भ्रमरगीत-परम्परा में नंददास का ‘भँवरगीत’ – गौरव वर्मा

‘भ्रमरगीत शब्द ‘भ्रमर’ और ‘गीत’ दो शब्दों से मिलकर बना है भ्रमर काले रंग का उड़ने वाला जन्तु होता है जिसे मधुप, मधुकर, अलि आदि विविध नामों से पुकारा जाता […]

आधुनिक युग में खेलों का महत्व – डाॅ. सुनीता अरोड़ा

आधुनिक युग का दौर प्रतियोगिताओं का दौर है। हर तरफ प्रतियोगिता ही प्रतियोगिता है। मनुष्य को इस तनाव, चिन्ता व प्रतियोगिता के दौर में जीने व इसके साथ चलने के […]

खेलों में मानसिक दृढ़ता का योगदान – डाॅ. मुकेश अग्रवाल

मानसिक दृढ़ता मनुष्य के जीवन में बहुत महत्वपूर्ण है। इसके द्वारा वह किसी भी क्षेत्र में अपना वर्चस्व स्थापित कर सकता है। विपरीत परिस्थितियों में भी मनुष्य की मानसिक दृढ़ता […]

आधुनिक हिन्दी में सांस्कृतिक राष्ट्रवाद – वीरेन्दर

राष्ट्रवाद मूल रूप से एक सांस्कृतिक अवधारणा है। राष्ट्रवाद का स्वरूप उस राष्ट्र की धर्म और संस्कृति के द्वारा निर्धरित होता है। भारत में अनादिकाल से ही धर्म मनुष्य के जीवन का प्राणतत्त्व रहा […]

विद्यासागर नौटियाल के उपन्यास ‘सूरज सबका है’ में अभिव्यक्त यथार्थ – शिवानी

विद्यासागर नौटियाल जी यथार्थवादी लेखक के रूप में भी जाने जाते हैं। प्रेमचन्द की लेखन परम्परा के समान ही नौटियाल जी की भी लेखन कला है। वह भी प्रेमचन्द की […]

शमशेर की काव्य- रचना प्रक्रिया – रीता रानी

शमशेर प्रयोगशील कवि हैं जो प्रयोगवाद से चलकर प्रगतिवाद की और आकर्षित हुए फिर नई कविता से जुड़े है। अपनी स्वगत संलाप शैली में कविता करना उनके कवित्व को उनके […]

आधी आबादी की आवाज़: इदन्‍नमम – डॉ. तेज नारायण ओझा / रजनी पाण्डेय / रश्मि पाण्डेय

सार : स्त्री जीवन के अनेक पहलू हैं जो उम्र, स्थान, प्रस्थिति के अनुरूप नये नये ढंग से परिचालित होती नजर आती हैं। इसे उभारने का काम जब से लेखिकाओं ने किया […]

कवि द्विजदेव – डाॅ. ममता सिंगला

हिन्दी साहित्य के रीतिकाल में द्विजदेव ऐसे कवि हैं, जिन्होंने किसी राजदरबार में आश्रय ग्रहण नहीं किया, वरन् वे स्वयं अनेक कवियों के आश्रयदाता थे। द्विजदेव, जिनका वास्तविक नाम मानसिंह […]

साहित्यकार दूधनाथ सिंह का आखिरी कलाम : एक सामाजिक अनुशीलन-    डॉ. दिग्विजय कुमार शर्मा

   प्रत्येक इतिहास अपने आप को दोहराता है। यह दोहराव केवल स्थितियों या चरित्रों का नहीं, बल्कि आपसी विचारों का होता है। जो अपने अनुकूल घटित होते हुए स्थितियों और चरित्रों को […]

केदारनाथ सिंह के काव्य में प्रकृति – रणजीत कुमार सिन्हा

तीसरे सप्तक के महत्वपूर्ण कवि ,प्रकृति और जीवन के उल्लास के  गीतकार के रूप में कवि जीवन की शुरुआत करने वाले केदारनाथ सिंह की काव्य संवेदना अत्यंत विशिष्ट रही है […]