या दमनकारी व्यवस्थाओं के विरुद्ध स्वर उठाया, तब-तब उसे प्रतिबंधों का सामना करना पड़ा। प्रतिबंधित साहित्य में समाज की उन आकांक्षाओं, असंतोषों और प्रतिरोधी स्वरों का सघन रूप दिखाई देता है जिन्हें सत्ता द्वारा दबाने का प्रयास किया गया। इस प्रकार प्रतिबंधित साहित्य उस समय की सामाजिक-राजनीतिक परिस्थितियों तथा जनचेतना के महत्वपूर्ण दस्तावेज के रूप में सामने आता है। प्रतिबंधित साहित्य को परिभाषित करते हुए मधुलिका बेन पटेल लिखती हैं- “प्रतिबंधित साहित्य’ वह साहित्य है जिसे ‘ज़ब्त’ घोषित किया गया हो। ऐसे साहित्य, जिसे पढ़ने-लिखने पर पाबन्दी घोषित की गयी हो। मुख्यतः पाबन्दी की घोषणा सत्ता द्वारा कानून के तहत की जाती है। इसके कारणों में राजनीति कार्य करती है लेकिन इसके सामाजिक, आर्थिक, धार्मिक एवं सांस्कृतिक कारण भी होते हैं। यह प्रतिबन्ध सत्ता द्वारा ऐसे साहित्य पर लगाया जाता है जिसे वे सत्ता के लिए खतरनाक समझते हैं अथवा किसी भी क्षेत्र में ऐसी रचनाओं को दुर्भावना के प्रसार की संभावनाओं वाला समझा जाता है।”1 इस प्रकार प्रतिबंधित साहित्य इतिहास की उस महत्वपूर्ण धारा का प्रतिनिधित्व करता है जिसका गहरा संबंध स्वाधीनता संघर्ष और जनआंदोलनों से रहा है। राजस्थान की रियासतों में प्रतिबंधित हिंदी साहित्य इस संघर्षशील चेतना की सशक्त अभिव्यक्ति के रूप में सामने आता है। यहाँ शब्द केवल साहित्यिक अभिव्यक्ति का माध्यम नहीं रहे, बल्कि उन्होंने सत्ता के दमनकारी स्वरूप के सामने अपनी स्वतंत्र शक्ति और प्रभाव को स्थापित करने का साहस भी दिखाया। इस साहित्य में समाज के भीतर व्याप्त असमानताओं, अन्यायपूर्ण व्यवस्थाओं और शोषणकारी परिस्थितियों के विरुद्ध उठती जनभावनाओं का सजीव चित्रण मिलता है। महेश प्रसाद सिन्हा लिखते हैं- “स्वाधीनता आंदोलन में राष्ट्र-गीत और लोक-गीत की जोरदार भूमिका थी। आंदोलन में चुंबकीय गति, शक्ति और विद्युत आवेश देने में क्षेत्रीय गीतों, लोकगीतों का महत्वपूर्ण योगदान रहा है। यह मंत्र-सूत्र के रूप में लोककंठ और जन समूह के दिलो दिमाग में संचित था। इसने लोगों में मरने मारने जैसी भूमिका और हरकत के लिए अद्भुत शक्ति और साहस का संचार किया। अकेले ‘वंदेमातरम’ राष्ट्रगीत के रूप में पूरे भारत में तहलका मचा रखा था। इसी से अंगरेजों ने राष्ट्रीय गीतों, गजलों, भजन, आल्हा और मल्हार आदि के ढेर सारे संग्रहों को प्रतिबंधित किया। अधिकांश संकलनों में विदेशी सत्ता के शोषण और यातना के प्रति रोष और स्वाधीनता के प्रति प्रबल आग्रह के स्वर विद्यमान हैं।”2 ब्रिटिश शासन द्वारा भारतीय भाषाओं में लिखित साहित्य को रोकने के लिए अनेक कानून बनाए, जिनके तहत पुस्तकों की जब्ती की गई। प्रतिबंध की परंपरा पर प्रकाश डालते हुए आगे फिर वे लिखते हैं- “आजादी के दौर में अंगरेजी सरकार ने केवल हिंदी कविता के लगभग तीन सौ पचास संग्रहों को जब्त किया। अधिकांश कविता संग्रह सन् 1920 से लेकर 1942 के बीच के हैं।”3 इस प्रकार देखते हैं कि स्वाधीनता काल के इतिहास में प्रतिबंध की लंबी परंपरा दिखाई पड़ती है, जिसे साहित्येतिहास में अभी तक उपेक्षित रखा गया है।
शोध पत्र के पहले खंड में औपनिवेशिक सत्ता के विरुद्ध उठे प्रतिरोध के स्वरों का अध्ययन किया है। राजस्थान के प्रतिबंधित गीतों और कविताओं में औपनिवेशिक सत्ता के विरुद्ध प्रतिरोध का स्वर अत्यंत स्पष्ट रूप से दिखाई देता है। अंग्रेजों के आगमन के बाद भारतीय समाज में अनेक प्रकार के राजनीतिक, आर्थिक और सामाजिक परिवर्तन हुए। इन परिवर्तनों का प्रभाव राजस्थान की रियासतों और वहाँ के जनजीवन पर भी पड़ा। अंग्रेजी शासन के कारण सैनिक अत्याचार, बेगार प्रथा, आर्थिक शोषण और सामाजिक विघटन जैसी समस्याएँ उत्पन्न हुईं। लोकगीतों और कविताओं में इन परिस्थितियों के प्रति जनता की पीड़ा और आक्रोश का सशक्त चित्रण मिलता है। औपनिवेशिक शासन की दमनकारी नीतियों के प्रति जनभावनाओं को व्यक्त करते हुए एक लोकगीत में कहा गया है-
“वा वा रोळो वापरियो।
मोड़की मगरी रो पाणी ढाळो ढाळ ढळियो रे
आबू थारे पहाड़ा में अंग्रेज बड़ियो रे
काळी टोपी रो हां हां काळी टोपी रो
देस में छावणियां नांखी रे काळी टोपी रो।
देस में अंग्रेज आयो कांई-कांई लायो रे
फूट नांखी भाया में बेगार लायो रे काळी टोपी।”4
यह कविता अंग्रेजों के आगमन से उत्पन्न पीड़ा और आक्रोश को व्यक्त करती है, जिसमें बताया गया है कि अंग्रेजों ने देश में छावनियाँ स्थापित कर लोगों के बीच फूट डाली और बेगार जैसी शोषणकारी व्यवस्थाएँ लागू की। स्वाधीनता आंदोलन के दौर में गीत और कविताएँ जनजागरण के प्रभावशाली माध्यम बने। लोकभाषा में रचित इन गीतों ने जनता के भीतर साहस और आत्मविश्वास का संचार किया। इन रचनाओं में विदेशी सत्ता के अत्याचार, बेगार प्रथा, आर्थिक शोषण और सामाजिक विषमता के प्रति तीखा असंतोष व्यक्त हुआ। यही कारण था कि अनेक गीतों और कविता-संग्रहों को अंग्रेजी शासन द्वारा प्रतिबंधित कर दिया गया। बेगार प्रथा के कारण जनता को झेलनी पड़ रही अमानवीय परिस्थितियों का चित्रण करते हुए एक अन्य कविता में कवि लिखता है-
“मर्दा ओरे काली तो भदूड़ा री रातां सोवे छा।
तन का कपड़ा भी खोवे छा, हां पड़या पड़या थे रोवे हा।।
आंसू सूं डीलड़ों धोवे हा। ढांडा थानै जाण सिपाही कूटे हा,
धन-माल कमाई लूटै हा, दूजां के खूंटे-खूंटे कूदै हा, आपस में भाई फूटे हा,
बेगारों का जूता थांकै सिर पर लागै हा।”5
इन कविताओं में औपनिवेशिक शोषण के विरुद्ध मुक्ति के स्वर भी सुने अ सकते है जो जन प्रतिरोध का प्रतिनिधित्व करते हैं। क्रांतिकारी चेतना को व्यक्त करते हुए ‘इंकिलाब’ कविता में श्री सुधीन्द्र बी.ए. लिखते हैं-
“इंकिलाब हो उठा राष्ट्र में सुप्त चेतना जाग उठी
सोई हुई हड्डियों में भी प्रखर क्रांति की आग उठी
कूद पड़े नर-नारी लेकर प्राणों में प्रण की ज्वाला
झूम-झूम गा क्रांति- रागिनी देश प्रेम का पी प्याला।”6
ये पंक्तियाँ राष्ट्र में जागृत होती क्रांतिकारी चेतना का चित्रण करती हैं। इनमें बताया गया है कि स्वतंत्रता की भावना से प्रेरित होकर देश की सुप्त चेतना जाग उठी और स्त्री-पुरुष सभी देशप्रेम और क्रांति की भावना से ओत-प्रोत होकर स्वतंत्रता संग्राम में कूद पड़े। इसी प्रकार ‘हाड़ा जाग रे!’ कविता में कवि लिखता है-
“छायो जग म्ह उजालो,
अन्यायां को कढ्यो दिवालो,
आप खुदी को मटग्यो चालो,
उथल पुथल को बाज्यो बायरो, सब नृप धूजे रे। हाड़ा जा.।।”7
इस प्रकार इन कविताओं में औपनिवेशिक सत्ता के विरुद्ध प्रतिरोध के स्वर सुने जा सकते है। ‘प्याला’, ‘क्रांति’ और ‘आँधी’ जैसे प्रतीकों के माध्यम से कवियों ने जनता को जागृत करने का प्रयास किया है।
शोध-पत्र के दूसरे खंड में सामंती व्यवस्था और आर्थिक शोषण के विरुद्ध प्रतिरोध के स्वरों का अध्ययन किया गया है। राजस्थान की रियासतों में यह स्थिति विशेष रूप से स्पष्ट दिखाई देती है। यहाँ सामंती सत्ता की संरचना और औपनिवेशिक प्रभाव के संयुक्त दबाव के कारण जनता की आवाज़ को सीमित करने के अनेक प्रयास किए गए। परिणामस्वरूप अनेक गीत, कविताएँ और साहित्यिक रचनाएँ ऐसी बनी जिनमें जनता के दुःख, असंतोष और प्रतिरोध की भावना प्रकट हुई। यही रचनाएँ आगे चलकर प्रतिबंधित साहित्य के रूप में सामने आई और उन्होंने समाज में जागरूकता तथा प्रतिरोध की चेतना को जीवित बनाए रखने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। राजस्थान के प्रसिद्ध कवि कन्हैयालाल सेठिया किसानों को जागृत करते हुए ‘कुण जमीन रो धणी’ में लिखते हैं-
“हाड मांस चाम गाळ
खेत में पसेव सींच।
लू लपट ठंड मेह,
सै सबै दांत भींच।
फाड़ चौक कर करै जोतणी’ र बोवणी
ओ जमीन रो धणी’क, बो जमीन रो धणी?”8
इन पंक्तियों में किसान के कठोर परिश्रम का चित्रण किया गया है। कवि बताता है कि किसान अपने हाड़-मांस गलाकर, पसीने से खेतों को सींचकर, लू, ठंड और वर्षा जैसी कठिन परिस्थितियों में भी दाँत भींचकर खेती करता है, भूमि को जोतता और बोता है। फिर भी प्रश्न उठाया गया है कि इतनी मेहनत करने वाला किसान ही जमीन का वास्तविक मालिक क्यों नहीं माना जाता। आगे कवि किसानों को उनकी वास्तविक स्थिति से परिचित कराते हुए लिखते हैं-
“चेत चेत अन्नदाता करसा! जग चेतावै रे दुख क्यूं पावै रे!
गोबर रा छाणा कर बालै, सभी राख हो जावै रे!
खाद घणो घट जावै, खेत नहीं धान बधावै रे।”9
राजस्थान की रियासतों में जिन गीतों, कविताओं और रचनाओं को तत्कालीन शासन द्वारा प्रतिबंधित घोषित किया गया, वे वास्तव में उस समय के सामाजिक और राजनीतिक यथार्थ को उजागर करने वाली कृतियाँ थी। इन रचनाओं में सामंती शोषण, अत्यधिक कर-भार, प्रशासनिक कठोरता तथा जनजीवन पर पड़े दमनकारी प्रभावों का स्पष्ट वर्णन मिलता है। साहित्यकारों और लोककवियों ने इन परिस्थितियों को अपने शब्दों के माध्यम से व्यक्त किया और जनता के भीतर व्याप्त पीड़ा, असंतोष तथा परिवर्तन की आकांक्षा को स्वर प्रदान किया। इसी संदर्भ में ‘आराम तभी लेंगे जब पायेंगे आजादी’ कविता में कवि लिखते हैं-
“बजा हथोड़े बहा पसीना, कम करें पर मुश्किल जीना।
इनकी कड़ी कमाई लाचारी ने लुटवादी।। आराम तभी.।।
इधर जहाँ देखो बेकारी, उधर उड़ाते तनख्वा भारी।
हमने दौलत सारी, गैरों के पांव चढ़ादी।। आराम तभी.।।”10
इस प्रकार इन कविताओं में सामंती शोषण के विरुद्ध जनता को संगठित होने और संघर्ष करने के लिए प्रेरित किया है। राजस्थान के ग्रामीण समाज में किसान जीवन संघर्ष और श्रम का प्रतीक रहा है। खेतों में निरंतर परिश्रम करने के बावजूद किसान आर्थिक रूप से समृद्ध नहीं हो पाता था। उसका श्रम दूसरों के हित में प्रयुक्त होता था जबकि स्वयं उसे अभाव और कठिनाइयों का सामना करना पड़ता था। इन गीतों और कविताओं में ऐतिहासिक स्मृतियों को जीवित रखते हुए लोगों को यह याद दिलाया गया कि उनके पूर्वजों ने स्वतंत्रता, धर्म और स्वाभिमान की रक्षा के लिए कठिन संघर्ष किए थे। इसी ऐतिहासिक चेतना को आधार बनाकर जनता को औपनिवेशिक सत्ता, सामंती शोषण और सामाजिक अन्याय के विरुद्ध जागरूक करने का प्रयास किया गया। इसी भाव को व्यक्त करते हुए केसरीसिंह बारहठ लिखते हैं-
“पग पग भम्या पहाड़, धरा छाड़ राख्यो धरम।
महाराणा’ र मेवाड़, हिरदै बसिया हिंद रै।।
औरां नै आसांण, हाकां हरवळ हालणौ।
किम हालै कुलराण, हरवळ साहां हांकिया।।”11
इन पंक्तियों में कवि ने इतिहास के प्रसंगों का सहारा लेकर जनता के भीतर स्वाभिमान और प्रतिरोध की चेतना जगाने का प्रयास किया है। महाराणा प्रताप के संघर्षपूर्ण जीवन और उनके अडिग स्वाभिमान का उल्लेख करते हुए यह बताया गया है कि उन्होंने मुग़ल सत्ता की अधीनता स्वीकार करने के बजाय कठिन परिस्थितियों में भी स्वतंत्रता और मर्यादा की रक्षा के लिए संघर्ष का मार्ग चुना। आगे कवि ने राजस्थान में स्वाधीनता आन्दोलनों के समय गठित प्रजामंडलों की भूमिका पर प्रकाश डालते हुए लिखा है-
“रंगला टोपी वाळा रे
सेवा संघ खोलावतु आवे रंगला टोपी वाळा रे
मीटिंगे करतु आवे, अंग्रेज हटावतु आवे
परजामण्डल खोलावतु आवे…”12
तीसरे खंड में सामाजिक परिवर्तन और स्वाधीनता संग्राम के प्रतिरोधात्मक स्वरों का अध्ययन किया है। राजस्थान की लोक परंपरा भी इस दृष्टि से अत्यंत समृद्ध रही है कि यहाँ के लोकगीतों और कविताओं में वीरता, स्वाभिमान, संघर्ष और जनचेतना के अनेक रूप मिलते हैं। विशेष रूप से औपनिवेशिक काल में लिखे गए गीतों और कविताओं में जनता की पीड़ा, शोषण और प्रतिरोध की भावना तीव्र रूप में व्यक्त हुई। इन कवियों में समाज में व्याप्त कुप्रथाओं पर भी व्यंग्य किया है। कवि जयनारायण व्यास पर्दा प्रथा पर व्यंग्य करते हुए लिखते हैं-
“डेढ़ हाथ को काढ़ घूंघटो, पूठ फेर छिप जासो जी,
कोरतार चूड़ी वालं नै टका गिणासो जी
घर वाला सूं लाज घणी, पर पुरषा बात बणासो जी,
चीर शरबती मांय आंखियां खूब हिलासो जी
दुनिया आगे दौड़ रही है, पाछे रह जासो जी।”13
प्रतिबंधित कविताओं में एक ओर सामंती व्यवस्था और औपनिवेशिक सत्ता के विरुद्ध लोक प्रतिरोध के स्वर हैं, वहीं दूसरी ओर राष्ट्रप्रेम और देशभक्ति के स्वर भी स्पष्ट रूप से सुनाई देते हैं। इन गीतों में मातृभूमि के प्रति प्रेम, स्वतंत्रता की आकांक्षा और विदेशी शासन के प्रति विरोध की भावना स्पष्ट रूप से व्यक्त की गई है। इन गीतों में देश को माता के रूप में संबोधित किया गया है और उसके प्रति समर्पण तथा सेवा की भावना को प्रोत्साहित किया गया है। इसी भावना को व्यक्त करते हुए ‘कांटों का ताज’ में कवि गनपतचंद्र भंडारी लिखते हैं-
“जब-जब माता को पदाक्रान्त करने परदेशी आये हैं,
हमने माता के चरणों में, हंस-हंस कर शीश चढ़ाये हैं।
फिर आज पड़ी मां बंधन में, वीरत्व हमारा सोये क्यों?
रे! कोटि-कोटि पुत्रों की माता पुत्रहीन-सी रोये क्यों?
युग-युग के बंधन काट आज, रखनी माता की लाज हमें!”14
इस प्रकार राष्ट्रीय चेतना के प्रसार में इन गीतों की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण रही। जब लोग सामूहिक रूप से इन गीतों को गाते थे तो उनमें एकता और उत्साह की भावना उत्पन्न होती थी। यह सामूहिक गायन जनता को मानसिक रूप से सशक्त बनाता था और उन्हें संघर्ष के लिए तैयार करता था। इन गीतों में बलिदान और त्याग की भावना को भी विशेष महत्व दिया गया है। स्वतंत्रता प्राप्त करने के लिए लोगों को अपने व्यक्तिगत हितों से ऊपर उठकर राष्ट्रहित को प्राथमिकता देने के लिए प्रेरित किया है। इन कविताओं में नौजवानों को विशेष रूप से संबोधित किया गया है, क्योंकि युवा ही राष्ट्र की वास्तविक शक्ति माने जाते हैं। कवि लिखते हैं-
“उठो नौजवनो न रहने कसर दो, विदेशी का अबतो बहिष्कार करदो।
मुअस्सर जहाँ पेट भर है दाना, गुलामी में मुश्किल हुआ सर उठाना।”15
इन पंक्तियों में कवि ने नौजवानों को राष्ट्र की शक्ति मानते हुए उनसे स्वदेशी अपनाने और विदेशी वस्तुओं के बहिष्कार का आह्वान किया है। जनजागरण के संदर्भ में इन गीतों की भूमिका अत्यंत प्रभावशाली रही। इन गीतों को सार्वजनिक सभाओं, आंदोलनों और प्रभातफेरियों में गाया जाता था। प्रभातफेरियाँ स्वाधीनता आंदोलन का एक महत्वपूर्ण सांस्कृतिक माध्यम थीं। सुबह-सुबह लोग समूहों में निकलकर देशभक्ति के गीत गाते थे और जनता को स्वतंत्रता आंदोलन में भाग लेने के लिए प्रेरित करते थे। इन प्रभातफेरियों के माध्यम से ये गीत गाँव-गाँव और शहर-शहर तक पहुँच गए। परिणामस्वरूप जनता के भीतर राष्ट्रीय चेतना का प्रसार हुआ और स्वतंत्रता आंदोलन को व्यापक जनसमर्थन प्राप्त हुआ। इसी भावना को व्यक्त करते हुए कवि ‘निर्भय’ लिखते हैं-
“रही फूलती और फलती जो हमसे।
विलायत के अब के खिजाँ के देख लेना।
करें संगठन हम बढ़ावेंगे जुर्रत।
तो जल्दी ये होंगे विदा देख लेना।
‘निर्भय’ किसानों के दिल का इरादा।
गुलामी से हमको रिहा देख लेना।”16
इन गीतों में सामाजिक-आर्थिक शोषण के विरुद्ध प्रतिरोध, राष्ट्रीय चेतना का प्रसार और सांस्कृतिक स्वाभिमान की भावना स्पष्ट रूप से दिखाई देती है। औपनिवेशिक शासन द्वारा इन गीतों को प्रतिबंधित करना इस बात का प्रमाण है कि वे सत्ता के लिए चुनौती बन चुके थे। जलियाँवाला बाग की ऐतिहासिक घटना को स्मरण कराते हुए ‘झंडा गायन’ कविता में कवि लिखते हैं-
“अरे क्या भूले हो जलियाँ वाला, या वह डायर का इतिहास काला
गोलियों की लगी जब छड़ी थी, नींव आजादी की तब पड़ी थी।
याद जो हो वह खूं में नहाना, तो न झंडा यह नीचे झुकाना।”17
राष्ट्रप्रेम और स्वतंत्रता की चेतना इन कृतियों की मूल प्रेरक शक्ति है। यही कारण था कि इन काव्य-संग्रहों का प्रभाव व्यापक जनसमूह तक पहुँचने लगा और शासन ने इनके प्रसार को नियंत्रित करने का प्रयास किया। उस समय समाज में गरीबी, पर्दा-प्रथा, अनमेल विवाह, अशिक्षा तथा सामाजिक विषमता जैसी अनेक समस्याएँ विद्यमान थीं। कवियों ने इन परिस्थितियों को अपनी रचनाओं का आधार बनाकर समाज के समक्ष प्रश्न खड़े किए और जनमानस को जागरूक करने का प्रयास किया। इस प्रकार ये कृतियाँ केवल सामाजिक चेतना और परिवर्तन की आकांक्षा का सशक्त प्रमाण प्रस्तुत करती है।
“चेतोरे भारत वासीरे, जागोरे भारत वासीरे,
सोचोरे भारत वासीरे, होवे है थारी हांसी रे,
थाँरे कर्मासूँ जग में, डूब रही रे नौका देश की
खादी त्याग भुलायो चर्खो, करी भयंकर भूल,
विलायती कपड़ो अपणाकर कियो देश सन धूल।”18
निष्कर्ष
राजस्थान के प्रतिबंधित गीतों और कविताओं का अध्ययन यह स्पष्ट करता है कि लोक साहित्य केवल सांस्कृतिक अभिव्यक्ति का माध्यम नहीं था, बल्कि सामाजिक और राजनीतिक प्रतिरोध का प्रभावी साधन रहा। इन गीतों और कविताओं के माध्यम से जनता ने अपने अनुभवों, पीड़ाओं और संघर्षों को व्यक्त करते हुए अन्यायपूर्ण सत्ता के विरुद्ध अपनी असहमति प्रकट की। औपनिवेशिक काल में अंग्रेजी शासन और रियासती सामंती व्यवस्थाओं के कारण उत्पन्न शोषण और अत्याचार के विरुद्ध लोक साहित्य ने प्रतिरोध की चेतना को जीवित रखा। इन रचनाओं में राष्ट्रीय चेतना और स्वतंत्रता की आकांक्षा भी प्रबल रूप में व्यक्त हुई, जिससे स्वाधीनता आंदोलन के दौरान जनता में साहस, आत्मविश्वास और देशभक्ति की भावना का संचार हुआ। यही कारण था कि अंग्रेजी सरकार ने अनेक गीतों और कविता-संग्रहों को प्रतिबंधित कर दिया। इन गीतों की एक महत्वपूर्ण विशेषता यह भी है कि इनमें सामाजिक चेतना और परिवर्तन की आकांक्षा का स्वर दिखाई देता है। लोकभाषा में रचे होने के कारण ये गीत सीधे जनमानस से जुड़े और व्यापक रूप से लोकप्रिय हुए। प्रतिबंधों के बावजूद ये रचनाएँ लोकस्मृति में सुरक्षित रही और जनचेतना को निरंतर प्रभावित करती रही। इस प्रकार राजस्थान के प्रतिबंधित गीत और कविताएँ स्वतंत्रता आंदोलन और लोक साहित्य की प्रतिरोधात्मक परंपरा के महत्वपूर्ण सांस्कृतिक दस्तावेज के रूप में देखी जा सकती हैं।
संदर्भ ग्रंथ सूची
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- वही…, पृष्ठ-30
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- प्रभात फेरी गायन व नारे, नगर लोक परिषद्, फलोदी, संवत्- 1997, पृष्ठ-8
- किसानों का बिगुल, सस्ता साहित्य मंडल, अजमेर, 1930, पृष्ठ-36
- प्रभात फेरी गायन व नारे, नगर लोक परिषद्, फलोदी, संवत्- 1997, पृष्ठ-9-10
- पं. सवाईराम शर्मा, मारवाड़ी राष्ट्रीय गीत, श्री ईश्वर प्रिंटिंग प्रेस, महुवा, 1931, पृष्ठ-6
रामप्यारी
पीएच.डी. शोधार्थी (हिंदी विभाग)
हैदराबाद केंद्रीय विश्वविद्यालय
हैदराबाद, तेलंगाना-500046





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