सिनेमा के कैनवास का लोक रंग – अर्चना पाठक

लोकाचार या लोकजीवन भारत जैसे ग्राम्य आधारित समाज का एक अत्यन्त महत्त्वपूर्ण अंग है, जिसकी पैठ समाज की अन्तर्षिराओं में रक्त की भाँति है। इस दृष्टि से हिन्दी सिनेमा के […]

महारानी पद्मिनी: इतिहास या मिथक – डा. वीरेन्द्र भारद्वाज

इन दिनों चित्तौड़ की महारानी पद्मिनी की जीवन-गाथा भारतीय जनमानस को झकझोर रही है । संजय लीला भंसाली बम्बईया फिल्मों के मझे हुए डायरेक्टर हैं जो अक्सर ऐतिहासिक किरदारों में […]

प्रतिरोध का सिनेमा वाया कड़वी हवा – तेजस पूनिया

प्रदूषण हर तरह का हानिकारक होता ही है उसी के परिणामस्वरूप हमें और कई गम्भीर परिणाम भी भुगतने पड़ते हैं । वर्तमान में तेजी से बदलते हमारे देश भारत में […]

फिल्म ‘दंगल’ के गीत : भाव और अनुभूति – डॉ.ममता धवन

आजकल का दौर तीव्रता से कहानी कहने का चल रहा है। फिल्म प्रदर्शित करने की समय अवधि कम होती जा रही है। फिल्म के इस कम समय को बनाए रखने […]

हिन्दी कथा साहित्य और टेलीफिल्म : डॉ. विपुल कुमार

‘साहित्य समाज का दर्पण है’ – यह कहावत अपनी कसौटी पर खरी है या नहीं पर साहित्य को समझने के लिए समाज को जानना आवश्यक है। व्यक्ति का सामंजस्य, संबंध […]

एनिमेशन फिल्मों का जादुई संसार – डॉ. अंकित कुमार श्रीवास्तव

बच्चों का मन मनुष्य जीवन की सबसे प्रारंभिक एवं कोमल प्रवृत्ति है| प्रारंभिक अवस्था में बच्चों का जीवन बहुत ही भावुक और संवेदनशील होता है | इस दौरान अधिगम की […]

अप्रवासी सिनेमाः रचनात्मक प्रयोगधर्मिता – राकेश दूबे

आधुनिक समय में सिनेमा जीवन का एक ऐसा अंग बन चुका है जिसे उससे अलग कर पाना संभव नहीं है। सिनेमा ही ऐसा माध्यम है जिसके द्वारा समाज के विभिन्न […]

साहित्य और सिनेमा में किसान  – तेजस पुनिया

प्रेमचंद कहते हैं कि साहित्य समाज का दर्पण है किंतु फिल्म निर्माता और निर्देशक अनुराग कश्यप का कहना है कि सिनेमा भी समाज का दर्पण है। भारतीय सिनेमा अपने सौ वर्ष पूर्ण […]