राकेश धर द्विवेदी की कविताएं

1. सुनो नकाबपोश चारों तरफ दिख रहे हैं दुनिया में नकाब लगाए लोग आपसे मिलने, बतियाने से हाथ मिलाने से घबराते हुए जल्दी से किनारे से निकलकर मुँह छिपा कर […]

महावीर सिंह रावत की कविताएं

1. घर जलता रहा और वे ज़िद पर अड़े रहे, संभाल ना सके चार मित्र भी, और वे अनजान भीड़ में पड़े रहे, बड़ा गुमान था हमें इस बात का […]

बलजीत सिंह बेनाम जी की ग़ज़ल

किया जिसने तुझसे किनारा बहुत है मोहब्बत यक़ीनन वो करता बहुत है हँसी में उड़ा कर ज़माने की बातें तेरा नाम लिख कर मिटाया बहुत है चलो चंद जुगनू ही […]

कुम्भनगरी का काशी में तर्पण (कहानी) – डॉ.मधुलिका बेन पटेल

सात साल …? क्या मैंने सात साल बिता दिए…उफ़ …बड़ी बेवकूफ हूँ मैं …बेवकूफ ही नहीं पागल भी हूँ| दुनियां की सबसे बड़ी पागल| सही कहती हैं मेरी फ्रेंड्स…हूँ भी […]

प्रतिभा कुमारी की कविताएं

सिंधु किनारे, दूर क्षितिज को निहारते सिंधु किनारे, दूर क्षितिज को निहारते, अरुणिमा से परावर्तित जल को देखते, प्रकृति की रचना को आत्मसात करते, परंतु आँखें तो बस तुम्हारे नैनों […]

अन्तर्द्वन्द – मीनाक्षी

सुबह के सात बजे थे। रोजाना की तरह सीमा रसोईघर में नाश्ता बना रही थी। तभी अनीता ने आकर पूछा – भाभी नाश्ता बन गया क्या? हां बस अभी देती […]

पुरखउत ( कविता )- डॉ. प्रेमकुमार पाण्डेय

मकान के चौहद्दी के ठीक सामने गंभीर मुद्रा में बैठे पुरखउत नीब दादा साक्षी हैं बसते- उजड़ते गांव,पाही और जीवन की सांस के ।   कभी पुरवट खींचकर थके-हरे पछाहीं […]

 प्रेमचंद ( कविता ) – प्रीति कुमारी

साहित्य के सरोकार, जिनकी रचना में, निर्धन, दलितों, नारी, के करुण स्वरों की है पुकार, कहलाते हैं वह साहित्य सम्राट। वाराणसी में है जन्म लिया, नवाब राय नाम से लेखनी […]

रात का सन्नाटा (कविता) – सारिका ठाकुर

                 जब रात अंधेरा होता हैं                    और छा जाती है नीरवता                    तब उस क्षण गूंजती हैं                    अनगिनत आवाज़ें                    जो […]

क्या अब गौरैयों की फ़िक्र नहीं – डॉ.अनुपमा श्रीवास्तव

बन कर रंगीन कठपुतली, क्यों नाच रही है शिक्षा? करने वाले प्रकृति की वंदना, आज अभिभूत, कर रहे अतिरंजना क्या मॉल – झोपड़ी एक समान, बना कर इंटरनेट वरदान? रेतीले […]