राजस्थान नाम आते ही हमारे मन में रेगिस्तान की उड़ती रेत और टीले, राजपूत की वीरता, आलीशान किले और महल, यहां के मेले, त्यौहार, खान-पांन, रंगीन वेशभूषा ,ढ़लोक ,गीत और लोक नृत्य एक दृश्य की भांति चित्रित होने लगते हैं। राजस्थान के लोक नृत्य का अपना अलग ही अंदाज है। यह उनके जीवन का अभिन्न अंग है। क्योंकि यहां का लोक नृत्य उत्सव के आकर्षण को दुगना कर देते हैं। यहां हर एक समुदाय का अपना लोक नृत्य होता है । राजस्थान की भौगोलिक स्थिति का प्रभाव भी उनके लोक नृत्य में दिखाई देता है ।
बीज शब्द :-गैर नृत्य ,भवाई नृत्य ,गीदड़ नृत्य, घूमर नृत्य, बम नृत्य ,अग्नि नृत्य ,गुडला नृत्य , तेरहताली नृत्य और कालबेलिया नृत्य ।
मूल लेख :- ग्रामीण संस्कृति में हमारा पूरा भारत झलकता है । क्योंकि मानवीय मूल्य, रीति रिवाज ,परंपरा और लोककला गांव से जुड़े हुए हैं ।भारत को जानना है तो पहले गांव को जानना जरूरी है । क्योंकि भारत की संस्कृति का उद्भव गांव से ही हुआ है । यही बात अज्ञय जी की कविता ‘हमारा देश ‘ में बताया है ।
“इन्हीं तृण फूस – छप्पर से
ढके ढुलमुल गँवारू
झोपड़ों में ही हमारा देश बसता है ।
इन्हीं के ढोल मादल – बांसुरी के उमगते सुर में
हुनरी साधन का रस बसता है । “1
वास्तव में ग्रामीणों की ढोल , मादल ,और बांसुरी के सुर में भारत की कला और संस्कृति बस्ती है । उसी संस्कृती का एक अंग है ,लोक नृत्य ।
लोक नृत्य ग्रामीण जीवन शैली से उत्पन्न हुआ है । ग्रामीण लोग आनंद में होते हैं तो उनके हाथ और पैर अनायास ही थिरक उठते हैं । “आमजन द्वारा आनंद और उमंग से भरकर सामूहिक अकाल रूप से किए जाने वाले नृत्य को लोक नृत्य कहा जाता है “2 ग्रामीण, लोक त्योहार, मेले और विवाह के अवसर पर इसे प्रस्तुत करते हैं। इस नृत्य में उनकी परंपरा रीति रिवाज यहां तक कि उनकी जीवन शैली को भी दर्शाते हैं ।राजस्थान के लोक नृत्य में राजस्थान की समृद्ध संस्कृति की छाप लिए हुए हैं।यहां के नृत्य में मनोरंजन ही नहीं,राजपूतों के शौर्य की गाथा, ग्रामीण रीति रिवाज, प्रकृति की सुंदरता, विवाह, मेले और त्योहार की झलक इसमें दिखाई देती है। यहां का नृत्य लोक जीवन से जुड़े होने के कारण यह सामाजिक एकता को मजबूत करता है। इन नृत्य को अधिक ऊर्जावान बनाने के लिए कई तरह के वाद्य यंत्रों का उपयोग किया जाता है। जिसमें ढोलक. डफली, डमरू ,घुंघरू,सारंगी, मंजीरा, तारा, नगाड़ा और थाली आदि आते हैं ।इन वाद्य यंत्रों के ताल पर नृत्य करने वाले ही नहीं दर्शक भी आनंद होकर झूम उठते हैं ।गैर नृत्य ,भवाई नृत्य ‘ गीदड़ नृत्य ,घूमर नृत्य ,बम नृत्य ,अग्नि नृत्य , गुडला नृत्य , तेरहताली नृत्य , कालबेलिया नृत्य , आदि से परिचित होते है ।
गैर नृत्य : -यह नृत्य पुरुषों द्वारा किया जाता है ।होली के दूसरे दिन यह शुरू होता और 15 दिनों तक खेला जाता है ।यह बाड़मेर और मेवाड़ के क्षेत्र में अधिक खेला जाता है । “गोल घेरे में नृत्य के कारण इसे ग़ैर तथा गैर करने वाले गैरिये कहलाते हैं।”3.यह नृत्य पुरुष प्रधान होने के कारण बड़ा ही ऊर्जावान होता है। नृत्य की ऊर्जा ढोल, चंग ,थाली और उनके पैरों पर बँधे घुंघरू की थाप से आती है।नृत्य करने वालों के दोनों हाथों में छडी या तलवार होती हैं।वाद्य यंत्रों की ताल और थाप पर ये छड़ियों या तलवारों से युद्ध करने वाली मुद्राओं जैसे नृत्य करते हैं । यह नृत्य तेज गति से होता है ।इस नृत्य में भक्ति और श्रृंगार के गीत भी होते हैं ।गैर नृत्य करने वालों की वेशभूषा बढ़िया आकर्षक होती है। वह सफेद अंगरखी, सफेद धोती और केसरिया पाग पहनते हैं, साथ में गले में फूलों की या मोतियों की माला पहनते हैं ।
भवाई नृत्य -यह एकल नृत्य है ।जिसमें संतुलन बनाकर यह नृत्य किया जाता है ।यह नृत्य राजस्थान के मेवाड़ प्रदेश के भवाई जाति के पेशेवर कलाकार द्वारा किया जाता है ।इस नृत्य में सारे कर्तव्य संतुलन के आधार पर किए जाते हैं, जैसे कि सर पर सात आठ मटके रखकर नृत्य करना lइन्हीं मटकों को सिर पर संतुलित करके जमीन पर पड़े रुमाल को उठाना, थाली के किनारो पर और तलवारों की धार पर नाचना आदि ।नृत्य को अधिक ऊर्जावान बनाने के लिए राजस्थानी लोकगीतों की धुन और थाली, ढोलक, चंग, सारंगी और हारमोनियम आदि यंत्रों का प्रयोग किया जाता है ।अमेरिका गेट टैलेंट 2024 में अलवर के प्रवीण प्रजापत ने भवाई नृत्य करके जजों को भी ताली बजाने पर मजबूर कर दिया था।”अस्मिता काला भवाई नृत्यांगना ने अपने सिर पर 111 घड़े रखकर लिम्का बुक ऑफ़ वर्ल्ड रिकॉर्ड बनाया है।”4 आज भवाई नृत्य देश में ही नही विदेश में भी अपनी प्रसिद्धी के झँडे गाड रहा है ।
गीदड नृत्य :यह नृत्य होली के 15 दिन पहले शुरू होकर होली के साथ समाप्त हो जाता है। गीदड़ नृत्य सीकर, चूरू, रामगढ़ ,लक्ष्मणगढ़ , आदि शेखावाटी क्षेत्र में अधिक खेला जाता है ।यह पुरुष प्रधान नृत्य हैं ।पुरुष स्त्रियों के वस्त्र पहनकर नृत्य करते हैं ।”इसमें कुछ पुरुष कलाकार महिलाओं के वस्त्र पहनकर नृत्य में भाग लेते हैं। उन्हें ‘ गणगौर या मेहरी ‘कहते हैं।”5 नृत्य करने वालों के दोनों हाथों में छड़ी होती हैं। छड़ी को आपस में टकराकर घेरे में नृत्य करते हैं ।नृत्य के दौरान होली के गीत , झाला , जीरा और ढोला नामक लोकगीत गाए जाते हैं ,साथ में नगाड़े, ढोल, चंग थाप के स्वर नृत्य को ऊर्जावान बना देते हैं ।नृत्य में स्वांग किए जाते हैं । जिसमें दूल्हा दुल्हन राजा -रानी ,साधु -सन्यासी ‘सेठ -सेठानी , सरदार , पठान, पादरी , बाजीगर ,भूत -पिशाच ,’ शिव-पार्वती ,राम-कृष्ण और हनुमान आदि के स्वांग किये जाते है ।
घूमर नृत्य -यह राजस्थान का प्रसिद्ध लोक नृत्य हैं। विशेष रूप से यह नृत्य महिलाओं द्वारा खेला जाता है। यह नृत्य तीज, त्यौहार ,मांगलिक अवसर पर किया जाता है ।नृत्य करने वाली महिलाओं की पोशाक बड़ी ही आकर्षक होती है।नृत्य में गोल-गोल घूमने पर लहंगा वृताकार रूप में फैल जाता है और बदन की लचक और हाथों को हवा में उठाकर मुद्राएं करने से नृत्य और भी आकर्षक लगने लगता है ।नृत्य में राजस्थानी लोकगीत ‘म्हारी घूमर जैसे अनेक लोक गीत गाये जाते है ।
“म्हारी घूमर छै नखराली ए माय,
घूमर रमबा म्हैं जास्याँ,
ओ रजरी घूमर रमबा म्हैं जास्याँ,
ओ म्हाने रमतां ने काजल टीकी ल्यादो ए माय,
घूमर रमबा म्हैं जास्याँ ओ
रजरी घूमर रमबा म्हैं जास्याँ। “6
नृत्य और गीत को ऊर्जावान बनाने के लिए ढोल , नगाड़े सारंगी , मंजीरा तथा शहनाई का प्रयोग किया जाता है ।
बम नृत्य : – इस नृत्य का नाम सुनते ही हमारे मन में यह दृश्य ऊभरने लगते हैं कि नृत्य करने वालों के हाथ में बम होते हैं। नृत्य के दौरान इसे फोड़ा जाता है ।लेकिन ऐसा बिल्कुल नहीं है, ‘बम ‘एक वाद्य यंत्र का नाम है । “करीब 3 फीट ऊंचा तथा तीन चार फिट व्यास वाला नगाड़ा जो बम कहलाता है।”7 इसे मोटे डंडे से दोनों हाथों से बजाया जाता है।यह नृत्य पुरुष प्रधान होता है। खासकर भरतपुर और अलवर जिले में यह नृत्य ज्यादातर खेला जाता है।फागुन मास में नई फसलों के आने के उल्लास में यह नृत्य किया जाता है।बम की थाप,मंजीरे ,थाली ,चिमटा,ढोलक के स्वर नृत्य को और आकर्षक बना देते है, साथ ही लोक गीत की धुन नृत्य को ऊर्जावान बना देती है lइन गीतों में कृष्ण-राधा और भगवान शिव की भक्ति का गान होता है ।
अग्नि नृत्य :- राजस्थान के लोक नृत्य में अग्नि नृत्य का नाम आता है ।यह पुरुष प्रधान नृत्य होता है ।यह नृत्य जसनाथी संप्रदाय के लोगों द्वारा किया जाता है । “नृत्यकार गुरु जसनाथ को नमस्कार करने के बाद गुरु के सामने नाचते हुए फतेह-फतेह के उच्चारण के साथ अंगारों के ढेर में प्रवेश करते हैं और नृत्यकर अंगारों से विभिन्न करतब करते हैं, जैसे होली पर फाग खेल रहे हो । “8 नृत्य के शुरू होने से पहले मिट्टी या रेत पर बहुत सारी लकडियाँ एक साथ रखकर उसे जलाई जाती है । लकडियाँ सारी जल जाने के बाद अंगारे बन जाते हैं । इन दहकते हुए अंगारों पर वे नृत्य करते हैं । नृत्य के दौरान कुछ नृत्यकार अंगारों को मुंह में लेकर ऊपर की ओर फूंकना. अँगारो पर बैठना , चलना , लेटना और हाथों में लेकर उछालना आदि करतब दिखाते है ।नृत्य के दौरान नगाड़े, ढोल और मंजीरे का स्वर नृत्य को गति देता है ,साथ में सदगुरू की उपासना वाले लोकगीत नृत्य को ऊर्जावान बना देते हैं ।
” म्हरा सदगुरू बण्या वे दिया रे ‘
नाडी र पकड़ी हाथ ।
उण नाडी में लहर उपजे
हियो हिलोला खाय गुरु म्हाने ज्ञान देगा ।
म्हारे तन बिचे लियों लिखाय
सुमिरन चेतन कराया । “9
घुडला नृत्य :-चैत्र कृष्णाष्टमी में महिलाओं द्वारा यह नृत्य किया जाता है। यह नृत्य अधिकतर रात के समय में किया जाता है। महिलाएं सज धज के अपने सिर पर छेद किए हुए मटके के अंदर जलता हुआ दीपक रखकर नृत्य करती है ।महिला नृत्य करते हुए पूरा गांव घूमती है । घुडला नृत्य की पौराणिक कथा के अनुसार जोधपुर में कुछ स्त्रियां पूजा करने कुएं के पास गई स्त्रियों को पूजा करते देखा अजमेर का सेनापति घुडला खान ने देख लिया और उन स्त्रियों को जबरदस्ती उठा लिया जब यह घटना जोधपुर के राजा राव सताल जी के पास पहुंची तब उन्होंने घुडला खान का पीछा किया। दोनों गुटों में घमासान युद्ध हुआ। युद्ध में घुडला खान की मृत्यु हो गई ।युद्ध में घुडला खान का सर तीरों से छेड़ दिया। उस सर को काटकर उन स्त्रियों को दे दिया। स्त्रियों उस सर को लेकर सारे गांव घूमी। उस दिन से लेकर आज के दिन तक राजा सताल जी की याद में घुडला नृत्य किया जाता है।जिसने अपनी प्रजा को बचाया था । घुडला नृत्य में छेद किया हुआ घड़ा घुडला खान के सिर का प्रतीक है ” 10
छिद्रित मटके के अन्दर दीपक जलता रहता है। इसी मटके को सिर पर रखकर संतुलित करके नृत्य करना यह भी अपने आप में कम नही है ।
तेरहताली नृत्य : -यह लोक नृत्य स्त्री प्रधान है। इस नृत्य की खास बात यह है कि यह बैठकर किया जाता है। तेरहताली नाम से ही पता पड़ता है कि यह तेरहताली से बजते हैं। “यह नृत्य तेरह मंजिरों के साथ किया जाता है । नौ दायें पैर में ,दो हाथों की कोहनी के ऊपर और एक-एक दोनों हाथों में होते हैं।हाथों वाले मंजीरे अन्य मंजीरों से टकराकर ध्वनि उत्पन्न करते हैं” 11 इसमें स्त्रियां मंजीरे के माध्यम से कई नृत्य की मुद्राएं करती है- जैसे रोटियां बनाना, अनाज को साफ करना ,आटा गुंथना, मक्खन निकालना ,चूल्हा जलाने के लिए फूंकना आदि ।यह नृत्य बाबा रामदेव जी के गीत गाकर किया जाता है ।
कालबेलिया नृत्य :-यह नृत्य राजस्थान के प्रसिद्ध नृत्यों में से एक है ।जिसमें नृत्यकार कई तरह की मुद्राएं करती नजर आती हैं ।इस नृत्य को कालबेलिया जनजाति की स्त्रियां करती हैं । “कालबेलिया नृत्य (स्नैक चार्मर डाँस ) को 2010 में यूनेस्को द्वारा अपूर्व संस्कृति विरासत की सूची में शामिल किया गया है।”12 इसलिए नृत्य स्त्री प्रधान है।इसमें स्त्रियां सर्पिलि मुद्राओं से लचकदार नृत्य करती है । अर्थात सांप की तरह नृत्य करती हैं ।ढोल, डफली, बीन की धुन नृत्य को अधिक ऊर्जावान बनती है। जिससे लचकदार नृत्य, सांप की भांति अधिक तेजी से नृत्य करने लगते हैं ।कालबेलिया के लोकगीत पौराणिक कथाओं पर आधारित होते हैं ।यह काले रंग के वस्त्र पहनते हैं । नृत्य में वाद्य यंत्र की थाप ,लोकगीत की धुन और काले और चमकीली वेशभूषा, तीनों का मिलन एक साथ होने पर नृत्य बेहद ही आकर्षक लगता है ।
निष्कर्ष
राजस्थान के लोक नृत्य वहाँ की सांस्कृतिक का एक अटूट हिस्सा है ।क्योंकि लोक नृत्य में राजस्थान का कण-कण नजर आ जाता है ।इसमें वहां के जंगल ,नदी पहाड़ ,रेगिस्तान आदि वातावरण का प्रभाव यहां के लोगों के नृत्य पर पड़ता है । यहां के लोक नृत्य को एक कला के रूप में ही न देखकर लोक जीवन की सच्ची और जीवंत अभिव्यक्ति को भी देखा जाना चाहिए जो राजस्थान की संस्कृति को भरपूर रूप से दर्शाती है ।
संदर्भ ग्रंथ –
1.https://www.geeta-kavita.com/poems/desh-prem-poems/hamara-desh-agyeya/
2.होशियार सिंह -राजस्थान कला एवं संस्कृति – पृष्ठ – 166 – धींधवाला पब्लिकेशन बीकानेर 3.डॉ हुकुमचंद जैन -राजस्थान का इतिहास ,संस्कृति , परंपरा एवं विरासत – पृष्ठ -386 -राजस्थान हिंदी ग्रंथ अकादमी जयपुर
4.होशियार सिंह -राजस्थान कला एवं संस्कृति – पृष्ठ – 166 – धींध वाला पब्लिकेशन बीकानेर
5 वही – पृष्ठ – 167
6.डॉ हुकुमचंद जैन -राजस्थान का इतिहास ,संस्कृति , परंपरा एवं विरासत – पृष्ठ -388 -राजस्थान हिंदी ग्रंथ अकादमी जयपुर
- वही – पृष्ठ – 388
8.वही – पृष्ठ – 388
9.https://youtu.be/-XcNT4_9mBY?si=OjWxegSrW179GJRJ (सतगुरु ) ।
10.https://youtu.be/5ASHTKqocgg?si=udVUgMqqO6DKqtPG (घुडला नृत्य )
- होशियार सिंह – राजस्थान कला एवं संस्कृति – पृष्ठ – 169 – धींध वाला पब्लिकेशन बीकानेर
- ” वही – पृष्ठ -171
अन्य सहायक ग्रन्थ
अमेरिकन टेलेन्ट https://youtu.be/Pt6Zc-3TCTk?si=TulWmlTYTXxZQgVH
लेखक: डॉ. शिवकुमार
सहायक प्रोफेसर, हिन्दी विभाग
क्राइस्ट कॉलेज (स्वायत्त), इरिंजालकुडा, केरल






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