प्रस्तावना
भारतीय संस्कृति की व्यापकता और बहुरंगी स्वरूप का मूल स्रोत लोकजीवन में निहित है। भारत की सभ्यता केवल राजकीय इतिहास, शास्त्रीय ग्रंथों और अभिजात साहित्य तक सीमित नहीं रही, बल्कि उसका वास्तविक, जीवंत और स्पंदित रूप गाँवों, जनजातीय अंचलों, खेत-खलिहानों, पर्व-त्योहारों और सामुदायिक परंपराओं में दिखाई देता है। इसी लोकजीवन की सहज, स्वाभाविक और सामूहिक अभिव्यक्ति को हम लोक साहित्य और लोक कलाओं के रूप में पहचानते हैं।”लोक साहित्य की परम्परा उतनी ही प्राचीन है, जितनी मानव जाति । भाषा का उद्गम ही संगीतात्मक था । अतः बाद में धीरे-धीरे गद्य भाषा और संगीत विकसित हुये । परन्तु लोकगीतों, लोककथाओं तथा लोकोक्तियों आदि की परम्परा सनातन से मौखिक रही है।”1
लोक साहित्य और लोक कलाएँ किसी भी राष्ट्र की सांस्कृतिक आत्मा होती हैं। वे केवल मनोरंजन का माध्यम नहीं, बल्कि समाज की सामूहिक चेतना, ऐतिहासिक स्मृति, नैतिक मूल्यों, आस्थाओं और संघर्षों का जीवंत दस्तावेज हैं। ये उस समाज का अनलिखा इतिहास हैं, जो पीढ़ी-दर-पीढ़ी मौखिक परंपरा के माध्यम से संप्रेषित होता आया है।
आज वैश्वीकरण, तकनीकी प्रगति और बदलती जीवन-शैली के कारण लोक परंपराओं पर अनेक प्रकार के संकट मंडरा रहे हैं। ऐसे समय में लोक साहित्य और लोक कलाओं का अध्ययन, संरक्षण और पुनर्स्थापन अत्यंत आवश्यक हो जाता है। प्रस्तुत लेख में लोक साहित्य और लोक कलाओं की संकल्पना, ऐतिहासिक विकास, प्रकार, विशेषताएँ, सामाजिक-सांस्कृतिक महत्व, समकालीन चुनौतियाँ तथा संरक्षण के उपायों का विस्तृत विवेचन किया जा रहा है।
- लोक साहित्य : अर्थ, परिभाषा और स्वरूप
‘लोक’ का आशय उस जनसमुदाय से है जो परंपरागत जीवन मूल्यों, रीति-रिवाजों और सांस्कृतिक मान्यताओं से जुड़ा होता है। ‘साहित्य’ का तात्पर्य है—मानव अनुभवों और भावनाओं की शब्दात्मक अभिव्यक्ति। इस प्रकार लोक साहित्य वह साहित्य है जो जनसामान्य के जीवन से उत्पन्न होकर लोकभाषा, लोकशैली और सामूहिक चेतना में व्यक्त होता है।
लोक साहित्य मुख्यतः मौखिक परंपरा पर आधारित होता है। इसका रचनाकार कोई एक व्यक्ति नहीं, बल्कि संपूर्ण समुदाय होता है। समय के साथ इसमें परिवर्तन और परिष्कार होता रहता है।
आचार्य हजारीप्रसाद द्विवेदी ने लोक साहित्य को “जनता के हृदय की सहज अभिव्यक्ति” कहा है। डॉ.हजारीप्रसाद द्विवेदी ने “लोक के सम्बन्ध में अपने विचार प्रक्ट करते हुए लिखा है कि ‘लोक’ शब्द का अर्थ ‘जानपद’ या ‘ग्राम्य’ नहीं है बल्कि नगरों और गाँवों में फैली हुई वह समूची जनता है जिनके व्यवहारिक ज्ञान का आधार पोथियाँ नहीं हैं। ये लोग नगर में परिष्कृत, रुचिसम्पन्न तथा सुसंस्कृत समझे जाने वाले लोगों की अपेक्षा अधिक सरल और अकृत्रिम जीबन के अभ्यस्त होते हैं और परिष्कृत रुचि वाले लोगों को समूची विलासिता और सुकुमारिता को जीवित रखने के लिये जो भी वस्तुएँ अय-व्यक होती है उनको उत्पन्न करते हैं।”2
लोक साहित्य की प्रमुख विशेषताएँ हैं—
मौखिक परंपरा
सामूहिक सृजन
सरल एवं लोकभाषा का प्रयोग
सांस्कृतिक प्रतिबिंब
परिवर्तनशीलता
संगीतात्मकता
- लोक साहित्य का ऐतिहासिक विकास
लोक साहित्य की जड़ें अत्यंत प्राचीन हैं। वैदिक युग में ऋग्वेद के सूक्तों में लोकधुनों और सामूहिक गायन के संकेत मिलते हैं। रामायण और महाभारत में अनेक कथाएँ लोक परंपराओं से ग्रहण की गई हैं। डॉ. नगेन्द्र के शब्दों में “गीत एक विधा है, और समसामयिक परिवर्तनों के साथ चिरन्तन विद्या है। युगीन सन्दर्भों में मानव मन के संवेगों को नया-नया रुपप्राप्त होता रहता है, लेकिन इन संवेगों को गाने के लिए मानव मन में बेचैनी रहा करती है।” उन्होंने ‘गीत’ को एक ऐसी विधा कहा है जिसमें मानव मन के संवेग तो होते हैं लेकिन वे अनादिकाल से अब तक युगानुकूल बदलती हुई मनोदशा का क्रमानुसार चित्रण करते हैं। उन गीतों में रचयिता की गाने सम्बन्धी आन्तरिक बेचचैनी का भाव भी निहित होता है। नगेन्द्र की गीत सम्बन्धी इस धारणा में भी लोक और साहित्यिक गीत की ऐतिहासिक प्रक्रिया का उल्लेख है।”3
मध्यकाल में भक्ति आंदोलन ने लोक साहित्य को नई दिशा प्रदान की। संत कवियों ने संस्कृत के स्थान पर लोकभाषाओं को अपनाया और जनसाधारण तक आध्यात्मिक संदेश पहुँचाया। कबीर, तुलसीदास, सूरदास और मीरा के काव्य में लोक तत्वों की प्रचुरता मिलती है।
औपनिवेशिक काल में अंग्रेजी विद्वानों और भारतीय शोधकर्ताओं ने लोक साहित्य का संकलन प्रारंभ किया। आधुनिक युग में विश्वविद्यालयों में लोक साहित्य अध्ययन का विषय बना और इसे अकादमिक मान्यता प्राप्त हुई।
- लोक साहित्य के प्रमुख प्रकार
(1) लोकगीत
लोकगीत लोकजीवन की धड़कन हैं। ये जन्म से मृत्यु तक प्रत्येक अवसर पर गाए जाते हैं।
(क) संस्कार गीत – सोहर (जन्म), विवाह गीत, विदाई गीत।
“सोहर पुत्र जन्म के अवसर पर गाये जाने वाले गीतों को ‘सोहर’ कहते हैं। कहीं-कहीं उन्हें ‘मंगल’ भी कहा जाता है।
‘गावहु ए सखि ! गावहु गाई के सुनावहु हो ।
सब सखि जुलि गावहु, आजु मंगल गीत हो ।
गोस्वामी तुलसीदास जी ने भी श्री रामचन्द्र के जन्म के अवसर पर रामचरितमानस में मंगल गाने का उल्लेख किया है-
‘गावहिं मंगल मंजुल बानी.
सुनि कलरव कलकंठ लजानी ।’
सोहर शब्द की व्युत्पत्ति शोमन’ शब्द से ज्ञात होती है। यही शोभन शब्द सोमिलो, सोहिलो, सोहद, सोहर के रूपो में परिवर्तित होता हुआ इस रूप में आया। भोजपुरी में ‘सोहल’ का अर्थ अच्चा लगना है जो सस्कृत के ‘शोभन से मिलता-जुलता है। सोहर की उत्पत्ति ‘सुधर शब्द से मानी जा सकती है। जिसका अभिप्राय सुन्दर होता है। पुत्र के जन्म के गीत ‘सोहिलो’ के नाम से प्रसिद्ध है।”4
(ख) ऋतु गीत – कजरी (सावन), फाग (होली), बसंत गीत।
ऋतु-सम्बन्धी गीतों में जन-मानस पूर्ण तरंगित दिखाई पड़ता है। विभित्र ऋतुओं में जन-मन के अनुरंजन के लिए गीतों के गाने की प्रथा बहुत दिनों से चली आ रही है। भारत के प्रत्येक राज्य में विभिन्न ऋतुओं में गीत गायन की परम्परा प्रचलित है।
(1) कजली सावन के मन-भावन महीने में उत्तर प्रदेश में कजली गाने की प्रथा है। इस मास में प्रकृति सर्वत्र हरी दिखाई पड़ती है। भक्त कवि सूरदास जी ने अपनी बन्द आँखों द्वारा छटा का सुन्दर वर्णन किया है
“जहें देखौ तह श्याममयी है,
श्याम कुंज, वन, यमुना, श्यामा,
श्याम–श्याम घन घटा छाई है।“5
(ग) कृषि गीत – बुवाई और कटाई के समय।
रोपनी के गीत धान को खेत में रोपते समय जो गीत गाये जाते हैं,
“वे रोपनी के नाम से प्रसिद्ध हैं। धान रोपने का काम प्रायः मुसहर, चमार आदि की स्रियाँ किया करती हैं। ग्रहस्थ जीवन का चित्रण इन गीतों में प्रचुर मात्रा में होता है। कोई स्त्री ससुराल के कष्टों का निवेदन करती हुयी अपने पति से कहती है कि जब से मैं यहाँ आयी तब से काम करते-करते मेरे शरीर का चाम सूख गया और सुख सपना हो गया। स्त्रियों का अटूट एवं विशुद्ध पति प्रेम तो बहुत देखने को मिलता है, परन्तु पति का स्त्री-प्रेम प्रायः दुर्लभ पदार्थ है। परन्तु रोपनी के गीतों में इस विशुद्ध स्त्री-प्रेम की झाँकी भी मिलती है।”6
(घ) वीर गीत – युद्ध और शौर्य की कथाएँ।
(ङ) भक्ति गीत – देवी-देवताओं की आराधना।
देवी-देवताओं के सम्बन्ध में अनेक गीत उपलब्ध होते हैं। भोजपुरी प्रदेश में शीतला माता, गंगा जी, तुलसी माता के गीत प्रसिद्ध हैं। भजनों में भगवान् की महिमा का वर्णन है। शीतला माता के गीतों में चेचक रोग से पीड़ित, बालक को आरोग्य प्रदान करने की प्रार्थना की गयी है। राजस्थान में विवाहादि मांगलिक अवसरों पर गृहस्थ स्त्रियाँ गणपति (गणेश) की स्तुति में गीत गाती हैं। “इन गीतों में गणपति को विनायक के नाम से स्मरण किया गया है। इसके अतिरिक्त हनुमान जी. भैरव, जलदेवता, सील, सती और वितराणी आदि के गीत प्रसिद्ध हैं। गीतों में अपनी मनोवांछित कामना की पूर्ति के लिये भक्तों की विभिन्न देवताओं से प्रार्थना बड़ी मर्मस्पर्शी है। कोई राजस्थानी वन्ध्या स्त्री भैरव जी से विनती करती हुयी कहती है कि देवरानी और जेठानी ने मुझे ताना मारा है। उनके पालने में पुत्र झूल रहे हैं, परन्तु कुल भर में मैं ऐसी अभागिन हूँ जिसे पुत्र नहीं है। अतएव हे देव । मेरे ऊपर दया करो । इसी प्रकार इन गीतों में भक्तों की अभिलाषाओं का वर्णन पाया जाता है।”7
लोकगीतों में प्रकृति, प्रेम, विरह, करुणा और उत्सव की भावनाएँ सहज रूप से व्यक्त होती हैं।
(2) लोककथाएँ
लोककथाएँ कल्पना और यथार्थ का अद्भुत समन्वय प्रस्तुत करती हैं। इनमें नैतिक शिक्षा, सामाजिक अनुभव और जीवन-दर्शन निहित होता है। पंचतंत्र, सिंहासन बत्तीसी, बेताल पच्चीसी जैसी कथाएँ लोक परंपरा से ही विकसित हुईं।
लोककथाएँ बच्चों से लेकर वयस्कों तक सभी के लिए ज्ञान और मनोरंजन का स्रोत हैं।
(3) लोकगाथाएँ
लोकगाथाएँ वीरता और ऐतिहासिक घटनाओं का वर्णन करती हैं। जैसे—आल्हा-ऊदल, पृथ्वीराज रासो, पाबूजी की गाथा आदि। ये सामूहिक गौरव और प्रेरणा का संचार करती हैं।
(4) लोकोक्तियाँ, कहावतें और मुहावरे
ये लोक अनुभवों का सार हैं। उदाहरण—
“जैसी करनी वैसी भरनी।”
“नाच न जाने आँगन टेढ़ा।”
इनमें जीवन के व्यावहारिक ज्ञान का संक्षिप्त रूप मिलता है।
(5) पहेलियाँ और लोक-प्रहसन
पहेलियाँ लोक बुद्धि और विनोद का परिचायक हैं। लोक-प्रहसन सामाजिक व्यंग्य प्रस्तुत करते हैं।
- लोक कलाएँ : स्वरूप और वर्गीकरण
लोक कलाएँ जनजीवन में स्वाभाविक रूप से विकसित कलात्मक अभिव्यक्तियाँ हैं। ये केवल सौंदर्यबोध नहीं, बल्कि सामाजिक और धार्मिक जीवन से भी जुड़ी होती हैं।
(1) लोकनृत्य
भारत में प्रत्येक क्षेत्र का अपना लोकनृत्य है—
गरबा (गुजरात)
भांगड़ा (पंजाब)
बीहू (असम)
घूमर (राजस्थान)
छऊ (झारखंड/ओडिशा)
लोकनृत्य सामूहिक उल्लास, एकता और सांस्कृतिक पहचान का प्रतीक हैं।
(2) लोकनाटक
रामलीला, रासलीला, नौटंकी, तमाशा, यक्षगान आदि लोकनाट्य शैलियाँ धार्मिक और सामाजिक विषयों को मंचित करती हैं।
(3) लोकचित्रकला-
मधुबनी, वारली, फड़, पिथोरा आदि चित्रकलाएँ लोक जीवन, प्रकृति और धार्मिक आस्थाओं का चित्रण करती हैं।
(4) लोकशिल्प और हस्तकला
मिट्टी के बर्तन, बाँस शिल्प, हाथकरघा वस्त्र, कढ़ाई, लकड़ी की कारीगरी आदि ग्रामीण अर्थव्यवस्था का आधार हैं।
- लोक साहित्य और लोक कलाओं का सामाजिक-सांस्कृतिक महत्व
(1) सांस्कृतिक संरक्षण और पहचान
ये हमारी जड़ों से जोड़ती हैं और सांस्कृतिक निरंतरता बनाए रखती हैं।
(2) नैतिक और शैक्षिक महत्व
लोककथाएँ और गीत जीवन मूल्यों की शिक्षा देते हैं।
(3) सामाजिक एकता और समरसता
सामूहिक गायन और नृत्य सामाजिक बंधनों को सुदृढ़ करते हैं।
(4) ऐतिहासिक दस्तावेज
लोकगाथाएँ इतिहास का वैकल्पिक स्रोत हैं।
(5) आर्थिक सशक्तिकरण
लोकशिल्प ग्रामीण रोजगार और आत्मनिर्भरता को बढ़ावा देते हैं।
- वैश्विक परिप्रेक्ष्य
आज भारतीय लोक कलाएँ अंतरराष्ट्रीय मंच पर प्रतिष्ठित हो रही हैं। यूनेस्को द्वारा कई लोक परंपराओं को “अमूर्त सांस्कृतिक विरासत” के रूप में मान्यता दी गई है। इससे इनके संरक्षण को वैश्विक समर्थन मिला है।
- समकालीन चुनौतियाँ
शहरीकरण और औद्योगिकीकरण
वैश्वीकरण के कारण सांस्कृतिक एकरूपता
युवा पीढ़ी की घटती रुचि
व्यावसायीकरण
मौखिक परंपरा का क्षय
- संरक्षण और संवर्धन के उपाय
शिक्षा में लोक साहित्य का समावेश
डिजिटल अभिलेखन
लोक महोत्सव और कार्यशालाएँ
सरकारी और गैर-सरकारी सहयोग
स्थानीय कलाकारों को आर्थिक सहायता
निष्कर्ष
लोक साहित्य और लोक कलाएँ भारतीय सांस्कृतिक चेतना की आधारशिला हैं। ये केवल अतीत की स्मृति नहीं, बल्कि वर्तमान की प्रेरणा और भविष्य की दिशा हैं। इनकी जड़ों में समाज का जीवन-संघर्ष, प्रकृति से सामंजस्य और मानवीय मूल्यों की गहराई निहित है।
यदि हम इन्हें संरक्षित और संवर्धित करें, तो हमारी सांस्कृतिक पहचान सुदृढ़ होगी और आने वाली पीढ़ियाँ अपनी जड़ों से जुड़ी रहेंगी। लोक संस्कृति की जीवंतता ही राष्ट्र की वास्तविक शक्ति है।
संदर्भ सूची
1 लोक साहित्य, संपादक: डॉ. इन्दु यादव, प्रकाशक: साहित्य रत्नालय, कानपुर 2004, फ्लैप
2 लोक- साहित्य की भूमिका, संपादक: डॉ. कृष्णदेव उपाध्याय, प्रकाशक: साहित्य भवन प्रा. लि. इलाहाबाद,1970 पृष्ठ 12
3 लोकगीतों में नाद-सौंदर्य, संपादक: डॉ. पुष्पा शर्मा, प्रकाशक: सत्यम पब्लिशिंग हाउस नई दिल्ली, 2006पृष्ठ 38-39
4 लोक साहित्य, संपादक: डॉ. इन्दु यादव, प्रकाशक: साहित्य रत्नालय, कानपुर 2004, पृष्ठ 41
5 वही, पृष्ठ 52
6 वही, पृष्ठ 51
7 वही, पृष्ठ 51





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