सारांश: अबला जीवन हाय! तुम्हारी यही कहानी

आंचल में है दूध और आंखों में पानी”1

लोक साहित्य में स्त्री संघर्ष का चित्रण अत्यंत सजीवता एवं यथार्थता के साथ अभिव्यक्त हुआ है।

‘कुमाउनी लोक साहित्य में स्त्री संघर्ष’  शोध पत्र  में पितृसत्तात्मक समाज  के बीच महिलाओं के बहुआयामी संघर्ष को दर्शाया जाएगा । कुमाऊनी लोक साहित्य के अंतर्गत लोकगीतों, लोककथाओं,लोकगाथाओं, कहावतों, लोकनाट्यों,  मुहावरें आदि के माध्यम से  नारी की पीड़ा, दुख, निराश,त्याग, और पितृसत्तात्मकता तथा कहीं कहीं पर स्वजाति(सौतेली मां,सास के रूप में)के खिलाफ मौन विद्रोह दिखाई देता है । लोकसाहित्य में  सौतेली मां का अत्याचार, बेटी के साथ भेदभाव, विवाह के समय मायके से जाने का दर्द, ससुराल में सताया जाना, बेमेल विवाह, बाल विवाह, सौतन  का भय, अत्यधिक दूर ससुराल ,दहेज उत्पीड़न, और  बहु-बेटों की चाहत में होने वाला अपमान, बहुओं के साथ होने वाला भेदभाव,  प्रमुखता से झलकता है।

हालाँकि, यह केवल शोषण की  ही गाथा नहीं है; यह स्त्री की सहनशक्ति और प्रतिरोध की भी कहानी है। लोक साहित्य में स्त्री अपने  कठिन संघर्ष को ‘कंठ के संगीत’ के द्वारा  व्यक्त करती है, जिससे उसका दु:ख साझा अनुभव बन जाता है। वह सामाजिक नियमों के बीच भी अपना वर्चस्व और साहस बनाए रखती है, इसे लोक कथाओं  एवं लोग गाथाओं में साहसी नायिकाओं के रूप में देखा जा सकता है। इन सभी पहलुओं को इस शोध का विषय बनाया गया है।

औरत का जीवन ‘फूलों की सेज’ नहीं कटीली कहानी है।

कहने को तो अनेक विशेषण जैसे- घर की रानी है।।

क्या मिला उसे ? बेटी,  बहन, पत्नी, मां बनकर।

सारा जीवन कष्ट सहकर भी ‘पैर की जूती जोरू’ फिर वही कहानी है।। (स्वरचित)

“लोकसाहित्य” शब्द दो शब्दों से मिलकर बना है लोक और साहित्य। इसमें लोक शब्द का अर्थ है जग अथवा संसार और साहित्य का अर्थ है वह रचना जिसमें सबका हित हो। विद्या चौहान ने लोक साहित्य को पारिभाषित करते हुए कहा है- “लोक में व्याप्त प्राणियों के जीवन का मुखरित व्यापार लोक साहित्य है, जिसमें क्षण-क्षण की अनुभूतियाँ, मनोवेग, हृदयोद्गार तया कियाव्यापार सजीव-साकार होते हैं। विश्व के विशाल प्रांगण में जो सहज और सामान्य सत्य रूप है, लोक साहित्य उनकी विवृत्ति करता है, देश-काल की सीमाओं के पार अनवरत गतिशील युग की सामान्य चेतना की प्रत्येक गति का, सुषुप्ति और जागृति का, धर्म और नीति का स्वाभाविक चित्रण इसमें रहता है ।”2

स्त्री संघर्ष से तात्पर्य स्त्री द्वारा अपने अस्तित्व की लड़ाई लड़ने से है।

महादेवी वर्मा ने स्त्री के संघर्ष को ‘मौन संघर्ष’ और ‘अग्निपरीक्षा’ के रूप में देखा है। उनका कहना है कि स्त्रियां घर के अंदर रूढ़ियों का दंश झेल रही हैं और घर के बाहर पुरुषों  से सामानता के लिए कड़ी परीक्षा दे रही हैं। उन्होंने ‘श्रृंखला की कड़ियां’ में स्त्री की परतंत्रता का कड़ा विरोध किया।

कुमाऊँनी  लोककथाएं, लोकगाथाएं, लोकगीत, लोकनाट्य, मुहावरे, कहावतें, पहेलियां (आणे) , बाल गीत,  जागर,  आदि में  केवल कुमाऊनी संस्कृति ही नहीं  अपितु यहाँ  की  स्त्रियों  के  जीवन  का  वास्तविक    चित्रण भी  मिलता  है।

पर्वतीय राज्यों में स्त्री सामाजिक जीवन का मुख्य केंद्र होती है। उसके बिना समाज की कल्पना भी नहीं की जा सकती। पर्वतीय राज्यों की श्रेणी में 11 वें नंबर पर स्थित उत्तराखंड के कुमाऊं मंडल के अंतर्गत आने वाला समस्त क्षेत्र कुमाऊं क्षेत्र कहलाता है। अन्य पर्वतीय राज्यों की भांति  कुमाऊँ  के पर्वतीय समाज में भी  भौगोलिक कठिनाइयों के कारण स्त्री का जीवन अत्यंत संघर्षपूर्ण रहा है। जहाँ एक ओर वह परिवार की रीढ़ है, वहीं दूसरी ओर सामाजिक व आर्थिक अधिकारों (जैसे संपत्ति का अधिकार) के लिए वह संघर्षरत रहती है। डॉ. गिरीश अधिकारी ने महिला श्रम को दिखाते हुए ‘किरसाण- पर्वतीय महिला का जीवन काव्य’ नामक रचना लिखी है जिसमें महिला के संघर्ष को उन्होंने बहुत ही बारीकी से उभारा है, उदाहरण दृष्टव्य है- घा काटहैं जंगोव जैं

तिनाड़ लम्यूण में भ्योव पड़ैं

और कभतै गढ़ौव भारि

चिफइ ढुंगि में खुट रणैं

कभतै दाथुलल आँउ सपकाइ

कभतै कुल्याड़ल खुट में हाण

बस वी हणी कूनी किरसाण

 तो कहीं पर प्रवास से पति के ना आने पर वह बहुत दुखी है और कहती है-

“नी आई चिट्ठी, नी आया आपूँ,

ऐगो उदेखिया चैता ।

उ डाना बाशी न्यौली इकुली,

‘यो डाना बाशो कफूवा ।

बाँजै की डाई घुघुती बाशी,

आमै की डाई में सूवा ।।”

 पति परदेश जाने का दुख है तो कहीं पर मां से ना मिल पाने का दुख। साहित्य की एक विशेषता है कि जब वह अपने मन की बात किसी से ना कह पाती है तो रो-रो कर अपने आप से ही कह कर अपने मन को हल्का कर लेती है-

यो बायो चैत को मैंनू, इजू मेरी रोली ।

मेरि इजू की बादीं लाटी, छै मैंना में खोली ॥3

 (आज चैत के महीने में 6 महीने पूरे हो गए मेरी मां मुझे याद करके रो रही होगी अपनी मां की गुंथी हुई चोटी मैंने 6 महीने बाद खोली है)

और कहीं पर तो महिला पर इतना अत्याचार होता है कि उसकी हत्या ही कर दी जाती है-

सौका ले सौक्यानि मारी, गिठि का चौका लें ।

म्यासा ले मामलो हुँछ, भेट् हुँछी मौका ले।।4

कुमाउनी लोक गाथा ऋतुरैण की गोरिधना विवाह के बाद अपने मायके न जा पाती है। विवाह के पश्चात मायके ना आना भी एक स्त्री की बड़ी विडंबना है।  एक स्थान पर विदाई संबंधी लोकगीत में मां अपनी भावनाएं कुछ इस प्रकार व्यक्त करती है- अरे अरे पंडित लोगो मेरी धिया कन, दुख जन दिया।

दस म्हैण मैंले पेट में बोकी

दस धारि मैले दूध पिवाछऽ।’5

यहां की महिलाएं कहीं पर तो अपने से दोगुनी उम् के व्यक्ति के साथ जीवन जीने को विवश है तो कहीं पर पति शराबी हैं और ऊपर से छोटे-छोटे बच्चे भी उसे ही पालने पड़ रहे हैं

जाड़ा काट्या निङालि का, टुका में छिन् काट्या  

यो बाली उमर मेरी, बुड़ा लै दिन् काट्या ।।6

त्यारा लटी फुन्दा छन, म्यार् लटी धमेली।

सुवा मेरो शराबी , ना्ना की धमेली।।7

 यह शोधपत्र यह दर्शाएगा कि कैसे लोकगीत ‘पुराली’ (पति के दूर जाने पर दुःख) और घर की भारी जिम्मेदारियों के बीच महिला के साहस और त्याग को चित्रित करते हैं। साथ ही, इन गीतों में पितृसत्तात्मक व्यवस्था के प्रति मूक प्रतिरोध और महिला की सामाजिक स्थिति का विश्लेषण किया जाएगा।

‘कुमाऊँनी लोक साहित्य में स्त्री संघर्ष’ के अंतर्गत उन लोक-कथाओं और गीतों का अध्ययन करना है जो अनसुनी नायिकाओं  के संघर्ष, उनकी सहनशीलता और आधुनिकता के दौर में भी उनके अस्तित्व की लड़ाई को उजागर करते हैं।

यह शोध कुमाऊँ की लोक संस्कृति के परिप्रेक्ष्य में नारी जीवन के यथार्थ और उनके प्रतिरोधी स्वरों को दर्शाता है।

अतः निष्कर्ष रूप से कहा जा सकता है कि कुमाऊंनी लोकसाहित्य में स्त्री संघर्ष महत्वपूर्ण विषय है, जो पहाड़ की महिलाओं की जिजीविषा, कठिन परिश्रम, और पितृसत्तात्मक समाज के अत्याचारों को रेखांकित करता है। कुमाऊं क्षेत्र की ये महिलाएं उस अनसुनी नायिका की तरह है जिसकी चीत्कार, विरह वेदना को आज तक किसी ने समझने का प्रयास नहीं किया है। यह अनसुनी नायिका संस्कृति की संरक्षिका, निडर, आत्मनिर्भर और लचीली हैं। आज हमें आवश्यकता है इन महिलाओं को इनकी असली पहचान देने की, उनके कार्य को सराहने की।

प्रतिक्षण कार्य में लगी हुई यह महिलाएं कार्य करते हुए भी समाज की नजरों में सामान्य है, अब समय आ गया है महिलाओं के संघर्ष को अधिक से अधिक समाज में दिखाया जाए और उनको उनके वे अधिकार दिए जाएं जिसकी वह असली हकदार है

मैं हैरान हूं यह सोचकर, किसी औरत ने क्यों नहीं उठाई उंगली तुलसी दास पर, जिसने कहा ,

“ढोल, गंवार, शूद्र, पशु, नारी,

ये सब ताड़न के अधिकारी।

संदर्भ ग्रंथ:

  1. (यशोधरा (काव्य) –1932, मैथिलीशरण गुप्त)
  2. कुमाऊनी लोक साहित्य एवं कुमाऊनी साहित्य-देव सिंह पोखरिया (पृ.सं। 2)
  3. न्यौली सयसई भाग-1डा.देवसिंह पोखरिया (पृ. सं. – 40)
  4. न्यौली सयसई भाग-1डा.देवसिंह पोखरिया (पृ. सं. – 117)

5.डॉ. कृष्णानंद जोशी, कुमाऊँ का लोक-साहित्य, (पृ. सं. 19)

  1. न्यौली सयसई भाग-1डा.देवसिंह पोखरिया (पृ. सं. – 104)
  2. न्यौली सयसई भाग-1डा.देवसिंह पोखरिया (पृ. सं. – 104)

8.डॉ गिरीश अधिकारी रचना ‘किरसाण’ – पर्वतीय महिला का जीवन काव्य।

  1. लोक – साहित्य – संपादक प्रो०चंद्रकला रावत

10.उत्तराखंड की लोकगाथाएं – डॉ० शिवानंद नौटियाल

11.कुमाऊनी लोक गाथाऐं -डॉ० देव सिंह पोखरिया

 

शोधार्थी: गीता तिवारी
शोध निर्देशिका: डॉ. रेनू जोशी
राजकीय महाविद्यालय लमगड़ा (अल्मोड़ा) S.S.J यूनिवर्सिटी