समय की मांग कहो या संस्कृति का स्वाभिमान वह अब लौट रहा है। भारत अब लौट रहा है । वह स्वयभू होने को है। हाँ, हाँ! वह स्वयंभू पहले से ही था और हमेशा रहेगा चाहे ,मनुष्य की मनुष्यता रहे ना रहे मनुष्य को मनुष्य बनाया ही स्वयंभू भारतवर्ष ने है। कल जब तुम न थे तुम्हारी सभ्यता न थी वह तब भी था आगे भी रहेगा। यौवन की जिस मदहोशी को तुम संभाल नहीं पाते और वृद्ध हो जाते हो हर जन्म में तुमने यह यौवन चिर स्वयंभू युवा भारतवर्ष से ही प्राप्त किया है ,कभी बूढे न होनेवाले भारतवर्ष की पहचान तुम.. तुम..और तुम कभी न थे  यह स्वयं ही अपनी पहचान लिए हुए है इसका कण-कण स्वयंभू, स्वाभिमानी, परोपकारी, श्रद्धालु, अतिथि सत्कार की गवाही देता है। जाओ गिरी कंदराओं से जाकर पूंछो प्राचीन बरगद से पूछो नदियों, पवनों से पूछो जो स्वयंभू भारतवर्ष के अलौकिक गीत गा रही हैं । जिनका पोषण पाकर तुम जिंदा हो, क्या तुम..तुम जिंदा हो!
शायद तुम.. तुम और तुम भी जिंदा हो याद है तुम्हारा वह अपनापन जिसे तुम गले लगाए फिरते हो बीतीं सदियों में तुमने उसे इसलिए गले लगाया क्योंकि वह तुम्हारे गले पड़ गया था । पर अब शायद इसलिए गले लगाए हो क्योंकि अब वह तुम्हारी आदत बन चुका है गले का वह फंदा जान छुड़ाने के लिए तुम उसे टाई कहने लगे हो उनके लिए वह आज भी नाक साफ करने वाला कपड़ा ही है। जिनका कोई अस्तित्व नहीं उन्होंने तुम्हें सपेरों का देश कहा और तुम मान गए। ब्लैक इंडियन कहा तुमने स्वीकार लिया  हिंदु  कहा तुमने अपना लिया और स्वयंभू भारतवर्ष को त्यागते चले गए तब क्यो न तुमसे।तुम्हारी पहचान कराई जाए बताओ तुम कौन हो ?
वही न जिसे अपनी मातृभाषा को अपनाने में शर्म आती है ,असहनशीलता ,असभ्यता, अनपढ़, की झलक दिखाई देती है दूसरो के तये पर अपनी रोटी सेंकने वालों का साथ आज तुम्हे इतना भाता है जरा ढूंढकर बताओ तो कौन सी देशी सभ्यता है जो अपनी मातृभाषा में खुद को आर्थिक,सामाजिक,सांस्कृतिक इत्यादि रूप से सुदृढ़,सुसंस्कृत नहीं पाती। जिस भाषा में विचारों के पोषण के लिए पर्याप्त शब्द नहीं। जिन्होंने अपनी तकनीक (कंप्यूटर)का निर्माण ही उधार की भाषा (संस्कृत) से किया है। जो तुम्हारे ही ग्रंथ को हाथ में लेकर तुम्हे ही गीता का ज्ञान सिखा रहे हैं । तुम्हें अंधविश्वासी कहकर चुड़लो का डर दिखा रहे हैं ।उनकी अंग्रेजी को जबतक तुम सीख व ग्रहण नहीं कर लेते तब तक खुद को शिक्षित नहीं मान पाते हो।
जरा ढूंढकर बताओ उनके देश में क्या सभी अंग्रेजी के श्रेष्ठ जानकार शिक्षित भी कहलाते हैं या अंग्रेजी भाषा का सर्वोत्तम ज्ञान होने के बाद भी स्वयं को शिक्षित करने के लिए वो स्वयंभू भारतवर्ष  चले आते हैं। जरा गौर से देखो उन तुम्हारे सभ्यत लोगों को कीड़े-मकोड़े, जानवर खाने वाले, उनकी डिश बनाकर खाने बेचने वाले लोगों को, अगर वे ही सभ्य हैं तो मुर्दे को दबाने वाले उसे जला क्यों रहे हैं। हाथ मिलाकर गले मिलने वाले लोग सार्वजनिक चुंबनकर लैंगिक समानता का ढोंग भरने वाले लोग हाथ जोड़कर नमस्कार क्यों कर रहे हैं। अगर तुम और तुम्हारी भाषा ही गलत व असभ्यत हो तो वो अपने बच्चों को अनिवार्य रूप से संस्कृत क्यों सिखा रहे हैं। नासा के वैज्ञानिक वैदिक संस्कृत को सर्वश्रेष्ठ, रोग-प्रतिकारक क्षमता बढ़ाने वाली भाषिकौषधि क्यो सिद्ध कर रहे हैं भजन, भोजन, अध्ययन  एकांत में करने वाले लोगों की संस्कृति उन्हें इतनी भा क्यों रही है क्योंकि वास्तविकता में तुम ही, तुम ही सभ्य हो, सुसंस्कृत हो,सुभाषी हो। फिर क्यों खुद को अधूरा मान बैठे हो। क्यों स्वतंत्र होकर भी खुद को दबा कुचला पाते हो।
खुद को पिछड़ा समझने वाले तुम..तुम.. और तुम ! शुरू से ही अग्रणी सभ्य रहे हो तुम्हारे इस एकाकी जीवन का कारण तुम स्वयं हो क्योंकि अपनी गलतियों पर पर्दा डालने का मानवीय गुण तुम में शुरू से है आश्चर्य यह है। कि यह गुण भी तुम्हारी संस्कृति की उपज नहीं बल्कि पश्चिम से इसे भी तुमने उधार लिया है। इसलिए तुम गर्व कर सकते हो कि तुम्हारी बौद्धिक भूमि बंजर कभी नहीं रही। तुम्हारे मस्तिष्क की उपजाऊ फसल साक्षी है। कि तुम गुलाम होने योग्य शुरू से ही नहीं हो और तुम्हें इस पर गर्व करने का अधिकार है फिर भी, तुम गुलाम हुए अनेकों सभ्यताओं की मार झेलकर तुमने अपनी सभ्यता को मस्तिष्क के ऊपर उपजाऊ बनाए रखा इसलिए स्वयं पर स्वयंभू भारत वर्ष पर गर्व करते रहो ।
जीवन की उच्छृंखलताओं से जूझते हुए तुम्हें..तुम्हें और तुम्हे यह समझना ही होगा की अतीत की दासता का असर अभी तक क्यों जिंदा है क्या वजह है तुम… तुम…और तुम जाति, धर्म, भाषा, सभ्यता, संस्कृती के हरे भरे बगीचे को व्यापार, बाजार, राजनीति का रूप दे बैठे हो। क्योंकि अब तुम से ही उन्होंने दूर बैठकर तुम्हारे मस्तिष्क से खेल खेलना सीख लिया है। आज भी तुम उन व्यापारियों के गुलाम हो तभी दुनिया का व्यापार संभालनेवाले तुम अपनी अर्थव्यवस्था को डूबने दे रहे हो। कठपुतली के खेल की यह समझ उनमें तुम से ही विकसित हुई है। इसलिए तुम गर्व कर सकते हो स्वयंपर। बाजारवाद की यह गुलामी तुमने स्वतः ही अपनाई है। इस तंत्रजाल को तुम्हें ही तोड़ना होगा और यह तभी संभव है जब तुम्हारे अतीत का सुख तुम्हें आलसी न बनने दे और दुख तुम्हें कायरता के गर्त में डूबने से बचाए तथापि तुम्हें अपनी सभ्यता, संस्कृती, मातृभाषा रूपी पोषक तत्वों की आवश्यकता और अधिक है। ये है इसलिए तुम हो अन्यथा पशु से ज्यादा तुम कुछ भी नहीं।
नेत्र खोलो प्रवाहित जल की शीतलता को हाथ फैलाकर दृढ़ मेरुदंड के भरोसे छोड़ पवन के पवित्र स्पर्श को महसूस करोगे तो पाओगे कि अब तक तुम्हारे। साथ जो हुआ वह तुम्हारी मूर्खता से ही संभव था, अब जो तुम कर रहे हो…
फिर भी कहना न होगा भारतवर्ष लौट रहा है लोग कह रहे हैं हवा बदल रही है, पानी बदल रहा है, दशा बदल रही है और ध्यान से देखोगे तो पाओगे दिशा भी बदल रहीं हैं…

 

संदीप वशिष्ठ

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