
प्रासंगिकता का प्रश्न जितना सीधा दिखता है , जब उसके अंतर में उतरिये तो वह उतना ही विचित्र दिखाई पड़ता है – वह भी तब जब रचना और रचनाकार के […]

प्रासंगिकता का प्रश्न जितना सीधा दिखता है , जब उसके अंतर में उतरिये तो वह उतना ही विचित्र दिखाई पड़ता है – वह भी तब जब रचना और रचनाकार के […]

भाषा एक समाज सापेक्ष प्रतीक व्यवस्था है। वह समाज के सापेक्षता में ही जीवित रह सकता है तथा उसका विकास भी समाज के भीतर ही होता है। इस प्रकार यह […]

समाज में स्त्री को हमेशा पार्श्व में रखने की ही परम्परा रही है। पुरूष के समकक्ष स्त्री को खड़ा देखने की आदत आज भी हमारे भारतीय समाज में नहीं आ […]

भारतीय इतिहास का मध्यकाल कई दृष्टियों से उल्लेखनीय है। यह वही दौर है जब भारत की धरती पर मुसलमानों का विधिवत् शासन स्थापित हुआ था। इसी दौर में भक्ति ने […]

मनुष्य अपने व्यापक अर्थ में स्त्री-पुरुष का योग है। सभ्यता और समाज के विकास में इन दोनों का ही सहयोग समान रूप से आवश्यक माना गया है। लेकिन भारतीय समाज […]

फिल्म और साहित्य दोनों ही मानवीय सम्वेदनाओं को व्यक्त करने का सशक्त माध्यम है। पुस्तकों में स्त्रियों की दशा-दुर्दशा को हम शताब्दियों से पढ़ते-सुनते आए हैं। फिल्मी परदे के चकाचौंध […]

लोकगीत लोक साहित्य की सशक्त और प्रधान विधा है। लोकगीत सरल, मधुर होते हैं जिनमें सुर, लय, तान और गेयता का स्वाभाविक प्रवाह होता है। लोक गीत सामूहिक जन चेतना […]

कृष्ण की भक्ति में लीन मीरा के साहित्य में स्त्री और काव्य का अनोखा संबंध है क्योंकि काव्य के लिए स्त्री प्राणस्वरूपा होती है। काव्य संवेदना और अनुभूति का विषय […]

हिन्दी साहित्य के इतिहास का आदिकाल और रीतिकाल हमेशा से सवालों के घेरे में रहा है। जहां आदिकाल ग्रन्थों की प्रमाणिकता को लेकर तो वही रीतिकाल अपनी विषय सामग्री को […]

रहीम का जन्म लाहौर (अब पाकिस्तान) में 17 दिसम्बर , सन १८५६ को हुआ । उनकी माता का नाम सुल्ताना बेग़म था । पिता बैरम खां मुग़ल बादशाह हुमायूँ के […]