क्रांतिकारी निराला साहित्य में स्त्री विमर्श – सुमन 

प्रत्येक मानवतावादी व्यक्ति सकारात्मक शक्ति के संपर्क में शीघ्र ही आ जाता है। जिसकी अमर झलक उसके संपूर्ण व्यक्तित्व और कृतित्व में स्पष्ट दिखती है। ऐसे ही मानवीय मूल्यों एवं […]

पर्यावरण और कवि पंत – गुप्ता अशोक कुमार कृपानाथ

२१वीं सदी के कई महत्वपूर्ण विमर्शों में एक विमर्श पर्यावरण भी है। अत्यधिक कार्बन उत्सर्जन से पृथ्वी का तापमान लगातार बढ़ता चला जा रहा है जिससे खाद्यान की पैदावार में […]

छायावादी रचनाकारों की दृष्टि में नारी – डाॅ0 बलजीत श्रीवास्तव

नारी आदिम संस्कृति का उद्गम स्थल है, नारी पुरुष की प्रेरणा है और पुरुष संघर्ष का प्रतीक है। ‘‘दोनों की भिन्न प्रकृति से ही परस्पर पूरकता और जीवन की पूर्णता संभव है।’’ याज्ञवल्क्य […]

जयशंकर प्रसाद के काव्यों में नारीवादी दृष्टिकोण – डाॅ0 शक्ति प्रसाद द्विवेदी

‘छायावाद का काल गाँधी जी के नेतृत्व एवं राष्ट्र‘-भावना के प्रसार का काल था’ | उनसे प्रेरित होकर पुरूषों के साथ-साथ स्त्रियों ने भी देश के लिए बढ़-चढ़कर कदम उठाया। ‘असहयोग आंदोलन […]

छायावाद काव्य-भाषा और पल्लव – आशीष जायसवाल

हिंदी साहित्य के इतिहास में ‘छायावाद’ का समय 1918 से 1936 तक माना जाता है । छायावादी काव्य-भाषा और पल्लव को समझने से पूर्व दरअसल छायावाद को समझना होगा । […]

छायावाद की व्यापकता – श्रद्धा वर्मा 

सहानुभूति, कल्पना ,अध्यात्मिक छाया, लाक्षणिक विचित्रता, मूर्तिमत्ता, प्रकृति का मानवीकरण आदि सभी विशेषताएं किसी एक ही युग में प्रचुरता के साथ मिलती हैं तो वह है छायावाद। हिंदी साहित्य में […]

मध्यवर्गीय नारी, समाज और सेवासदन – मनीता ठाकुर / डॉ. टी. एन. ओझा

समाज में नारियों की परिस्थिति अलग-अलग होती है। अलग-अलग वर्ग की नारियों की परिस्थिति भी अलग-अलग होती है। उच्च वर्ग में रह रही स्त्रियों का जीवन अलग प्रकार का होता […]

साहित्य संबंधी प्रेमचन्द की चिन्तन दृष्टि – ज्ञानेंद्र प्रताप सिंह 

हिन्दी साहित्य के अविस्मरणीय एवं लोकप्रिय लेखक प्रेमचन्द जी ने हिन्दी में कहानी और उपन्यास को सुदृढ़ नींव प्रदान की और आदर्शोन्मुख यथार्थवादी चित्रण से देशवासियों का दिल जीत लिया। […]

यशोधरा : समय सापेक्षता – डॉ. रूचिरा ढींगरा

भारतीय संस्कृति और भारतीयता के प्रखर उद्घोषक मैथिलीशरण गुप्त    (3 अगस्त 1886-12 दिसंबर 1964)  हिन्दी आधुनिक हिंदी साहित्य में अपना महत्वपूर्ण स्थान रखते हैं। उनके द्वारा सृजित महत्वपूर्ण कृतियां हैं- […]

मध्ययुगीन समाज : मीरा – विश्वम्भर दत्त काण्डपाल / डॉ. टी. एन. ओझा

मध्यकाल अपने समय और सरोकारों के साथ एक ऐसा काल है जो, मध्यकालीन रूढ़ियों से जकड़ा हुआ है। ऐसा स्वीकार किया जाता है कि समाज, मनुष्य और साहित्य का आपस […]