भारत के सांस्कृतिक और धार्मिक इतिहास में इलाहाबाद का स्थान कुछ गिने-चुने नामों में आता है|प्राचीन धार्मिक इतिहास में इसे देवराज प्रयाग कहा जाता रहा है|गंगा,यमुना और अदृश्य सरस्वती का संगम स्थल है| साहित्य के इतिहास में यह छायावाद का केंद्र और पन्त,निराला और महादेवी वर्मा की रचना की उर्वर भूमि रही है|इलाहाबाद भारतीय राष्ट्रीय आन्दोलन का प्रमुख केंद्र रहा है|यह कभी संयुक्त प्रान्त की राजधानी हुआ करता था |आज भी यह राजनीतिक और धार्मिक दृष्टि से आकर्षण का केंद्र बना हुआ है|यहाँप्रत्येक बारह वर्ष में महाकुम्भ लगता है और प्रतिवर्ष कुम्भ मेला संगम क्षेत्र में लगता है,जिसमें लाखों की संख्या में संत और श्रद्धालु  आते हैं | हम भी संगम में ही ठहरे थे ,गंगा किनारे शिवकुटी में|यहाँ से कुछ ही दूरी पर नारायणी आश्रम है ,जो यहाँ के लोगों के लिए सुबह और शाम को भ्रमण करने का सबसे उत्तम स्थल है |हम भी आज की शाम गंगा किनारे भ्रमण पर निकले थे |गंगा किनारे की सुहानी हवा किसी पुरानी याद सी गुदगुदा रही थी | हवा की सरसराहट में ऐसा लग रहा था जैसे हरिवंश राय बच्चन के ‘निशा निमंत्रण’ की कविताएँ गुनगुना रही हों |मन कल्पना की छलांगे भरता हुआ घुमक्कड़ प्रवृत्ति को जागृत कर दिया|यह नवम्बर का महीना था लेकिन ठण्ड कुछ खास नहीं थी ,जैसा कि पिछली सर्दियों में होती थी|

सारनाथ संगम से लगभग 130 किलोमीटर की दूरी पर है |यहाँ से  बस और ट्रेन दोनों ही वाराणसी के लिए जाती हैं और वाराणसी से 12किमी ऑटो रिक्शा जाने के लिए मिलते हैं|हमने ट्रेन का सफर चुना –सारनाथ एक्सप्रेस| जैसा कि हमेशा होता है, भारतीय ट्रेन समय से दो-चार घंटे देरी से आती है | हमारे साथ भी वही हुआ |हमने जाम की समस्या से बचने के लिए बस का सफर नहीं तय किया परन्तु हमें इलाहाबाद रेलवे स्टेशन पर चार घंटे इन्तजार करना पड़ा| गाड़ी चार बजे आई |हम सारनाथ एक्सप्रेस पर आख़िरकार बैठ गए|ट्रेन जब चली तो कुछ यात्रियों के चेहरे पर ऐसे भाव थे कि शायद यह गाड़ी दस दिन में वाराणसी पहुंचेगी|ट्रेन आहिस्ता-आहिस्ता हिचकोले खाते,जंघई और भदोही को पार करते हुए वाराणसी पहुंच गयी |

आज हम पहली बार वाराणसी की यात्रा कर रहे थे |हमें यहाँ के बारे में कुछ विशेष मालूम न था |हाँ ‘काशी का अस्सी’ फिल्म देख चुके थे,यहाँ की गलियों,गंगा आरती ,दशाश्वमेध घाट ,अस्सी घाट ,काशी विश्वनाथ मंदिर ,दुर्गा कुण्ड,तुलसी मानस मंदिर और यहाँ से 12 किमी की दूरी पर सारनाथ का स्तूप  के बारे में काफी सुना था|आज बनारस को अपनी आँखों से देख रहे थे |वाराणसी आने से पहले ठहरने की चिंता थी |कुछ मित्र काशी हिन्दू विश्वविद्यालय में थे परन्तु वहां जाना हमने उचित नहीं समझा|हम परमहंस आश्रम अनुसुइया की एक शाखा वाराणसी में लंका से कुछ दूरी पर स्थित ‘सामने घाट’ में है |इस आश्रम के महंत रंगनाथ बाबाजी से ठहरने की बात कर ली थी |रेलवे के समय के अनुसार बाबाजी से हमने शाम चार बजे का समय बताया था और जब हम उपयुक्त समय पर नहीं पहुंचे तो उन्होंने सोचा कि लडके अब यहाँ नहीं आएंगे|आश्रम पहुँचते-पहुँचते रात के नौ बज गए और मुख्य दरवाजा बंद हो चुका था |बाबाजी से डांट मिलना एकदम तय हो गया|अंदर आवाज दी कि हम लोग अंदर आना चाहते हैं ,इलाहाबाद से आए हुए हैं |अंदर से आवाज आई ‘कितने जन हो?’दो लोग !दरवाजा खुला और हम अन्दर आ गए ,दरवाजा खोलने वाले बाबाजी को प्रणाम किया और उन्होंने हमें सीधे रंगनाथ बाबाजी के पास ले गए|बाबाजी को प्रणाम करने को जैसे ही झुका एक काला-सा कुत्ता तेज से भौंका हम एकदम से चौंक गए और पीछे हटकर प्रणाम किए|बाबाजी एकटक देखे जा रहे हैं ,समझ में आ गया कि मामला गडबड है |उन्होंने पूछा यह समय है आप लोगों के आने का |हमने कहा बाबाजी ट्रेन काफी देर से आई है |देर से आई थी तो बताना चाहिए था ,यहाँ सब भोजन कर चुके हैं ,खाने को कुछ बचा नहीं है और आप लोगों को आश्रम की मर्यादा का तो ख्याल है नहीं |हमने अपनी गलती मान ली और यही बचने का रास्ता भी था |फ़िलहाल हमें भोजन कराया गया और एक कमरा हमें रहने को दे दिया गया |

यह परमहंस आश्रम था, जिसके अपने नियम और मर्यादाएं हैं|यहाँ किसी भी धर्माडंबर को नहीं मानते,कर्मकांड का विरोध है और गुरू की ही पूजा होती है और गुरू ही सब कुछ है |यहाँ सुबह चार बजे और शाम को छः बजे नित्य गुरू-वंदना होती है ,जिसमें सभी का उपस्थित होना अनिवार्य है|हाँ परमहंस आश्रम की खास बात यह है कि भोजन सब एक साथ करते हैं |जब भंडार-गृह में कुछ भी बनाया जायेगा तो उसके बाद घंटी बजा दी जाती है और सभी संत और आगंतुक वहां पर रखी थाली , कटोरी और गिलास लेकर पहुँच जाते हैं और एक पंगत में सब बैठकर भोजन गृहण करते हैं| और अपना –अपना खाने का पात्र स्वयं धुलते हैं|

दूसरा दिन –

हम सुबह आश्रम से बाबा विश्वनाथ के दर्शन को निकल पड़े ,जो कि  आश्रम से पांच किमी की दूरी पर है|चौराहे से आगे मंदिर वाली गली में हम प्रवेश किए और आगे हमें कई गलियाँ दिखाई पड़ी ,अब समझ नहीं आया कि किस गली में जाएँ| सचमुच यह गलियों का शहर है|इधर-उधर देखने से हमारे पास कुछ पंडित जी लोग आ खड़े हुए और बोले आइये बाबा भोलेनाथ के दर्शन कराते हैं परन्तु पंडित जी से हमने कहा कि हमें रास्ता पता है ,बहुत मना करने के बाद भी एक पंडित जी हमारे आगे-आगे चलने लगे और मंदिर की कथा कहते हुए हमारे साथ हो लिए |

काशी विश्वनाथ मंदिर बारह शिव लिंगों में से एक है |यह बहुत प्राचीन मंदिर है ,हालाँकि पुराना मंदिर औरंगजेब के द्वारा तोड़ दिया गया था और बहुत दिनों बाद यहाँ पर इंदौर की रानी अहिल्याबाई होलकर ने 18 वीं शताब्दी में पुनः निर्माण करवाया |इस मंदिर के उपरी भाग पर स्वर्ण जड़ित है जिसको पंजाब के महाराजा रणजीत सिंह ने लगवाया था|इस मंदिर से पांच सौ मीटर की दूरी पर दशाश्वमेध घाट स्थित है ,जहाँ पर देशी-विदेशी पर्यटकों की भीड़ देखी जा सकती है |

यात्रा अब हमारी शुरू होती है सारनाथ के लिए जो कि यहाँ से 12 किमी की दूरी है |महात्मा बुद्ध ने सारनाथ में ही प्रथम उपदेश दिया था और यहीं से धर्मचक्र-प्रवर्तन किया| हिन्दू धर्म नगरी काशी के पास से ही बौद्ध धर्म का उदय हुआ और चीन ,श्री लंका ,म्यामार ,थाईलैंड और विश्व के तमाम देशों में अपना विस्तार किया|बुद्धम शरणम् गच्छामि ,धम्मम शरणं गच्छामि,संघम शरणं गच्छामि की गंगा प्रवाहित हो कर विश्व समुद्र में जाकर मिल गयी|आष्टांगिक मार्ग और चार आर्य सत्यों ने विश्व भर में धार्मिक क्रांति कर दी|

सारनाथ पुरातात्विक स्थल में प्रवेश करते ही सामने बड़ी गोलाई में पकी ईंटो से फर्श दिखाई पडती है ,यह धर्मराजिका स्तूप का अवशेष है ,जिसकी आधारशिला संभवतः अशोक ने रखी थी|

धर्मराजिका स्तूप

धर्मराजिका स्तूप के उत्तर में चलने पर एकाश्मक वेदिका स्थित है ,जिसका ऊपरी भाग सम्भवतः कभी धर्मराजिका स्तूप के ऊपर रखा होता था|एकाश्मक वेदिका के उत्तर दिशा में ही भगवान् बुद्ध का साधना-स्थल और उसके सामने विशाल मूलगंध कुटी विहार पूर्व –पश्चिम दिशा में स्थित है |यहाँ पर उपस्थित वेदिकाओं से सहज ही अनुमान लगाया जा सकता है कि यह स्थान ध्यान-साधना और विचार-विमर्श का कितना बड़ा स्थल था| बताते हैं कि यहाँ पर सभी विद्वानों का कद निर्धारित था और उसी के अनुरूप सब बैठते थे|

मूलगंध कुटी

मूलगंध कुटी के पूर्व में सारनाथ स्तूप बना है ,जिसके चारों तरफ प्रदक्षिणा पथ ,स्तूप पर महात्मा बुद्ध की खंडित प्रतिमा और चित्रकारी की गयी है|वेदिकाओं के आस-पास महत्मा बुद्ध की ध्यान मुद्रा की विभिन्न प्रकार की मूर्तियाँ उकेरी गयी हैं जिनमें से अब कुछ खंडित अवस्था में हैं|

सारनाथ स्तूप

भारत का राजचिन्ह जिसमें चार शेर आपस में पीठ से पीठ सटाए बैठे हैं वह सारनाथ में स्थित अशोक स्तम्भ का ऊपरी भाग है ,जो पांच शिला खण्डों के ऊपर स्थित था|इस अशोक स्तम्भ की लिपि ब्राम्ही है|यह स्तम्भ बुद्ध के साधना-स्थल के उत्तर-पश्चिम में स्थित है |

किसी भी धर्म को राजनीतिक संरक्षण और विचारों की उत्कृष्टता उसके विस्तार में सहायक होते हैं ,बौद्ध धर्म में यही खास बात थी |शुक्रवार का दिन होने के कारण संग्रहालय बंद था और हम इसके कारण कुछ जानकारियों से वंचित रह गए और हमने तय किया है कि अगली बार हम संग्रहालय जरूर जायेंगे|

 

कृष्णानन्द
दिल्ली विश्वविद्यालय

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