सारांश:

     भारत विविधताओं से संपन्न देश है। खान-पान, रहन-सहन, बोली-भाषा आदि भिन्नताएँ होने पर भी भारत में एकता,अखंडता नजर आती है। भाषा की तरह लोक नृत्य के माध्यम से मनुष्य अपने भावों की अभिव्यक्ति करता है। लोकनृत्य के कारण भारत आज विश्व में आकर्षण का केंद्र बना है। जन्म, विवाह, विभिन्न त्योहार, पर्व, फसल की कटाई आदि की झाँकियाँ लोकनृत्य द्वारा प्रस्तुत होती हैं। लोकनृत्य मानव जीवन का अभिन्न अंग बना है। कला, परंपरा, आम जनता की आशा-आकांक्षाओं का बिंब लोकनृत्य में झलकता है। आनंद और उल्लास से प्रस्तुत होने वाले लोकनृत्य भारतीय जनता की सर्वश्रेष्ठ अभिव्यक्ति है। लोकनृत्य भारतीय परंपराओं का प्रतिनिधित्व करते हैं। आज के तकनीकी युग में लोक नृत्य को वैश्विक पहचान देना आवश्यक है। सांस्कृतिक महोत्सवों एवं कार्यशालाओं का आयोजन करना,साथ ही युवा वर्ग में लोकनृत्य की ओर देखने का नया दृष्टिकोण विकसित करना चुनौती भरा कार्य है। लोकनृत्य को आजीविका के साथ जोड़कर उसकी कलात्मकता को जनमानस तक पहुँचाकर उसे ऊँचाइयों के शिखर तक ले जाना आज की आवश्यकता है।

विषय प्रवेश

         ‘लोक’ शब्द का सहजता से प्रयोग किया जाता है। ‘लोक’ शब्द स्थान, संसार, सर्वसाधारण, समाज जैसे अर्थों को इंगित करता है। कभी-कभी विशेष अर्थ की ओर संकेत करता है, जैसे- ‘स्वर्ग लोक’, ‘पृथ्वी लोक’, ‘पाताल लोक’, ‘भूलोक’ आदि।1संस्कृत शब्द ‘लोक’ का व्युत्पत्ति मूलक अर्थ देखें तो ‘लोक दर्शने’ धातु में ‘घञ्’ प्रत्यय लगाकर ‘लोक’ शब्द की निर्मिति हुई है।इसका अर्थ है – देखने वाला।2 इस प्रकार ‘लोक’ उस जन समूह को कहते हैं जो समूचे विश्व का निरीक्षण करता है।भारतीय प्राचीन ग्रंथों में ‘लोक’ शब्द का प्रयोग हुआ है।’ऋग्वेद’ से लेकर भरतमुनि द्वारा रचित ‘नाट्यशास्त्र’ तक लोक शब्द विभिन्न अर्थों में प्रयुक्त हुआ है।3 हिंदी साहित्य के सशक्त हस्ताक्षर आचार्य रामचंद्र शुक्ल ने ‘चिंतामणि’ में लोक-सत्ता, लोक-मंगल, लोक-धर्म जैसे शब्दों का प्रयोग कर समाज, संस्कृति पर अपने गहन विचार प्रस्तुत किए हैं।4आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी के अनुसार,”लोक शब्द का अर्थ ‘जनपद’ या ‘ग्राम’ न होकर नगरों और गाँवों में फैली हुई वह समूची जनता है जिनके व्यवहारिक ज्ञान का आधार पोथियाँ नहीं हैं। ये लोग नगर में परिष्कृत, रूचि-संपन्न तथा सुसंकृत समझे जाने वाले लोगों की अपेक्षा अधिक सरल और अकृत्रिम जीवन के अभ्यस्त होते हैं और परिष्कृत रूचि वाले लोगों की समूची विलासिता और सुकुमारता को जीवित रखने के लिए जो वस्तुएँ आवश्यक होती हैं उन्हें उत्पन्न करते हैं।” 5इसी बात की पुष्टि करते हुए डॉ. सत्येंद्र लिखते हैं,” ‘लोक’ मनुष्य समाज का वह वर्ग है जो अभिजात्य संस्कार, शास्त्रीयता और पांडित्य की चेतना अथवा अहंकार से शून्य है और जो एक परंपरा के प्रवाह में जीवित रहता है।”6 लोक अंग्रेजी भाषा की बात करें तो अंग्रेजी का ‘FOLK’ शब्द हिंदी भाषा के शब्द लोक, लोग, जन का पर्याय बना है।7

        ‘नृत्य’ भारतीय जनमानस का अभिन्न अंग है। ‘नृत्य’ शब्द की व्युत्पत्ति संस्कृत के ‘नृत’ धातु से हुई है, जिसका अर्थ है- गात्र-विक्षेपण अथवा अंग संचालन।8 नृत्य में वाचिक, आंगिक, सात्विक और आहार्य अभिनय का विशेष महत्व है। ‘नृत्य’ और ‘नृत्त’ में काफी भिन्नता देखी जाती है। रस, भाव को नृत्य की आत्मा कह सकते हैं, जबकि ‘नृत्त’ में ताल-लय के अनुरूप हाथ एवं पैरों का परिचालन किया जाता है। नृत्य में भाव की सत्ता है तो नृत्त में केवल पदविन्यास का महत्व है। भारतीय नृत्य की परंपरा भगवान शिव से मानी जाती है। नृत्य को शास्त्रीय नृत्य और लोकनृत्य आदि दो प्रमुख भागों में देखा जाता है।शास्त्रीय नृत्य केवल मनोरंजन का साधन नहीं है अपितु भारतीय दर्शन और आध्यात्म की अभिव्यक्ति है।जीवन को देखने का कलात्मक दृष्टिकोण है। लोकनृत्य क्षेत्रीय इतिहास, संस्कृति का दर्पण है। लोकनृत्य से क्षेत्रीय अस्मिता का बोध होता है।लोकगीत, लोक संगीत मनुष्य के हृदय के तार छेड़ता है जबकि लोकनृत्य उन्हीं भावों का सामूहिक प्रकटीकरण है।लोकनृत्य का विशेष प्रशिक्षण नहीं दिया जाता। लोग अपने आनंद, खुशी को प्रकट करने हेतु एकत्रित आते हैं।ढोल,पिपुही आदि पारंपारिक वाद्यों पर उनके पैर थिरकने लगते हैं। कभी तालियाँ बजाते हुए तो कभी एक-दूजे का हाथ थामे लोग अपने दुखों को भूल कर हर्ष मनाते हैं। मनुष्य के शरीर में ही एक आतंरिक ऊर्जा रहती है। अनुकूल वातावरण में वह थिरक उठती है, जिसे नृत्य कहते हैं। लोकनृत्य में सभी एक धरातल पर आकर आनंद, सादगी, सरलता और एकता का अनुभव करते हैं। कहा जा सकता है कि शास्त्रीय नृत्य की जड़ें लोकनृत्य में मिलती हैं।

          लोकनृत्य भारत की सांस्कृतिक धरोहर है। क्षेत्रीय विशेषताओं का वर्णन लोकनृत्य द्वारा प्रस्तुत किया जाता है। हमारी मान्यताओं एवं परंपराओं की अभिव्यक्ति तीर त्यौहार उत्सव पर्व विवाह समारोह आदि अवसरों पर लोकनृत्य के माध्यम से होती है। इसे सामूहिक सद्भाव सामंजस्य तथा अपनेपन की भावना जागृत होती है। सूरत लाल है और गति के साथ फुर्ती से किया जाने वाला लोकनृत्य दशकों में उत्साह एवं जोश निर्माण करता है। आशा -आकांक्षा नई उमंग आनंद को हर्षोल्लास के साथ व्यक्त करने की एक सहज सुंदर आकर्षक और मनभावन पढ़ती है लोक नृत्य। लोकनृत्य अपने क्षेत्र की भौगोलिक, सामाजिक, सांस्कृतिक, ऐतिहासिक अस्मिता को उजागर करते हैं।आज कश्मीर से लेकर कन्याकुमारी तक कच्छ से लेकर कोहिमा तक प्रत्येक क्षेत्र अपने लोक नृत्य के द्वारा सामाजिक सद्भाव का संदेश प्रस्तुत कर रहा है।लोक नृत्य के कारण पर्यटक को प्रोत्साहन भी मिल रहा है।स्थानीय कलाकारों, कारीगरों को आजीविका लोक नृत्य द्वारा उपलब्ध हो रही है।लोकनृत्य से हमें जीवन की ओर देखने की नई दृष्टि प्राप्त होती है।प्राचीन काल से लेकर आज तक कला के सतरंगी रंग धुंधले नहीं पड़े हैं।वर्तमान समय में भारतीय परंपराओं एवं संस्कृति का वहन करने वाले लोकनृत्य बड़े जोश के साथ प्रस्तुत किए जाते हैं। शास्त्रीय नृत्य के समान लोकनृत्य भारतीय जनमानस की आत्मा है।समूह में किया जाने वाला लोकनृत्य दर्शकों को आकर्षित करता है। धार्मिक, सामाजिक समारोहों में महिला, पुरुष मिलकर आनंदोत्सव मनाते हैं। लोकनृत्य के माध्यम से लोकसंस्कृति व्यंजित होती है। वह समाजसुधार का भी एक सशक्त साधन है। उदाहरणार्थ- महाराष्ट्र का ‘पवाड़ा’ वीरश्री को जगाता है तो ‘भारुड़’ अंधविश्वास निर्मूलन का कार्य करता है।नृत्य चाहे शास्त्रीय हो या लोक नृत्य शारीरिक क्षमता विकसित करने में संतुलन बनाए रखने में सहायक है। नृत्य सीखने से आत्मविश्वास वृद्धिंगत होता है। शारीरिक एवं मानसिक स्वास्थ्य लाभ भी होते हैं। हमारे व्यक्तित्व पर सकारात्मक प्रभाव पड़ता है।मनुष्य समायोजन तथा समन्वय करना सीखता है।

उत्तर भारत के लोकनृत्य-

        जम्मू -कश्मीर,लद्दाख, उत्तराखंड,उत्तर प्रदेश,पंजाब,हरियाणा, राजस्थान में प्रस्तुत होने वाले लोकनृत्य अपने क्षेत्र की परंपराओं को दर्शाते हैं।कश्मीर की वादियों में जन्मा ‘रउफ’ लोक नृत्य फसल की कटाई के समय कश्मीरी महिलाओं द्वारा किया जाता है।लाल, नीले, पीले रंग बिरंगी कुर्ते और सफेद सलवार पहनकर लड़कियाँ एक-दूसरे का हाथ थामती हैं।लोकगीत गाते हुए उनके पैर थिरकते हैं।लद्दाख में लोग अपने पारंपरिक वाद्यों के साथ विवाह, त्योहार आदि पर नृत्य प्रस्तुत करते हैं।यहाँ का ‘शोंडोल नृत्य’ विशेष प्रसिद्ध है।पंजाब प्रांत में लोकनृत्य के क्षेत्र में अपना अलग स्थान बना लिया है।’भांगड़ा’ अपनी लोकप्रियता के चरम छूता है।ऊर्जा से भरपूर भांगड़ा देखकर दर्शक झूम उठते हैं।फसल उत्सव बैसाखी विवाह जैसे समय भांगड़ा प्रस्तुत होता है। महिलाओं द्वारा किया गया ‘गिद्दा’ भी सामाजिक समारोह में अपना विशेष स्थान बनाए हुए है।भांगड़ा की तरह गिद्दा भी जबरदस्त ऊर्जा के साथ किया जाता है। हरियाणा का डंडा नाच  ढोलक की गूँज पर किया जाता है। घोड़ी नाच लड़की की बिदाई के समय किया जाता है।9

        हिमाचल प्रदेश का ‘नाटी नृत्य’ तालियाँ बजाते हुए किया जाता है। हिमाचल प्रदेश के चंबा क्षेत्र की महियाएँ डांगी नृत्य करती हैं।उत्तराखंड का ‘छोलिया’ नृत्य भी कुमाऊॅं क्षेत्र की पहचान है। कुमाऊॅं क्षेत्र चांचरी लोकनृत्य के जाना जाता है। इस नृत्य में पैरों की थिरकन देखी जा सकती है। उत्तराखंड में मेले, त्योहार, पर्व गोलाकार में ‘चांचरी नाच’ किया जाता है।10 उत्तर प्रदेश के प्रसिद्ध लोकनृत्य ‘नौटंकी’ से सामाजिक समस्याओं को प्रस्तुत किया जाता है। मथुरा,वृंदावन में प्रचलित ‘रासलीला’ दर्शकों को आकर्षित करती है। ‘कजरी नाच’ सावन के समय उत्तर प्रदेश में स्त्रियाँ करती हैं। उत्तर प्रदेश के अहीर,चमार,कहार जाति के लोग भी ढोलक के साथ नाचते हैं। राजस्थान की माटी खुशबू ‘घूमर’, ‘कालबेलिया’, जैसे लोक नृत्य बिखेरते हैं। विवाह, त्यौहार, गणगौर जैसे समय महिलाएँ सुंदर घागरा पहनकर ‘घूमर’ नृत्य करती हैं। आकर्षक शारीरिक गतिविधियों से ‘कालबेलिया’ नृत्य दर्शकों का हृदय जीत लेता है। पारंपरिक जेवर, काले रंग का घागरा पहनकर महिलाओं द्वारा प्रस्तुत किया जाता है।

मध्य भारत के लोकनृत्य-

          मध्यप्रदेश,छत्तीसगढ़,महाराष्ट्र,गुजरात,गोवा,बिहार आदि प्रमुख राज्य अपने लोकनृत्यों के लिए जाने जाते हैं।’जय अंबे’ कहकर माँ दुर्गा के स्मरण में किया जाने वाला ‘गरबा’ नृत्य गुजरात की पहचान है।रंग-बिरंगी, आकर्षक शीशे, मोती और कड़ाई की हुई चनिया चोली महिलाएँ पहनती हैं।विभिन्न आभूषण पहनकर महिलाएँ बड़े जोश के साथ गरबा प्रस्तुत करती हैं। गरबा देखते-देखते ही दर्शकों के पैर अपने-आप थिरकने लगते हैं। पुरुष धोती, सिर पर पगड़ी, हाथ में कड़ा,पैरों में मोजड़ी पहनकर गरबा नृत्य करते हैं।सौराष्ट्र,काठियावाड़ क्षेत्र से लोकप्रिय हुआ गरबा अपनी ऐतिहासिक परंपरा का गुणगान करता आकर्षक ढंग से यह नृत्य प्रस्तुत करती हैं। मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़ में आदिवासी समुदाय रहता है।’भील और भिलाला’ लोग लोकनृत्य कर त्योहार मानते हैं। पुरुष पैरों में घुँघरू बाँधते हैं और हाथों में ढाल-तलवार पकड़कर नाच करते हैं।11 ‘सैला नाच’ गोल बनाकर किया जाता है।कौड़ियों से बने बाजूबंध,करधनी, मोरपंख लगाकर युवा सैला नृत्य करते हैं। मध्य प्रदेश के मालवा प्रांत का ‘मटकी नृत्य’, छत्तीसगढ़ का ‘तपाड़ी’,बुंदेलखंड का ‘होली’ आदि नृत्य देखे जाते हैं।इस प्रकार मध्य प्रदेश लोक नृत्यों से संपन्न है।

           ढोलक की थाप पर अपनी मनमोहक अदाओं से महाराष्ट्र की महिलाएँ ‘लावणी’ नृत्य करती हैं। महिलाएँ पारंपरिक नौवारी साड़ी, सुंदर आभूषण पहनती हैं। लावणी नृत्य में ‘सवाल- जवाब’ का अलग स्थान है। गण-गवळण,तमाशा लावणी के साथ किया जाने वाला एक रंजक नृत्य है।यहाँ का ‘दशावतार’ भी उल्लेखनीय है।महाराष्ट्र के तटीय क्षेत्र का गुणगान करने वाला ‘कोली नृत्य’ मछुआरों के जीवन को समर्पित है। महाराष्ट्र के ठाकुर,कातकरी,कोर्कू(गोंड) जैसे समुदाय ढोलचा नाच,तंबोरीचा नाच प्रस्तुत करते हैं। महाराष्ट्र के वारली समुदाय द्वारा प्रस्तुत किया जाने वाला ‘तारपा’ नृत्य वारली समुदाय की पहचान बना है। सागर तट पर बसा गोवा प्राकृतिक सौंदर्य के लिए प्रसिद्ध है। यहाँ पुर्तगालियों का प्रभाव दिखाई देता है। ‘दकनी नृत्य’ गोवा का लोकनृत्य है।शादी-ब्याह के अवसर पर दकनी नृत्य किया जाता है।स्त्रियाँ सजधज कर नृत्य प्रस्तुत करती हैं। ‘मंडो’ भी एक जाना-माना नृत्य प्रकार है।

दक्षिण भारत के लोकनृत्य-

           दक्षिण भारत के आंध्र प्रदेश,तेलंगाना,कर्नाटक,केरल,तमिलनाडु आदि दक्षिणी राज्य अपनी लोककलाओं के लिए जाने जाते हैं।आंध्र प्रदेश के बंजारों द्वारा ‘लम्बाड़ी’ लोकनृत्य प्रस्तुत होता है।रंग-बिरंगी कपड़े, खूबसूरत गहने पहनकर महिलाएँ ‘लम्बाडी’ नृत्य होली,शादी के दरम्यान करती हैं।आंध्र प्रदेश में ‘डप्पू’ वाद्य पर लोकनृत्य किया जाता है।घुटनों तक धोती पहन कर डप्पू को बजाते हुए नाच करते हैं।‘बत-कम्मा’ नाच तेलंगाना की महिलाएँ विवाह समारोह पर प्रस्तुत करती हैं।कर्नाटक के प्रचलित ‘यक्षगान’ में नृत्य, नाट्य और संगीत का संगम दिखाई देता है।कर्नाटक में लोकनृत्य उत्सवों और पूजा के समय किए जाते हैं।इसके आलावा फसल पकने पर ‘बलाकाट’ नृत्य कोड़वा समूह करता है।’पुतली नृत्य’ रात के समय पुतलियाँ नाचकर किया जाता है। वीरता और शक्ति से संबंधित ‘करगा’ नृत्य है। पुरुष धोती, पगड़ी पहनकर नृत्य करते हैं।12

               तमिलनाडु में उत्सवों एवं त्योहारों लोकनृत्य पर किए जाते हैं।यहाँ ‘कावड़ी’,’करकरम’,’पाविक्कूतु’,’कुम्मी’ आदि प्रचलित लोकनृत्य हैं।’कावड़ी’ में लकड़ी से बने चंद्राकृति ढाँचे को रंग-बिरंगी कपड़ों से सजाया जाता है। उसे लंबे डंडे उठाकर नृत्य किया जाता है।’करकरम’ माता मरिअम्मा की पूजा के समय किया जाता है।’पाविक्कूतु’ में पुतलियों को नचाया जाता है।रात्रि में दीपक के आस-पास गोल बनाकर ‘कुम्मी’ नाच स्त्रियाँ करती हैं।केरल के लोकनृत्य अपनी परंपराओं को दर्शाते हैं।मंदिरों में ‘भद्रकाली’ नृत्य किया जाता है।इसके अंत में ‘तियाट्टु'(अग्निनृत्य) किया जाता है। ओणम के समय महिलाएँ ‘काईकोट्टिकली’ नृत्य घेरा बनाकर करती हैं।’वेलकलि’ नायर परिवार के पुरुषों द्वारा किया जाने वाला लोकनृत्य है।केरल के मालाबार क्षेत्र आस-पास ‘थेर आट्टम’ लोकनृत्य अपनी परंपरा का बखान करता है।13

पूर्वोत्तर भारत के लोकनृत्य-

         उड़ीसा,पश्चिमबंगाल,बिहार,झारखंड़,आसाम,अरुणाचलप्रदेश,मणिपुर,मिजोरम,मेघालय, त्रिपुरा, नागालैंड आदि राज्यों के लोकनृत्य से वहाँ की संस्कृति के दर्शन होते हैं। उड़ीसा अपने प्राकृतिक सौंदर्य के लिए प्रसिद्ध है।उड़ीसा के आदिवासी शादी-ब्याह के अवसर पर ‘शबर नृत्य’ करते हैं।’डंडा नाट’ यहाँ का पूर्वकालीन लोकनृत्य है। ‘करमा’ नाच मयूरगंज,संबलपुर आदि जगहों पर किया जाता है।मयूरगंज में महिलाएँ गोलाकार में नृत्य करती हैं।उड़ीसा के घुमक्कड़ी लोग  विशेषकर सपेरे ‘केला-केलूनी’ नाच करते हैं।यहाँ के मछुआरे ‘चैती घोड़ा’ नृत्य करते हैं।छाती पर घूमरा (ढोलक) बाँधकर युवक ‘घूमरा’ नृत्य करते हैं। मयूरभंज का ‘छाऊ’ विशेष लोकप्रिय है।बिहार में ग्रामीण जीवन देखा जाता है। कृषक,आदिवासी समुदाय के कारण यहाँ का लोक जीवन मुखर हुआ है।बिहार का ‘बिदेसिया’ नृत्य अपनी विशेष पहचान बनाए हुए है। बिहार के आदिवासी समाज द्वारा ‘जातरा’ आदि नाच किए जाते हैं।’रामलीला’,’नारदी नाच’ आदि धार्मिक नृत्य हैं तो ‘झिझिया’,’जट-जटनी’ जैसे नृत्य स्त्रियाँ करती हैं।झारखंड लोकगीत, लोकगाथा, लोकनृत्य के लिए परिचित है।यहाँ का आदिवासी समाज अपनी परंपराओं का प्रतिनिधित्व करता है। यहाँ के लोग ढोल,झाँझ,नगाड़ा,बांसुरी आदि वाद्यों के साथ पारंपारिक वेशभूषा में नृत्य करते हैं।झारखंड में ‘जदुर’,’गेना’,’खेमटा’,’जरगा’,’फगु’,’पाईका'(मुण्डा),’ठठिया’ आदि नृत्य देखे जाते हैं।पश्चिम बंगाल लोक- कलाओं के लिए जाना जाता है।पश्चिम बंगाल में ‘धूप नृत्य’ किया जाता है। धूपदानी बाएँ हाथ में रखकर गोलाकार घूमकर नृत्य करते हैं। ‘मादल पूजा’ में चार्म वाद्यों की पूजा की जाती है और युवा उस समय नृत्य करते हैं। ‘कीर्तन नृत्य’ यहाँ की एक और विशेषता है।इसमें ढोल, झाँझ के साथ गोलाकार में नृत्य करते हैं।

        ब्रह्मपुत्र नदी से संपन्न असम का ‘बीहू नृत्य’ प्रसिद्ध है।’बीहू नृत्य’ स्त्री-पुरुष पारंपरिक वेशभूषा में ढोल की गूँज पर प्रस्तुत करते हैं। नए वर्ष का स्वागत ‘बोहाग बीहू’ से किया जाता है। फसल पकने पर ‘माघ बीहू’ और बैसाख में ‘बैसाख बीहू’ मनाया जाता है। असम के बोडो जन समुदाय द्वारा किया जाने वाला ‘बगुरूम्बा नृत्य’ एक संपन्न सांस्कृतिक विरासत का प्रतीक है।ऊॅंचे- ऊॅंचे पर्वतों से अरुणाचल प्रदेश घिरा है। आदि, डफला, सिंगपो, तागिन, जैसे आदिवासी अपना जीवन व्यतीत करते हैं। अरुणाचल प्रदेश की लड़कियाँ एक-दूसरे कंधे पर हाथ रखती हैं और घेरा बनाकर नाचती हैं।’शेर और मोर नृत्य’ लोगों को आकर्षित करता है। मणिपुर एक रमणीय जगह है।मणिपुर की लोकनृत्य परंपरा निखरी हुई है।’खंबा थोइबी’ नामक पारंपारिक लोकनृत्य में शिव-पार्वती का वर्णन किया जाता है।’मरिबौक जोई’,’खुबाकइसै’ आदि नृत्य लड़कियाँ करती हैं।’आखेट नृत्य’ मणिपुर के आदिवासी करते हैं। ‘चोलम'(ढोल नृत्य) नृत्य तलवार -भाले की सहायता से नाचते -कूदते किया जाता है।

          मिजोरम का बांस नृत्य ‘चेरोकन’ एक खेल नृत्य है।लड़कियाँ यह नृत्य करती हैं। विविध जन-जातियों से मेघालय निखर उठा है।मेघालय राज्य की गारो,खासी और जैतिया जनजाति के लोगों द्वारा लोकनृत्य प्रस्तुत किए जाते हैं।जैतिया लड़कियाँ समूह में ‘लाहो’ नृत्य करती हैं।’क-शद-मस्तिएइ’ नाच पुरुष करते हैं।अपने कपड़ों पर मयूर,मुर्गे के पर लगाते हैं। गोलाकार घूमने के बाद एक-दूजे से झूठ-मूठ का युद्ध करते हैं। नगालैंड भूमि पर सेमा, आओ, लोथा,कूकी,फोम,जित्यांग आदि आदिवासी लोग रहते हैं। कोहिमा के आस-पास के युवा ‘क्रेदोहोह’ नामक युद्ध-नर्तन करते हैं।सेम नगाओं का ‘अकहाजी’ एक प्रसिद्ध लोकनृत्य है।नगा का ‘चोंग नृत्य’ लोकप्रिय है।

         लोकनृत्य पर डॉ. श्याम परमार लिखते हैं कि, “हमारे ये लोक नृत्य सह- संबंधों को बढ़ाते हैं। जो जाति जितना अधिक गाती और नाचती है उतना ही उनमें कठिनाइयों से जूझने का मद्दा होता है।”14 

निष्कर्ष

          वर्तमान समय में भारतीय लोकनृत्य के सम्मुख शहरीकरण, आधुनिकीकरण, तकनीक का बढ़ता प्रयोग जैसी बड़ी समस्याएँ दस्तक दे रही हैं।शहरों का आकर्षण, आजीविका की उपलब्धि युवा पीढ़ी को अपना क्षेत्र छोड़ने के लिए मजबूर कर रही है।पारंपरिक माध्यम का मिलना भी मुश्किल हो जाता है जिससे लोक नृत्य प्रस्तुतीकरण पर संकट के बादल छा जाते हैं।जनता के मन के द्वार खोलने वाले आकर्षक लोक नृत्य का संवर्धन एवं संरक्षण करना सबका दायित्व है।सरकार के साथ-साथ संगीत नाटक अकादमी, क्षेत्रीय सांस्कृतिक केंद्र, अनुसंधान संस्था अपना काम कर रही हैं। साथ ही,सामान्य जनता भी अपने लोक नृत्य के लिए खड़ी हो रही है।लोकनृत्य की परंपरा अबाधित गति से प्रवाहित रखने की हम सबकी जिम्मेदारी है।लोकनृत्य के प्रशिक्षण केंद्रों की स्थापना कर उसके संवर्धन में योगदान दिया जा रहा है।आधुनिक तकनीक के साथ लोक नृत्य को जोड़कर वह अत्यधिक पल्लवित एवं समृद्ध वह हो रहा है। भविष्य में,लोक नृत्य की मूल आत्मा को बिना ठेंस पहुँचाए एआई के सफलतम प्रयोग करने होंगे। लोकनृत्य को सर्वदूर पहुँचाने में सामाजिक मीडिया का बहुत बड़ा योगदान रहा है। नए सुर, नए कलेवर के साथ प्रस्तुत किया गया लोक नृत्य दर्शकों को अवश्य लुभाएगा।

          अपने आनंददायक क्षणों को चिरस्मरणीय बनाने के लिए मनुष्य ने नृत्य को अपनाया। नृत्य अपने-अपने क्षेत्र की विशेषताओं को लेकर लोक नृत्य के जरिए प्रस्तुत होने लगा। समाज को एकत्रित, संगठित रखने की क्षमता लोक नृत्य में है। स्थानीय मान्यताओं, परंपराओं तथा कहानियों को लोक नृत्य जीवित रखने में सहायक है। संक्षेप में क्षेत्रीय अस्मिता की पहचान बने लोक नृत्य में अखंडता, एकता निरंतर प्रवाहित होती है।नई पीढ़ी को लोकनृत्य की परंपरा का संवर्धन तथा उन्नयन करने में अपना सक्रिय योगदान देना जरूरी है। लोकनृत्य के आतंरिक सौंदर्य को बनाए रखना उनका दायित्व बनता है। इस प्रकार विविध रंगों में रंगे हुए भारत के लोकनृत्य भारतीय समाज की आन-बान-शान हैं। भारत की अस्मिता है।

 

 

 

संदर्भ सूची –

1)लोकसाहित्य के प्रतिमान, डॉ कुंदनलाल उप्रेती, भारत प्रकाशन मंदिर,अलीगढ़, पृ.1

2) लोकसाहित्य के प्रतिमान, डॉ कुंदनलाल उप्रेती, भारत प्रकाशन मंदिर,अलीगढ़, पृ.2

3)लोकसाहित्य के प्रतिमान, डॉ कुंदनलाल उप्रेती, भारत प्रकाशन मंदिर,अलीगढ़, पृ.2,3

4)चिंतामणि, रामचंद्र शुक्ल, प्रकाशक के मित्रा,इंडियन प्रेस, लिमिटेड, प्रयाग,पृ.214

5)जनपद (त्रैमासिक पत्रिका) वर्ष 1अंक1(कशी:हिन्दू विश्वविद्यालय,अक्टूबर,1952) द्विवेदी हजारी प्रसाद पृ.65

6) लोक साहित्य विज्ञान,डॉ सत्येंद्र,शिवलाल अग्रवाल एण्ड कंपनी, आगरा,द्वितीय संशोधित संस्करण1971, पृ.3

7)अंग्रेजी-हिंदी शब्दकोश, डॉ हरदेव बाहरी, राजपाल प्रकाशन,पृ 279

8)आचार्य शारदातनय के संदर्भ में नृत्य की प्रासंगिकता,अमित सिंह, शोधछात्र,2019 IJRST Volum 6 Issu3 Online ISSN:2395-602X

9)भारत के लोकनृत्य,डॉ श्याम परमार,राजपाल एण्ड सन्ज,कश्मीरी गेट,दिल्ली, तीसरा संस्करण,1981पृ.9,11,13,16,23

10) कुमाऊँ हिमालय के लोकनृत्य- indiaich-sna.in

11) भारत के लोकनृत्य,विश्वमित्र शर्मा,आत्माराम एण्ड संस,दिल्ली,1901पृ. 53

12) भारत के लोकनृत्य,डॉ श्याम परमार,राजपाल एण्ड सन्ज,कश्मीरी गेट,दिल्ली, तीसरा संस्करण,1981पृ.74,75,76

13) भारत के लोकनृत्य,डॉ श्याम परमार,राजपाल एण्ड सन्ज,कश्मीरी गेट,दिल्ली, तीसरा संस्करण,1981पृ.69,70,71,72,75,76,77

14) भारत के लोकनृत्य,डॉ श्याम परमार,राजपाल एण्ड सन्ज,कश्मीरी गेट,दिल्ली, तीसरा संस्करण,1981पृ.54

डॉ. प्रदीप रेवाप्पा सरवदे
अध्यक्ष, स्नातक एवं स्नातकोत्तर हिंदी विभाग,
तुलजाराम चतुरचंद महाविद्यालय (कला, विज्ञान एवं वाणिज्य)
बारामती, जिला – पुणे (महाराष्ट्र)

प्राजक्ता उमेश अभ्यंकर
शोधार्थी
तुलजाराम चतुरचंद महाविद्यालय (कला, विज्ञान एवं वाणिज्य)
बारामती, जिला – पुणे (महाराष्ट्र)