भारत के विविध भाषा के साहित्य की भांति असमीया साहित्य भी प्राचीन इतिहास से समृद्ध है। असमीया साहित्य की इतिहास रचयिताओं ने इस इतिहास को मूल रूप से प्राचीन युग, मध्ययुग और आधुनिक युग-इन भागो में विभक्त किया है। मध्ययुग की असमीया साहित्य में प्रधान रूप से भक्ति भाव का महत्व रहा हैं। राम और कृष्ण भक्ति को आलम्ब कर साहित्य ने प्रधान रूप से विकास लाभ किया है। इस युग की प्रमुख साहित्यिक व्यक्तित्व के रूप में श्रीमंत शंकरदैव और उनके प्रिय शिष्य माधवदैव के नाम लिए जाते हैं।
इस शोध पत्र में मध्ययुग की असमीया साहित्य में राम सम्बन्धित साहित्य के विषय में चर्चा किया जाएगा। मूल विषय को स्पष्ट करने के लिए सन्दर्भित तथ्यों को विश्लेषणात्मक पद्धति के प्रयोग से अध्ययन किया जाएगा।

बीजशब्द-राम, असमीया साहित्य, मध्ययुग, शंकरदैव, माधवदैव
1.1 प्रारंभ
महाकाव्य रामायण और महाभारत का प्राचीन काल से भारतीय समाज-सभ्यता पर प्रभाव रहा है। यह प्रभाव सामाजिक जीवन के विभिन्न पहलुओं में आसानी से महसूस किया जा सकता है। जाति, विविध आबादी, सामाजिक-सांस्कृतिक, भौगोलिक विविधता के बावजूद, इन दोनों महाकाव्यों का प्रभाव इस मानसिकता के निर्माण में निर्विवाद है कि भारत के सभी लोग खुद को भारतीय समझ सकते हैं। इसकी कहानियों के साथ परिचय और एकजुटता की अवधारणा भारतीय संस्कृति को विविधता के बीच एकता के बंधन के साथ बाँधती है। भारतीय महाकाव्य परंपरा ने असमीया साहित्य को भी भारतीय साहित्य के दायरे मे लाने मे सहायता किया है। असमीया सामाजिक जीवन की स्थिति रामकथा या रामायण के प्रभाव को दर्शाती है। लोक समाज में लोक विश्वास, लोक परंपराओं, लोककथाओं आदि में रामायण के प्रभाव को जीवित रखा गया है। यह प्रभाव मौखिक साहित्य या लोककथाओं के युग से लेकर साहित्य के आधुनिक युग तक देखा जा सकता है। असम के कुछ आदिवासी समाजों में भी रामकथा की अपनी परंपरा रही है। उदाहरण के लिए, कार्बी लोगों के बीच प्रचलित ‘सबिन आलून’ की बात की जा सकती है।
इस शोधपत्र में रामकथा या रामायण आधारित असमीया साहित्य पर चर्चा की गई है।
2.1 रामायण आधारित असमीया साहित्य
असमीया साहित्य को प्राचीन काल से लेकर आज तक संक्षेप में उजागर करने की आवश्यकता है। यह ध्यान दिया जा सकता है कि लोककथाओं के समय से ही असमीया साहित्य में रामायण का प्रभाव देखा जा सकता है। रामायण की कहानी का मौखिक लोककथाओं के विभिन्न रूपों, जैसे लोकगीतों, साधुकथा, डाक के वचन, कहावतों आदि पर प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष प्रभाव रहा है।
मुख्य विषय प्रस्तुत करने से पहले असमीया साहित्य के युग विभाजन पर चर्चा करने की आवश्यकता है। असमीया साहित्य के युग विभाजन को आम तौर पर इस तरह से दिखाया जा सकता है – प्रारंभिक युग, मध्य युग और वर्तमान युग। मध्य युग के असमीया साहित्य को फिर से क) वैष्णव युग और ख) वैष्णव युग से पहले के साहित्य के रूप में विभाजित किया जा सकता है। लगभग इसाई 14 वीं शताब्दी से 18 वीं शताब्दी तक इस अवधि को असमीया साहित्य का मध्य युग कहा जा सकता है।
लिखित असमीया साहित्य में, रामकथा का उल्लेख पहली बार 10 वीं -11 वीं शताब्दी के ‘कालिकापुरण’ में किया गया है। चर्यापद, मंत्रपुस्तिका आदि में रामायण की कहानी या चरित्र के साथ-साथ एक दूर के देश के रूप में लंका का उल्लेख पाया जाना हैं। [शर्मा 1984:250] असमीया साहित्य के मध्ययुग और आधुनिक युग में रामकथा के आधार पर अनेक प्रकार के साहित्य की रचना किया गया है। मध्ययुग में भक्तिसाहित्य का प्रभाव अधिक रहा है। आधुनिक काल के असमीया साहित्य में कहानी, उपन्यास, कविता आदि विविध रूप में रामकथा का विकास हुआ ।
2.2 मध्ययुग की असमीया साहित्य में राम
असमीया साहित्य के पूर्ववैष्णव युग के उल्लेखनीय कवि माधव कंडलीजी ने वाल्मीकि की संस्कृत रामायण का असमीया में अनुवाद किया। यह अनुवाद संपूर्ण उत्तर भारत के आधुनिक भारतीय आर्य भाषा में से पहला है। कंडलीजी की रामायण के कविताओं ने सभी समकालीन व्यक्तियों को प्रभावित किया। इसकी कहानियां बच्चों से लेकर बड़ों तक सभी को आकर्षित करती रही हैं।
माधव कंडली की रामायण असमीया साहित्य का गौरव है। 14 वीं शताब्दी ईस्वी की यह रामायण पूरे उत्तर भारत की सीमांत भाषाओं में अनूदित रामायणों में सबसे पुरानी रामायण है। [शर्मा 1984:251] यह अवधि के रामायण आधारित अन्य कार्यों में, हरिबर विप्रजी का ‘लव-कुश युद्ध’ उल्लेखनीय है। शंकरी युग में लिखी गई रामकथा आधारित कृतियों में माधवदेव की ‘आदिकांद’, शंकरदेव की ‘उत्तरकाण्ड’, ‘रामविजय’ नाट और रामकेंद्रित वरगीत, अनंत कंडली की ‘रामायण’, दुर्गाबर कायस्थ की ‘गीती रामायण’ आदि ‘रामायण’ शामिल हैं।
शंकरोत्तर काल में भी रामकथा पर आधारित अनेक नाटक, काव्य आदि साहित्य लिखे गए हैं। उदाहरणार्थ अनंत ठाकुर का ‘श्रीरामकीर्तन’, लक्ष्मीदेव का ‘रावण वध’, पुर्णकान्त महंत का ‘लंका-दहन’, जयनाथ का ‘सीताहरण बालिवध’ आदि। रघुनाथ महंत की ‘रामायण-कथा’, ‘शत्रुंजय’ और ‘अद्भुत रामायण’, राम सरस्वती की ‘लक्ष्मणर शक्तिशेल’, द्बिज पंचानन की ‘पातालिकांड रामायण’ जैसी काव्यों का उल्लेख किया जा सकता है।
असमीया भाषा में लिखी गई रामकथा की परंपरा को देखने से कुछ विशेषताएं दिखाई देती हैं। जैसे-
1. पूर्ववैश्नव असमीया साहित्य के रामकथा में विशेष रूप से माधव कंडलीजी की रामायण में राम को एक आम आदमी के रूप में प्रस्तुत किया गया है। मुल वाल्मीकि रामायण के विषयों या कथाओं में विशेष रूप से परिस्थिति या घटना के वर्णन में मौलिकता का परिचय दिया है।
2. शंकरी युग की रामकथा में राम को भगवान के अवतार के रूप में प्रस्तुत किया गया है। विशेष रूप से शंकरदेव का उत्तरकांड, माधवदेव का आदिकांड आदि में दोनों भक्त-कवियों ने कंडली की रामायण में ‘भक्ति का रंग चढ़ाया’ है।
3. उत्तर शंकरी युग की रामकथा काल्पनिक कहानियों से भरी हुई है जो मूल रामायण में मौजूद नहीं हैं।
3.0 निष्कर्ष
रामायण की कहानियों ने प्राचीन काल से पूरे भारत के साथ-साथ असमीया समाज को भी प्रभावित किया हैं। रामायण की कहानी, चरित्र आदि को लोककथाओं के विभिन्न गीतों और रूपों के बीच जगह मिली है। ये जनता को ज्ञान और मनोरंजन प्रदान करते रहे हैं। असमीया साहित्य के मध्य युग में, अर्थात भक्ति काल में, कृष्ण और राम दोनों को अभेद माना गया है। भक्त कवियों और लेखकों ने भक्ति के प्रचार और प्रसार के साधन के रूप में साहित्य का निर्माण किया है। इस साहित्य में राम या कृष्ण को मुख्य देवता के रूप में प्रस्तुत किया गया है। रामायण की कथा पर केन्द्रित नाटक, गीत, कविता आदि रचकर जन-जन को आकर्षित करने का प्रयास किया गया है। माधव कंडली, शंकरदेव, माधवदेव आदि भक्त-कवि को इस कार्य में सफलता मिली है।

सहायक ग्रंथ सूची
महंत, केशदा, 2011: असमीया रामायणी साहित्य: कथाबस्तुर आँतिगुरी, वेदकांत, जोरहाट
शर्मा, सत्येन्द्रनाथ, 1984: रामायणर इतिवृत्त, असमिया विभाग, डिब्रूगढ़ विश्वविद्यालय, डिब्रूगढ़
—, 2006: असमीया साहित्यर समीक्षात्मक इतिवृत्त, सौमार प्रकाश, गुवाहाटी, 9 वें संस्करण का पुनर्मुद्रण

 

डॉ. नयनमणि बरुवा
सहकारी अध्यापक, असमीया बिभाग
पूब कामरूप महाविद्यालय
कामरूप, असम