वर्तमान समय में ज्ञान के प्रत्येक क्षेत्र से लेकर व्यक्ति की दिनचर्या तक में अनुवाद ने अपना महत्त्व स्थापित किया है। बिना अनुवाद के हम यह तक नहीं जान सकते हैं कि हमारे आस-पास क्या घट रहा है? ज्ञान के अन्य क्षेत्रों में क्या नए आविष्कार हो रहे हैं? साथ ही हम अनुवाद के बिना यह भी नहीं जान पाते हैं कि हमारे देश के अन्य भागों एवं विश्व के अन्य देशों में क्या-क्या नया घट रहा है? कारण हमें सभी प्रकार की नयी जानकारी अंतत: अनुवाद के माध्यम से ही प्राप्त हो सकती है। इसीलिए आधुनिक काल में साहित्य या ज्ञान के अन्य विषयों के ही समान अनुवाद ने भी अपना महत्त्व स्थापित किया है। इतना ही नहीं आधुनिक काल की शुरुआत जिस नवजागरण से मानी जाती है, उस नवजागरण के मूल में भी अनुवाद का महत्त्वपूर्ण योगदान रहा है। भारत में 19वीं शताब्दी के शुरुआत से लेकर 20वीं शताब्दी के शुरूआती तीन-चार दशकों तक का समय दो भिन्न-भिन्न संस्कृतियों के टकराव और उनके संपर्क से एक नई संस्कृति के विकास का काल रहा है। इसको बहुत से विद्वानों ने ‘नवजागरण काल’ के रूप में भी प्रस्तुत किया है। इस दौर में एक तरफ हमारा समाज अंग्रेजी संस्कृति के प्रभाव में आकर उसके प्रभाव को ग्रहण कर रहा था, तो दूसरी तरफ भारतीय संस्कृति से समाज को परिचित कराने के लिए प्राचीन वेदों, पुराणों एवं उपनिषदों की व्याख्या हो रही थी। संस्कृतियों की इस टकराहट ने नवजागरण का रूप ग्रहण किया। नवजागरण को वस्तुत: दो अलग-अलग संस्कृतियों के टकराहट या मेल से उपजे एक नए दौर के रूप में ही देखा जाता है। जाहिर-सी बात है संस्कृतियों की इस टकराहट या कहे कि आपसी आदान-प्रदान में सबसे अधिक महत्त्वपूर्ण भूमिका अगर किसी ने निभाई है तो वह है अनुवाद। बिना अनुवाद के यह संभव ही नहीं था की भारतीय समाज पश्चिम के समाज, संस्कृति एवं ज्ञान-विज्ञान से परिचित होता और इसी प्रकार बिना अनुवाद के संस्कृत की कालजयी रचनाओं, भारतीय चिंतन परंपरा आदि से भी परिचित होना नामुमकिन था।
19वीं शताब्दी के मध्य से अनुवाद की एक लहर हिंदी में दिखाई देती है। आधुनिक हिंदी साहित्य की सबसे प्रमुख विशेषता गद्य का विकास है। लेकिन इस गद्य के विकास में भी यदि सबसे अधिक भूमिका अगर किसी की है तो वह अनुवाद की ही रही है। गद्य की जिन शुरूआती रचनाओं की चर्चा हम करते हैं उनमें से अधिकतर अनुदित रचनाएँ ही हैं। रामप्रसाद निरंजनी की ‘भाषा योग वशिष्ठ’ वशिष्ठ ऋषि की ‘योगवशिष्ठ’ नामक संस्कृत रचना का अनुवाद है। मुंशी सदासुख लाल नियाज की रचना ‘सुखसागर’ श्रीमद्भगवत के ‘दशम स्कंध’ का अनुवाद है। इसी प्रकार लल्लू लाल का ‘प्रेम-सागर’ भागवतपुराण के ‘दशम स्कंध’ का चतुर्भुज शर्मा के ब्रजभाषा रूपांतर का खडी बोली में अनुवाद है। सदल मिश्र की रचना ‘नासिकेतोपाख्यान’ भी संस्कृत के प्रसिद्ध नचिकेता आख्यान का खडी बोली में अनुवाद है। हिंदी के प्रथम नाटकों की अगर हम चर्चा करें तो राजा लक्ष्मण सिंह द्वारा अनुदित ‘शकुंतला’ नाटक और भारतेंदु के ‘विद्यासुन्दर’ नाटक की चर्चा की जाती है। इसी प्रकार अगर उपन्यास और कहानी लेखन की बात करें तो पश्चिम की इन दोनों विधाओं से परिचय ही अनुवाद के माध्यम से ही संभव हो पाया था। मूलत: उपन्यास और कहानी जैसी विधा हिंदी भाषा में नहीं थी। हिंदी उपन्यास की शुरुआत हजारी प्रासाद द्विवेदी ने भारतेंदु के ‘पूर्ण प्रकाश और चंद्रप्रभा’ से मानी है, जो किसी बंगला उपन्यास का छायानुवाद है। स्पष्ट है कि भारतीय लेखकों का उपर्युक्त रचनाओं से परिचय अनुवाद के द्वारा ही हुआ था और इसके बाद ही हिंदी लेखकों ने इन विधाओं में रचना करना प्रारम्भ किया था। उपन्यास मौलिक रूप से हिंदी में लिखे जाने से पूर्व बंगला और अंग्रेजी से हिंदी भाषा में अनुवाद किए गये। हिंदी की जिस कहानी (इंदुमती) को प्रथम कहानी माना जाता है, वस्तुत: उस पर भी शेक्सपियर के ‘टेम्पेस्ट’ का प्रभाव माना जाता है। खडी बोली में जब भारतेंदु जैसे लेखकों ने भी कविता लिखने की संभावनाओं से इंकार कर दिया उस समय में श्रीधर पाठक ने अनुवाद के रूप में ही सही लेकिन बहुत ही मधुर भाषा में खडी बोली पद्य में अनुवाद करके दिखाया। खडी बोली काव्य की प्रथम कृति ‘एकांतवासी योगी’ श्रीधर पाठक द्वारा गोल्ड स्मिथ की रचना ‘द हर्मिट’ का अनुवाद ही है। चूंकि प्रस्तुत विषय के संदर्भ में हमारा लक्ष्य साहित्यिक संदर्भ में अनुवाद की स्थिति और उसके विकास में आचार्य रामचंद्र शुक्ल के योगदान पर विचार करना है। अत: इसी संदर्भ में हम अपनी बात को आगे बढ़ाएंगे। अनुवाद के क्षेत्र में शुक्ल जी के योगदान को मोटे रूप से निम्नलिखित तीन रूपों में रेखांकित किया जा सकता है-
हिंदी में अनुदित साहित्य के इतिहास लेखक के रूप में,
अनुवाद आलोचक के रूप में और
हिंदी अनुवादक के रूप में।
इनमें से प्रथम और द्वितीय बिन्दुओं को एक साथ रख कर विचार कर सकते हैं। क्योंकि शुक्ल जी का अनुवाद आलोचक का जो रूप हमें दिखाई देता है, वह उनके इतिहास ग्रन्थ में ही दिखाई देता है। अत: इन दोनों बिन्दुओं पर हम एक साथ विचार कर सकते हैं। इसके अलावा शुक्ल जी का एक रूप व्यवहारिक अनुवादक के रूप में भी हमें देखने को मिलता है। जिसमें हम उनके द्वारा अनुदित रचनाओं पर बात कर सकते हैं। इन पर हम क्रमश: इस प्रकार विचार कर सकते हैं-
अनुवाद-साहित्येतिहासकार के रूप में आचार्य रामचंद्र शुक्ल –
हिंदी साहित्य का इतिहास लिखते समय शुक्ल जी ने विभिन्न लेखकों द्वारा किए गए अनुवाद कार्य को अपने इतिहास में प्रमुखता से स्थान दिया है। आधुनिक काल में आकर यह साहित्य की स्वतंत्र विधा के समान स्थान प्राप्त करता है। शुक्ल जी ने भी अपने साहित्येतिहास में इसे इसी रूप में स्थान दिया है। इतना ही नहीं इसके साथ ही साथ उन्होंने विभिन्न लेखकों द्वारा किए गए अनुवादों के संदर्भ में अपने विचार भी दिए हैं, जो कि उनके द्वारा लिखित हिंदी साहित्य के इतिहास में हमें देखने को मिलते हैं। आचार्य रामचंद्र शुक्ल के ‘हिंदी साहित्य का इतिहास’ पर समय-समय पर विभिन्न संदर्भों के माध्यम से बहस होती रही है लेकिन अनुवाद के संदर्भ में स्वयं रामचंद्र शुक्ल और उनके द्वारा लिखित इतिहास पर न के बराबर बहस हुई है। उन्होंने अपने साहित्येतिहास में अनुवाद को कितना महत्त्व दिया है और एक आलोचक के रूप में किस प्रकार उसकी व्याख्या की है, इसको हम उनके साहित्येतिहास के विभिन्न प्रसंगों के माध्यम से समझ सकते हैं।
आचार्य रामचंद्र शुक्ल ने आधुनिकाल की शुरुआत के साथ ही हिंदी गद्य की शुरुआत और उसके विकास पर भी प्रमुख रूप से विचार किया है। आचार्य रामचंद्र शुक्ल के इन विचारों में सबसे महत्त्वपूर्ण जो चीज़ दिखाई देती है वह है गद्य के विकास के संदर्भ में अनुवाद की चर्चा। शुक्ल जी लिखते हैं “संवत् 1860 के लगभग हिन्दी गद्य का प्रवर्तन तो हुआ पर उसके साहित्य की अखंड परंपरा उस समय से नहीं चली। इधर-उधर दो-चार पुस्तकें अनगढ़ भाषा में लिखी गई हों तो लिखी गई हों पर साहित्य के योग्य स्वच्छ सुव्यवस्थित भाषा में लिखी कोई पुस्तक संवत् 1951 के पूर्व की नहीं मिलती। संवत् 1889 में किसी ने ‘गोरा बादल री बात’ का, जिसे राजस्थानी पद्यों में जटमल ने संवत् 1680 में लिखा था, खड़ी बोली के गद्य में अनुवाद किया।”
इसी संदर्भ में ईसाई धर्मप्रचारकों के अनुवाद और गद्य के विकास के संदर्भ में उन्होंने लिखा है, “संवत् 1860 के लगभग हिन्दी गद्य की जो प्रतिष्ठा हुई उसका उस समय यदि किसी ने लाभ उठाया तो ईसाई धर्मप्रचारकों ने, जिन्हें अपने मत को साधारण जनता के बीच फैलाना था। सिरामपुर उस समय पादरियों का प्रधान अड्डा था। विलियम केरे (William Carey) तथा और कई अंग्रेज पादरियों के उद्योग से इंजील का अनुवाद उत्तर भारत की कई भाषाओं में हुआ। कहा जाता है कि बाइबिल का हिन्दी अनुवाद स्वयं केरे साहब ने किया। संवत् 1866 में उन्होंने ‘नए धर्म नियम’ का हिन्दी अनुवाद प्रकाशित किया और संवत् 1875 में समग्र ईसाई धर्म पुस्तक का अनुवाद पूरा हुआ। इस संबंध में ध्यान देने की बात यह है कि इन अनुवादकों ने सदासुख और लल्लूलाल की विशुद्ध भाषा को ही आदर्श माना, उर्दूपन को बिल्कुल दूर रखा, इससे यही सूचित होता है कि फारसी-अरबी मिली भाषा से साधारण जनता का लगाव नहीं था जिसके बीच मत का प्रचार करना था। ……. ईसाइयों ने अपनी धर्मपुस्तक के अनुवाद की भाषा में फारसी और अरबी के शब्द जहाँ तक हो सका है नहीं लिए हैं और ठेठ ग्रामीण शब्द तक बेधड़क रखे गए हैं। उनकी भाषा सदासुख और लल्लूलाल के ही नमूने पर चली है। उसमें जो कुछ विलक्षणता-सी दिखाई पड़ती है वह मूल विदेशी भाषा की वाक्यरचना और शैली के कारण। ‘प्रेमसागर’ के समान ईसाई धर्मपुस्तक में भी ‘करने वाले’ के स्थान पर ‘करनहारे’, ‘तक’ के स्थान पर ‘लौ’, ‘कमरबंद’ के स्थान पर ‘पटुका’ प्रयुक्त हुए हैं। पर लल्लूलाल के इतना ब्रजभाषापन नहीं आने पाया है। ‘आय’, ‘जाय’ का व्यवहार न होकर ‘आके’, ‘जाके’ व्यवहार हुए हैं। सारांश यह कि ईसाई मतप्रचारकों ने विशुद्ध हिन्दी का व्यवहार किया है।” जाहिर है यहाँ यह बात स्पष्ट है कि आचर्य रामचंद्र शुक्ल ने प्रमुखता से इस बात पर विस्तार से विचार किया है कि हिंदी गद्य के विकास में अनुवाद का योगदान किस प्रकार रहा है।
आचार्य रामचंद्र शुक्ल के इतिहास में अनुवाद से संबंधित विचार आधुनिक काल में ही देखने को अधिक मिलते हैं। लेकिन इसका मतलब यह नहीं है कि आधुनिक काल या गद्य के विकास के साथ ही अनुवाद का जन्म हुआ। अनुवाद का महत्त्व चिरकाल से ही बना हुआ है, अत: हम यह तो कह नहीं सकते कि आधुनिक काल में ही आकर अनुवाद प्रारम्भ हुआ। रीतिकालीन कवियों ने संस्कृत के लेखकों के ग्रंथों से प्रभावित होकर कई ग्रंथों की रचना की। एक तरह से वह भी प्रभाववादी अनुवाद ही था। इसके अलावा बहुत से रीति आचार्यों ने संस्कृत के ग्रंथों का अनुवाद भी उस समय में किया। बाद में फोर्ट विलियम कॉलेज की स्थापना और भारत में छापे खाने की स्थापना के बाद अनुवाद विधा का विकास तीव्र गति से हुआ। ईसाई पादरियों ने सन 1830 ई. के लगभग बड़ी मात्रा में बाइबिल के अनुवाद किए। इसने अनुवाद के विकास में महत्त्वपूर्ण योगदान दिया। पश्चिम में बाइबिल के अनुवादों के माध्य से ही अनुवाद की सैद्धांतिकी पर काफी विचार किया गया। जिसके संदर्भ में हम आचार्य रामचंद्र शुक्ल के विचारों को भी ऊपर देख चुके हैं।
सन 1850 ई. तक अनुवाद कार्य सामान्य गति से होता रहा। लेकिन हिंदी में 1850 ई. के बाद भारतेंदु के उदय और अंग्रेजी शिक्षा के प्रभाव स्वरूप हिंदी पट्टी के लोगों का परिचय अन्य भाषाओं के साहित्य से हुआ। इसमें भी अंग्रेजी और बंगला भाषा के साहित्य का प्रमुख स्थान रहा है। इन भाषाओं के साहित्य से परिचय के बाद हिंदी लेखकों में भी गद्य लेखन की इच्छा जागृत हुई। लेखकों ने अपनी पत्रिकाओं का प्रकाशन प्रारम्भ किया। पत्रिकाओं में छापने के लिए अन्य भाषाओं से साहित्य का अनुवाद स्वयं तो किया ही साथ ही अन्य लोगों पर भी कराया। भारतेंदु के प्रयासों से कई लेखकों ने बंगला और अंग्रेजी से बहुत ही महत्त्वपूर्ण रचनाओं का अनुवाद खडी बोली हिंदी में किया। शुक्ल जी ने इस संदर्भ में अपने इतिहास में लिखा है, “उस समय तक बंगभाषा में बहुत से अच्छे उपन्यास निकल चुके थे। अत: साहित्य के इस विभाग की शून्यता शीघ्र हटाने के लिए उनके अनुवाद आवश्यक प्रतीत हुए। हरिश्चंद्र ने ही अपने पिछले जीवन में बंगभाषा के एक उपन्यास के अनुवाद में हाथ लगाया था; पर पूरा न कर सके थे। पर उनके समय में ही प्रतापनाराण मिश्र और राधाचरण गोस्वामी ने कई उपन्यासों के अनुवाद किए। तदनंतर बाबू गदाधार सिंह ने बंगविजेता और दुर्गेशनंदिनी का अनुवाद किया। संस्कृत की कादंबरी की कथा भी उन्होंने बंगला के आधार पर लिखी। पीछे तो बा. राधाकृष्णदास, बा. कार्तिकप्रसाद खत्री, बा. रामकृष्ण वर्मा आदि ने बंगला के उपन्याओं के अनुवाद की जो परंपरा चलाई वह बहुत दिनों तक चलती रही। इन उपन्यासों में देश के सर्वसामान्य जीवन के बड़े मार्मिक चित्र रहते थे।”
राजा शिवप्रसाद सितारेहिंद शिक्षा विभाग में थे। अत: उन्होंने शिक्षा से संबंधित पाठ्य सामग्री के लिए कई पुस्तकों का अनुवाद किया तथा अन्य लेखकों पर भी करवाया। मनुस्मृति का अनुवाद उन्होंने ‘मानव धर्मसार’ के नाम से किया। वहीं उन्हीं के समय में राजा लक्ष्मण सिंह ने ‘अभिज्ञानशाकुन्तल’ का अनुवाद किया। जिसको शिवप्रसाद सितारेहिंद ने पाठ्य पुस्तक के रूप में रखा।
भारतेंदु का नाटक के क्षेत्र में बहुत ही महत्त्वपूर्ण योगदान रहा है। जबकि उनका प्रथम नाटक ही बंगला से अनुदित है। बंगला और संस्कृत के अलावा अंग्रेजी भाषा से भी उन्होंने अनुवाद किया। अगर उनकी अनुदित रचनाओं की हम चर्चा करें तो उनकी बंगला और संस्कृत से अनुदित प्रमुख अनुदित रचनाएँ हैं- विद्यासुन्दर (चौर कवी कृत चौरपंचाशिका का अनुवाद), पाखंड विडंबना (कृष्ण मिश्र कृत प्रबोधचंद्रोदय का अनुवाद), धनञ्जय विजय (कांचन कवि कृत धनंजय विजय का अनुवाद), कर्पुर-मंजरी (राजशेखर कृत कर्पुरमंजरी का अनुवाद), मुद्राराक्षस (विशाखदत्त कृत मुद्राराक्षस का अनुवाद)। इनके अलावा अंग्रेजी भाषा से भी उन्होंने शेक्सपियर के ‘मर्चेंट ऑफ वेनिस’ का ‘दुर्लभबंधू’ नाम से अनुवाद किया है। भारतेंदु हरिश्चंद्र का अनुवाद की ओर ध्यान कैसे गया? इस संदर्भ में आचार्य रामचंद्र शुक्ल ने लिखा है कि “संवत् 1922 में ये अपने परिवार के साथ जगन्नाथजी गए। उसी यात्रा में उनका परिचय बंग देश की नवीन साहित्यिक प्रगति से हुआ। उन्होंने बंगला में नये ढंग के सामाजिक, देश-देशांतर-संबंधी ऐतिहासिक और पौराणिक नाटक, उपन्यास आदि देखे और हिन्दी में वैसी पुस्तकों के अभाव का अनुभव किया। संवत् 1925 में उन्होंने ‘विद्यासुंदर नाटक’ बंगला से अनुवाद करके प्रकाशित किया। इस अनुवाद में ही उन्होंने हिन्दी गद्य के बहुत ही सुडौल रूप का आभास दिया।” भारतेंदु के संदर्भ में ही वे आगे लिखते हैं, “सत्यहरिश्चंद्र’ मौलिक समझा जाता है, पर हमने एक पुराना बंगला नाटक देखा है जिसका वह अनुवाद कहा जा सकता है। कहते हैं कि ‘भारतजननी’ उनके एक मित्र का किया हुआ बंगभाषा में लिखित ‘भारतमाता’ का अनुवाद था जिसे उन्होंने सुधारते सुधारते सारा फिर से लिख डाला” इस प्रकार हम स्पष्ट रूप में देख सकते हैं कि शुक्ल जी मात्र अनुदित रचनाओं का ही इतिहास हमारे सामने नहीं रख रहे थे, बल्कि साथ ही साथ उसकी आलोचना भी कर रहे थे।
इसी प्रकार के महत्त्वपूर्ण विचार उनके भारतेंदु काल के बाद अनुदित उपन्यासों, कहानियों और नाटकों का परिचय देते समय दिखाई देते हैं। जहाँ उन्होंने उनकी भाषा के स्वरूप, उनके साहित्यिक महत्त्व एवं तात्कालिक महत्त्व आदि पर विचार किया है। उन्होंने आधुनिक काल में उपन्यास, कहानी और नाटक की शुरुआत के संदर्भ में इन विधाओं के अनुदित साहित्य पर विचार किया है, और यह दिखाया है कि कैसे इन तीनों विधाओं की शुरुआत में अनुवाद की महत्त्वपूर्ण भूमिका रही है। उपन्यास के संदर्भ में वे लिखते हैं, “प्रथम उत्थान का अंत होते होते तो अनूदित उपन्यासों का ताँता बँध गया। पर पिछले अनुवादकों का अपनी भाषा पर वैसा अधिकार न हुआ था। अधिकांश अनुवादक प्राय: भाषा का ठीक हिन्दी रूप देने में असमर्थ रहे। कहीं-कहीं तो बंगला के शब्द और मुहावरे तक ज्यों के त्यों रख दिए जाते थे- जैसे- ‘काँदना’, ‘सिहरना’, ‘धूं-धूं करके आग जलना’, ‘छल छल आँसू गिराना’ इत्यादि। इन अनुवादों से बड़ा भारी काम यह हुआ कि नए ढंग के सामाजिक और ऐतिहासिक उपन्यासों के ढंग का अच्छा परिचय हो गया और स्वतंत्र उपन्यास लिखने की प्रवृत्ति और योग्यता उत्पन्न हो गई” इसी प्रकार वे एक अन्य स्थान पर लिखते हैं कि “इस द्वितीय उत्थान में आलस्य का जैसा त्याग उपन्यासकारों में देखा गया वैसा और किसी वर्ग के हिन्दी लेखकों में नहीं। अनुवाद भी खूब हुए और मौलिक उपन्यास भी कुछ दिनों तक धाड़ाधड़ निकले, किस प्रकार के, यह आगे प्रकट किया जाएगा। पहले अनुवादों की बात खतम कर देनी चाहिए।
अनुवाद- सं. 1951 तक बाबू रामकृष्ण वर्मा उर्दू और अंग्रेजी के भी कुछ अनुवाद कर चुके थे, जैसे ‘ठग वृत्तांतमाला’ (संवत 1946), ‘पुलिस वृत्तांतमाला (1947), ‘अकबर’ (1948), ‘अमला वृतान्तमाला’ (1951), ‘चित्तौड़चातकी’ का बंग भाषा से अनुवाद उन्होंने संवत 1952 में किया। यह पुस्तक चित्तौड़ के राजवंश की मर्यादा के विरुद्ध समझी गयी और इसके विरोध में यहाँ तक आन्दोलन हुआ कि सब कापियां गंगा में फैंक दी गई। फिर बाबू कार्तिक प्रसाद खत्री ने ‘इला’ (1952) और ‘प्रमिला’ (1953) का अनुवाद किया। ‘जया’, ‘मधुमालती’ के अनुवाद दो बरस पीछे निकले।
भारतेंदु प्रवर्तित प्रथम उत्थान के अनुवादकों में भारतेंदु काल की हिन्दी की विशेषता बनी रही। उपर्युक्त तीनों लेखकों की भाषा बहुत ही साधु और संयत रही। यद्यपि उसमें चटपटापन न था, पर हिन्दीपन पूरा पूरा था। फारसी अरबी के शब्द बहुत ही कम दिखाई देते हैं, साथ ही संस्कृत के शब्द भी ऐसे आए हैं जो हिन्दी के परंपरागत रूप में किसी प्रकार का असामंजस्य नहीं उत्पन्न करते। सारांश यह कि उन्होंने ‘शूरता’, ‘चपलता’, ‘लघुता’, ‘मृदुता’ ऐसी संस्कृत का सहारा लिया है, ‘शौर्य’, ‘चापल्य’, ‘लाघव’, ‘मौर्ख्य’, साहाय’, ‘दैर्घ्य’ और ‘मार्दव’ ऐसी संस्कृत का नहीं।
द्वतीय उत्थान के आरम्भ में हमें बाबू गोपालराम (गहमर) बंग भाषा के गार्हस्थ उपन्यासों के अनुवाद में तत्पर मिलते हैं। उनके कुछ उपन्यास तो इस उत्थान (संवत 1957) के पूर्व लिखे गए; जैसे ‘चतुर चंचला’ (1950), भानमती (1951), नए बाबू (1951) और बहुत से इसके आरंभ में; जैसे- ‘बड़ा भाई’ (1957), ‘देवरानी जेठानी’ (1958), ‘दो बहन’ (1959) ‘तीन पतोहू’ (1961) और ‘सास पतोहू’ भाषा उनकी चटपटी और वक्रतापूर्ण है। ये गुण लाने के लिए कहीं कहीं उन्होंने पूरबी शब्दों और मुहावरों का भी बेधड़क प्रयोग किया है। उनके लिखने का ढंग बहुत ही मनोरंजक है। इस काल के आरंभ में गाजीपुर के मुंशी उदितनारायण लाल के भी कुछ अनुवाद निकले जिनमें मुख्य ‘दीपनिर्वाण’ नामक ऐतिहासिक उपन्यास है। इसमें पृथ्वीराज के समय का चित्र है।
इस उत्थान के भीतर बंकिमचंद्र, रमेशचंद्र दत्त, हाराणचंद्र रक्षित, चंडीचरण सेन, शरत् बाबू, चारुचंद इत्यादि बंगभाषा के प्राय: सब प्रसिद्ध उपन्यासकारों की बहुत सी पुस्तकों के अनुवाद तो हो ही गए, रवींद्र बाबू के ‘आँख की किरकिरी’ आदि कई उपन्यास हिन्दी रूप में दिखाई पड़े जिनके प्रभाव से इस उत्थान के अंत में आविर्भूत होनेवाले हिन्दी के मौलिक उपन्यासकारों का आदर्श बहुत कुछ ऊँचा हुआ। इस अनुवाद विधान में योग देनेवालों में पं. ईश्वरीप्रसाद शर्मा और पं. रूपनारायण पांडेय विशेष उल्लेख योग्य हैं। बंगभाषा के अतिरिक्त उर्दू, मराठी और गुजराती के भी कुछ उपन्यासों के अनुवाद हिन्दी में हुए पर बंगला की अपेक्षा बहुत कम। काशी के बाबू गंगाप्रसाद गुप्त ने ‘पूना में हलचल’ आदि कई उपन्यास उर्दू से अनुवाद करके निकाले। मराठी से अनूदित उपन्यासों में बाबू रामचंद्र वर्मा का ‘छत्रसाल’ बहुत उत्कृष्ट है। अंग्रेजी के दो ही चार उपन्यासों के अनुवाद देखने में आए, जैसे, रेनल्ड्स कृत ‘लैला’ और ‘लंडन रहस्य’। अंग्रेजी के प्रसिद्ध उपन्यास ‘टाम काका की कुटिया’ का भी अनुवाद हुआ”
इसी प्रकार उन्होंने हिंदी नाटक के इतिहास के संदर्भ में भी विचार करते समय अनुवाद पर महत्त्वपूर्ण रूप से विचार करते हुए लिखा है, “जैसा कि पहले कहा जा चुका है, भारतेंदु के पीछे नाटकों की ओर प्रवृत्ति बहुत कम हो गई। नाम लेने योग्य अच्छे मौलिक नाटक बहुत दिनों तक दिखाई न पड़े। अनुवादों की परंपरा अलबत्ता चलती रही।” शुक्ल जी ने इस बीच के अंतराल में लिखे गए प्रमुख नाटकों के अनुवाद का भी इतिहास दिया है। उन्होंने लिखा है, “बंग भाषा के अनुवाद – बाबू राम कृष्ण वर्मा द्वारा ‘वीरनारी’, ‘कृष्ण कुमारी’ और ‘पद्मावती’ नाटकों का उल्लेख पहले हो चुका है। संवत 1950 के पीछे गहमर (जिला गाजीपुर) के बाबू गोपाल राम ने ‘वनवीर’, ‘बभ्रुवाहन; ‘देशदशा’, ‘विद्या विनोद’ और रविंद्र बाबू के ‘चित्रंगदा’ का अनुवाद किया।
द्वितीय उत्थान के अंतिम भाग में पंडित रूप नारायण पांडे ने गिरीश बाबू के ‘पतिव्रता’ क्षीरोदप्रसाद विद्या विनोद के ‘खानजहां’ रवींद्र बाबू के ‘अचलायतन’ तथा द्विजेंद्र लाल राय के ‘उस पार’, ‘शाहजहां’, ‘दुर्गादास’, ‘तारावाई’ आदि कई नाटकों के अनुवाद प्रस्तुत किए। अनुवादकों की भाषा अच्छी खासी हिंदी है और मूल के भावों को ठीक-ठीक व्यक्त करती है| इन नाटकों के संबंध में यह समझ रखना चाहिए कि इनमें बंगवासियों की आवेशशील प्रकृति का आरोप अनेक पात्रों में पाया जाता है, जिससे बहुत से इतिहास प्रसिद्ध व्यक्तियों के क्षोवपूर्ण लंबे भाषण उनके अनुरूप नहीं जान पड़ते। प्राचीन एतिहासिक व्रत लेकर लिखे हुए नाटकों में उस काल की संस्कृति और परिस्थिति का संगठन नहीं प्रकट होता।
अंग्रेजी से अनुवाद – जयपुर के पुरोहित गोपीनाथ एम.ए. ने सं. 1950 के कुछ आगे पीछे शेक्सपियर के इन तीन नाटकों के अनुवाद किए। रोमियो जूलियट (प्रेम लीला के नाम से), ऐज यू लाइक इट और वेनिस का व्यापारी। उपाध्याय बद्रीनारायण चौधरी के छोटे भाई पंडित मथुरा प्रसाद चौधरी ने संवत 1950 में मैकबेथ का बहुत अच्छा अनुवाद ‘साहसेंद्र साहस’ के नाम से प्रकाशित किया। इसके उपरांत संवत 1967 के लगभग हेमलेट का एक अनुवाद ‘जयंत’ के नाम से निकला जो वास्तव में मराठी अनुवाद का हिंदी अनुवाद था।
संस्कृत के अनुवाद – संस्कृत के नाटकों के अनुवाद के लिए रायबहादुर लाला सीताराम बी.ए. सदा आदर के साथ स्मरण किए जाएंगे। भारतेंदु की मृत्यु से 2 वर्ष पहले ही उन्होंने संस्कृत काव्यों के अनुवाद में लग्गा लगाया और संवत 1940 में मेघदूत का अनुवाद घनाक्षरी शब्दों में प्रकाशित किया। इसके उपरांत बराबर किसी ने किसी नाटक का अनुवाद करते रहे। संवत 1944 में उनका ‘नागानंद’ अनुवाद निकला। तो धीरे-धीरे उन्होंने मृच्छकटिक, महावीर चरित्र, उत्तररामचरितम्, मालतीमाधव, मालविकाग्निमित्र का भी अनुवाद कर डाला। यद्यपि पद्य भाग के अनुवाद में लाला साहब को वैसे ही सफलता नहीं हुई पर उनकी हिंदी बहुत सीधी सादी सरल और आडंबरशून्य है। संस्कृत का भाव उसमें इस ढंग से लाया गया है कि कहीं से संस्कृतपन या जटिलता नहीं आने पाई है। भारतेंदु के समय में वे काशी के क्वींस कॉलेज के सेकंड मास्टर थे। पीछे डिप्टी कलेक्टर हुए और अंत में शांतिपूर्वक प्रयाग में आ रहे जहां 2 जनवरी 1937 को उनका साकेतवास हुआ।
संस्कृत के पुराण ग्रंथों के अनुवादक, रामचरित्रमानस, बिहारी सतसई के टीकाकार सनातन धर्म के प्रसिद्ध व्याख्याता मुरादाबाद के पंडित ज्वाला प्रसाद मिश्र ने वेणीसंहार और अभिज्ञान शाकुंतलम के हिंदी अनुवाद प्रस्तुत किए। संस्कृत की ‘रत्नावली नाटिका’ हरिश्चंद्र को बहुत पसंद थी और उसके कुछ अंश का अनुवाद उन्होंने किया था पर पूरा न कर सके। भारत मित्र के प्रसिद्ध संपादक, हिंदी के बहुत ही सिद्धहस्त लेखक बाबू बालमुकुन्द गुप्त ने उक्त नाटिका का पूरा अनुवाद अत्यंत सफलतापूर्वक किया।
संवत 1970 में पंडित सत्यनारायण कविरत्न ने भवभूति के ‘उत्तर रामचरित्र’ का और पीछे ‘मालती माधव’ का अनुवाद किया| कविरत्न जी के यह दोनों अनुवाद बहुत ही सरस हुए जिनमें मूल के भावों की रक्षा का भी पूरा ध्यान रखा गया है। अधिकतर ब्रजभाषा के सवैयो में है जो पढ़ने में बहुत मधुर हैं| इन पदों में खटकने वाली केवल दो बातें कहीं-कहीं मिलती है| पहली बात तो यह है कि ब्रज भाषा साहित्य में सुकृत शब्दों के अतिरिक्त वह कुछ स्थलों पर ऐसे शब्द भी लाए हैं जो एक भू-भाग तक ही (चाहे वह ब्रजमंडल के अंतर्गत ही क्यों ना हो) परिमित है। शिष्ट साहित्य में ब्रज मंडल के भीतर बोले जाने वाले शब्द नहीं ग्रहण किए हैं। ब्रजभाषा देश की सामान्य काव्यभाषा रही है। अत: काव्यों में उसके वे ही शब्द लिए गए हैं जो बहुत दूर तक बोले जाते हैं और थोड़े बहुत सब स्थानों में समझ लिए जाते हैं| उदाहरण के लिए ‘सिदौसी’ शब्द लीजिए जो खास मथुरा वृंदावन में बोला जाता है, पर साहित्य में नहीं मिलता। दूसरी बात यह है कि कहीं कहीं श्लोकों का पूरा भाव लाने के प्रयत्न में भाषा दुरूह और अव्यवस्थित हो गई है”
नाटकों के ही समान कहानी के विकास और अनुवाद के संबंध पर भी उन्होंने अपने महत्त्वपूर्ण विचार दिए हैं। उन्होंने लिखा है, “अंग्रेजी की मासिक पत्रिकाओं में जैसी छोटी छोटी आख्यायिकाएँ या कहानियाँ निकला करती हैं वैसी कहानियों की रचना ‘गल्प’ के नाम से बंगभाषा में चल पड़ी थीं। ये कहानियाँ जीवन के बड़े मार्मिक और भावव्यंजक खंडचित्रों के रूप में होती थीं। द्वितीय उत्थान की सारी प्रवृत्तियों का आभास लेकर प्रकट होनेवाली ‘सरस्वती’ पत्रिका में इस प्रकार की छोटी कहानियों के दर्शन होने लगे। ‘सरस्वती’ के प्रथम वर्ष (संवत 1957) में ही पं. किशोरीलाल गोस्वामी की ‘इंदुमती’ नाम की कहानी छपी जो मौलिक जान पड़ती है। इसके उपरांत तो उसमें कहानियाँ बराबर निकलती रहीं पर ये अधिकतर बंगभाषा से अनूदित या छाया लेकर लिखी होती थीं। बंगभाषा से अनुवाद करनेवालों में इंडियन प्रेस के मैनेजर बाबू गिरिजाकुमार घोष, जो हिन्दी कहानियों में अपना नाम ‘लाला पार्वतीनंदन’ देते थे, विशेष उल्लेख योग्य हैं। उसके उपरांत ‘बंगमहिला’ का स्थान है जो मिरजापुर निवासी प्रतिष्ठित बंगाली सज्जन बाबू रामप्रसन्न घोष की पुत्री और बाबू पूर्णचंद्र की धर्मपत्नी थीं। उन्होंने बहुत सी कहानियों का बंगला से अनुवाद तो किया ही, हिन्दी में कुछ मौलिक कहानियाँ भी लिखीं जिनमें से एक थी ‘दुलाईवाली’ जो संवत् 1964 की सरस्वती (भाग 8, संख्या 5) में प्रकाशित हुई। …
इनमें से यदि मार्मिकता की दृष्टि से भावप्रधान कहानियों को चुनें तो तीन मिलती हैं, ‘इंदुमती’, ‘ग्यारह वर्ष का समय’ और ‘दुलाईवाली’। यदि ‘इंदुमती’ किसी बंगला कहानी की छाया नहीं है तो हिन्दी की यही पहली मौलिक कहानी ठहरती है। इसके उपरांत ‘ग्यारह वर्ष का समय’ फिर ‘दुलाईवाली’ का नंबर आता है”
उपन्यास, नाटक और कहानी से आगे बढ़कर जब शुक्ल जी आलोचना और निबंध के विकास की चर्चा पर आते हैं तब भी अनुवाद के योगदान की चर्चा करना नहीं भूलते हैं। उन्होंने लिखा है कि “इस उत्थानकाल के आरम्भ में ही निबंध का रास्ता दिखाने वाले दो अनुवाद ग्रन्थ प्रकाशित हुए- बेकन विचार रत्नावली’ (अंग्रेजी के बहुत पुराने क्या पहले निबंध लेखक लार्ड बेकन के कुछ निबंधों का अनुवाद और निबंधमालादर्श (चपलुनकर के मराठी निबंधों का अनुवाद)। पहली पुस्तक महावीर प्रसाद जी द्विवेदी की ही है और दूसरी पंडित गंगाप्रसाद अग्निहोत्री की। उस समय आशा हुई थी कि इन अनुवादों के पीछे वे दोनों महाशय शायद उसी प्रकार के मौलिक निबंध लिखने में हाथ लगाये पर ऐसा ना हुआ। मासिक पत्रिकाएं इस द्वितीय उत्थान के भीतर बहुत सी निकली पर उनमें अधिकतर लेख ‘बातों का संग्रह’ के रूप में ही रहते थे, लेखकों के अंत:प्रयास से निकली विचारधारा के रूप में नहीं। इस काल के भीतर जिनकी कुछ कृतियाँ निबंधकोटि में आ सकती है उनका संक्षेप में उल्लेख किया जाता है।” जबकि महावीर प्रसाद द्वेदी की आलोचना पुस्तक के बारे में लिखते हैं, “इस प्रकार की पहली पुस्तक पं. महावीर प्रसाद द्विवेदी की ‘हिंदी कालिदास की आलोचना’ थी जो इस द्वितीय उत्थान के आरम्भ में ही निकली। इसमें लाला सीताराम बी.ए. के अनुवाद किये हुए नाटकों के भाषा तथा भाव संबंधी दोष् बड़े विस्तार से दिखाए गए हैं। यह अनुवादों की समालोचना थी। अत: भाषा की त्रुटियों और मूलभाव के विपर्यय आदि के आगे जा ही नहीं सकती थी। दूसरी बात है कि इसमें दोषों का ही उल्लेख हो सका। गुण नहीं ढूँढे गए।
खडी बोली हिंदी में कविता करने की शुरुआत भी आधुनिक युग की प्रमुख विशेषता है, और बड़ी दिलचस्प बात यह है कि उपर्युक्त विधाओं के समान कविता की प्रथम पुस्तक का संबंध भी अनुवाद से ही है। ‘एकांतवासी योगी’ श्रीधर पाठक की अनुदित रचना है। श्रीधर पाठक के संदर्भ में उन्होंने लिखा है, “एकांतवासी योगी’ के बहुत दिनों पीछे पं. श्रीधर पाठक ने खडी बोली में और भी रचनाएं की। खडी बोली की इनकी दूसरी पुस्तक ‘श्रांत पथिक’ (गोल्डस्मिथ के ट्रेवलर का अनुवाद) निकली। इनके अतिरिक्त खडी बोली में फुटकल कविताएं भी पाठक जी ने बहुत सी लिखी। मन की मौज के अनुसार कभी-कभी ये एक ही विषय के वर्णन में दोनों बोलियों के पद्य रख देते थे। खडी बोली और ब्रजभाषा दोनों में ये बराबर कविता करते रहे। ‘ऊजड़ ग्राम’ (डेजर्टेड विलेज) इन्होंने ब्रजभाषा में ही लिखा। अंग्रेजी और संस्कृत दोनों के काव्य साहित्य का अच्छा परिचय रखने के कारण हिंदी कवियों में पाठक जी की रूचि बहुत ही परिष्कृत थी। शब्दशोधन में तो पाठक जी अद्वितीय थे। जैसे चलती और रसीली इनकी ब्रजभाषा होती थी, वैसा ही कोमल और मधुर संस्कृत पदविन्यास भी। ये वास्तव में एक बड़े प्रतिभाशाली, भावुक और सुरुचि संपन्न कवि थे। भद्दापन इनमें न था- न रूप रंग में न भाषा में न भाव में न चाल में न भाषण में।”
द्विवेदी युग में अनुदित कविता कैसे कविता लेखन का माहौल बना रही थी इसके संदर्भ में शुक्ल जी ने लिखा है, “सुधार चाहने वालों में कुछ लोग नए-नए विषयों की ओर प्रवृत्त खड़ी बोली की कविता को ब्रजभाषा काव्य की सी ललित पदावली तथा रसात्मकता और मार्मिकता से समन्वित देखना चाहते थे। जो अंग्रेजी या अंग्रेजी के ढंग पर चली हुई बंगला की कविताओं से प्रभावित थे वे कुछ लाक्षणिक वैचित्र्य, व्यंजक चित्रविन्यास और रुचिर अन्योक्तियाँ देखना चाहते थे। श्री पारसनाथ सिंह के किए हुए बंगला कविताओं के हिंदी अनुवाद सरस्वती आदि पत्रिकाओं में संवत 1967 (सन 1910) से ही निकलने लगे थे। ग्रे, वर्ड्सवर्थ आदि अंग्रेजी कवियों की रचनाओं के कुछ अनुवाद भी (जैसे, जीतनसिंह द्वारा अनुदित वर्ड्सवर्थ का ‘कोकिल’) निकले। अत: खड़ी बोली की कविता जिस रूप में चल रही थी उससे संतुष्ट न रहकर द्वितीय उत्थान के समाप्त होने से कुछ पहले ही कई कवि खड़ी बोली काव्य को कल्पना का नया रूप रंग देने और उसे अधिक अंतर्भाव व्यंजक बनाने में प्रवृत्त हुए जिनमें प्रधान थे सर्वश्री मैथिलीशरण गुप्त, मुकुटधार पांडेय और बदरीनाथ भट्ट । कुछ अंग्रेजी ढर्रा लिए हुए जिस प्रकार की फुटकर कविताएँ और प्रगीत मुक्तक (रिलिक्स) बंगला में निकल रहे थे, उनके प्रभाव से कुछ विश्रृंखल वस्तुविन्यास और अनूठे शीर्षकों के साथ चित्रमयी, कोमल और व्यंजक भाषा में इनकी नए ढंग की रचनाएं संवत 1970-71 से ही निकलने लगी थीं जिनमें से कुछ के भीतर रहस्य भावना भी रहती थी” इसी प्रकार आगे उन्होंने छायावाद हिंदी में कैसे आया, इस पर विचार करते हुए भी अनुवाद के महत्त्व की और संकेत किया है।
शुक्ल जी ने सिर्फ आधुनिक साहित्य की विभिन्न विधाओं के विकास में अनुवाद के महत्त्व पर ही विचार नहीं किया है, अपितु उन्होंने इसके साथ-साथ उसके स्वरूप को लेकर भी टिप्पणियाँ की है। एक स्थान पर वे लिखतें हैं, “बंगला, मराठी, उर्दू, अंग्रेजी के अनुवाद का वह तूफान जो पचीस तीस वर्ष पीछे चला और जिसके कारण हिन्दी का स्वरूप ही संकट में पड़ गया था, उस समय नहीं था। उस समय ऐसे लेखक न थे जो बंगला की पदावली और वाक्य ज्यों के त्यों रखते हों या अंग्रेजी वाक्यों और मुहावरों का शब्द-प्रति-शब्द अनुवाद करके हिन्दी लिखने का दावा करते हों। उस समय की हिन्दी में न ‘दिक्-दिक् अशांति थी, न काँदना, सिहरना और छल छल अश्रुपात’, न ‘जीवन होड़’ और ‘कवि का संदेश’ था, न ‘भाग लेना और स्वार्थ लेना’।” शुक्ल जी के इस कथन से स्पष्ट हो रहा है कि भारतेंदु के बाद अनुदित रचनाओं की जो बाढ़ आई उसमें अनुवाद तो बहुत अधिक मात्रा में किया गया, लेकिन उसकी मात्रा के साथ ही उसके स्तर में भी बदलाब आता गया।
अनुवाद के स्तर के प्रति शुक्ल जी कितने सचेत थे इसका परिचय उनके एक और कथन से हमें चलता है। उन्होंने लिखा है कि “भाषा बिगड़ने का एक और सामान दूसरी ओर खड़ा हो गया था। हिन्दी के पाठकों का अब वैसा अकाल नहीं था, विशेषत: उपन्यास पढ़नेवालों का। बंगला उपन्यासों के अनुवाद धडाधड निकलने लगे थे। बहुत से लोग हिन्दी लिखना सीखने के लिए केवल संस्कृत शब्दों की जानकारी ही आवश्यक समझते थे जो बंगला की पुस्तकों से प्राप्त हो जाती थी। यह जानकारी थोड़ी बहुत होते ही वे बंगला से अनुवाद भी कर लेते थे और हिन्दी के लेख भी लिखने लगते थे। अत: एक ओर अंग्रेजीदानों की ओर से ‘स्वार्थ लेना’, ‘जीवन होड़’, ‘कवि का संदेश’, ‘दृष्टिकोण’ आदि आने लगे; दूसरी ओर बंगभाषाश्रित लोगों की ओर से ‘सिहरना’, ‘काँदना’, ‘बसंत रोग’ आदि। इतना अवश्य था कि पिछले कैंडे क़े लोगों की लिखावट उतनी अजनबी नहीं लगती थी जितनी पहले कैंड़ेवालों की। बंगभाषा फिर भी अपने देश की और हिन्दी से मिलती जुलती भाषा थी। उसके अभ्यास से प्रसंग या स्थल के अनुरूप बहुत ही सुंदर और उपयुक्त संस्कृत शब्द मिलते थे। अत: बंगभाषा की ओर जो झुकाव रहा उसके प्रभाव से बहुत ही परिमार्जित और सुंदर संस्कृत पदविन्यास की परंपरा हिन्दी में आई, यह स्वीकार करना पड़ता है।”
उपर्युक्त विश्लेषण से यह भलीभांति स्पष्ट हो जाता है कि है कि शुक्ल जी ने अपने ‘हिंदी साहित्य का इतिहास’ में न केवल हिंदी साहित्य का इतिहास लिखा है, बल्कि उसमें हिंदी के अनुदित साहित्य का भी इतिहास लिखने का सराहनीय प्रयास किया है। इतना ही नहीं उन्होंने इसमें अनुदित साहित्य की मुकम्मल आलोचना और अनुदित साहित्य की आलोचना के प्रतिमान को निर्मित करने की भी शुरुआत की है। अब हम संक्षेप में शुक्ल जी द्वारा किए गए मौलिक अनुवाद कार्य पर विचार कर सकते हैं, जो इस प्रकार है-
हिंदी अनुवादक के रूप में आचार्य रामचंद्र शुक्ल –
आचार्य रामचंद्र शुक्ल ने निम्नलिखित रचनाओं का अनुवाद किया है-
सन 1901 ई. में जोसेफ एडिसन की रचना ‘प्लेजर्स ऑफ़ इमेजिनेशन’ का ‘कल्पना का आनंद’ नाम से अनुवाद किया जो बाद में सन 1905 ई. में नागरी प्रचारिणी सभा की पत्रिका में धारावाहिक रूप से प्रकाशित हुआ।
न्यूमन के ‘यूनिवर्सिटी लिटरेचर’ नामक निबंध का ‘साहित्य’ नाम से अनुवाद किया जो सन 1904 में सरस्वती पत्रिका में प्रकाशित हुआ|
टी. माधवराव की पुस्तक ‘माइनर हिंट्स’ का सन 1913 ई. में ‘राज्य शिक्षा प्रबंध’ नाम से अनुवाद|
एडम्स विलियम डेवन पोर्ट की पुस्तक ‘प्लेन लिविंग एंड हाई थिंकिंग’ का 1914 ई. में ‘आदर्श जीवन’ नाम से अनुवाद किया|
सन 1920 ई. में अर्न्स्ट हैकल की रचना ‘रिडल ऑफ़ द यूनिवर्स’ का ‘विश्वप्रपंच’ नाम से अनुवाद।
स्वानाबक के ‘मेगास्थनीज इंडिका’ का ‘मेगस्थनीज का भारतवर्षीय वर्णन’ जैसी पुस्तकों का अनुवाद भी आचार्य रामचंद्र शुक्ल ने किया है।
बंगला से राखलदास बंदोपाध्याय के उपन्यास शशांक का सन 1922 ई. में अनुवाद किया।
और सन 1922 ई. में ही एडविन आर्नल्ड के ‘लाइट ऑफ़ एशिया’ का ब्रज भाषा पद्य में ‘बुद्धचरित’ नाम से अनुवाद।
शुक्ल जी के उपर्युक्त सारे अनुदित साहित्य पर विस्तार से विचार करके ही अंतिम निष्कर्ष निकाले जा सकते हैं, फिर भी हम यहाँ संक्षेप में यह स्पष्ट करने का प्रयास करेंगे कि शुक्ल जी के उपर्युक्त अनुदित साहित्य का क्या महत्त्व रहा है? उनकी अनुवाद दृष्टि कितनी व्यापक रही है? अनुवाद से संबंधित उनका नजरिया कैसा रहा है? और उनकी अनुवाद शैली कैसी रही है?
आचार्य रामचंद्र शुक्ल द्वारा अनुदित रचनाओं को देखने पर यह स्पष्ट हो जाता है कि उन्होंने अपने समय की बहुत ही महत्त्वपूर्ण रचनाओं का अनुवाद किया है। उन्होंने समाज को नई दिशा देने वाली रचनाओं का अनुवाद किया है। हैकल की रचना रिड्ल ऑफ़ द यूनिवर्स प्रकाशित होने के साथ ही विश्वभर में तीव्र गति से लोकप्रिय हुई। इस पुस्तक ने पादरियों में खलबली मचा दी थी तथा इसके विरोध में बहुत कुछ दुष्प्रचार किया गया। लेकिन शुक्ल जी; जो कि आस्थिक थे, उन्होंने इस रचना का अनुवाद पूरी ईमानदारी के साथ किया। इस पुस्तक में भौतिकवादी सिद्धांतों पर विचार किया गया। हालाँकि इसको लिखा हैकल ने पूंजीवाद के समर्थन में था, लेकिन यह पुस्तक इतनी महत्त्वपूर्ण थी कि लेनिन ने यहाँ तक कहा कि “पूंजीवादी राजनीतिक विचारों के बावजूद लेखक की यह लोकप्रिय पुस्तिका पूंजीपति-वर्ग के विरुद्ध वर्ग-संघर्ष का हथियार बन गई।” इस पुस्तक के अनुवाद के संदर्भ में अनुवाद-आलोचक देवी शंकर नवीन लिखते हैं कि “उल्लेखनीय है कि इस सिद्धांत ग्रन्थ का हिंदी अनुवाद परम आस्तिक आचार्य रामचंद्र शुक्ल ने उस दौर में किया जब हिंदी में प्राणिशास्त्र की कोई पारिभाषित शब्दावली नहीं बनी थी।”
आचार्य रामचंद्र शुक्ल जिस समय साहित्य लेखन कर रहे थे, उस समय पश्चिम में विज्ञान के क्षेत्र में नए-नए अविष्कार और साहित्य के क्षेत्र में नए-नए सिद्धांतों का प्रतिपादन हो रहा था। शुक्ल जी उन सब को देख रहे थे तथा साथ ही साथ भारत के संदर्भ में उसका क्या महत्त्व हो सकता है? इस पर भी चिंतन कर रहे थे। इसीलिए साहित्य के क्षेत्र में जब वे छायावाद के संदर्भ में विचार करते हैं तो पश्चिम से लेकर बंगला तक की परंपरा पर विचार करते हुए छायावाद पर अपने विचार प्रस्तुत करते हैं। समाज के उपयोग के लिए शुक्ल जी पश्चिम के ज्ञान-विज्ञान से भी भारतीय समाज को परिचित कराना आवश्यक मानते थे। विश्वप्रपंच की भूमिका के शुरुआत में ही आचार्य रामचंद्र शुक्ल ने लिखा है कि “गत शताब्दी में योरोप में ज्यों-ज्यों भौतिक विज्ञान, रसायन, भूगर्भविद्या, प्राणिविज्ञान, शरीरविज्ञान इत्यादि के अंतर्गत नई-नई बातों का पता लगने लगा और नए-नए सिद्धांत स्थिर होने लगे त्यों-त्यों जगत के संबंध में लोगों की जो भावनाएं थीं वे बदलने लगीं। जहाँ पहले लोग छोटी से छोटी बात के कारण को न पाकर उसे ईश्वर की कृति मान संतोष कर लेते थे वहाँ चारों ओर नाना विज्ञानों के द्वारा कार्य-कारण की ऐसी विस्तृत श्रृंखला उपस्थित कर दी गई कि किसी को बीच ही में ठिठकने की आवश्यकता न रह गई।”
विश्वप्रपंच की लम्बी भूमिका में आचार्य रामचंद्र शुक्ल ने विज्ञान से संबंधित उस समय के तात्कालिक विचारों पर महत्त्वपूर्ण रूप से चर्चा की है। परमाणु की संरचना तक पर उसमें उन्होंने विचार किया। एक साहित्य का लेखक विज्ञान के सिद्धांतों पर विचार कर रहा है यह एक बड़ी बात है। इससे यह स्पष्ट होता है कि शुक्ल जी एक बड़ी दृष्टि के साथ अनुवाद कार्य कर रहे थे।
आधुनिक काल की शुरुआत के साथ ही भारतीय समय को दो चीजों पर प्रमुख रूप से विचार करने की आवश्यकता थी। उनमें एक विज्ञान और दूसरा इतिहास। विज्ञान से संबंधित रचना का अनुवाद उन्होंने जो किया उसकी चर्चा हम कर चुकें है। इतिहास से संबंधित उन्होंने मेगास्थिनिज की पुस्तक ‘मेगास्थनीज इंडिका’ का ‘भारतवर्षीय वर्णन’ नाम से अनुवाद किया।
एक महत्त्वपूर्ण अनुवाद आचार्य रामचंद्र शुक्ल ने सर माधवराव की ‘माइनर हिंट्स’ नामक पुस्तक का ‘राज्यप्रबंध शिक्षा’ नाम से का अनुवाद किया है। माधवराव बडौदा राज्य में नौकरी करते थे, उन्होंने राज्य प्रशासन की तात्कालिक स्थिति को देख कर इस पुस्तक को लिखने का विचार किया। इस पुस्तक का अनुवाद करने के उद्देश्य के संदर्भ में आचार्य रामचंद्र शुक्ल ने लिखा है कि “आज इस अनुवाद द्वारा हिंदी पाठकों के सामने देशी राज्यों के प्रबंध आदि के विषय में ऐसे पुरुष का अनुभव रक्खा जाता है जिसने अपने नीति बल और व्यवस्था कौशल से भारतवर्ष के दो बड़े बड़े राज्यों को चौपट होने से बचाया था। जिन लोगों ने राजा सर टी. मधावराव का नाम सुना होगा वे यह भी जानते होंगे कि उनकी सारी आयु देशी राज्यों की शासन पद्धति सुधारने में बीती थी। वे बड़े भारी नीतिज्ञ और राज्य संचालक थे।”
आचार्य रामचंद्र शुक्ल ने विज्ञान, इतिहास और राज्य प्रबंध से संबंधित इन राचानाओं के अतिरिक्त साहित्यिक रचानों का अनुवाद भी किया है। राखलदास बंदोपाध्याय के उपन्यास शशांक का अनुवाद उन्होंने किया। हालाँकि वर्तमान समय में यह अधिक चर्चित नहीं है, लेकिन जिस समय आचार्य रामचंद्र शुक्ल ने इसका अनुवाद किया था, उस समय यह एक महत्त्वपूर्ण रचना रही थी। शशांक उपन्यास के माध्यम से शुक्ल जी ने अनुवाद में उपन्यास की परंपरा को आगे बढ़ाने का काम किया।
आचार्य रामचंद्र शुक्ल ने सिर्फ बंगला से ही अनुवाद नहीं किया है एक तरह से अनुवाद की शुरुआअत ही जोसेफ एडिसन की रचना ‘प्लेजर्स ऑफ़ इमेजिनेशन’ का ‘कल्पना का आनंद’ नाम से अनुवाद करने के साथ की। उन्होंने यह अनुवाद सन 1905 ई. में किया। इससे यह भी स्पस्ट होता है कि बाद में आचार्य रामचंद्र शुक्ल ने जब हिंदी साहित्य का इतिहास लिखा तो छायावाद के संदर्भ में विदेशी प्रभाव पर जो चर्चा उन्होंने की उसका चिंतन की शुरुआत इसके माध्यम से बहुत पहले ही हो चुकी थी, जिसका प्रयोग उन्होंने छायावाद के संदर्भ में किया। इस अनुवाद में उन्होंने कुछ संस्कृत की कविताओं के अनुवाद भी अपनी तरफ से जोड़े हैं। इसी प्रकार शुक्ल जी ने न्यूमन के ‘यूनिवर्सिटी लिटरेचर’ का ‘साहित्य’ नाम से अनुवाद सन 1904 में किया। एडविन आर्नल्ड के ‘लाइट ऑफ़ एशिया’ का ब्रज भाषा पद्य में ‘बुद्धचरित’ नाम से अनुवाद भी आचार्य रामचंद्र शुक्ल ने किया। इन बातों से यह स्पस्ट है कि आचार्य रामचंद्र शुक्ल की पकड़ बंगला, ब्रज, संस्कृत और अंग्रेजी पर अच्छी थी। जिसके कारण ही वे इतने महत्त्वपूर्ण अनुवाद अलग-अलग भाषाओं से हिंदी में कर पाए। और वो भी उस समय में जब हिंदी का अपना भी एक मानक रूप नहीं था और विज्ञान जैसे नए विषय के लिए भी किसी प्रकार की पारिभाषिक शब्दावली नहीं थी। ऐसे दौर में आचार्य रामचंद्र शुक्ल को अनुवाद करने में कई प्रकार की समस्याओं का सामना करना पड़ा होगा, फिर भी उन्होंने इतनी महत्त्वपूर्ण रचनाओं का अनुवाद किया और अनुवाद की परंपरा को बनाए रखते हुए आगे बढाया। “इस प्रकार समग्र रूप से कहा जा सकता है कि आचार्य शुक्ल के अनुवाद-कर्म में आचार्य शुक्ल के गंभीर दायित्व-बोध के व्यक्तित्व की झलक मिलती है| इनकी साहित्य साधना के कारण हिंदी समाज नवीन ज्ञान-विज्ञान से परिचित ही नहीं हुआ बल्कि कई बाह्य आडम्बरों से भी मुक्त हुआ| साथ ही साथ यह भी देखने को मिलता है कि वे केवल साहित्य के ही मर्मज्ञ नहीं थे बल्कि वे भूगोल, इतिहास, भाषा विज्ञान, भौतिक विज्ञान और दर्शन में भी दक्ष थे, जिसका उत्तरोत्तर लाभ हिंदी समाज को एक हद तक अनुवाद से मिला|” अत: हम निश्चित रूप में अनुवाद के क्षेत्र में आचार्य रामचंद्र शुक्ल के स्थान को महत्त्वपूर्ण मान सकते हैं।

 

वीरेन्द्र कुमार मीना

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