कुँवर नारायण के काव्य में सामाजिक संचार – डॉ. चन्देश्वर यादव

साहित्य और संचार पूर्णतया सहगामी हैं। जब भी साहित्य की सर्जना होती है तो वह निश्चय ही संचार की प्रक्रिया के जरिए अन्तःवैयक्तिक से जनसंचार को पूर्ण करता है। कोई […]

मिथकों के सहारे सत्ता से संघर्ष के कवि: कुँवर नारायण  – बीरज पांडेय 

साहित्य, समाज, सामाजिक परिस्थितियों, काल अथवा समसामयिकता से गहरे स्तर पर प्रभावित होता है ,किन्तु वह संस्कृति का, संस्कृति की पहचान का, उसकी गरिमा और गौरव का और उसकी विशिष्टता […]

संगीत, नृत्य और कला –  शुभांगी

संगीत सुव्यवस्थित ध्वनियाँ जो रस की सृष्टि करे वह संगीत कहलाती है।गायन ,वादन और नृत्य तीनों के सामवेद को संगीत कहते हैं।भारतीय संगीत का जन्म वेद के उच्चारण के रूप […]

आज के प्रश्न और कुँवर नारायण – नौशाद अली

साहित्य और समाज दोनों का गहरा संबंध है। ये दोनों एक-दूसरे के सहयोगी हैं ।एक के अभाव में दूसरा अधूरा है । साहित्य का केंद्र मानव होता है और मानव […]

हिन्दी कथा साहित्य : बाजारवाद और उपभोक्तावाद – डॉ. कमलिनी पाणिग्राही

आज भूमण्डलीकरण के दौर में उपभोक्तावादी संस्कृति के कारण सारा विश्व बाज़ार के रूप में स्थापित हो चुका है। बाज़ारवाद से आज समाज का कोई वर्ग, क्षेत्र अछूता नहीं है। […]

तुलसी की नारी चेतना – रश्‍मि‍ पाण्‍डेय / डॉ. सुशीला लड्ढा / डॉ. सुनील ति‍वारी

तुलसी की नारी संबंधी भावना उनके दार्शनि‍क मतवाद पर आधारि‍त थी। उन्‍होंने शंकराचार्य के समान माया का केवल अवि‍धारूप ही नहीं देखा था वरन् उसका दूसरा पक्ष जो जगत को […]

स्वयं प्रकाश की लोककथात्मक कहानियों में जनपक्षधरता – बीरज पाण्डेय

प्रत्येक भाषा का अपना साहित्य होता है जो लोक कथाओं, लोक गीतों, मुहावरों व कहावतों तथा समसामयिक सृजन के रूप में विद्यमान रहता है। इनमें लोक कथाओं की अपनी विशिष्ट […]

दक्षिण कोरिया में हिन्दी : एक सिंहावलोकन – द्विवेदी आनन्द प्रकाश शर्मा 

भूमिका वैश्वीकरण की वजह से विदेशी भाषाओं को सीखने की माँग बढ़ी हैl उभरते हुए विशाल बाज़ार के रूप में भारत विश्व का ध्यान आकर्षित कर रहा हैl भारतीय अर्थव्यवस्था […]

मुक्तिबोध की रचनाएँ: परिपूर्ण क्षणों की अपूर्ण अभिव्यक्तियाँ – सौरभ कुमार यादव

मुक्तिबोध, हिंदी साहित्य के क्षेत्र में एक ऐसा नाम है, जिसका लोहा हर कोई मानता है या कहिये कि हर किसी को मानना पड़ता है। कविता, कहानी, आलोचना हर क्षेत्र […]

गांधी और स्त्री सम्बन्धी सवाल – डॉ. संजीव कुमार तिवारी

भारतीय सन्दर्भ में आधुनिकता पर विचार प्रारंभ करते ही नारी विषयक चिंतन की भूमिका महत्त्वपूर्ण हो जाती है। राष्ट्रपिता महात्मा गांधी के विचार के केन्द्र में जो स्वराज, स्वतंत्रता, स्वावलम्बन […]