अनुक्रमणिका

संपादकीय – डॉ. आलोक रंजन पांडेय बातों-बातों में हबीब तनवीर के संदर्भ में कपिल तिवारी से ऋतु रानी की बात-चीत शोधार्थी पाठकों से संवाद करती स्वयंप्रकाश की कहानियाँ : डॉ.शशांक […]

आचार्य शिवपूजन सहाय की संपादन कला – डाॅ. सुनील कुमार तिवारी

आधुनिक संपादन कला के वैशिष्ट्य के लिए जिन बिंदुओं की महत्त्वपूर्ण माना जाता है, उस वैज्ञानिक आधार की पृष्ठभूमि शिव पूजन सहाय द्वारा संचालित ‘हिमालय’ में उस समय देखा जा […]

  साहित्य में स्त्री विमर्श का महत्त्व और रघुवीर सहाय की रचनाएँ – दिनेश कुमार यादव

साहित्य को समाज का दर्पण कहा जाता है। साहित्य एक-दूसरे के दुःख में दुःखी होना और एक-दूसरे के सुख में सुखी होना सिखाता है। वह संपूर्ण मनुष्य का कल्याण हो […]

सिनेमा में हिन्दी भाषा का स्वरूप – अर्चना उपाध्याय

हिन्दी सिनेमा का आरम्भ पारसी थिएटर की देन है। उन्नीसवीं शताब्दी के अंतिम दशक में महाराष्ट्र और गुजरात में पारसी थिएटर का जन्म माना जाता है। इसके आरंभिक रंगकर्मियों में […]

विश्व शांति: अहिंसा और महात्मा गांधी के योगदान – डॉ. संजीव कुमार तिवारी

भारतीय संस्कृति में अहिंसा को सबसे बड़ा धर्म स्वीकार किया गया । मानवीय सभ्यता के मूल में अहिंसा की भूमिका सबसे अहम है । वैसे तो वैदिक ग्रंथों में अहिंसा […]

कविताओं से गायब होता देश का अन्नदाता – मोनिका मीना

भारत की जनंसख्या का अधिकांश प्रतिशत कृषि पर निर्भर करता है। देश की अर्थव्यवस्था में सदैव कृषि की महत्वपूर्ण भूमिका रही है। साहित्य में भी किसान एक जमाने से केन्द्र […]

तुलसीदास के ग्रंथों में भारतीय जनसंस्कृति का स्वरूप – कल्याण कुमार

हिंदी के मध्यकालीन युग से लेकर नवीनतम युग में महाकवि तुलसी एक ऐसे सूर्य है,जिनका तेज वर्तमान में छटाक मात्र भी मलीन नहीं हुआ है। भारतीय साहित्य की विभूतियों में […]

अमृतलाल नागर और कथा संसार – अतुल वैभव

अमृतलाल नागर हिंदी गद्य साहित्य के उन शिखर पुरुषों में गिने जाते हैं जिनके गद्य से हिंदी साहित्य ही नहीं बल्कि अन्य भारतीय भाषाओं का साहित्य भी समृद्ध हुआ है। […]

द्विभाषिकता एवं बहुभाषिकताः संदर्भ एवं प्रकृति – श्वेतांशु शेखर

भाषा का आविष्कार मनुष्य की महानतम उपलब्धियों में से एक है। मनुष्य ने इसके महत्त्व को हजारों-लाखों वर्ष पूर्व पहचान लिया था, इसलिए इसके विकास के लिए प्रयत्नशील रहा। भाषा […]