मैं अतीत को जीत,जीत की पहली एक किरण हूँ,

भारत के आते भविष्य का मैं मंगलाचरण हूँ।

बदल रहा यह देश, विश्व को मैंने दिखा दिया है,

मैं भिलाई का नगर कि मैंने जीना सिखा   दिया है। 

 

उपरोक्त पंक्तियां दिवंगत रमाशंकर तिवारी द्वारा रचित हैं। वे भिलाई इस्पात संयंत्र के जनसम्पर्क विभाग में प्रमुख थे। भिलाई इस्पात संयंत्र के शुरूआती दौर में कुछ ऐसे कर्मचारी और अधिकारी यहाँ आये जिन्होंने साहित्य के क्षेत्र में भी यश प्राप्त किया। दानेश्वर शर्मा,रविशंकर शुक्ल, रमाशंकर तिवारी,मोहन भारती और केशव पाण्डे जैसे कवि चढ़ती जवानी के दिनोंं में यहाँ आये और आगे चलकर वे अपने अपने क्षेत्रों के दिग्गज कहलाये। केशव पाण्डे जनवादी लेखक संघ दुर्ग जिला के अध्यक्ष बने। दानेश्वर शर्मा लिटररी क्लब के अध्यक्ष बने और मोहन भारतीय ने प्रतिष्ठित जैनी पत्रिका का एक दशक तक संपादन किया।

प्रसिद्ध पत्रकार और सेंट थॉमस कालेज भिलाई के पत्रकारिता विभाग में शिक्षाविद् मुहम्मद जाकिर हुसैन द्वारा लिखित पुस्तक ‘वोल्गा से शिवनाथ तक’ में भिलाई नगर की वंदना का रमाशंकर तिवारी लिखित यह गीत महत्व के साथ प्रकाशित है। जाकिर छत्तीसगढ़ के जिम्मेदार और प्रतिष्ठित युवा पत्रकार हैं। नई पीढ़ी के जिन पत्रकारों ने अपना विशिष्ट स्थान बनाया जाकिर उनमें से एक प्रमुख नाम है।

वे अपने दायित्वों को निबाहते हुए पुस्तक लेखन भी करते हैं। अब तक उनकी तीन पुस्तकें प्रकाशित हो चुकी हैं। ‘वोल्गा से शिवनाथ तक’ उनकी तीसरी पुस्तक है। निश्चित रूप से शीर्षक राहुल सांकृत्यायन की किताब ‘वोल्गा से गंगा’ की तर्ज पर है लेकिन ‘वोल्गा से शिवनाथ तक’ इस शीर्षक में ही पूरी किताब की आंतरिक सामग्री के सम्बन्ध में लेखक ने अपना उद्देश्य स्पष्ट कर दिया है। पुस्तक लेखन में सदैव शीर्षक चयन का विशेष महत्व होता है। विशेषकर किसी विशेष संदर्भ को केन्द्र में रखकर लिखी गई किताब में तो शीर्षक का चयन पाठक को जुडऩे का आमंत्रण ही देती है।

वोल्गा रूस की नदी है और शिवनाथ छत्तीसगढ़ के दुर्ग नगर के पास बहने वाली नदी है। शिवनाथ नदी से जुड़ा है दुर्ग शहर जिसके पास ही भिलाई नाम से नया नगर आबाद हुआ। रूसी भाषा में दोस्ती को द्रुगे कहा जाता है। आश्चर्य तथ्य यह है कि छत्तीसगढ़ी में भी इसे दु्रग या दुरूग ही कहते हैं। छत्तीसगढ़ी और रूसी की दोस्ती भी दु्रगे शब्द में निहित है। भारत और रूस ने मिलकर भिलाई इस्पात संयंत्र को खड़ा किया। यह द्रुगे अर्थात दोस्ती की मिसाल भी है। जवाहर लाल नेहरू ने इस तरह के नए उद्योग नगरी को भारत का नया तीर्थ कहा। विनोबा भावे ने भिलाई कारखाने को भलाई कारखाना कहा। जाकिर इससे पहले ‘भिलाई एक मिसाल’ और इस्पात नगरी के प्रसिद्ध रंगकर्मी सुब्रत बसु पर ‘फौलादी रंगकर्मी सुब्रत बसु’ पुस्तक भी लिख चुके हैं। जाकिर हिन्दी और उर्दू के अच्छे जानकार हैं। उनके पास आमफहम सर चढ़कर बोलने वाली भाषा है।

वे कल्याण महाविद्यालय के छात्र हैं। उन्होंने इतिहास में एमए किया है। वे बाकायदा पत्रकारिता में डिग्री के साथ सक्रिय हैं। अपनी अब तक की दो दशक की पत्रकारिता में उन्हें दैनिक भास्कर, दैनिक जागरण, सांध्य दैनिक छत्तीसगढ़ और हरिभूमि में कार्य का अनुभव है। ‘हरिभूमि’ में ही लगातार पन्द्रह दिनों तक उनका कॉलम ‘वोल्गा से शिवनाथ तक’ शीर्षक से प्रकाशित हुआ। जिसमें प्रकाशित सभी साक्षात्कार रूसी दम्पत्तियों के थे जो भिलाई में ही बस गए हैं।

यह भी सुखद संयोग रहा कि ‘हरिभूमि’ ने 17 साल पहले इस कॉलम को ससम्मान प्रकाशित किया था और जब किताब की बारी आई तो ‘हरिभूमि’ के यशस्वी प्रबंध संपादक डॉ. हिमांशु द्विवेदी ने इसकी भूमिका लिखकर जाकिर के लेखनकर्म को यथोचित सम्मान दिया।

पुस्तक में पहला लेख है ‘ऐसे साकार हुआ भिलाई’। इस प्रथम लेख में जाकिर ने 1955 से लेकर 1961 तक के संघर्ष भरे दिनों का खाका खींचा है। इसमें 1932 में आये इस सिलसिले के महत्वपूर्ण प्रस्ताव का जिक्र भी है। किस तरह 1945 में आयरन एण्ड स्टील पैनल बना, भिलाई कारखाने के लिए भूमि अधिग्रहण कब से हुआ और पंचवर्षीय योजना में भारत सरकार ने किस तरह 1952 में देश में इस्पात की खपत की दिशा में ठोस चिंतन किया। फिर सोवियत संघ से संबंध बने, धीरे-धीरे भिलाई के सामने आ रही अड़चने हटीं। 1953 में पंडित रविशंकर शुक्ल ने ऐलान कर दिया था कि वे भिलाई के पक्ष में केंद्र्र सरकार के सामने दृढ़ता से बात रखेंगे।

10 सितम्बर 1954 की बैठक में सोवियत संघ से सहयोग लेने का प्रस्ताव पारित हुआ। 2 फरवरी 1955 को 10 लाख टन हाट मेटल सालाना उत्पादित करने हेतु संयंत्र लगाने हेतु सोवियत संघ और भारत के बीच समझौता हुआ। धीरे-धीरे लाल मिट्टी, डासा कन्हार वाली धरती जिसे धान का कटोरा कहा जाता है वहाँ भिलाई इस्पात संयंत्र आकार लेने लगा। रूस ठंडा मुल्क हैं और वहाँ से विशेषज्ञ भिलाई आये जो बरसात और गर्मी के मौसम में खूब अपना रंग दिखाता है। यहाँ खूब बारिश भी होती है और गर्मी भी अधिक पड़ती है। रूसी विशेषज्ञ ठंडे माहौल में रहने के आदी थे। उन्हें मौसम, भाषा, भोजन और अन्य परिस्थितियों से समझौता करना पड़ा। लेकिन एक बड़े उद्देश्य के लिए समर्पित इस्पात सेनानियों ने यहाँ धीरे-धीरे उत्साह का वातावरण बना दिया।

‘द्रुगे’ अर्थात दोस्ती ने विशाल कारखाने को बहुत कम समय में खड़ा कर दिया। मैत्री बाग भिलाई नगर में इसी दोस्ती को महत्व देते हुए बनाया गया। जहाँ संस्थापकों की प्रतिमा भी लगाई गई है। 1 जुलाई 1956 को मुख्यमंत्री रविशंकर शुक्ल भिलाई आए। उसके बाद देश के मूर्धन्य नेतागण लगातार भिलाई आये। जवाहर लाल नेहरू, डॉ. राजेन्द्र प्रसाद, विनोबा भावे से लेकर नेहरू जी के साथ छुटपन में भिलाई आये राजीव गांधी बाद में प्रधानमंत्री के रूप में भी भिलाई आये।

शुरूआती दौर की हर परिस्थिति पर जाकिर ने इस पुस्तक में लेखन करने का प्रशंसनीय प्रयास किया है। शुरू में भोजन और निवास के लिए यहाँ सुविधा नहीं थी। ऐसे दौर में पुरोहित होटल ने यहाँ सबसे पहले इस दिशा में काम किया। सेक्टर-1 में और कैम्प-1 में पुरोहित होटल स्थापित कर सेवा का कीर्तिमान रचा गया। तब बड़े-बड़े ठेकेदार पुरोहित होटल (लॉज) में ही ठहरते थे। लक्ष्मीनिवास मित्तल जैसे स्टील किंग शुरूआती दिनों मेें अपने पिता के साथ यहीं ठहरे। बीके, बी.ई.सी, सिम्पलेक्स के रूप में बाद में फैक्ट्री लगाने वाले लोग तब ठेका लेने के लिए आते थे और पुरोहित लॉज में ही आसरा पाते थे।

धीरे-धीरे सेक्टर-1 बना फिर अन्य सेक्टर बने। भिलाई नगर का पहली सिनेमा चित्रमंदिर सिविक सेंटर में तैयार किया गया। नेहरू सांस्कृतिक सदन बना। मड़ोदा टैंक ने भी आकार लेना शुरू किया। नेहरू चिकित्सालय ने यहाँ अपार यश अर्जित किया। इसी कारखानें से जुड़ी हैं पद्म विभूषण तीजन बाई। जाकिर ने इन सबको अपनी किताब में यथोचित महत्व दिया है।

अलेक्सेई निकोलाई कोसिजिन सोवियत संघ के मंत्री परिषद के उपाध्यक्ष के हाथों 1961 में भारत रूस मैत्री के प्रतीक स्तम्भ (ओबेलिस्क) की आधार शिला रखी गई। इसी प्रतीक स्तम्भ में एक तरफ जवाहरलाल नेहरू की पंक्ति अंकित हैं कि-‘भिलाई भारत के भविष्य का शुभ शगुन एवं प्रतीक हैं।’ दूसरी तरफ  तत्कालीन रूसी प्रधानमंत्री खुश्चेव की पंक्ति है कि-‘भारत-रूस की मैत्री भिलाई इस्पात संयंत्र की तरह मजबूत हो’।

भिलाई इस्पात संयत्र की गतिविधियों एवं उपलब्धियों की ज्यादातर शानदार फोटोग्राफी हरीश जाधव जी द्वारा की गई है। जाकिर ने अपनी किताब में ‘टाइम कैप्स्यूल’ का भी जिक्र किया है, जो 25 दिसम्बर 1965 को ब्लास्ट फर्नेस-4 की नींव में डाला गया।

इस पुस्तक से गुजरते हुए मुझे एक शख्स के द्वारा रचित कीतिर्मानों को पढ़कर सुखद आश्चर्य हुआ। विजय सिंह पाराशर तत्कालीन सुपरिन्टेण्डेण्ट ब्लास्ट फर्नेस भिलाई इस्पात संयंत्र ने भी अपना अनुभव साझा किया है। वे नेहरू नगर में रहते हैं। पाराशर मेरी बहू के दादा जी हैं। मैं उन्हें विभिन्न पारिवारिक समारोहों में उनकी अग्रगामी भूमिका के कारण ही जानता और सम्मान देता था। इस पुस्तक से यह जानकारी मिली कि भिलाई इस्पात संयंत्र में काबिल इंजीनियर के रूप में उन्होंने महत्वपूर्ण सेवायें दी हैं। पुस्तक में 121वें पृष्ठ में उनके योगदान का विशेष जिक्र जाकिर ने किया है।

पुस्तक में जाकिर ने सभी प्रबंध निदेशक, रूसी प्रमुखों के साथ विशेषज्ञों को याद किया है। इस पुस्तक में जनरल मैनेजर जी. जगतपति के नाम प्रधानमंत्री इन्दिरा गांधी के पत्र को भी प्रकाशित किया गया है, जो एक विशेष पत्र है। यह पत्र बताता है कि देश के विकास के लिए चिंतित रहने वाले बड़े लोग किस तरह चौकन्ने होकर हर उपलब्धि का ध्यान रखकर उससे सम्बन्धित लोगों की हौसला अफजाई करते थे। शिवराज जैन राजनांदगांव में जन्मे,पढ़े-लिखे पहले छत्तीसगढिय़ा इन्जीनियर थे जो बाद में प्रबंध निदेशक और फिर सेल के अध्यक्ष भी बने। चर्चित जनरल सुपरिन्टेण्डेंट कुलवंत सिंह नागी का भी इस पुस्तक में जिक्र है जिन्होंने एक विशेष अवसर पर शिवराज जैन तथा रशियन विशेषज्ञ  मिखाइलोविच को पंजाब की परंपरागत पगड़ी पहनाकर सम्मान दिया था।

भारत और रूस के बीच राजनायिक सम्बन्धों के 70 वर्षीय इतिहास को महत्व देते हुए भिलाई से इंडिया-रशिया फ्रैंडशिप मोटर रैली 20 फरवरी 18 को निकाली गई। भिलाई में रूसी महिलाओं ने अपने लिए जीवन साथी चुना। उनके सुखद दाम्पत्य जीवन के ब्यौरे को भी बहुत आत्मीयता के साथ इस ग्रंथ में संग्रहित किया गया है।

रूस में नेहरू, लता और राजकपूर खूब प्रसिद्ध रहे हैं। जाकिर ने रूसी लोगोंं के साक्षात्कारों के माध्यम से इस सन्दर्भ में रोचक जानकारियाँ दी हैं। इस ग्रंथ में एक मार्मिक कहानी प्रदीप पुरतेज सिंह की है। वे भिलाई इस्पात संयंत्र में जन सम्पर्क विभाग में उपप्रमुख थे। उनका प्रेम रूसी महिला से था। उन्होंने रूसी महिला के माता-पिता को राजी करने का प्रयत्न भी किया लेकिन विकलांग पुरतेज सिंह को देखकर वे लोग राजी नहीं हुए। इस तरह तान्या त्सालगावा एवं प्रदीप सिंह की प्रेमकथा का दुखद अंत हुआ। रूसी भाषा के जानकार दुभाषिए विष्णु प्रभाकर तोपखानेवाले का किस्सा भी कम रोचक नहीं है। वे रूसी भाषा में प्रवीण थे। रूसियों ने उन्हें खूब सम्मान एवं अपनत्व दिया।

‘वोल्गा से शिवनाथ तक’ एक ऐसी किताब है जिसमें एक कारखाने के जन्म की कहानी है। उसका बचपन और उसकी जवानी के किस्से भी इस कृति में है। छत्तीसगढ़ प्रान्त की आंतरिक विशेषता, यहाँ के लोगों की सहजता, देश भर से आये श्रमिकों से जुड़े उनके प्रान्तोंं की तस्वीरें किताब के हर्फ-हर्फ में है। भिलाई नगर में विभिन्न प्रान्तों से आये समुदायों ने अपना भवन बनाया। पूरा देश यहाँ अपनी विशेषताओं केसाथ मिल जाता है।

भिलाई इस्पात संयंत्र के हर अगुवा ने कुछ नया करने का प्रयास किया। छत्तीसगढ़ के उदार मुख्यमंत्री भूपेश बघेल ने उत्तर प्रदेश, बिहार के छठ पर्व पर छुट्टी देकर छत्तीसगढ़ की उदारता का प्रमाण प्रस्तुत कर दिया है। विभिन्न प्रान्तों से भिलाई आये कमर्चारियों, व्यवसायियों तथा उनके बच्चों ने विभिन्न क्षेत्रों में कीर्तिमान रचकर सबको प्रेरित किया है। यह पुस्तक संतुलित विचार और समग्र जानकारी, प्रमाणित आंकड़ों एवं ऐतिहासिक महत्व की घटनाओं के आलेखन के कारण बेहद महत्वपूर्ण बन पड़ी है। कल्पना के बदले यथार्थ और सुनी सुनाई बातों के बदले प्रामाणिक इतिहास को आधार बनाकर लेखक जाकिर ने ऐसी किताब को आकार दिया है जो उसे भिलाई और देश से प्रेम करने वाले पाठक के लिए इसे बेहद उपयोगी किताब बनाती है। ‘वोल्गा से शिवनाथ तक’ पठनीय और संग्रहणीय पुस्तक हैं।

 

डॉ. परदेशी राम वर्मा

 

 

 

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