निराला के काव्य में आक्रोश एवं संवेदना –   डॉ. दिनेश कुमार

अक्खड़, मस्तमौला व्यक्तित्व के धनी निराला छायावाद की चतुष्टय में महत्वपूर्ण स्थान रखते हैं। निराला का पूरा नाम सूर्यकांत त्रिपाठी निराला है। इनका जन्म 21 फरवरी सन 1896 ई. को […]

हिंदी सिनेमा में चित्रित आदिवासी समाज और उनकी समस्याएँ – ज्ञान चन्द्र पाल

19वीं सदी की महत्वपूर्ण खोजों में से सिनेमा की खोज विशेष रूप से उल्लेखनीय है। उस समय किसी के भी चित्र को रूपहले पर्दे पर प्रकट कर देना किसी आश्चर्य […]

भूमंडलीकरण को असग़र वजाहत का संदेश – प्रियंका कुमारी

‘वसुधैव कुटुम्बकम्’ यानी सम्पूर्ण मानव जाति को एक परिवार की तरह देखने-मानने की अवधारणा हमारे आर्ष ग्रंथों में मिलती है। ‘जियो और जीने दो’ का सह अस्तित्ववादी सूत्र विश्व समाज को सूत्र बद्ध […]

सहित्य और पर्यावरण का अंतर्सबंध – डॉ. गरिमा जैन

संसृति के प्रारम्भ में मानव ने जिज्ञासा, जिजीविषा और चिन्तन के आधार पर अपनी बौद्विक  चेतना का विकास किया है। उसी का उत्स साहित्य है। मानव की गतिषील चेतना ने […]

आजादी का अमृत महोत्सव और श्रमजीवी वर्ग: कुछ साहित्यिक कुछ जगबीती – मुन्नी चौधरी

भारत अपनी आजादी का 75वां साल पूरा करने जा रहा है। इतनी लम्बी अवधि किसी देश के निवासियों के लिए एक गर्व की बात है। इस बीच भारत ने वह […]

भूमण्डलीकरण, लोकतन्त्र और भारतीय किसान की ‘फाँस’ – राम विनय शर्मा

‘‘भूमण्डलीकरण के आक्रामक दौर में नष्ट होती हुई ग्राम संस्कृति और आत्महत्या के लिए विवश किसानों को केन्द्र में रखकर किया जाने वाला कथा-सृजन ही अपनी सार्थकता प्रमाणित कर सकता […]

इक्कीसवीं सदी का हिंदी सिनेमा : स्त्री चेतना के विविध आयाम – डॉ. सुषमा सहरावत

हिंदी सिनेमा यद्यपि मनोरंजन प्रधान और व्यावसायिक रहा है किन्तु सामाजिक मुद्दों और समसामयिक घटनाओं की अभिव्यक्ति से भी इसका जुड़ाव लगातार रहा हैI समाज के विभिन्न वर्गों-समुदायों को अपनी […]

भारतीय समाज में नौकरीपेशा नारी की समस्याएँ:  कन्नड़ फिल्म “बेंकीयल्ली अरळिद हुवू” के संदर्भ में – किरण अय्यर वी.

सार  भारतीय समाज में चाहे स्थान तथा क्षेत्र कोई भी हो नारी को हर जगह अपने अस्तित्व के लिए लड़ाई लड़नी ही पड़ती है। वैदिक काल में नारी को पुरूषों […]

माध्यम रूपान्तरण का सैद्धांतिक एवं व्यावहारिक पक्ष – कृष्ण मोहन

साहित्य और सिनेमा दो स्वतंत्र विधा होते हुए भी दोनों एक दूसरे से संबंधित हैं। वर्तमान समय में फिल्में हमारे समाज के यथार्थ को प्रस्तुत करने की सशक्त माध्यम बन […]