भूमिका भारतीय संस्कृति विश्व की प्राचीनतम और समृद्ध संस्कृतियों में से एक मानी जाती है। इसकी विशेषता इसकी विविधता, सहिष्णुता, आध्यात्मिकता और समन्वय की भावना में निहित है। भारत […]
राजस्थान के प्रतिबंधित गीतों और कविताओं में लोक प्रतिरोध का स्वर – रामप्यारी
साहित्य और सत्ता के संबंध सदैव जटिल रहे हैं। जब भी साहित्य ने अन्यायपूर्ण सत्ता या दमनकारी व्यवस्थाओं के विरुद्ध स्वर उठाया, तब-तब उसे प्रतिबंधों का सामना करना पड़ा। प्रतिबंधित […]
संत मलूकदास के काव्य में लोक संस्कृति और लोक भाषा – रीना आर्य
संत मलूकदास भक्तिकाल के संत परंपरा के प्रमुख कवि हैं। उनके काव्य में नैतिकता, भक्ति, सामाजिक चेतना और लोक जीवन का गहरा संबंध दृष्टिगोचर होता है। प्रस्तुत शोध आलेख के […]
आधुनिक हिंदी उपन्यासों में चित्रित प्रेम के विविध रूप – सजनी एंथोनी
प्रस्तावना आधुनिक उपन्यासों में प्रेम के विविध रूपों का चित्रण हुआ है। हर उपन्यास प्रेम की एक नई कहानी कहता है।असल जिंदगी में सच्चे प्रेम को पाना जितना मुश्किल […]
लोकगीतों का भाव-कला तत्त्व और तीसरी कसम के गीतों का दृश्य विधान – सिमरन सिंह
लोक शब्द की उत्पत्ति और अर्थ: लोक शब्द संस्कृत के ‘लोक’ धातु में ‘घञ्’ प्रत्यय लगाकर बना है, जिसका अर्थ है – देखने वाला। ‘लोक’ शब्द को सामान्यतः उस समुदाय […]
वैश्वीकरण के दौर में भारतीय लोक संस्कृति – प्रिंस गुप्ता
वैश्वीकरण (ग्लोबलाइज़ेशन/भूमंडलीकरण) एक ऐसा व्यापक सामाजिक-आर्थिक-सांस्कृतिक प्रक्रिया है, जिसके कारण दुनिया के देशों, अर्थव्यवस्थाओं, इंसानों और संस्कृतियों के बीच संपर्क अधिक तीव्र और व्यापक हुआ है। इसके परिणामस्वरूप वस्तुओं, सेवाओं, […]
बंजारा बोली की सत्ता और महत्ता – प्रा. सूर्यकांत रामचंद्र चव्हाण
सदियों से जीवन परिचालन करनेवाले बंजारा समाज को विभिन्न ऐतिहासिक कालखंडों में अनेक रियासतों के अधिनस्त अपना जीवनयापन करना पड़ा है। अर्थात उन सभी का प्रभाव बंजारा समाज, संस्कृति और […]
लोक साहित्य में स्त्री संघर्ष: एक मूल्यांकन – भारती जैन
लोक साहित्य किसी भी समाज की सांस्कृतिक चेतना का जीवंत और उर्जावान दर्पण होता है। यह वह साहित्य है जो लोक-मानस की सहज अभिव्यक्ति है और मौखिक परंपरा के माध्यम […]
लोकसाहित्य एवं लोककलाएँ: एक अकादमिक अध्ययन – डॉ. अनिताबहन मंगलदास राठवा
भारतीय संस्कृति अत्यंत समृद्ध और बहुआयामी है। इस संस्कृति की जड़ें लोकजीवन में गहराई तक फैली हुई हैं। लोकसाहित्य और लोककलाएँ इसी लोकजीवन की सजीव अभिव्यक्ति हैं। ये समाज की […]
लोकसाहित्य में अभिव्यक्त पर्यावरण चेतना – प्रा.डॉ.सादिकअली हबीबसाब शेख
प्राचीन काल से ही नहीं बल्कि युगो-युगो से लोकसाहित्य् और पर्यावरण का गहरा संबंध रहा है, और यह एक दूसरे के पूरक है। इन दोनों का संबंध सदियों से स्थापित […]





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