शोध-सार:-
भारतीय संस्कृति अपनी प्राचीनता के साथ विश्व बन्धुत्व की भावना से निरंतर अग्रसर हो रही है। इस संस्कृति का परम लक्ष्य मानवता का विकास है। अध्यात्म एवं कला भारतीय संस्कृति के मूल में स्थापित है। लोक या साधारण लोगों से संबन्धित संस्कृति को ‘लोक संस्कृति’ के नाम से जाना जाता है। भारतीय संस्कृति संसार की प्राचीनतम तथा कर्म प्रधान संस्कृति है। भारतीय वेदों, उपनिषदों और शास्त्रों में नाद साधना का उल्लेख मिलता है जो मोक्ष प्राप्ति का साधन है। भारतीय दर्शन अध्यात्म पर आधारित है। भारतीय संस्कृति में सत्य, अहिंसा, सेवा, सहृदयता, सौम्यता, जीव दया तथा विश्व मानवता की भावना समाहित है। भारतीय संगीत एवं ललित कला अध्यात्मिक उन्नति का मार्ग प्रशस्त करता है। भारतीय लोक संस्कृति विभिन्न रीति-रिवाजों, भाषाओं, धर्मों, धार्मिक-सांस्कृतिक प्रथाओं, विश्वासों, आस्था, खान-पान, रहन-सहन, लोक परंपराओं, लोक संगीत, लोक नृत्य, लोक कला, लोक साहित्य आदि के माध्यम से विकसित एक समृद्ध परंपरा है। भारतीय लोक संगीत अपनी अनूठी परंपरा के साथ सम्पूर्ण भारत में क्षेत्र विशेष के आधार पर विविधता लिए हुए हैं। यह अपनी सादगी के साथ अक्सर मौखिक रूप में प्रचलित है।
बीज शब्द:- लोक, संस्कृति, भारतीय, लोक संगीत, ललित कलाएँ, भाषा, बिहू, मधुबनी चित्रकला, हिंदुस्तानी संगीत, कर्नाटक संगीत, कथक, मोहनीअट्टम, कथकली, भरतनाट्यम, यक्षगान, कुचिपुड़ी।
किसी क्षेत्र या प्रदेश विशेष में रहने वाले लोगों के रीति-रिवाज, रहन-सहन, वेशभूषा, खानपान, धर्म, त्योहार, कला-कौशल आदि को उस प्रदेश के लोक संस्कृति के नाम से अभिहित किया जाता है। “समाज के साधारण लोग ही, समाज की अनुभूतियों को व्यक्त करने के लिए लोक साहित्य की रचना करता है, जहाँ लोक समाज का ही चित्रण करता है ”1 लोक संस्कृति किसी क्षेत्र की जीवन पद्धति का सूचक है। प्रदेश विशेष की अपनी संस्कृति होती है तथा वह अन्य प्रदेशों की संस्कृति से भिन्न भी होती है। भारतीय समाज में लोक संस्कृति बिना किसी परिवर्तनों के पीढ़ी दर पीढ़ी हस्तांतरित होकर संरक्षित हो रही है। भारत के किसी प्रांत विशेष का जिक्र उसकी संस्कृति के आधार पर किया जाता है। ‘लोक’ संस्कृत शब्द है, जिसका अर्थ है ‘देखना’। इसी ‘लोक’ शब्द से हिंदी के ‘लोग’ शब्द की व्युत्पति हुई है। अंग्रेज़ी में ‘लोक’ शब्द का पर्याय ‘Folk’ तथा संस्कृति का ‘Culture’ है। वास्तव में संस्कृति किसी समाज की रीति या तरीका है जिसके अनुसार समाज विशेष के लोग जीवन जीते हैं। संस्कृत साहित्य के महान नीतिकार एवं कवि भर्तहरि के अनुसार-
“साहित्य-संगीत-कला विहीन साक्षात् पशु: पुच्छ-विषाण-हीन: ।
त्रणं न खादन्नपि जीवमानम् तद्भागदेयम् परं पशुनाम् ।।”2
लोकसंस्कृति किसी भी समाज का एक धरोहर होता है, जो वहाँ के निवासियों द्वारा अर्जित होता है। इसका एक स्थायी रूप होता है तथा लोक जीवन की आत्मा भी। “‘भाषा शब्द कोश’ में इसका अर्थ जगत् के जीवधारियों द्वारा की गई शुद्धि, सफाई, सुधार, परिष्कार लोकसंस्कृति कहलाती है।“3 लोक भाषा के माध्यम से लोक जीवन पर आधारित आस्था, विश्वास, रीति-रिवाज, खान-पान, वेशभूषा, परंपरा आदि विषय लोक संस्कृति के अंतर्गत आते हैं। लोक संस्कृति एक दिन में नहीं बल्कि ये युगों-युगान्तर से निर्मित होती हैं। भारतीय लोक संस्कृति सिन्धु घाटी सभ्यता से आरंभ होकर वैदिक युग में विकसित हुई। इसके पश्चात् बौद्ध धर्म का प्रभाव, स्वर्ण युग का आरंभ एवं अंत आदि भी इसमें शामिल हैं। “ इन सबकी मिली जुली संस्कृति लोक संस्कृति कहलाती है। देखने में इन सबका अलग-अलग रहन-सहन है, खान-पान, पहनावा-ओढ़ावा, चाल-व्यवहार, नृत्य, गीत, कला-कौशल, भाषा आदि अलग-अलग दिखाई देते हैं, परन्तु एक ऐसा सूत्र है जिसमें ये सब एक माला में पिरोई हुई मणियों की भाँति दिखाई देती हैं, यही लोक संस्कृति है। ”4
भारतीय संस्कृति विश्व की प्राचीनतम संस्कृतियों में से एक हैं। प्रगतिशील भारतीय संस्कृति अपनी प्राचीनता के कारण ही विश्व की अन्य संस्कृतियों में सबसे विशिष्ट एवं प्रसिद्ध है। “भारतीय संस्कृति की प्राचीनता, सर्वांगीणता, विशालता, उदारता एवं सहिष्णुता की समता अन्य कोई संस्कृति नहीं रख सकती। राष्ट्रीयता, शान्ति, अहिंसा एवं विश्व बन्धुत्व का संदेश देते हुये भारतीय संस्कृति ने मानवता का विकास किया हैं। व्यक्ति के मन शरीर तथा आत्मा से संबद्ध नैसर्गिक शक्तियाँ संस्कृति से ही परिवर्तित और परिष्कृत होती है।”5 किसी भी राष्ट्र की संस्कृति उस राष्ट्र की प्रगति या अवनति का द्योतक होता है। वास्तव में संस्कृति सभ्यता के विकास का पर्याय है। व्यक्ति या राष्ट्र का कल्याण संस्कृति पर निर्भर करता है जो व्यक्ति या राष्ट्र का सर्वांगीण विकास करता है। भारतीय संस्कृति के विविध आयाम भारतीय साहित्य, नृत्य, संगीत, नाटक जैसी भारतीय परंपरा में निहित है जो हमारी सभ्यता का आधार स्तंभ है। भारतीय सभ्यता अपनी विशिष्ट रीति-रिवाजों, तीज-त्योहार, रहन-सहन, वेशभूषा, धर्म, तथा कला-संस्कृति आदि की गौरवशाली परंपरा के कारण अत्यंत समृद्ध है। भारतीय सभ्यता-संस्कृति का मूलाधार अध्यात्म में निहित है। सभी कलाओं का लक्ष्य पारलौकिक आनन्द प्राप्त करना है। भारतीय संगीत एवं नृत्य आत्मोन्नति के लिए अत्यन्त सहायक है।
“वीणा वादनततिवज्ञ: श्रुतिजाति विशारद: ।
तालज्ञश्चप्रयासेन मोक्षमार्ग निगच्छति।।”6
संगीत एवं ललित कलाएँ मध्यकालीन संतो के लिए आत्म साक्षात्कार का मार्ग था। संगीत एवं ललित कला मात्र मनोरंजन का माध्यम न होकर इश्वर प्राप्ति का माध्यम भी रहा है। “प्राचीन काल से ही संगीत मोक्ष प्राप्ति का मार्ग है। वैदिक काल से ऋषि मुनियों ने अपने मन:भावों की अनुभूतियों को छन्दबद्ध किया है। देवालयों तथा मंदिरों में आराधना हेतु संगीत तथा नृत्य परंपरागत रूप से प्राचीन काल से आधुनिक काल तक निरन्तर प्रचलित रहे है। ”7 भारतीय लोक गीत समृद्ध भारतीय संस्कृति का द्योतक है जो विशेष अवसरों जैसे तीज-त्योहार, विवाह, मृत्यु आदि पर गाये जाते हैं। भारतीय लोक संगीत क्षेत्र विशेष के आधार पर कई शैलियों में उपलब्ध है। भारत में हर क्षेत्र का अपना लोक संगीत एवं लोक गीत है जिसमें विविध वाद्य यंत्रों का उपयोग किया जाता है। “ भारतीय लोक संगीत (Indian Folk Music in Hindi) में संगीत की कई शैलियाँ और शैलियाँ शामिल हैं, जिनमें से प्रत्येक की अपनी अनूठी ध्वनि, वाद्य और परंपराएँ हैं। देश के लगभग हर क्षेत्र का अपना लोक संगीत है, जो जीवन के तरीके को दर्शाता है। ये लोकगीत आमतौर पर प्रकृति के मूल्य को व्यक्त करते हैं। वे उस क्षेत्र की सामाजिक-सांस्कृतिक प्रथाओं के महत्व को व्यक्त करते हैं।”8
भारत के विभिन्न राज्यों में अलग-अलग भाषा एवं संस्कृति हैं। भारत विविध भाषाओं, धर्मों, संस्कृतियों एवं परंपराओं का संगम है। भारतीय संस्कृति को उत्तर भारतीय, उत्तर-पूर्वी, पश्चिम तथा दक्षिण भारतीय आदि संदर्भों में समझा जा सकता है। उत्तर भारत की संस्कृति विविध रंगो, इंडो आर्यन परंपराओं, हिंदुस्तानी संगीत(उत्तर भारतीय शास्त्रीय संगीत- जो 12वीं शताब्दी में दक्षिण भारत के कर्नाटक संगीत से अलग हो गया), लोक नृत्य(भांगड़ा, गिद्दा, कथक, घूमर, कालबेलिया, नाटी, जागर तथा पांडव नृत्य), उत्सवों, बहुधार्मिक सह-अस्तित्व, जीवंत त्योहारों से भरपूर है। पूर्वोत्तर राज्य असम में लिखित साहित्य के साथ लोक साहित्य भी प्रचुर मात्रा में उपलब्ध है। नेग्रिटो, द्रविड़, मंगोल तथा ऑष्टिक जनजातीय संस्कृति के मिश्रण से असमिया जाति गठित हुआ है। बिहू गीत, निचुकोनी, श्रम गीत, देव-देवी के गीत, खेल गीत, मेंढ़क की शादी के गीत, विवाह गीत आदि असम राज्य के कुछ लोकगीत है। बिहू असम का एक प्रसिद्ध कृषि-उत्सव है। जिसमें युवक-युवतियाँ पारंपरिक रीति-रिवाजों के आधार पर दिल को छूने वाले बिहू गीत गाते हैं और बिहू नृत्य करते हैं। निचुकोनी, धायगीत अथवा लोरियाँ, बच्चे को सुलाने के लिए गाये जाते हैं, जो बच्चों को कल्पना से भरे लोक में ले जाता हैं।
बिहार राज्य का वैश्विक स्तर पर प्राचीन काल से ही विद्या, न्याय, दर्शन, कला-संस्कृति, शिल्प, अध्यात्म आदि के कारण अपना विशिष्ट स्थान रहा है। यहाँ के संगीत के प्रमुख रूप ‘नचारी’, ‘फाग’, ‘चैत’, ‘लगनी’ तथा ‘पूरबी’ आदि हैं। पूरे विश्व में प्रसिद्ध लकड़ी के टुकड़ों पर निर्मित, ज्यामितीय आकृतियों तथा जीवंत प्राकृतिक रंगों से युक्त मधुबनी चित्रकला(मिथिला चित्रकला) बिहार राज्य की देन है। भारतीय सांस्कृतिक विरासत को अभिव्यक्त करने में सक्षम इस लोक कला में पौराणिक कथाएँ, धार्मिक अनुष्ठानों, प्राकृतिक प्रतीक तथा लोकजीवन से जुड़े सामाजिक विषयों का सजीव चित्रण पाया जाता है। मिथिलांचल(दरभंगा, मधुबनी) में विकसित यह लोक कला मुख्यतः महिलाओं के द्वारा विकसित की गई है। आज राष्ट्रीय एवं अंतरराष्ट्रीय स्तर पर सराहना प्राप्त ‘मधुबनी चित्रकला’ दरभंगा, मुजफ्फरपुर, मधुबनी, सहरसा, पूर्णिया तथा नेपाल में प्रचलित भारतीय लोक कला है। मधुबनी पेंटिंग का भारतीय जनजातीय लोक कलाओं में अपना एक विशिष्ट स्थान है जो महिलाओं द्वारा प्राकृतिक रंगों से घर के दीवारों(मिट्टी या गाय के गोबर से लिपी) कागज, कपड़ों आदि पर बनाई जाती है। “ प्रमुख रूप से, मधुबनी चित्रकारी ब्राह्मण और कायस्थ महिलाओं द्वारा की जाती थी। लेकिन, साथ ही, निचली जातियों और दलित वर्गों की महिलाएँ भी अपने सामाजिक-सांस्कृतिक दायरे के अंदर रहकर, इस कला रूप का अभ्यास कर रही थीं। चाहे जो भी उनका सामाजिक वर्ग रहा हो, वे सभी महिलाएँ परंपरा के अनुसार चले आ रहे अपने कौशल का उपयोग कर, चित्र बनाने के लिए गीली मिट्टी या गाय के गोबर से लेपित दीवारों का इस्तेमाल करती थीं।”9 ‘छठ पूजा’ एक प्राचीन भारतीय पर्व है जिसमें सूर्योपासना की जाती है। यह पर्व अत्यंत कठिन है तथा बिहार, उत्तर प्रदेश, झारखण्ड, पश्चिम बंगाल तथा नेपाल के कुछ क्षत्रों में (दीवाली के छठे दिन से आरंभ होकर चार दिन तक) मनाया जाता है। भारतीय संस्कृति के इस पौराणिक पर्व में आध्यात्मिकता, प्रकृति एवं विज्ञान का अद्भुत संगम देखने को मिलता है। “यह पर्व हमारे और प्रकृति के बीच की गहरी कड़ी को दर्शाता है। छठ पूजा केवल एक अनुष्ठान नहीं है, बल्कि समाज को एकजुट करने का माध्यम भी है। हर साल हजारों लोग नदियों, तालाबों और अन्य जल स्रोतों पर इकट्ठा होते हैं, जहाँ सूरज की पहली और अंतिम किरणों को नमन किया जाता है। इस पूजा का हर दिन, हर अनुष्ठान एक नई कहानी कहता है, जो हमारे पूर्वजों से लेकर आज की पीढ़ी तक का संदेश है।”10
कालीघाट पेंटिंग, पट्टाचित्र(मेदिनीपुर), टेराकोटा(बांकुड़ा) शिल्प, अल्पना और कांथा कढ़ाई आदि पश्चिम बंगाल की प्रसिद्ध लोक कलाएँ हैं। यहाँ के लोक नृत्य हैं – छऊ, मुंड़ारी, छड़ी नृत्य या लघु नृत्य, रानापा नृत्य, धली और पैका नृत्य, नटुआ नृत्य, रभा नृत्य, भादु, झुमर नृत्य, चैबारी नृत्य, बाउल, जात्रा, डोम्फू नृत्य, गंगा, गंगा वैद्य, कुकरी नृत्य, मेच नृत्य, राजबंशी नृत्य, गंभीरा, काठी, ढाली, कीर्तन, बारोमश्या तथा रायबेंशे आदि। छऊ युद्ध, मुंड़ारी नृत्य कृषि, गंभीरा नृत्य कृषि और पौराणिक कथाओं, बाउल अध्यात्मिक तथा रायबेंशे योद्धा आधारित नृत्य रूप हैं। इस राज्य में अत्यंत समृद्ध संगीत परंपरा भी है। कीर्तन, रवीन्द्र संगीत, बिष्णुपुरी शास्त्रीय संगीत, गणसंगीत, परमार्थ संगीत, बाउल, आधुनिक गान तथा बंगाली रॉक आदि यहाँ के स्वदेशी संगीत शैलियाँ हैं। पश्चिम बंगाल के पारंपरिक लोक नृत्यों में कृषि आधारित फसल नृत्य एवं युद्ध आधारित नृत्य प्रमुख हैं। “इन नृत्यों में अनुष्ठानिक से लेकर व्यंग्यात्मक और प्रतीकात्मक से लेकर सामाजिक तक के विषय शामिल हैं। इनमें प्रार्थना, भेंट, उत्सव और स्तुतिगान शामिल हैं। आमतौर पर त्योहारों के मौसम में या किसी शुभ अवसर पर किए जाने वाले ये नृत्य, लोक संस्कृति में रचे-बसे हैं और स्थानीय आस्था, परंपरा और रीति-रिवाजों को दर्शाते हैं।”11 ये सभी लोक नृत्य उत्सव, समारोह तथा धार्मिक अवसरों पर आयोजित किए जाते हैं। बंगाल की समृद्ध सांस्कृतिक परंपरा उसके लोक संगीत, लोक नृत्य, लोक कलाओं तथा लोक साहित्य में अत्यंत सजीव रूप से परिलक्षित होती है। बंगाल की ग्रामीण जनजातियों तथा जातीय समूहों की कृषि एवं पौराणिक वृतांतों पर आधारित लोक नृत्य भी प्रचलित हैं।
पश्चिम बंगाल में दुर्गा पूजा, काली पूजा, नबो बोरशो, दशहरा, जगधात्री पूजा, भाई फंटा, डोल पूर्णिमा, सरस्वती पूजा, बसंत पंचमी दीपावली, रथ-यात्रा, भाई-दूज, महावीर जयंती, बुद्ध जयंती, रबींद्रनाथ जयंती, क्रिसमस आदि मनाये जाने वाले त्योहार हैं। यहाँ का सबसे प्रमुख एवं लोकप्रिय त्योहार ‘दुर्गा पूजा’ है। “शरद ऋतु में मनाई जाने वाली दुर्गा पूजा बंगाल के त्योहारों के कैलण्डर का सबसे महत्वपूर्ण सामाजिक-सांस्कृतिक और धार्मिक उत्सव है। दुर्गा पूजा न केवल पश्चिम बंगाल परंतु बिहार(बिहारियों), ओडिशा(उड़िया) और असम(असमियाँ) और भारत के अन्य राज्यों में जहाँ बंगाली समुदाय रहता है वहाँ भी मनाई जाती है। यह दुर्गा देवी से आशीर्वाद पाने के लिए उन्हें पूजने और महिषासुर राक्षस पर उनकी विजय को मनाने के लिए मनाया जाता है। यह भी माना जाता है कि भगवान राम ने रावण से युद्ध करने से पहले दुर्गा देवी का आशीर्वाद प्राप्त करने के लिए उनकी पूजा की थी।”12
पूर्वी भारत में स्थित उड़ीसा(प्राचीन कलिंग) की लोक संस्कृति अत्यंत समृद्ध है। यहाँ की संस्कृति का मुख्य तत्व भगवान जगन्नाथ हैं अर्थात् भगवान जगन्नाथ पर केन्द्रित संस्कृति, जो कला, शिल्प एवं परंपरा के लिए विख्यात है। ‘पट्टाचित्र’ यहाँ की प्रसिद्ध चित्रकला है, जो ओड़िशा की सबसे पुरानी चित्रकला शैलियों में से एक हैं। ओडिसी संगीत ‘गंडा राज्य’ यहाँ का पारंपरिक शास्त्रीय संगीत है जो विशेष रूप से पश्चिमी ओडिशा में प्रचलित है। ‘धरती पर स्वर्ग’ नाम से विख्यात गुजरात में संगीत को देवदूतों की वाणी कहा जाता है। यहाँ की लोक संस्कृति भारत के अन्य राज्यों के समान ही अपनी जीवंत परंपराओं, स्वादिष्ट व्यंजनों, विशिष्ट पर्व-त्योहारों तथा वेशभूषा आदि के कारण विशेष पहचान रखती है। नवरात्र (‘गरबा’,‘डांडिया’), उत्तरायण(‘पतंग’ उत्सव) और ‘भवई’ जैसे लोकनाट्य आदि गुजरात की सांस्कृतिक पहचान है।
दक्षिण भारत(केरल, तमिलनाडु, कर्नाटक, आंध्र प्रदेश, तेलंगाना) की लोक संस्कृति शास्त्रीय संगीत व नृत्य, त्योहारों, परंपराओं(द्रविड़) तथा वास्तुकला का अनूठा संगम है। यहाँ की लोक संस्कृति अत्यंत जीवंत है तथा यहाँ की भाषा (मलयालम, तमिल, तेलुगु तथा कन्नड़), नृत्य(मोहनीअट्टम, कथकली, भरतनाट्यम, यक्षगान, कुचिपुड़ी), लोक नृत्य(कुम्मी, कोलाट्टम), संगीत(चेन्नई संगीत महोत्सव, त्यागराज कर्नाटक महोत्सव) त्योहार(ओणम, पोंगल), उत्सव(पुलिकली, हाथी उत्सव), पारंपरिक वेषभूषा, खान-पान आदि सांस्कृतिक विविधता के सूचक हैं। “ कर्नाटक संगीत दक्षिण भारत की शास्त्रीय संगीत शैली है, जिसकी उत्पत्ति 15वीं शताब्दी में हुई थी। इसका सबसे आम रूप कृति है -एक निश्चित राग(धुन) और ताल(लय) पर आधारित रचना, जिसमें बहुत अधिक सुधार शामिल होता है। कर्नाटक संगीतकारों की सबसे बड़ी संख्या तमिलनाडु की राजधानी चेन्नई में पाई जाती है। ”13 दक्षिण भारतीय मंदिरों में ‘नादस्वरम’ मुख्य वाद्ययंत्र है तथा ‘पेरिया मेलम’ वादन ‘नादस्वरम’ व ‘थाविल’ को बजाकर किया जाता है। प्रत्येक भारतीय राज्य की अपनी विशिष्ट लोक संस्कृति है। इस प्रकार भारतीय संस्कृति अत्यंत सजीव, समृद्ध तथा बहुरंगी है।
संदर्भ सूची
- डॉ. राजश्री देवी: मनमोहक हैं असम के लोकगीत:भारतीय धरोहर: https://www.bhartiyadharohar.com/assam-music/
- भर्तहरि: नीति शतकम्: श्लोक सं.12
- रामचन्द्र वर्मा: मानक हिंदी कोश(चौथा खण्ड): प्रयाग हिंदी साहित्य सम्मेलन, 1965: पृ, सं. 59
- भारतीय लोक संस्कृति: Indian Folk Culture: September 10,2022 https://bundeliijhalak.com/bhartiya-lok-sanskriti/
- https://jvbi.ac.in/dde/pdf/menu/distance/SLM/BA-I-History-II.pdf
- संगीतरत्नाकार: प्रथम अध्याय टीका: कल्लिनाथ भाग:1 :अड्यार संस्करण: पृ. सं. 17
- डॉ दीपक कुमार त्रिपाठी: भारतीय संगीत का अध्यात्मवादी चिन्तन: S।angeet Galaxy 5, Issue. 2 (July 2016) pp. 39
- https://testbook.com/hi/ias-preparation/folk-music-in-india
- मधुबनी चित्रकला: भारतीय संस्कृति :https://indianculture.gov.in/hi/paintings/madhaubanai-caitarakalaa
- https://shikshanam.in/ छठ पूजा: प्रकृति, आस्था और संस्कृति का महापर्व।
- https://indianculture.gov.in/hi/intangible-cultural-heritage/saamaajaika-parathaaen-anausathaana-evan-utasavai-kaarayakarama-26 : भारतीय संस्कृति।
- https://www.ezcc-india.org/west-bengal.php
- https://taajoo.com/south-india-culture-and-artifacts/
- डॉ कुलदीप कौर: लोक संस्कृति से अभिप्राय, स्वरूप विशेषताएँ तथा विभिन्न पक्ष: International Journal of Information Movement: I Issue IV (August 2016)
- https://www.festivalsofindia.in/states/ पश्चिम बंगाल के त्योहार।





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