रामा तक्षक जी

भारत के राजस्थान में जन्में रामा तक्षक नीदरलैंड में रहकर हिंदी साहित्य की समृधि में कार्य कर रहे हैं.आप स्थानीय स्तर पर हिंदी से जुड़े कार्यक्रमों का आयोजन और संयोजन करते रहते हैं.भारत और भारत से बाहर होने वाले हिंदी सेमिनारों/संगोष्ठियों में निरंतर प्रतिभागिता करते रहते हैं. रवींद्रनाथ टैगोर विश्वविद्यालय द्वारा देश और विदेश में विभिन्न कार्यक्रमों के बीच विस्तार और कनेक्शन के लिए आयोजित टैगोर इंटरनेशनल लिटरेचर एंड आर्ट फेस्टिवल ‘विश्वरंग’ के सफल आयोजन के बाद, रवींद्रनाथ टैगोर विश्वविद्यालय के चांसलर संतोष चौबे की अध्यक्षता में एक अंतरराष्ट्रीय समिति का गठन किया गया है। इसमें लगभग 20 देशों के प्रतिनिधि शामिल हैं ,जो सभी महाद्वीपों का प्रतिनिधित्व करते हैं। रामा तक्षक भी इस समिति के सक्रिय सदस्य हैं. ‘जब माँ कुछ कहती’ काव्य-संग्रह की कविताओं में जहां भारतीयता परिवेश के भावबोध की  रचनाएं हैं वहीं अंतर्राष्ट्रीय जगत के अनुभवों को अभिव्यक्ति दी है. भारतीय  सामाजिक और सांस्कृतिक परिवेश कवि ह्रदय में हिलोरें मारता दीखता है.

केंद्रीय हिंदी निदेशालय,शिक्षा मंत्रालय,भारत सरकार के सहायक निदेशक डॉ.दीपक पाण्डेय ने प्रवासी लेखक रामा तक्षक से उनकी रचनाधर्मिता पर सार्थक संवाद किया, पाठकों के लिए संवाद प्रस्तुत है .

आदरणीय रामा तक्षक जी आप भारत से दूर नीदरलैंड में भारतीय संस्कृति और हिंदी के प्रचार -प्रसार में कार्य कर रहे हैं कृपया अलवर,राजस्थान  से नीदरलैंड तक की  प्रवास-यात्रा के बारे में बताइए    

रामा तक्षक : यह प्रश्न बहुत गहन है। इसके उत्तर में हजारों पन्नों का एक उपन्यास लिखा जा सकता है। शायद एक ही नहीं बल्कि दो तीन उपन्यास लिखे जा सकते हैं। संक्षेप में कहूं तो हायर सैकेण्डरी पास करते ही गांव से महाविद्यालय में पढ़ने के लिए अलवर शहर में आ गया था।हम छ: बहिन भाइयों का बड़ा परिवार था। परिवार में मेरे पिताजी अकेले कमाने वाले थे। पिताजी के वेतन से बड़ी मुश्किल से काम चलता था। दुकानदारी की उधारी हर बार, आय की सीमा को पार कर, बणिये के अगले माह के बकाया खाते में, समाहित होती रहती थी। इसके अतिरिक्त बड़ी बहिन के ब्याह करने के लिए लिया गया कर्ज, चक्रवृद्धि ब्याज की दर से, हर छमाही छलाँगें मार बढ़ जाता था। मेरे पिताजी के माथे की लकीरें हर छमाही गहरी पड़ रही थी। मेरा शहर में आने का मतलब एक ही था। जल्दी से नौकरी ताकि गृहस्थी के बोझ को सम्भाला जा सके। कर्जा उतारा जा सके। छोटे भाई बहिनों को पढ़ाया जा सके।

मेरा महाविद्यालय जाने भेजने के पीछे का कारण, जैसा कि पहले बताया, बहुत सीधा सीधा था।। पिताजी कहते क्लर्क बनने के लिए टाइपिंग सीख लो। बी एड कर लो। टीचर बन जाओ। न मैं टाइपिंग सीख सका। ना ही बी. एड. करने का मन बना। इस तरह माँ पिता की समझानुसार मेरा नौकरी पाना सम्भव न हो सका।

इस बीच, मेरे पीछे से, मेरी सगाई भी कर दी गई। जिस लड़की के साथ रिश्ता हुआ वह गाँव, शहर के रास्ते के बीच है जिससे गुजरते समय आज भी दिल में गुदगुदी होती है। शहर से गाँव लौटकर गया तब पता चला कि मेरा रिश्ता पक्का हो गया है। इस घटना पर ‘उनके बोल’ कहानी लिखी। कहानी छपी भी है।

इन्दिरा गाँधी की हत्या के दिन मेरा सिविल सेवा मुख्य परीक्षा का पहला दिन था। उस दिन दिल्ली के माहौल ने भी मेरी आत्मा को कुरेद दिया था, झकझोर दिया था। दिल्ली में ही मेरी परीक्षा का केन्द्र था। इस हादसे से परीक्षा स्थगित हुई और फिर कुछ समय बाद परीक्षाएँ सम्पन्न हुई। परीक्षा में सफलता भी मिली परन्तु, मौखिक परीक्षा पास न कर सका। इस फेल होने की खबर ने, नौकरी न मिल पाने के एक और अवसर ने, आत्महत्या के विचार को बल दिया। परन्तु मौत भी इस विचार को भुनाने में सफल न हो सकी।

बेरोजगारी के काल में ही एक विदेशी महिला से मिलना हुआ। इसी के चलते यूरोप आने का रास्ता खुला। यूरोप आया तो महिला मित्र ने भिण्डी की सब्जी और बेसन व छाछ को उबालकर कढ़ी बनाई। चपातियाँ बनाने की जिम्मेदारी मैंने ली। इस तरह यह मित्रता स्थायी संबंधों में बदली।

आपको हिंदी के प्रति लगाव कैसे पैदा हुआ और हिंदी लेखन के प्रति रागात्मक संबंध उत्पन्न करने वाली परिस्थियां कौन सी  रहीं ?

रामा तक्षक :हिंदी मेरी मातृभाषा है। लोकोक्ति और मुहावरों की पीढ़ियों की अभिव्यक्ति का भी अपना रस है। जिस भाषा को जन्म से सुनने और बोलने को मिला हो। उस भाषा के विषय में लगाव या विलगाव का प्रश्न क्यों ? हिंदी मेरे ज्ञान और अनुभव का स्त्रोत है। जैसा पहले कहा हिंदी मेरी मातृभाषा है। हिंदी मेरे खून, मेरी धमनियों और मेरे धड़कते दिल की भाषा है।

साहित्यिक अभिरुचि का भी अपना योगदान रहा। कालीदास से लेकर तुलसी,सूर,रहीम, रसखान, मीराबाई, कबीर और उनके बाद के कवियों और लेखकों की लम्बी कड़ी है। जिसके अध्ययन ने हिंदी भाषा की क्षमता की समझ बनने, पोषित करने में अहम भूमिका निभाई।

अलवर में हिंदी में स्नातकोत्तर के समय विष्णु प्रभाकर किसी पुस्तक के विमोचन के सिलसिले में सूचना केन्द्र में आये थे। मैंने झिझकते हुए उनको अपनी रचना दिखाई। उन्होंने अधिक कुछ नहीं कहा। मेरी पीठ थपथपाई और बोले ” लिखते रहो। लिखना तुम्हें माँज देगा।”
इसी काल में मुंशी प्रेमचंद के पुत्र अमृतराय का भी एक दो बार आना हुआ। वे पान खाने के बड़े शौकीन थे।उनके लिए साइकिल पर शहर से पान लाने की जिम्मेदारी भी आयी।मेरे गुरुदेव डॉ. सत्येन्द्र चतुर्वेदी भी मुझे बहुत प्रोत्साहित करते थे। उन्हीं के प्रोत्साहन पर, केन्द्रीय हिंदी निदेशालय के कार्यक्रम पर, मुझे दक्षिण हिंदी प्रचार सभा मद्रास ( चेन्नई) जाने का अवसर मिला था। इस यात्रा के दौरान मुझे डॉ. बरसाने लाल चतुर्वेदी से मिलने का मौका मिला। इसी क्रम में दिल्ली में सम्पन्न हुए तृतीय विश्व हिंदी सम्मेलन में भाग लेने का अवसर भी।

दक्षिण हिंदी प्रचार सभा चेन्नई के अनुभव ने भी बहुत गहरे चोट की। यह शिविर तीन दिन का था। एम. एस. रामचन्द्रन, सांसद उद्घाटन समारोह के अध्यक्ष थे। इस आयोजन का, अँग्रेजी में हिंदी की टाँगों को तोड़ते हुए, उद्घाटन अध्यक्षीय भाषण और समापन एक ही बैठक में पूरा हो गया था। सांसद के सहायक ने मुझसे सांसद के बच्चों को हिंदी सीखाने का न्योता भी दिया था। जिसे मैंने हाथ जोड़कर अपनी असमर्थता व्यक्त की और अपना पीछा छुड़वाया।

इस उद्घाटन/ समापन के पश्चात टी नगर में मेरे हिंदी में बात करने पर, मुझे पाँच सात लोगों ने जबरन रिक्शे से उतार कर, सड़क पर चॉक से हिंदी डाऊन डाऊन डाऊन लिखने को मजबूर किया। मजबूरी में मैंने लिखा भी परन्तु हिंदी में। मैं पूरा लिख भी न सका था कि मेरी गर्दन पर हाथ की दबोच का दबाव बढ़ा और फूलती साँसों को मेरे कानों ने महसूस किया तो फिर अँग्रेजी मेंहिंदी डाऊन डाऊन डाऊन लिखा तब जाकर गर्दन पर पकड़ ढ़ीली हुई। यह संस्मरण उन दिनों राजस्थान पत्रिका ने प्रकाशित किया था।

इस बीच बरसाने लाल जी का स्नेह मुझ पर बरसा। उनके साथ मेरे सम्बन्ध बहुत प्रगाढ़ बने। उनके मिलने पर विदा लेता तो वे सूखे मेवों से मेरी कोट की जेब यह कहते हुए भर दिया करते थे कि ” जवान हो। भूख तो लगेगी ही। कहीं सड़क के किनारे का मत खाना।”अचानक एक दिन जब मैं उनके घर पहुँचा। घर का दरवाजा खुला। कुछ तीखे बाणों के स्वर के साथ घर से शब्दों की भाप भी निकली। बरसाने लाल जी बहुत मजाकिया किस्म के व्यक्तित्व के थे।

उन्होंने तुरन्त कहा ” सही समय पर आये हो। थोड़ा बहुत तुम भी ले लो। प्रसाद है। सबको मिलता है।”
कुछ समय बाद बरसाने लाल जी ने कहा “चलो।”
“कहाँ ?” मैंने जिज्ञासावश पूछा। बोले “तुम अब सवाल मत करो। बस चलो।”
मुझे लगा कि घर के माहौल से पिण्ड छुड़ाने की सुझी है। मैं चुपचाप उनके पीछे हो लिया। बिना कोई प्रश्न किये। कोई चालीस पैंतालीस मिनट बाद हम सीरीफोर्ट ऑडिटोरिम पहुँच गये।ऑडिटोरिम में सामने से दूसरी पंक्ति में हम बैठ गये। कायदे से बरसाने लाल जी की धर्मपत्नी को उनके साथ आना था। आयोजन था ज्ञानपीठ अवार्ड। उस दिन मार्ग्रेट थेचर द्वारा ज्ञानपीठ सम्मान महादेवी वर्मा को दिया गया।

ये कुछ परिस्थितियाँ रही जिन्होंने हिंदी भाषा के प्रति, हिंदी साहित्य के प्रति राग जगाया।

आपके लेखन का उद्देश्य क्या है और हिंदी ने आपको क्या दिया है ?

रामा तक्षक : मन कहता है। मन करता है तो लिखता हूँ। कोई उद्देश्य नहीं है। सोद्देश्य कभी भी नहीं लिखता हूँ। जिन आँखों से इस संसार को देखा है। हृदय के तल पर जीवन की जिन अनुभूतियों को जीया है। उन्हें ही शब्दों में उतार दूँ और अपने समय में लिख साझा कर लूँ। मातृभाषा हिंदी से मुझे क्या नहीं मिला ! बहुत कुछ मिला। हिंदी की बोलियों को सुनने और समझने की धार मिली। मेरी सोच को अभिव्यक्ति दी। अभिव्यक्ति का धागा, हिंदी ही देह को, साँसों और सँसार से जोड़े है। बस यही बना रहे।

रामा जी जब आप नीदरलैंड पहुंचे थे तब और वर्तमान में हिंदी की क्या स्थिति है ?

रामा तक्षक : हिंदी की स्थिति में पिछले दो तीन दशकों में बहुत गिरावट आई है। यह देख कर बहुत कष्ट होता है। वर्तमान में हमारी लगभग दो से तीन पीढ़ियाँ हिंदी में लिखना नहीं जानती। हिंदी में पढ़ना नहीं जानती। हिंदी में जब लिखती हैं तो वह देवनागरी लिपि की अपेक्षा रोमन लिपि में हिंदी को लिखती है। भारत में रहते हुए जब कभी अखबार के पन्ने पलटता हूँ तो अखबारों में, हिंदी के अखबार में, अंग्रेजी शब्दों की बहुतायत होती है। अँग्रेजी के शब्दों की देवनागरी में बाढ़ सी पढ़ने को मिलती है। इसे रोका जाना बहुत आवश्यक है। भारत सरकार या राज्य सरकारों को हिंदी ही नहीं अपितु सभी भारतीय भाषाओं के स्वरूप को बनाये रखने, संरक्षित करने के लिए स्पष्ट नीति बनाना समयकी आवश्यकता है।मैंने कभी सपने में भी नहीं सोचा था कि हिंदी भाषा का ऐसा क्षरण, चरण भी आयेगा।

आपका कहना है कि वर्तमान परिदृश्य में हिंदी का क्षरण हुआ है. कृपया बताइए कि इस क्षरण से कैसे बचा जा सकता है ?

रामा तक्षक :इसका उत्तर हमको हिंदी भाषा व अन्य भारतीयभाषाओं के इतिहास में झाँक कर देखना होगा। हिंदी भाषा को क्षरण से बचाने व जीवन दान देने के लिए हमें तकनीकी शब्दों का अनुवाद करना होगा। तकनीकी जानकारियों का अनुवाद कर उसे हिंदी भाषा का अंग बनाना होगा। जैसे कम्प्यूटर की भाषा है। जैसे अभियांत्रिकी है। जैसे स्वास्थ्य है। मेडिकल है। जो क्षेत्र आज हमें सर्वाधिक रूप से काम दे रहे हैं, रोजगार दे रहे हैं उनकी शब्दावली को आमजन की भाषा बनाना होगा। यदि मेडिकल, अभियांत्रिकी और कम्प्यूटर की भाषा को हिंदी भाषा में आधार नहीं मिलेगा तो हिंदी की कमजोरी का लाभ दूसरी भाषाएँ उठाती रहेंगी। इस तरह समाज का एक पूरा वर्ग भी पिसता रहेगा। मूल धारा के प्रवाह में शामिल न हो पायेगा।हिंदी भाषा में तकनीकी शब्दावली का हमें अनुवाद करने, आमजन तक पहुँचाने से आम आदमी को उसका लाभ मिलेगा।

हिंदी भाषा के क्षरण में व्यक्ति दोषी नहीं है। यह व्यवस्था का दोष है। यह भाषाई अनुवाद का दोष है। जो समय पर ना हुआ और आज भी जिस गति से होना चाहिए उस गति से नहीं हो रहा है। इसी ने हिंदी भाषा और भारतीय अन्य भाषाओं को परिधि पर ला खड़ा किया है। पिछले सात दशक का इतिहास साक्षी है । सत्ता ने दशकों से भारतीय समाज को अंग्रेजी चश्मे से देखा है।

आपके अलावा नीदरलैंड में हिंदी के क्षेत्र में कौन-कौन सक्रिय हैं और इस दिशा में वे क्या रचनात्मक कार्य कर रहे हैं  ?

रामा तक्षक : नीदरलैण्ड छोटा सा देश है। हालाँकि हिंदी भाषी, सूरीनामी भोजपुरी भाषी बहुत हैं। मेरा सम्पर्क एक छोटे से सरहद पार कविता भारत समूह से है। कई युवा प्रतिभाएँ हैं। मूलतः काव्य-सृजन में संलग्न हैं। सब मिलकर काव्य-गोष्ठी भी करते रहते हैं। ये काव्य गोष्ठियाँ मूलतः गाँधी केन्द्र द हेग में होती हैं। शिव मोहन सिंह ‘शुभ्र’ हिंदी में अच्छी गजल लिखते हैं। उनकी लेखनी पर पकड़़ बहुत अच्छी है।

आपने फोन पर हुई चर्चा के दौरान बताया था कि आप योग और हर्बल मेडिसिन के क्षेत्र में गंभीर रुचि रखते हैं और इससे जुड़े व्यवसाय से जुड़े हैं .इस क्षेत्र में आने की प्रेरणा आपको कहाँ से मिली, इस क्षेत्र की किन गतिविधियों से समाज का कल्याण कर रहे हैं ?

रामा तक्षक :योग मैं रोज करता हूँ। पिछले लगभग तीन दशकों से लगातार। योग की बात करने और योग को प्रतिदिन करने के रास्ते दो विपरीत ध्रुवों को जाते हैं। योग करना। ध्यान करना आपके होने, आपके अस्तित्व को जानने, पढ़ने और पहचानने का मार्ग है। आपकी सही पहचान आपका नाम नहीं है। कहीं गहरे में आप अस्तित्व की ईकाई हैं। जहाँ नाम कोसों दूर पीछे छूट जाता है।मैंने ध्यान की पचासों विधियों को प्रयोग में लिया है। एक बार दरवाजे का , देहरी का परम तत्व का पता चल जाय। चखना हो जाये। फिर रास्ता कोई भी हो। कोई फर्क नहीं पड़ता।

हर्बल मेडीसिन को। जड़ी बूटियों को हर व्यक्ति को जानना चाहिये। स्वास्थ्य संवर्धन में स्थानीय जड़ीबूटी का उपचार में उपयोग सर्वाधिक महत्वपूर्ण है। स्थानीय जड़ीबूटी आपके शरीर के स्वास्थ्य के उपचार में सर्वथा उपयोगी है। परिणाम भी शीघ्रता से मिलते हैं।यह दुर्भाग्य रहा कि नीदरलैण्ड के नियमों के कारण मेरी ये उपाधि काम न आ सकी। इसलिए मैंने जीविकोपार्जन के लिए नयी चुनौती को चुना। भारत से फैशन गारमेंट्स का आयात।

आपका जीवन संघर्षमय रहा. रोज़गार के क्षेत्र में हर्बल मेडिसिन की शिक्षा बहुत उपयोगी नहीं हुई और आपने भारत से गारमेंट आयात का व्यापार किया . इस नए व्यवसाय ने आपके साहित्यिक-लेखन को किस रूप में प्रभावित किया ?

रामा तक्षक : दीपक जी, उत्पादन की प्रतिक्रिया को बहुत गहरे से जानने को मिला। एक मजदूर, मजदूर क्यों है ? मजदूर क्या क्या करता है ? उसको क्या क्या परेशानी आती है ? मजदूर की पीढी दर पीढी क्यों नहीं उबर पाता। उसके काम का सम्मान क्यों नहीं दिया जाता?उसको प्रशिक्षण क्यों नहीं दिया जाता ? बिना प्रशिक्षण उसको काम में क्यों झोंक दिया जाता है ? मजदूर की व्यक्तिगत समस्याएँ उसकी पारिवारिक व जीवन की समस्याएँ क्यों बन जाती हैं ?
क्यों एक मजदूर हाडतोड़ मेहनत के बाद भी धन्यवाद के लिए भी तरस जाता है ? बहुत सी बातें हैं।

डॉ रामा जी आप साहित्य की किन-किन विधाओं में सृजन कार्य कर रहे हैं ?

रामा तक्षक :मूलतः पद्य और गद्य दोनों में ही लिखता हूँ। एक काव्य-संग्रह और एक उपन्यास प्रकाशनाधीन हैं। एक नाटक का लेखन जारी है जो अपने अंतिम छोर पर है।

आपने बताया कि आप कविता, डायरी और संस्मरण  विधाओं में रचनाएं लिख  रहे हैं .  मैं जानना चाहता हूँ कि आपके विचार में कविता क्या है और आपके कविता-लेखन की प्रक्रिया क्या है  ?

रामा तक्षक :कविता मेरे देखे कवि का शब्दों में पलटा हुआ, ऊँडेला हुआ, उकेरा हुआ हृदय का तल है। कविता, निर्विचार तल पर उपजे, भावों की अभिव्यक्ति है। जो किसी की मोहताज नहीं है। मेरा प्रयास रहता है कि जब कभी इस निर्विचार तल पर भाव जन्म लेता है तो इस भाव को शब्दों में उकेर दूँ।

कविता की समाज को क्या उपादेयता मानते हैं ?

रामा तक्षक :कविता व्यक्ति का, समाज का ही प्रतिबिम्ब है। “मानो तो गंगा माँ हूँ न मानो तो बहता पानी” वाली बात है। यदि व्यक्ति पढ़े और कविता के कथ्य को समझे तो इसकी समाज में उपादेयता बहुत हो सकती है। बहुत अहम योगदान हो सकता है। यदि न पढ़ो तो ये शब्द भर हैं।

आपकी कवितायें ‘अक्षय ,हिंसा ढ़ोती परंपरा ,मौनम  स्तुति ‘ पढ़ी इनमें  सामाजिक संवेदना का गाम्भीर्य है.कृपया बताइए कि आपकी कविताओं की मूल संवेदना क्या है? 

रामा तक्षक : तू जाग, मुसाफिर जाग !
व्यक्ति सोया हुआ है। जन्म से लेकर मृत्यु तक जाग नहीं पाता। आम आदमी जीने की ईच्छा के साथ मौत के दामन का हिस्सा बन जाता है। इस जन्म और मृत्यु के बीच की अवधि जो उसके अपने हाथ की पूँजी है। उसको समझ नहीं पाता। इससे अधिक और जीवन में ज्यादती क्या होगी ? मेरा प्रयास रहता है कि व्यक्ति को उसके अस्तित्व के केन्द्र पर धकेल दूँ। वह अपने ‘होने’ को पहचान ले।

‘हिंसा ढ़ोती परंपरा’ कविता समाज में व्याप्त पशुओं के साथ किए जा रहे अमानवीय व्यवहार से रूबरू कराती है, इस प्रकार के विषय से समाज को क्या सन्देश देना चाहते हैं ?

रामा तक्षक : डॉ पाण्डेय, इस कविता को लिखने का एक ही उद्देश्य रहा। धर्मांन्ता के साये में मनुष्य को चैन सम्भव नहीं है। तथाकथित धर्मों के चंगुल में मानव में जागृति असम्भव है। भटकना निश्चित है।सुख की प्राप्ति के लिए मानव को अपने चारों ओर के अस्तित्व को समझना होगा। अपने अन्दर के अस्तित्व को अनुभूत करना होगा।

एक पशु, मेरे देखे ‘ चौपाये पर बचपन’ लिए खड़ा है। पशु की संवेदनशीलता मानव से मिलती है। पशु और मनुष्य का वेदना तन्त्र एक समान है। पशु के शरीर में हृदय है। पशु के शरीर में धमनियाँ हैं। सिरायें हैं। रक्त है। पशुओं के समूह को देखो। वहाँ बड़े छोटे का एक अनुक्रम है। समूह में बड़े, छोटे के व्यवहार को नियन्त्रित करते हैं। मानव को उसके शरीर की चीरफाड़ से जो वेदना होती है। पशु की हत्या के समय पशु उसी वेदना से गुजरता है। अन्तर केवल इतना है कि शिशु की भाँति पशु के पास शब्द नहीं हैं।

समाज केवल मानव निर्मित नहीं है । “मानव एक सामाजिक प्राणी है” यह वाक्य बहुत ही संदेहास्पद है।समाज में पशु पक्षियों का अपना स्थान है। पेड़ पौधों की भी अपनी अतुलनीय भूमिका है। कीड़े मकोड़ों का पर्यावरण के संतुलन में योगदान भी अभूतपूर्व है। फूलों का खिलना, तितलियों का फूलों पर मँडराना, भौंरों का गुँजन ये सब एक ही तार का तानाबाना है। एक के बिना दूसरे की उपस्थिति अजीब सी लगती है।

मानव अपनी क्षमता को सर्वोच्च समझता है। जबकि ऐसा नहीं है। इस समय कोरोना मानवता को उसी के कियों का पाठ पढ़ा रहा है। कोरोना काल में मानव को उसी की चुनी सरकारों ने घर के भीतर ठूँस दिया है।

पानी की बूँद कहाँ से आती है ? पानी की बूँद कितनी कीमती है इसका होश आम आदमी को नहीं है। पानी के स्त्रोत सूख रहे हैं और लोगों की खून की प्यास बुझती नहीं है। जीवन की इससे कोई ओर बड़ी विडम्बना नहीं है। हमारा अहम, हमारे बनाये धर्म, हमें बर्बरता का पाठ पढ़ा रहे हैं। हमारी चेतना तार तार हो, जार जार हो, चिथड़ा हो गई है।

आपने बताया कि आज मानव अपने मानवीय धर्म से विमुख होता हुआ प्रकृति की विपरीत दिशा में चलने के कारण ‘कोरोना’ जैसी भीषण त्रासदी में निसहाय हो गया है . क्या साहित्य-लेखक का उत्तरदायित्व नहीं है कि वह अपने लेखन से समाज का उचित मार्ग प्रशस्त करे.

रामा तक्षक :समाज को दिशा देने का दायित्व सभी का है। लेखन भी उसी का हिस्सा है। हिंदी लेखक और हिंदी पाठक का गणित चरमरा गया है। आर्थिक विकास के उन्माद में बोराया आदमी भला किस की बात सुनता है ! लेखक की तो सुनेगा ही क्यों ? पढ़ने, सुनने की फुर्सत किसको है ?

हाल ही में गर्भनाल पत्रिका में आपका समसामयिक विचारततेजक लेख ‘अदृश्य दैत्य कोरोना वायरस’ पढ़ा. आप हर्बल मेडिसिन के विशेषज्ञ हैं कृपया बताइए कि हर्बल मेडिसिन इस कोरोना से हमें कैसे सुरक्षित कर सकती है ?

रामा तक्षक :बीमारी से पहले स्वास्थ्य की बात करें तो उचित रहेगा।प्रत्येक दिन की शुरुआत योगाभ्यास से करना या अन्य शारीरिक श्रम करना ही स्वस्थ्य जीवन का अंग है। दिन में एक बार शरीर में पसीना आना स्वास्थ्यप्रद है।। शरीर को दिनभर के लिए चुस्त दुरुस्त बना देता है। गाँव में मेरी दादी कहा करती थी :
” पेट नरम, शरीर है स्वस्थ मसंडा,
जब होवै , पैर गर्म और सिर ठण्डा।”

ये सामान्यत: शरीर के स्वस्थ होने के संकेत हैं।
कोरोना का संक्रमण फेफड़ों को ग्रस्त करता है। आपके फेफड़े स्वस्थ रहें। यह बहुत जरूरी है। अतः प्राणायाम सर्वाधिक उपयुक्त साधन है फेफड़ों को स्वस्थ रखने का। यह समझने जैसा है कि नित्य प्रति प्राणायाम आपके श्वसन तंत्र को मजबूत बनाता है। साथ ही साथ आपकी रोग प्रतिरोधक क्षमता भी बलशाली होती है। नित्य प्राणायाम का महत्व आप इस बात से समझ सकते हैं कि रीढ़ देह को थामे है और प्राण यानि श्वास जीव को, आपको, आपके स्वास्थ्य को।

हालाँकि दालचीनी, काली मिर्च, तुलसी के पत्ते, अर्जुन, लौंग का काढ़ा बनाकर दिन में तीन चार बार पीयें। लेकिन कोरोना से संक्रमित होने की स्थिति में केवल जड़ी बूटियों पर आश्रित नहीं रहना चाहिए। कोरोना से आपकी जान को खतरा हो सकता है।
चूँकि किसी भी रोग के उपचार में जड़ी बूँटी का लम्बे समय सेवन आवश्यक है। कोरोना से संक्रमित होने पर, समय एक अत्यंत महत्वपूर्ण मानक है। अतः कोरोना से ग्रसित होने की स्थिति में रोगी को तुरन्त चिकित्सक/ अस्पताल से सम्पर्क करें। रोगी की आयु व स्वास्थ्य की स्थिति पर भी बहुत कुछ निर्भर करता है तथा फेफड़े कितने प्रतिशत कोरोना संक्रमित हैं। इसकी गहनता को जानना अति आवश्यक है।

आप डायरी और संस्मरण भी लिखते हैं, कहानी और उपन्यास की अपेक्षा डायरी और संस्मरण विधाओं को चुनने का कोई विशेष कारण है क्या ?

रामा तक्षक :कोई कारण विशेष नहीं है। जब जैसा मन को जँचा वैसा ही कर लिया। लिखना जरूरी है। विधा चाहे कोई भी हो। उससे क्या फर्क पड़ता है !डायरी एवं संस्मरण जीवन की उन अभिव्यक्तियों को आयाम देती हैं जिनसे व्यक्ति स्वयं गुजरता है। यह एक अनुभव से गुजरा हुआ तथ्य है। यहाँ कपोल कल्पित को स्थान नहीं है। इन विधाओं को जीवन व समाज का दर्पण की संज्ञा दिया जाना सर्वथा उपयुक्त है।

रामा तक्षक जी आपने भारतीय और पाश्चात्य जीवन शैली दोनों परिवेश को जीया है। आपको इनमें क्या भिन्नता दिखाई देती है?

रामा तक्षक :भारतीय जीवन शैली भी बदलाव की पटखनी से बच न सकी है। भारत में भी सर्वत्र एक बदलाव दृष्टिगोचर होता है। भारतीयता का रंगरूप भी बदल रहा है। यदि आप पचास बरस पहले की बात करते हैं तो अवश्य भिन्नता है। इस परिदृश्य में इस प्रश्न का जवाब भारतीय एवं पाश्चात्य दर्शन को समझने जैसा है।मूलतः व्यक्ति स्वयं को पढ़ ले। स्वयं को जान ले तो पूर्व और पश्चिम का भेद केवल शब्दों का रह जाता है। हमारी चेतना का तार एक ही है। वहाँ पूर्व, पश्चिम, उत्तर दक्षिण नहीं हैं। वहाँ परिधि नहीं है केवल केन्द्र है। द्व परिधि का दूसरा नाम है।

आप वैश्विक परिप्रेक्ष्य में भारतीय साहित्य और संस्कृति के प्रभाव को किस रूप में देखते हैं ?  

रामा तक्षक :साहित्य का अनुवाद बहुत आवश्यक है। हमें भी वैश्विक साहित्य का हिंदी में अनुवाद कर पढ़ना होगा। एक हाथ से ताली नहीं बजेगी।
भारतीय संस्कृति का प्रभाव आपको चारों तरफ, विश्व के कोने कोने में दिखाई दे रहा है। भारतीय सांस्कृतिक विरासत बहुत धनी है। अत: हमारे पास बाँटने के लिए बहुत है। योग, ध्यान, भारतीय दर्शन और आयुर्वेद इनमें प्रमुख हैं।
जहाँ तक भारतीय दर्शन और संस्कृति की बात है दर्शन के क्षेत्र में तो पाश्चात जगत अभी बालक है। भारतीय मनीषियों की पहुंँच जीवन के दर्शन में जिस बिंदु तक पहुंँची है। पाश्चात जगत अभी उस सबकी बात ही कर रहा है। पहुंँचा नहीं है। आज पाश्चात्य जगत में आध्यात्मिक शून्यकाल उपस्थित है। इस शून्यकाल से मेरा अभिप्राय आध्यात्मिक भूख से है। भारतीय संस्कृति के पास इस आध्यात्मिक भूख को मिटाने के लिए अगाध भण्डार है। अशेष विरासत है। इसके बाँटने की क्रिया को और गतिमान बनाना चाहिए।

प्रवासी जीवन का आपकी सृजनात्मक ऊर्जा में क्या योगदान है ?

रामा तक्षक :जी। यह योगदान बहुत गहरा है। प्रवास के साथ ही द्वन्द्वकी जीवन पर पकड़ बढ़ जाती है। जिसे नकारा नहीं जा सकता है। हाँ, जीया जा सकता है।जीवन दृष्टि में भी परिवर्तन आया है। कई आयाम जुड़े हैं। भारतीयता को हेलीकॉप्टर नजरिए से भी देखने की समझ बढ़ी है। इसी को अपनी दो पंक्तियों को उद्धृत करना उचित समझता हूँ :

फैलती परिधि, ज्यों फैलते पंख,
प्रवास की चुनौती, है सब द्वन्द्व।

आपने चर्चा में बताया कि आपका कविता संग्रह शीघ्र आने वाला है और आपने बहुत ही अच्छी पंक्तियाँ सुनाईं, कृपया कोई कविता सुनाये।

रामा तक्षक :जी अवश्य । कविता का शीर्षक है – अक्षय

आज भी,फिर बरसों बाद,
अक्षय है प्यार, साथ तेरा -मेरा,
मुरझाया नहीं है, बीसों बरसों बाद।

नौंक-झौंक,चमकीली,
तपती दुपहरी की, रही हैं बहुत।
जो ढलता, कड़ुवाहट भी,
कभी दिनों का दे गई।
बीच इस सब, दामन प्रेम-प्रसंग का,
अधिकाया है, बीसों बरस बाद।

विश्वास जो, पहली नजर में बना,
उसको, झंझावातों ने, कई बार आजमाया है।
धरातल जीजीविषा का,
अदृश्य सा होता प्रतीत, प्रीति लगती कल की सी,
चट्टान पे खड़ी है, बीसों बरस बाद ।

यूँ तो हरदिन का पैनापन, अपनी काट को,
कम नहीं करता, मजबूत इरादों से,
हमने चुनौतियों को रोज की,
कह कहकर फिर बुलाया है, बीसियों बरसों बाद।

रिश्ता पौधे सा, हर दिन केवल
देखरेख दुलार, में पलता।
नयी नयी कोमल, कोंपलें, पन्ने सी उगलता,
खेलता, धूप से, बयार से, फिर लुटाता फूल,
देता छाँव, ‘ना’ नहीं करता, बीसों बरस बाद ।

बहुत सुंदर कविता के लिए आभार । डॉ तक्षक जी, गर्व की  बात है कि भारतीय संस्कृति और हिंदी के लिए आपके योगदान के लिए  भोपाल में आयोजित ‘विश्वरंग’ समारोह में आपको सम्मानित किया गया.बहुत बहुत बधाई. सम्मान पाकर कैसा महसूस कर रहे हैं?

रामा तक्षक :बहुत-बहुत धन्यवाद ! निश्चय ही सम्मान पाकर गर्व तो होता ही है। सम्मान के साथ साथ कन्धों पर जिम्मेदारी भी बढ़ जाती है। पहचान का सम्मान और सम्मान की पहचान को बनाये रखने की राह भी यही है।

डॉ रामा जी भारत और भारत से बाहर के युवा  हिंदी सेवियों को क्या संदेश देना चाहेंगे?

रामा तक्षक :बहुत सटीक प्रश्न है। हिंदी भाषा की स्थिति को देखते हुए बहुत ही सामयिक प्रश्न है। मैं तो अपनी युवा पीढ़ी से जो चाहे भारत में रहती हो या भारत के बाहर रहती हो उनसे एक ही बात कहना चाहूँगा। युवा अपनी मातृभाषा से जुड़े। भारत की अन्य भाषाएँ सीखें। जिस देश में रहते हैं उस भाषा पर भी अपनी पकड़ बनायें। अवश्य सीखें। बहुभाषी बनें। बहुभाषी होना उनके व्यक्तित्व में चार चांद लगाएगा परन्तु अपनी मातृभाषा हिंदी को प्राथमिकता दें। देवनागरी लिपि में लिखें, पढ़ें, कविताएँ रचें। देवनागरी लिपि की समझ हमें संस्कृत के समीप बनाये रखती है। यही लिपि हमारी लोक परम्पराओं, लोकोक्तियों और मुहावरों के मुहानों से परिचय कराती है। इसके साथ-साथ घर में बोले जाने वाले मुहावरों और लोकोक्तियों को भी प्रयोग में लें। मुहावरे और लोकोक्तियाँ भाषा की सिरायें और धमनियाँ हैं।

रामा जी यह जानकार अच्छा लगा कि आपका हिंदी उपन्यास प्रकाशन प्रक्रिया में है . कृपया इस उपन्यास की कथाभूमि / संवेदना के बारे में विस्तार से बताइए .

रामा तक्षक :जी। फिलहाल आपको मैं संक्षेप में ही बताऊंगा। इस उपन्यास का कथ्य स्त्री जीवन है। स्त्री की अस्मिता है। पुरुष प्रधान समाज में स्त्री की अस्मिता के अनगिनत घेरे हैं। स्त्री स्वयं भी उत्तरदायी है परन्तु लौट लौटकर उँगली पुरूष की तरफ ही उठती है।
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लेखक का संक्षिप्त परिचय :
रामा तक्षक
जन्म  : सन १९६२ में, जन्म-स्थान : गाँव जाट बहरोड़, जिला अलवर, राजस्थान।
शिक्षा : स्नातकोत्तर हिन्दी साहित्य एवम् अँग्रेजी साहित्य राजस्थान विश्वविद्यालय जयपुर ।
डाक्टरेट इन हर्बल मेडिसिन  गोलकुंडा, आन्ध्रप्रदेश।

काव्य-संग्रह : जब माँ कुछ कहती, मैं चुप रह सुनता।
प्रवासी साहित्यकार सम्मान :
साझा सँसार  एवम् विश्वरंग नीदरलैंड्स उत्सव के  निदेशक।

रवींद्रनाथ टैगोर विश्वविद्यालय द्वारा देश और विदेश में विभिन्न कार्यक्रमों के बीच विस्तार और कनेक्शन के लिए आयोजित टैगोर इंटरनेशनल लिटरेचर एंड आर्ट फेस्टिवल ‘विश्वरंग’ के सफल आयोजन के बाद, रवींद्रनाथ टैगोर विश्वविद्यालय के चांसलर संतोष चौबे की अध्यक्षता में एक अंतरराष्ट्रीय समिति का गठन किया गया है। इसमें 20 देशों के प्रतिनिधि शामिल होंगे जो सभी महाद्वीपों का प्रतिनिधित्व करते हैं।इसमें रामा तक्षक भी सदस्य हैं.
सम्प्रति : व्यवसाय एवं स्वतंत्र लेखन ।
संपर्क : ईमेल-  drramatakshak@gmail.com

निवास : विलनिस, नीदरलैंड्स

साक्षात्कार कर्ता

डॉ. दीपक पाण्डेय

सहायक निदेशक

केंद्रीय हिंदी निदेशालय

शिक्षा मंत्रालय,भारत सरकार

नई दिल्ली

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