सारांश – संत मलूकदास भक्तिकाल के संत परंपरा के प्रमुख कवि हैं। उनके काव्य में नैतिकता, भक्ति, सामाजिक चेतना और लोक जीवन का गहरा संबंध दृष्टिगोचर होता है। प्रस्तुत शोध आलेख के माध्यम से संत मलूकदास के काव्य में व्याप्त लोक संस्कृति और लोक भाषा के स्वरूप का विश्लेषण किया गया है। उनके काव्य में उस समय के समाज में निहित परंपराएं, नैतिक मूल्य, लोकाचार तथा जनसाधारण के जीवन का वास्तविक चित्रण मिलता है। जो लोक संस्कृति को उद्घाटित करता है। संत मलूकदास के काव्य में करुणा, मानवता और समानता जैसे लोक मूल्य प्रमुख है। जिसमें दीन, दरिद्र, दुखी, भूखे, प्यासे की सहायता या मदद करना ही मनुष्यता का भाव है। यही सेवा का भाव लोक मूल्य है। वहीं दूसरी ओर सरल और सहज भाषा का प्रयोग भी संत मलूकदास के शब्द, कवित्त और साखियों में दिखाई देता है तथा उन्होंने अपने विचारों को जन सामान्य तक पहुंचाने के लिए जन भाषा यानि लोक भाषा का प्रयोग किया। प्रकृति को प्रतीक बनाकर संत मलूकदास ने सामान्य जनमानस को अपना उपदेश दिया है। वह कहते हैं –
“हरि डर मत तोड़िये, लागैं छूरा बान।
दास मलूका यो कहे अपना-सा जीव जान।।”1
अर्थात् वह हरि टहनी में जीवात्मा को देखते हैं और कहते हैं कि मनुष्य के समान ही उन्हें भी पीड़ा होती है।
बीज शब्द- मलूक दास, लोक संस्कृति, लोक भाषा
प्रस्तावना – संत कवियों का जीवन यायावरी और लोक कल्याणकारी होता था। वे विभिन्न ग्रामों-शहरों, मानव- समूहों, कस्बो में जाते रहते थे। सामान्य जनों के कार्य व्यापार, धर्म व धार्मिक अनुष्ठानों में भाग लेते रहते थे तथा उनके रहन-सहन, आचार-विचार व व्यापार से पूर्णत: परिचित रहते थे। उनकी बोलियों में ही अपना उपदेश करते। मुख्य रूप से कहा जाए तो यह कह सकते हैं कि संत जन सामान्य के सभी क्रियाकलापों से मूलतः परिचित होते उनमें रचे बसे हुए होते थे। इसलिए संत मलूकदास के पदों में सामान्य लोगों की भाषाएं दिखती है। उन सामान्य जनों के जीवन में आए समस्याओं का समाधान और विषम परिस्थितियों से उबरने का उपाय भी बताते हैं क्योंकि उनका स्वभाव ही लोक हितकारी था। उनके निम्न पद आज भी परोपकार के सत् मार्ग की ओर लोगों को ले जाते हैं तथा उनके जीवन के संशय को मिटाते हैं-
“भूखेहिं टूक प्यासेहिं पानी।
यहै भगति हरि के मनमानी।।”2
“राम नाम औषध करौ, हिरदै राखौ याद।
संकट में लौ लाइये, दूर करै सब ब्याध।।”3
‘अहम् ब्रह्मास्मि’ से ‘यथा पिंडे तथा ब्रह्मांडे’ के भेद को पूर्ण रूप से जान लेने वाला ब्रह्म ज्ञानी पुरुष ही संत कहलाता है। महातत्त्वेता स्वयं के पिंड से लेकर विस्तृत ब्रह्मांड में फैले सत्य स्वरूप ब्रह्म को जान लेने वाला, समस्त जड़ चेतन में एक ही परम सत् तत्त्व का ज्ञान रखने वाला, प्रत्येक परिस्थिति में समभाव रखने वाला पावन पुरुष ही संत है। गीता में वासुदेव श्री कृष्ण ने कहा है “सद्भावे साधु च सदित्येत्प्रपुज्यते अर्थात् सद्भाव व साधु भाव रखकर प्राणीमात्र से सह्रदय भाव रखना और राग द्वेष आदि में न पड़ने वाला व्यक्ति ही संत है।”4 संत मलूकदास ब्रह्मास्थ, ब्रह्मज्ञानी संत कवि थे। यही कारण है कि उनके जीवन में इदन्नमम का भाव है। वह कहते हैं-
“सबहिन के हम सबै हमारे।
जीव जंतु मोहिं लगै पयारे।।”5
संत मलूकदास का संक्षिप्त परिचय
मध्ययुगीन हिंदी साहित्येतिहास का काल विदेशी आक्रमणकारियों से मिली पराजय एवं हिंदू संस्कृति के पतन का काल है। पराजय की मानसिकता गुलामी या दासता की ओर ले जाती है। दासता से आत्मसम्मान और स्वयं की चेतना नष्ट होने लगती है। चलते-फिरते शव की भांति मनुष्य बन जाता है बेजान, लाचार और शक्तिहीन। ऐसी चेतनहीनता और आत्मसम्मानहीन स्थिति में जीने वाले मनुष्य का समस्त पथ बंद हो जाता है और वह तमस के बंद कूप की में घिर कर रह जाता है। उस स्थिति से बाहर निकलने का मात्र एक रास्ता रहता है और वह है भक्तिमार्ग। जो परमात्म सर्वशक्तिशाली प्रभु के दर पर खुलता है। प्रभु और प्रभु का भक्त या संत ही इस ब्रह्म तत्त्व प्रकाश की और ले जा सकता है। ऐसी ही स्थिति में संत मलूकदास का प्रादुर्भाव हुआ उनका जन्म इलाहाबाद के कड़ा में विक्रम संवत् 1631 में हुआ था। इनमें बाल्यकाल से ही मानवता के भाव के साथ-साथ सेवा भाव भी विद्यमान था। उनकी वाणी में ईश्वर तत्त्व का ओज और ब्रह्म तत्त्व का अलौकिक प्रकाश है। सामान्य जनों में अस्तित्वबोध का ज्ञान और सांस्कृतिक मूल्यों का संवर्धन करने के लिए संत मलूकदास जी ने अपने काव्यों के माध्यम से मानवीय चेतना को जागृत किया।
लोक संस्कृति की परिभाषा
लोक संस्कृति का अर्थ जन-सामान्य की उस संस्कृति से माना जा सकता है जिसका जन्म धरातल आम आदमी है। जिसका संबंध बौद्धिकता से न होकर लोक परंपरा व रीति-रिवाज है। एक सभ्य व बौद्धिक संस्कृति के संबल के रूप में लोक संस्कृति मानी जाती है। किसी देशकाल के अपने स्वयं के धर्म, धार्मिक अनुष्ठान, सामान्य जीविकोपार्जन के समस्त क्रियाकलाप होते हैं। पूर्वजों के द्वारा धरोहर के रूप में अपने भावी पीढ़ियों को सौंपे गए समस्त सूक्ष्म परंपराओं का अपभ्रंशित स्वरूप ही लोक संस्कृति है। लोक संस्कृति के क्षेत्र में जनजीवन के समस्त कार्य व्यापार आ जाते हैं। इस संबंध में डॉ.कृष्णदेव उपाध्याय ने कहा है “लोक संस्कृति के अंतर्गत जनजीवन से सम्बंधित जितने आचार-विचार, विधि-निषेध, विश्वास, प्रथा, परंपरा, धर्म, मुढ़ाग्रह, अनुष्ठान आदि है वे सभी आते हैं।”6
संत मलूकदास के काव्य में लोक संस्कृति
संत मलूकदास के काव्य में लोक संस्कृति के विविध रूप दृष्टिगोचर होते हैं-
सामाजिक समरसता का भाव-संत मलूकदास में सामाजिक समरसता का भाव दिखाई देता है। वह संसार के सारे दुख को खुद में ले लेना चाहते हैं और सभी मनुष्य को सुखी देखना चाहते हैं। इससे यह पता चलता है कि वह सिर्फ सैद्धांतिक रूप से बातें कहते ही नहीं बल्कि उसे अपने जीवन में आत्मसात करते हुए भी दिखाई देते हैं। संत मलूकदास कहते हैं कि जो दूसरों की पीड़ा को दुख को समझता है वही वास्तविक रूप में मनुष्य कहलाने का हकदार है। प्रेम ही वह भाव है जो सामाजिक समरसता को स्थापित कर सकता है और इसे बनाए रखने के लिए मलूकदास मानव को मानवीयता से जोड़े रखने की बात कहते हैं एवं कुछ जीवन सूत्र बताते हैं-
“जब तुम आये जगत में तब हंसिये सब कोय ।
अब तुम ऐसी कर चलो पाछे हंसी न कोय।।”7
धार्मिक सहिष्णुता और समन्वय-एक ही मिट्टी में विभिन्न प्रकार के पेड़-पौधे अपने गुणों के अनुसार अपना अलग-अलग फल देते हैं ,आम का पेड़ आम का मीठा फल देता है, कदली का पेड़ केले का मीठा फल देता है, वही नीम का पेड़ कड़वा निबौरी का फल देता है तो इमली का पेड़ इमली का खट्टा फल देता है। सभी फलों का रूप, रंग, गंध, स्वाद, प्रभाव अलग-अलग होता है। तत्त्वज्ञानी ब्रह्मज्ञ पुरुष भली भांति समझते हैं कि यह रचना परमात्मा की ही है और सब में वह अपने तात्विक गुणों को बिखरता रहता है। सोना एक टुकड़ा होता है जिससे अनेक आकार प्रकार और नाम के आभूषण बनाए जाते हैं। उसका नाम तत्त्व अलग-अलग रखा जाता है पर मनुष्य इस बात को भली-भांति जानता है कि इस प्रकार के गहनों का मूल तत्त्व सोना ही है और वह सोना मूल्यवान है। ऐसे ही जब आकाश से पहाड़ों पर वर्षा होती है तो वहां से बहते हुए उनके जल विभिन्न रूपों को धारण कर लेते हैं पर्वतों के नीचे गिरकर अनेकों प्रकार के रूपों में बदल जाते हैं परंतु वह मूलतः एक ही तत्व है जल। संत कबीर जी कहते हैं-
“कबीर कुआं एक है पानी भरे अनेक।
बर्तन में ही भेद है पानी सब में एक।।”8
संत मलूकदास ने अपनी वाणी के माध्यम से कहा है कि सब में वह परमतत्त्व विद्यमान है-
“सब कलियन में बास है, बिना वास नहीं कोय।
अति सूख ता में पाइए, जो कोई फूली होय।।”9
संत मलूकदास एक तत्त्वज्ञ ज्ञानी पुरुष है इसलिए उनकी सोच परमतत्त्व के तत्त्व ज्ञान के कारण विस्तृत है-उनकी दृष्टि जल के बूंद और सागर के भेद को नहीं मानती एक ही समझती है संत हृदय जाति, पंथ, मजहब उच्च-नीच से ऊपर उठा हुआ है। इसलिए वे सब में उस परमेश्वर का परमतत्त्व एक ही नूर में समझते हैं। हिंदू-मुसलमान, छोटा-बड़ा, अमीर-गरीब का सारा भेद सम हो जाता है एकत्व दिखता है इसलिए मलूकदास जी कहते हैं-
“सब कोउ साहब बन्दते, हिंदू मुसलमान।
साहब तिनको बन्दता जिनका ठौर इमान।।”10
नैतिक मूल्यों का प्रतिपादन-संत हृदय परम सत्य दिव्य गुणों से आप्लावित होता है। काव्य की स्रोतस्विनी का स्रोत उनके सहज सत्य ईश्वरी तत्वों से भरे हृदय गुहा से निस्सरित होता है। यही कारण है कि उनमें जीवन को संचालित व जीवनी शक्ति भरने वाले सभी सत्य नैतिक मूल्यों का बाहुल्य होता है-प्रेम, करुणा, दया, सत्य, अहिंसा जैसे मूल्य संत मलूकदास के काव्य में दृष्टिगोचर होते हैं। प्रेम साधना के बिना जीवन को मलूकदास निरर्थक मानते हुए कहते हैं-
“प्रेम नेम जिनका कियो, जीतो नाहीं मैन।
अलख पुरुष जिसका लख्यों, छार परो तेहि नैन।।”11
दया का भाव मलूकदास के अनेक पदों में देखा जा सकता है –
“दया धर्म हिरदे बसै, बोले अमृत बैन।
तई ऊंचे जानिये, जिसके नीचे नैन।।”12
वह तीर्थ की महत्ता को व्यर्थ मानते हुए कहते हैं कि यहां जाना बेकार है जब तक दया का भाव हृदय में व्याप्त नहीं है –
“मक्का मदीना द्वारका, बद्री और केदार ।
बिना दया सब झूठ है, काहे मलूक विचार।।”13
संत मलूकदास में दान की वृत्ति बचपन से ही मौजूद थी। वह 11 वर्ष की उम्र में अपने पिताजी द्वारा व्यापार के लिए दिए गए कम्बलों का दान कर देते थे। उनकी यही प्रवृत्ति उनके काव्य के माध्यम से उजागर होती है। अहिंसा का भाव उनके काव्य में व्यक्त है। वह जीव हत्या को पाप मानते हैं वह कहते हैं सभी में जब एक ही ईश्वर है या परमतत्त्व का वास है तो जीव हत्या नहीं करनी चाहिए –
“पीर सभन की एक सी मूरख जानत नाहिं।
कांटा चुभे पीर होय, गला काट कोउ खाय।।”14
“कुंजर चींटी पशु नर सब में साहेब एक।
काटे गला खोदाय का, करै सूरमा लेख।।”15
जीवन की यथार्थपरक दृष्टि-प्रकृति के समस्त जड़ चेतन में जब हम निहारते हैं तो विशाल आकाश, पृथ्वी, सूर्य, सितारे, नदियां, पर्वत वह पर्वतमालाएं, विभिन्न किस्म के पेड़-पौधे, सागर व सागर की लहरें, बहती हुई शीतल हवाएं, अग्नि स्वरूप तप देने वाले सूर्य व अग्नि की लपटे आदि-सब हमें आश्चर्यचकित करते हैं। गौरतलब है कि पृथ्वी अपनी उर्वर शक्ति से अन्न, फल आदि उत्पन्न करती है। अपने लिए नहीं दूसरों के लिए, दूसरों के कल्याण के लिए। सूर्य अपनी ताप व प्रकाश से जीवों में जीवनी शक्ति भरता है। बीजों में शक्ति का स्रोत बनाता है- दूसरों के लिए, दूसरों के कल्याण के लिए। पेड़ों के फल वृक्ष स्वयं नहीं खाते वे भी दूसरों को पुष्ट करने के लिए होते हैं-
“वृक्ष कबहुँ न फल भखै, नदी न संचय नीर।
परमार्थ के कारने साधुन धरा शरीर।”16
हवा ऑक्सीजन, नाइट्रोजन, कार्बन डाइऑक्साइड आदि गैसों से हमारे जीवन को चलाने के लिए हमेशा बहती है। पर्वत से निकलने वाली नदियां भी अपने जल को दूसरों के लिए देती है वह उन्हें नहीं पीती है। इस प्रकार जब हम गौर से देखते हैं तो प्रकृति में विद्यमान प्रत्येक शै के समस्त घटक हमारे जीवन में के लिए बहुत सारी चीजों को निरंतर देते रहते हैं। प्रश्न यह उठता है यह सारे प्रकृति के घटक हैं हम मानव का जीवन भी उन घटकों में एक है अर्थात् हम भी प्रकृति के घटक हैं जिसे परमात्मा ने रचा है इसलिए उन सब घटकों की भांति हमारे जीवन का मूल कार्य-व्यापार परहित, परकल्याण के लिए ही निरंतर होना चाहिए। इसलिए हितोपदेश में कहा गया है-
“अष्टादश-पुराणेषु व्यासस्य वचनद्वयम्।
परोपकारः पुण्याय पापाय परपीडनम्।।”17
जीवन की सार्थकता परहित कार्यों में संलग्न रहकर सत्यम् शिवम् पर तत्व का चिंतन भजन-मनन व साधना करना है।
“जे दुखिया संसार में खोवो तिन का दुक्ख।
दलिद्दर सौंप मलूक को लोगन दीजै सुक्ख।।”18
जीवन परमात्मा का अंश आत्मा से संचालित है। परमात्म सत्य है और वही संपूर्ण जड़ चेतन में आच्छादित है, फैला हुआ है। संपूर्ण ब्रह्मांड का आधार सत्य है। पृथ्वी, सूर्य, हवा सब सत्य पर आधारित है। बिना सत्य के ब्रह्मांड का एक भी पदार्थ संचालित नहीं है-
“सत्येन धार्यते पृथ्वी सत्येन तपते रविः।
सत्येन वाति वायुश्च सर्वं सत्ये प्रतिष्ठितम्॥”19
सत्य ही परम शक्ति शिव है। जहां शिव की शक्ति है वही सुंदर है इसलिए ‘सत्यम् शिवम् सुंदरम्’ कहा गया है। मुण्डकोपनिषद् के तृतीय मुण्डक के प्रथम खंड के श्लोक 6 में कहा गया है-
“सत्यमेव जयते नानृतं
सत्येन पन्था विततो देवयानः ।
येनाऽऽक्रमन्त्यृषयो ह्याप्तकामा
यत्र तत् सत्यस्य परमं निधानम् ॥”20
परमात्मा सत्य स्वरूप है। उसकी प्राप्ति के लिए मनुष्य को अपने जीवन में सत्य की प्रतिष्ठा होनी चाहिए। ईश्वर तत्व प्राप्ति के लिए सत्य अनिवार्य साधन है। साथ ही अन्य सब कर्मों में भी सत्य की विजय होती है। सत्य का परम आधार परब्रह्म परमात्मा में स्थित है। जीवन में परमात्मा को प्राप्त करने का साधन रूप मार्ग सत्य से परिपूर्ण है।
लोक परंपराओं का चित्रण– भारतीय परिप्रेक्ष्य में ऋग्वैदिक काल तथा पुराण काल में लोक जीवन की एक सुदीर्घ परंपरा दिखाई देती है। आर्यावर्त कृषि व ऋषि प्रधान प्राचीन काल से रहा है। ब्रह्मज्ञ ज्ञानियों की इस वसुंधरा की लंबी लोक परंपराएं हैं जो संस्कृत में प्राचीन काल से विशाल कथा परंपराओं की श्रृंखला है वृहद कथा और पंचतंत्र की कथा। ऋग्वेद के संवाद सूत्र में कथाएं मिलती है रामायण, महाभारत, बौद्ध जातक कथाएं, श्रीमद्भागवत आदि धार्मिक ग्रंथो में लोक कथाओं, लोक काव्यों व लोक परंपराओं का चित्रण देखा जा सकता है। इससे प्रेरित होना काव्य कथा रचयिताओं के लिए आवश्यक है। आलंबन व सोपान रूप में इन परंपराओं को लिया गया है। संत मलूकदास जी के पद भी इससे अछूते नहीं है। उनके पदों में अनेक स्थान पर हमारे प्राचीन लोक कथाओं, परंपराओं और गौरवमयी लोक विरासत के पुट मिलते हैं।
“गौतम नारी बड़ी पतिव्रता, बहुते किनी दाना।
करनी करी बैकुंठ ना बैठी, कहे भाई पषाना।।”21
संत मलूकदास अपने पदों में पुनर्जन्म से संबंधित मान्यताओं को भी उद्घाटित करते हुए कहते हैं –
“साधु भाई अपनी करनी नाहीं।।
जे करनी का करें भरोसा, ते जम के घर नाहीं।।
ना जानू धौं कहां मुए थे, ना जानूं कहं आये।
ना जानू हरि गर्भ बसेरा कोने भांति बनाये ।।
महा कठिन यह हरि की माया, या तें कौन बचावै।
जौन कहे जड़ भूलहि त्यागी, तिन को हाथ लगावै।।”22
पाप-पुण्य का संदर्भ प्रस्तुत करते हुए संत मलूकदास जी कहते हैं- “पाप औ पुण्य जमा कर बुझत, देत हिसाब कहां धरि फेकै।”23
संत मलूकदास ने स्वर्ग-नरक की परिकल्पना भी अपने काव्य में कि वह कहते हैं “जिभ्या कारन खून किये, बांधि जमपुर चले।”24
इस्लाम धर्म में स्वर्ग व नरक को बिहिश्त और दोजख कहा गया है संत मलूकदास ने इस बात का वर्णन करते हुए कहा है-
“करम जो लग्गां बदी खलक की किन तुझको फर्माय।
गुनहगार तू हुआ सरासर है दोजख बांध चलाया।।”25
सामाजिक रूढ़ियां जो लोक में प्रचलित थी उसे वर्णित करते हुए मलूकदास जी कहते हैं कि शाम के वक्त दिया जलाने से पहले खाना नहीं खाना चाहिए –
“सांझ हुय करो तुम भोजन, बिनु दीपक के बारे।
जो ना कहै असुरन की बेरिया, मूढ़ दई के मारे।।”26
संत मलूकदास के काव्य में लोक भाषा
संत मलूकदास के काव्य में लोक भाषा के विविध रूप दृष्टव्य हैं जैसे- सरल और सहज भाषा, लोक भाषा का प्रयोग, मुहावरों का प्रयोग, संप्रेषणीयता व प्रभावशीलता और देशज शब्दों का बाहुलय।
सरल और सहज भाषा-हृदय की परम सत्य अनुभूतियां जब उद्वेलित होती है तो भाव रूप में मानस- पटल में आकर लोक की भाषा में स्वयं को प्रकट करती है। भाषा जन-सामान्य परिवेश में बोली जाने वाली होती है जिसमें रचनाकार अपने भाव को आकार देता है। संत हृदय सहज सरल स्वभाव वाले होते हैं। इसलिए उनकी भाषा लोक भाषा की सामान्य चादर से लिप्त नज़र आती है।पर भाव या अनुभूति की गहराई अधिक होती है। विशद ईश्वरीय ज्ञान की बातों को, नीति संबंधी बातों को, मानवीय मूल्यों से संबंधित बातों को, संत मलूकदास जी ने इतनी सहजता से दिखाया वह सरलता से समझाया है कि सामान्य जन के हृदय की गहराइयों में उतर जाता है।
“अजगर करे न चाकरी पंछी करे न काम।
दास मलूका कह गए सबके दाता राम।।”27
मुहावरों का प्रयोग-संत मलूकदास के काव्य में लोक प्रचलित मुहावरों का प्रयोग देखा जा सकता है जैसे- मीठी छूरी, बालू की भीत, दाग लगना, हरि की माया, पार उतरना, हाथ न आना, जैसे को तैसा, लाज न आना, चुगली करना, चित् लगाना, धोखा देना आदि। उदाहरण के रूप में-
“दाग जो लागा नील का, सौ मन साबुन धोय।
कोटि बार समझाइया, कौवा हंस न होय।।”28
देशज शब्दों का बाहुलय-संत मलूकदास अलग-अलग जगह जाते और अपने उपदेश देते थे जिस कारण उनके काव्य में अनेक प्रकार के आंचलिक शब्दों या लौकिक शब्दों की भरमार है। जिसमें ब्रज, बुंदेली, मेवाती, अहीरवाटी, हरियाणवी आदि सम्मिलित है जैसे-
“हरि समान दाता काउ नाहीं।सदा बिराजैं संतन माहीं।।
नाम विसंभर बिस्व जियावै।सांझ बिहान रिजिक पहुंचावैं।।”29
संप्रेषणीयता और प्रभावशीलता-संत मलूकदास की भाषा बहुत ही संप्रेषणीय है उनके पदों की वाणी की गूंज इतनी प्रभावकारी है कि जनमानस तक सहजता से पहुंच जाती है यही कारण है कि उनके पद आज भी प्रासंगिक एवं जीवंत हैं-
“जो प्यासे को देवै पानी। बडी बंदगी मोहम मानी।।
जो भूखे को अन्न खवावै। सो सिताब साहेब को पावै।।”30
निष्कर्ष- हम यह कह सकते हैं कि सम और शांत अवस्था में रहने वाला ही संत है। मलूकदास जी एक महान संत कवि हैं उनका जीवन परमात्म शक्ति से भरा हुआ था। परमात्मा सत्य है, सम है, पूर्ण है, वही यह जगत मिथ्या है और विषम है। ‘यत् सत्यम् तत् शिवम् भवति:’ अर्थात् जो सत्य है, वह शिव है संतो के जीवन का हर पहलू सत्य से पूर्ण ब्रह्म गुणों से सिक्त होता है। संत मलूकदास की वाणी में यह भाव दिखाई देता है –
“हमारे गुरु की अद्भुत लीला, ना कछु खाय न पीवै।
ना वह सोवै ना वह जागै, ना वह मरै न जीवै।।
बिन तरवर फल लगावै, मो तो वा का चेला।
छिन में रूप अनेक धरत है, छिन में रहै अकेला।।”31
उनके काव्यों में लोक संस्कृति और लोक भाषा का वर्णन दिखाई देता है। जिसमें सामाजिक चेतना, लोक जीवन की संवेदनाएं और आध्यात्मिक विचारों का सुंदर समन्वय है। तो वही भाषा की सरलता, सहजता, संप्रेषणीयता और प्रभावशीलता जन-सामान्य के लिए ग्राहय बनती है।
संदर्भ सूची
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