लोकसाहित्य एवं लोककलाएँ: एक अकादमिक अध्ययन – डॉ. अनिताबहन मंगलदास राठवा

भारतीय संस्कृति अत्यंत समृद्ध और बहुआयामी है। इस संस्कृति की जड़ें लोकजीवन में गहराई तक फैली हुई हैं। लोकसाहित्य और लोककलाएँ इसी लोकजीवन की सजीव अभिव्यक्ति हैं। ये समाज की […]

लोकसाहित्य में अभिव्यक्त पर्यावरण चेतना – प्रा.डॉ.सादिकअली हबीबसाब शेख

प्राचीन काल से ही नहीं बल्कि युगो-युगो से लोकसाहित्य् और पर्यावरण का गहरा संबंध रहा है, और यह एक दूसरे के पूरक है। इन दोनों का संबंध सदियों से स्थापित […]

पर्यावरणीय चेतना और लोकसाहित्य – प्रा. मानखेडकर बी एस

पर्यावरणीय चेतना और लोकसाहित्य पर्यावरण शब्द अंग्रेजी के ‘Environment’ शब्द का हिंदी अनुवाद है, जिसका अर्थ है ‘चारों ओर से घेरना’। इसमें प्रकुर्ति के समस्त तत्व या घटक मिलकर पर्यावरण […]

लोक साहित्य एवं लोक कलाएँ – डॉ. शिल्पा कामलिया

प्रस्तावना भारतीय संस्कृति की व्यापकता और बहुरंगी स्वरूप का मूल स्रोत लोकजीवन में निहित है। भारत की सभ्यता केवल राजकीय इतिहास, शास्त्रीय ग्रंथों और अभिजात साहित्य तक सीमित नहीं रही, […]

लोक संस्कृति में भारतीय आत्मा – डॉ. दीपा कुमारी

किसी क्षेत्र या प्रदेश विशेष में रहने वाले लोगों के रीति-रिवाज, रहन-सहन, वेशभूषा, खानपान, धर्म, त्योहार, कला-कौशल आदि को उस प्रदेश के लोक संस्कृति के नाम से अभिहित किया जाता […]

कन्नड लोकसाहित्य में अभिव्यक्त पर्यावरण चेतना – डॉ. शिवानंद एच कोली

प्रस्तावना: लोकसाहित्य किसी भी समाज की सामूहिक स्मृति, सांस्कृतिक चेतना और जीवन-दर्शन का संवाहक होता है। कन्नड लोकसाहित्य—जिसे “ಜನಪದ ಸಾಹಿತ್ಯ” कहा जाता है—कर्नाटक के ग्रामीण, आदिवासी तथा पारंपरिक समुदायों के […]

लोक साहित्य में स्त्री संघर्ष: परंपरा, प्रतिरोध और अस्मिता – डॉ. अनुपमा

प्रस्तावना: लोक साहित्य किसी भी समाज की सामूहिक चेतना, सांस्कृतिक स्मृति और ऐतिहासिक अनुभवों का जीवंत दस्तावेज़ होता है| लोक साहित्य का सृजन किसी एक व्यक्ति का न होकर पूरे […]

वैश्वीकरण के दौर में भारतीय लोक संस्कृति : चुनौतियाँ, संभावनाएँ और संरक्षण की दिशा – डॉ. विक्रमसिंह पवार

वैश्वीकरण (Globalization) एक ऐसी प्रक्रिया है जिसके माध्यम से विश्व के विभिन्न राष्ट्र आर्थिक, सांस्कृतिक, सामाजिक और तकनीकी स्तर पर एक-दूसरे से जुड़े हैं। 20वीं सदी के उत्तरार्ध में सूचना […]

ग्रामीण जीवन शैली में कहावतें: एक समाजशास्त्रीय एवं सांस्कृतिक अध्ययन – सुरेन्द्र सिंह

भारत की सामाजिक संरचना का मूल आधार ग्रामीण जीवन रहा है। यद्यपि तीव्र शहरीकरण और औद्योगीकरण ने सामाजिक परिदृश्य में परिवर्तन लाया है, तथापि आज भी देश की बड़ी आबादी […]

राजस्थानी लोककथाओं में वीरता और नैतिक मूल्यों की अभिव्यक्ति – डॉ. रेणुका

भूमिका राजस्थान की भूमि शौर्यगाथाओं और लोकदेवताओं की कथाओं के लिए प्रसिद्ध है। यहाँ का लोकसाहित्य पीढ़ी-दर-पीढ़ी मौखिक परंपरा में संरक्षित रहा है। कोमल कोठारी के अनुसार, “लोकसाहित्य किसी समाज […]