सिनेमा वर्तमान युग में समस्त कलात्मक अभिव्यक्ति के माध्यमों में सबसे सशक्त माध्यम बनकर उभरा है। किसी भी जाति, धर्म, वर्ग के लोगों को सीधे प्रभावित करने में यह पूर्णतया समर्थ है। दृश्य एवं श्रव्य माध्यम के साथ ही कथा, अभिनय, संगीत और वातावरण के सहयोग से कोई भी संदेश बहुत तेजी से पहुंचा सकता है। सिनेमा से पूर्व साहित्य समाज को निर्देशित करता था। किंतु  सिनेमा ने आगमन के बाद यह समाज को सीधे निर्देशित ही नहीं, प्रभावित करने का कार्य भी किया है।

स्वयं राष्ट्रपिता महात्मा गांधी ने भी स्वीकारा था कि ,बाइस्कोप में ‘राजा हरिश्चंद्र’ देखकर उनके जीवन की दिशा बदल गई थी । प्रत्येक कला रूप में साहित्य का कुछ न कुछ अंश होता है। इसलिए प्रत्येक सिनेमा भी किसी न किसी भाषा के साहित्य, (चाहे वह भारतीय हो, लोक प्रधान हो ,या निर्देशी) से प्रभावित रहता है । सिनेमा का मेरुदंड साहित्य ही है । जिसके बल पर वह खड़ा रहता है।

पहली बार सन 1913 में दादा फाल्के द्वारा निर्मित फिल्म प्रदर्शित हुई। ‘राजा हरिश्चंद्र’ साहित्य से ही प्रभावित थी ।हालांकि ‘राजा हरिश्चंद्र’ से पूर्व सन 1896 से 1912 तक की अवधि में कई थिएटर कंपनियां बनीं , जहां फिल्मों का प्रदर्शन हुआ  ।

23 अप्रैल 1996 कोणार्क में सिनेमा के अविष्कारक एडिसन ने लगभग 50 फुट के सिनेमैटोग्राफ का पहला सार्वजनिक प्रदर्शन किया था । भारतीय सिनेमा में दादा साहब फाल्के पूर्व ज्योतिष सरकार ने सन 1905 में बंग -भंग के विरुद्ध फिल्म बनाई थी। किंतु इसे सरकार ने प्रतिबंधित कर दिया। सन 1900 सन 1930 तक की फिल्मों में भारतीय समाज को प्रेरित करने वाले नायकों पर आधारित पृष्ठभूमि का अनुपात अधिक था ।

पहली बो बोलती फिल्म ‘आलम आरा’ का सन 1927 फिल्म का निर्माण हुआ था  ।पहली बोलती फिल्म के बाद हिंदी की दुनिया में सिनेमा के उद्देशों पर गंभीरता से विचार प्रारंभ हुआ । इसके पूर्व किसी भी हिंदी पत्र-पत्रिकाओं में सिनेमा की चर्चा नहीं हुई थी। अब जबकि सिनेमा पर गंभीरता से चर्चा प्रारंभ हुई, तो साहित्य जगत में भी व्यवसायिकता के कारण लेखकों और साहित्यिक चिंतकों में विचार मंथन प्रारंभ हुआ। परिणामस्वरूप हिंदी जगत में कई शर्तों के साथ फिल्मों को मान्यता दी गई ।

मद्रास की फिल्म सेंसर बोर्ड ने युवा पीढ़ी पर फिल्मों के अच्छे -बुरे प्रभाव की जांच हेतु एक सीमित प्रश्नावली  बनाई।आचरण ,कर्तव्य, ज्ञान, दायित्व आदि से जुड़े प्रश्नों की सूची के साथ अभिभावकों के नाम कमेटी के सदस्यों का विशेष अनुरोध भी प्रसारित हुआ । यह प्रयास केवल भारत में ही नहीं, बल्कि यूरोप के कई देशों में हुआ ।फलत: 16 वर्ष से कम उम्र के लिए सिनेमा देखने पर पाबंदी लगाई गई ।इन सब के बाद भी सिनेमा के बढ़ते प्रभाव का असर पूरे देश और समाज पर पड़ा। भारतीय सिनेमा के बढ़ते प्रभाव पर एक लेख ‘भारतीय चित्रपट’ ,चांद पत्रिका ,लखनऊ जून 1937 में प्रकाशित हुआ। इसमें लेखक नंद गोपाल सिंह सहगल ने रंगमंच और सिनेमा की चर्चा करते हुए लिखा कि–” सिनेमा के कारण हिंदी राष्ट्रभाषा का पद प्राप्त कर सकती है साथ ही भारतीय नृत्य और कला के दूसरे रूपों को लोकप्रिय होने का अवसर मिल सकता है।”

साहित्य और सिनेमा दोनों में एक सामान्य बात है कि, दोनों ही समाज को प्रभावित करते हैं।

भारतीय फिल्मों का प्रारंभिक कथानक मूलत: धार्मिक था ।जिसके बारे में भारतीय जनमानस पहले से ही परिचित था। किंतु तीसरे दशक के प्रारंभ से बोलती फिल्मों के निर्माण में चर्चित धार्मिक कथानकों के साथ ही जागृत समाज की अभिव्यक्ति को फिल्म में दिखाने का प्रयास प्रारंभ हुआ । विदेशी नियंत्रण, राजनीतिक मोर्चा, सांस्कृतिक क्रांति के फलस्वरूप समाज में बदलते समाजशास्त्र और मनोविज्ञान की कूट अभिव्यक्ति सिनेमा में मिली । देश के प्रति मर मिटने की भावना, पति द्वारा देश पर प्राण न्योछावर करना,तथा पत्नी का परिवार के प्रति पूर्ण त्याग, निष्ठा बलिदान आदि भावपूर्ण फिल्में बनाई गईं ।आजादी बाद सामंतशाही, मिल- मालिक, मजदूर, वर्ग संघर्ष आदि सन 1970 तक फिल्मों के विषय बनें। ” मदर इंडिया “एक ऐसी सशक्त फिल्म बनीं। जिसने एक तरफ भारतीय लोक संस्कृति को प्रस्तुत किया, वहीं दूसरी ओर स्त्री की लोक लाज बचाने में मां की भूमिका से ऊपर स्त्री भाव को दिखाया। इस फिल्म में स्त्री मनोविज्ञान सशक्त भाव में उभरा ।

आजादी के बाद पाले गए स्वराज्य के स्वप्न का भ्रम धीरे -धीरे भारतीय जनमानस की आंखों में चुभने लगा ।पहले गोरे मालिक थे, अब अपने ही रक्त वर्ण के काले लोग मालिक बन गए थे। शिक्षा, रोजगार हेतु समाज में ग्रामों से शहरों की ओर पलायन बढ़ने लगा । फलत: जीवन की जद्दोजहद, शहर का व्यक्तिवादी और आत्मा विहीन माहौल तथा रोजगार की तलाश ने व्यक्ति में कुंठा और तनाव को पैदा किया । इसके अलावा शहरी जीवन की अस्त- व्यस्त जीवन शैली, प्रशासनिक दुर्बलताएं, लालफीताशाही ,नौकरशाही ,अयोग्य पात्रों को मिलती सफलता ने युवा मन में आक्रोश भरा । राजनीतिज्ञों और युवाओं का अपने स्वार्थ हेतु प्रयोग तथा बाद में उपेक्षा ने युवा मन में आक्रोश भरा । हिंसा और बदले की भावना को बल मिला । और इन्हीं भावात्मक अभिव्यक्तियों को फिल्मों में सजीव होता देख आक्रोशित मन क्षणिक सुखवाद में डूबता गया। ‘जंजीर’ ,’शोले’,’त्रिशूल ‘,’मुकद्दर का सिकंदर, ‘अंधा कानून ‘,’अर्धसत्य’ ‘अंकुर’ ‘अंकुर’, ‘लव सेक्स और धोखा’, ‘राज-2’, ‘हेट स्टोरी’, ‘जिस्म- 2’, ‘डर्टी पिक्चर ‘,’हीरोइन’, ‘सात खून माफ’, ‘माफिया’, ‘गैंग ऑफ वासेपुर’, ‘कोयला,’ ‘बैंडिट क्वीन’, ‘शंघाई’, ‘राजनीति ‘,’चक्रव्यूह’, आदि फिल्में इसी भारतीय युवा मन के आक्रोशित मनोविज्ञान का चित्रण करती हैं । हालांकि इस दौरान भारतीय सामाजिक- सांस्कृतिक मूल्यों परिवार और मित्र आदि संबंधों में मधुरता पर को गुलजार ऋषिकेश मुखर्जी वासु भट्टाचार्य जैसे निर्देशकों ने समझकर अपनी सशक्त कलात्मक फिल्म अभिव्यक्तियां दीं।

कला के सभी पक्षों में प्रेम और हिंसा समान रूप से प्रभाव डालती रही है । भारतीय समाज में राम- सीता आदर्श दंपत्ति के, राधा-कृष्ण उत्कृष्ट प्रेम के और मीरा- कृष्ण में एकतरफा दांपत्य भाव  दिखता है ।किंतु सिनेमा के प्रेम ने इससे पृथक संसार रचा। भारतीय सिनेमा में भी ‘हीर -रांझा ‘,लैला मजनू’ ,’शीरी -फरहाद’ ‘रब ने बना दी जोड़ी ‘, दोस्ती ‘, ‘दोस्ताना’, ‘राम लखन’ में प्रेम और मित्रता को दिखाने का प्रयास किया गया । भारतीय प्रेम त्याग बलिदान समर्पण पर आधारित है किंतु सिनेमाई प्रेम प्रारंभ से ही देह- प्रधान रहा है  ।वह क्षणिक सुखवाद में विश्वास करता है । प्रिय को पाने के लिए परिवार ,समाज में संस्कृति, धर्म ,विचार ,दर्शन  नीति, परंपरा सबकी नसीहतें उसे बेड़ियां लगती हैं । जिसे तोड़ देने के लिए नायक और नायिका सदैव उद्यत रहते हैं।

भारतीय समाज में त्यागमय युक्त जीवन जीने को कहा गया है ।किंतु सिनेमा जगत भोगमय जीवन को महत्व देता है ।फलत: सिनेमा ने त्याग और बलिदान प्रेम से हटाकर केवल इसके विकृत रूप को प्रस्तुत किया । जैसे कि- विवाह पूर्व संबंध ,कुवांरी मां ,प्रेम के स्थान पर यौन तृप्ति, यौन कुंठा ,यौन लिप्सा ,यौन आकर्षण ,देह आकर्षण को ही उभारा गया ।

स्त्री भोग की वस्तु मात्र मान ली गई ,ना कि प्रेम की । ‘एक दूजे के लिए ‘और ‘बॉबी’ आदि अनेक फिल्मों में देह आधारित प्रेम मुख्य है , भावना आधारित नहीं।

समाज का विरोध,, मारधाड़ ,हिंसा ,प्रेम न पाने पर बलात्कार, यौन हिंसा (हालांकि यह प्रेम भाव खलनायक तक ही सीमित रहा ) आदि  द्वारा स्त्री प्राप्ति ।यही सिनेमाई प्रेम का सुपरहिट फार्मूला संभव है। हालांकि इस दौरान प्रेम पर आधारित फिल्मों में ‘आखिर क्यों’, ‘अमृत’, ‘देवदास ‘और ‘वीर जारा’ जैसी फिल्में भी है ।

जो जीवन के अंतिम दौर तक प्रेम का एक भाव लिए रहते हैं । हिंसा भारतीय सिनेमा का एक प्रमुख अंग बनकर उभरा। प्रारंभिक फिल्मों में तो कोड़ा, लाठी और पिस्तौल तक हिंसा सीमित थी ,किंतु एक्शन प्रधान फिल्मों के आगमन  ने नायक के बदले की भावना को अभिव्यक्ति देने के लिए मशीन गन ,एके-47, चाकू ,तलवार ,रॉड ,लोहे के सिक्कड़ ,फरसा,  लकड़ी चीरने वाली  मशीनों के साथ-साथ जंगली कुत्ते, घोड़े, हाथी ,शेर ,जानवरों का प्रयोग भी बखूबी दिखाया । जिसे दर्शकों में अधिक से अधिक रोमांच जागे। कटे-फटे ,क्षत-विक्षत शरीर के अंग और उनसे बहता खून ,रोते बच्चे ,सूनी मांग ,रोती- बिलखती स्त्री ,झोपड़े में लगी आग, झुलसते जानवर, आदि के द्वारा सिनेमा ने  आम जनता हिंसा को इतना बढ़ा दिया है कि, यदि यथार्थ में भी ऐसे दृश्य घटित हो जाएं तो जनमानस भावात्मक रूप से आंदोलित नहीं होता, बल्कि तटस्थ भाव से रह जाता है। सिनेमा ने धीरे-धीरे भारतीय समाज को भावना मूल्य, संस्कार के प्रति तटस्थ और उदासीन बना दिया। आज इस बात के मूल्यांकन की आवश्यकता है कि, संवाद का सबसे सशक्त कलात्मक माध्यम सिनेमा का रचनात्मक प्रभाव मृतप्राय हो चुका है ।

डॉ. प्रेरणा चतुर्वेदी
वाराणसी

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