संगीत

सुव्यवस्थित ध्वनियाँ जो रस की सृष्टि करे वह संगीत कहलाती है।गायन ,वादन और नृत्य तीनों के सामवेद को संगीत कहते हैं।भारतीय संगीत का जन्म वेद के उच्चारण के रूप में देखा जा सकता हैं।संगीत का सबसे प्राचीनतम ग्रन्थ है भरत मुनि का नाट्यशास्त्र।

संगीत और अध्ययम भारतीय संस्कृति का सुदृढ़ आधार है।भारतीय संस्कृति अध्यात्म प्रधान मानी जाती है।संगीत से अध्यात्मऔर मोक्ष की प्राप्ति के साथ भारतीय संगीत के प्राण भूततत्वों  रागों के द्वारा मन ,शांति ,योग  ,ध्यान ,मानसिक रोगों की चिकित्सा आदि  विशेष लाभ प्राप्त होते है।प्राचीन समय सर ही मानव संगीत की आध्यात्मिक एवं मसनमोहिनी शक्ति से प्रभावित होता आया है।

प्राचीन मनीषियों ने सृष्टि की उत्पत्ति नाद से मानी है।सम्पूर्ण ब्रह्मांड के जड़ चेतन में नाद व्याप्त है।इसीलिए इसे नाद ब्रह्म भी कहा जाता है।

अनादिनिधानं ब्रह्म शब्दतावायद क्षरं।

विवर्तते अर्थभावेन प्रक्रियाजग तोयतः।।

अर्थात संपूर्ण  संसार अप्रत्यक्ष रूप से संगीतमय है।संगीतआनंद की अनुभूति है।आनंद ईश्वर का स्वरूप है।योग व ज्ञान के सर्वश्रेष्ठ आचार्य श्री याज्ञवल्क्य  ने कहा है – संगीत एक प्रकार का योग है।इसमें साधन और साध्य दोनो  सुखरूप हैं।संगीत एक उपासना है।इस कला के माध्यम से मोक्ष की प्राप्ति होती है।संगीत मन को एकाग्र  करने वाली अद्भुत शक्ति है।

नृत्य

नृत्य भी मानवीय अभिव्यक्तियों का रसमय प्रदर्शन है।यह एक सार्वभौम कला है।जिसका जन्म मानव जीवन के साथ हुआ है।यह कला देवी देवताओं ,दैत्यों,मनुष्यों और पशु पक्षियों सभी को प्रिय है।अमृत मंथन के पश्चात  भगवान विष्णु ने मोहिनी रूप धरकर लास्य नृत्य के द्वारा ही तीनों लोकों को दैत्यों से मुक्ति दिलायी थी।

भारतीय संस्कृति और धर्म प्रारम्भ से ही नृत्य से जुड़े रहे हैं।स्वर्ग की अप्सराओं के मनमोहक नृत्य का शास्त्रों उल्लेख मिलता है।यह मनोरंजन का सुनफर साधन तो है ही आनंद का अद्भुत स्रोत भी है।भगवान शंकर तो साक्षात नटराज  मने गए हैं औरउनके पंच नृत्य  से संबंधित नृत्य सृष्टि की उत्पत्ति ,स्थिति एवं संहार का प्रतीक भी है।भगवान विष्णु के अवतार श्री कृष्ण सर्वश्रेष्ठ नृत्यवतर ही माने जाते हैं।इसीलिए उन्हें नटवर कहा जाता है।भारतीय संस्कृति एवं इतिहास में ऐसे अनेक प्रमाण मिलते हैं जिनसे सफल कलाओं के रूप में नृत्य की श्रेष्ठता सर्वमय प्रतीत होती है।

नृत्य का प्राचीनतम ग्रंथ नाट्यशास्त्र है।यद्यपि वैदिक काल मे भी नृत्य संबंधित सामग्री प्रचुर मात्रा में मिलती है।उस युग में। इसे व्यायाम के रूप में स्वीकार किया जस्ता था।शरीर को आरोग्य रखने के लिए नृत्यकला का सार्थक उपयोग किया जाता था।रामायण महाभारत में भी समय समय पर नृत्य के सुंदर दृष्टांत मिलते हैं।कालिदास के महत्वपूर्ण ग्रंथों में नृत्य के विवरण भारतीय संस्कृति की कलाप्रियता को ही दर्शाता है।

आज भी हमारे समाज में नृत्य संगीत को उतना ही महत्व दिया जाता है और नृत्य के बिना आज भी कोई उत्सव ,समारोह सम्पन्न नहीं होता।

भारत के विविध शास्त्रीय नृत्यों की अनवरत शिष्य परंपराएं इस सांस्कृतिक विरासत को अनेक पीढ़ियों से प्रवहमान बनाये हुए है।

लोक नृत्य :

उत्तर भारत ही नहीं संपूर्ण भारत लोग नृत्यो  से भरा है । प्रत्येक प्रांत में वहां के सुंदर लोकनृत्य मिल जाएंगे जैसे गुजरात में गरबा और पंजाब में भांगड़ा। मनुष्य के हृदय में उपजते  भावों को सरलता से व्यक्त करना है उनकी विशिष्टता है। लोक नृत्य में बाल किशोर युवा महिला पुरुष आदि सभी मुक्त भाव से सम्मिलित होते हैं।

लोक नृत्य की पहचान है उसकी पारंपरिक वेशभूषा है लेकिन इसमें वेशभूषा काकड़ा बंधन नहीं है। सदियों की गुलामी के कारण हमारे लोकनृत्य समाज में अपनी प्रतिष्ठा हो चुके थे किंतु स्वतंत्रता के बाद से उन्हें नई चेतना मिली है।

अब हम भारत के कुछ प्रसिद्ध लोक नृत्य ओं का संक्षिप्त वर्णन करेंगे।

  • गरबा नृत्य यह नित्य गुजरात प्रांत का एक लोकप्रिय नृत्य है इसमें केवल स्त्रियां सामूहिक रूप से नित्य करती हैं पुरुष भाग नहीं लेते हैं इसी तरह का नित्य जो पुरुषों के लिए है वह गरबी नृत्य कहलाता है अश्विन शुक्ल प्रतिपदा से यह नित्य गुजरात के घर घर में तथा गांव-गांव में आरंभ हो जाता है प्रथम नवरात्र को घर-घर में गर्वित को सजाया जाता है रात्रि के 8:09 बजे स्त्रियां अपने अपने घर के कामों से निवृत्त होकर उसे एक स्थान पर रखकर उसके चारों और एक गोल घेरा बनाती हैं और रात्रि में बहुत देर तक गरबा नृत्य करती हैं।
  • भांगड़ा नृत्य पंजाब का भांगड़ा नृत्य वीर रस प्रधान सामूहिक रोमांचक नित्य है अतः इस इसमें अपनी गति की प्रधानता रहती है वर्तमान समय में यह पंजाब में बहुत लोकप्रिय है ऐसे तो यह पुरुषों का नृत्य है किंतु कभी-कभी स्त्रियां भी ऐसे करती हैं किंतु पुरुषों और स्त्रियों का सम्मिलित नित्य अधिक प्रचलित नहीं है यह उल्लास और वीर भावना प्रदर्शित लोक नृत्य है अतः इस नृत्य का प्रदर्शन खुशी के अवसरों पर किया जाता है पुरुष नर्तक रंगीन लूंगी ढीला कुर्ता गले में माला कामदार वास्केट तथा सिर पर छोटी सी पगड़ी पहनते हैं मुख के भावों का कोई विशेष महत्व नहीं होता लय धीमी गति से प्रारंभ होती है और फिर तेज हो जाती है।
  • शिकारी नृत्य यह एक लोकप्रिय नृत्य है वास्तव में यह बंगाल और असम की पहाड़ी घाटियों के भीलो का एक लोक नृत्य है अब सभी समाज में स्त्री पुरुष अकेले अथवा सामूहिक रूप से करने लगे हैं कलाकार सुंदर वेशभूषा पहनता है जो बड़ा आकर्षक लगता है कमर के नीचे जानवर की खाल गले में माला कानों में बड़ी-बड़ी बालियां सिर पर लाल रंग की पट्टी और उस पर चिड़ियों के रंग-बिरंगे पर खोजते हैं पैरों में घुंघरू पर एक हाथ में धनुष बाण अथवा लंबी नुकीली बच्ची और दूसरे हाथ में चमड़े से बनी हुई दाल रहती है। देखने वालों को ऐसा मालूम पड़ता है मानो वह किसी शिकार की तलाश में घूम रहा हो ।

भारत के शास्त्रीय नृत्य

भारतीय नृत्य कला अत्यंत पुरानी कला है जिसका स्तोत्र नाटे वेद में निहित है भारत के अलग-अलग प्रांतों में शास्त्री आधार पर जिन तत्वों को ग्रहण किया गया उनमें शास्त्रीय ता के साथ-साथ लोग तत्वों का मिश्रण से कुछ नई शैलियों का जन्म हुआ और उसी के आधार पर लोक में सर्वाधिक प्रचलित नृत्य विधाएं भारतीय शास्त्रीय नृत्यों के नाम से जाने लगी जिसमें भरतनाट्यम उड़ीसी मोहिनीअट्टम कथकली मणिपुरी कुचीपुड़ी कत्थक और सत्रिय हैं।

  • भरतनाट्यम दक्षिण भारत में तमिलनाडु प्रदेश की प्रसिद्ध शैली का नाम भरतनाट्यम है इसकी परंपरा 2000 वर्षों की है इस नृत्य की शास्त्रीय पद्धति का सूत्र पात्र विशेष रूप से तंजावर में हुआ इसमें नृत्य और अभिनय की प्रधानता रहती है दक्षिण भारतीय मंदिरों में देवराजन के लिए प्रस्तुत किए जाने वाले इस नृत्य को शास्त्री क्रम के अनुसार प्रयोग में लाया जाता है।
  • ओडीसी नृत्य की परंपरा भरतनाट्यम नृत्य की तरह ही प्राचीन है बुद्ध कालीन से ज्ञान और विज्ञान शाखाओं की सौंदर्य प्रधान साधना से उड़ीसी नित्य का जन्म हुआ सातवीं शताब्दी से भगवान को समर्पित म्हारी परंपरा ने ईश्वर की आराधना के लिए योग तंत्र से संबंधित अंग मुद्राओं का समावेश करके स्वास्थ्य प्रदान नित्य शैली का सूत्रपात किया जो सन् 1950 से विशेष प्रकाश में आई।
  • मोहिनीअट्टम तमिलनाडु की देवदास क्यों और केरल के अंगारों के मेल से जो नई नित्य पद्धति सामने आई उसका नाम मोहिनीअट्टम का हो गया देवदास क्यों कोमल भाव भंगिमा से युक्त लास्ट प्रधान ने तेज जानती थी और नंगे और लोग केवल अभिनय में थे अतः दोनों का सम्मिश्रण होकर मोहिनीअट्टम की कला का आविर्भाव हुआ।
  • कथकली यह दक्षिण भारत के केरल प्रदेश के मुख्य नृत्य है जिसका अभिभावक प्राचीन लोग धर्म इन्नाटेनेस की परंपरा कृष्ण नॉर्टन से हुआ कथा का अर्थ कहानी और कली का अर्थ है खेल किसी कथा के पात्रों को बड़े-बड़े मुखोटे लगाकर संगीत में अभिव्यक्ति के साथ प्रस्तुत करने को कथकली नाम से पुकारा जाता है नर्तक अपनी भाव भंगिमा और मुद्राओं द्वारा अपनी पुरानी कथा को दिखाता है।
  • मणिपुरी भारत के उत्तर पूर्वी छोर पर मणिपुर प्रदेश के प्रचलित नृत्य शैली को मणिपुरी कहा जाता है इनमें धार्मिक और पौराणिक गाथाओं का प्रदर्शन किया जाता है और वैष्णव पदावली की प्रधानता दी जाती है रासलीला मणिपुरी नृत्य की एक विशेषता है जिसका प्रदर्शन प्रायः सभी उत्सव पर किया जाता है।
  • कुचीपुड़ी आंध्र प्रदेश की कुचिपुड़ी नृत्य शैली का विकास कृष्ण देव आर्य के युग में हुआ आंध्र की कुचिपुड़ी नामक गांव में भाग अवतार ब्राह्मणों द्वारा कुचिपुड़ी नृत्य का पोषण हुआ जिसके उद्गम का समय इससे पूर्व दूसरी शताब्दी था यह आंध्र प्रदेश का एक परंपरागत नृत्य नाट्य है कुछ पूरी नामक गांव में रामायण की कथा को खुशी लोकगीत नृत्य तथा अभिनय के माध्यम से प्रस्तुत करते हैं इस नृत्य में स्त्री तथा पुरुष की भूमिकाओं को अधिकतर पुरुष पात्र ही अभिनीत करते हैं।
  • कत्थक उत्तर भारत के प्रमुख नृत्य विधाओं का नाम है कत्थक विदेशी आक्रमण के कारण यहां की संस्कृति में अनेक मिश्रण हुए इसलिए अनेक प्रकार के वेशभूषा और विविध प्रकार के कलाओं ने यहां जन्म लिया गायन व नृत्य के माध्यम से कथा की प्रस्तुति करने वाले कल आजीविका था कहलाए जिन्होंने कथक नृत्य नाम से एक नृत्य शैली को जन्म दिया तथा क्षेत्र में जयपुर लखनऊ और बनारस घराने प्रसिद्ध है।
  • सत्रीय 15 वी शताब्दी ईस्वी में महान वैश्णव संत और असम के सुधारक महापुरुष शंकरदेव द्वारा वैष्णव विश्वास का प्रचार के लिए एक शक्तिशाली माध्यम के रूप में 17 नृत्य की शुरूआत हुई सत्य नृत्य पर अन्य दृश्य प्रभाव असमिया लोक नृत्य जैसे बिहू बोर्ड और आदि से हैं यह एक नृत्य शैली है जो पुराने को धार्मिक कहानियों के हाथ और पैरों के भावों के माध्यम से बताती है।

कला

कला (आर्ट) शब्द इतना व्यापक है कि विभिन्न विद्वानों की परिभाषाएँ केवल एक विशेष पक्ष को छूकर रह जाती हैं। कला का अर्थ अभी तक निश्चित नहीं हो पाया है, यद्यपि इसकी हजारों परिभाषाएँ की गयी हैं। भारतीय परम्परा के अनुसार कला उन सारी क्रियाओं को कहते हैं जिनमें कौशल अपेक्षित हो। यूरोपीय शास्त्रियों ने भी कला में कौशल को महत्त्वपूर्ण माना है।

कला एक प्रकार का कृत्रिम निर्माण है जिसमे शारीरिक और मानसिक कौशलों का प्रयोग होता है।

मैथिली शरण गुप्त के शब्दों में,

अभिव्यक्ति की कुशल शक्ति ही तो कला है — (साकेत, पंचम सर्ग)

दूसरे शब्दों में -: मन के अंतःकरण की सुन्दर प्रस्तुति ही कला है।

कला शब्द का प्रयोग शायद सबसे पहले भरत के “नाट्यशास्त्र” में ही मिलता है। पीछे वात्स्यायन और उशनस् ने क्रमश: अपने ग्रंथ “कामसूत्र” और “शुक्रनीति” में इसका वर्णन किया।

“कामसूत्र”, “शुक्रनीति”, जैन ग्रंथ “प्रबंधकोश”, “कलाविलास”, “ललितविस्तर” इत्यादि सभी भारतीय ग्रंथों में कला का वर्णन प्राप्त होता है। अधिकतर ग्रंथों में कलाओं की संख्या 64 मानी गयी है। “प्रबंधकोश” इत्यादि में 72 कलाओं की सूची मिलती है। “ललितविस्तर” में 86 कलाओं के नाम गिनाये गये हैं। प्रसिद्ध कश्मीरी पंडित क्षेमेंद्र ने अपने ग्रंथ “कलाविलास” में सबसे अधिक संख्या में कलाओं का वर्णन किया है। उसमें 64 जनोपयोगी, 32 धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष, सम्बन्धी, 32 मात्सर्य-शील-प्रभावमान सम्बन्धी, 64 स्वच्छकारिता सम्बन्धी, 64 वेश्याओं सम्बन्धी, 10 भेषज, 16 कायस्थ तथा 100 सार कलाओं की चर्चा है। सबसे अधिक प्रामाणिक सूची “कामसूत्र” की है।

यूरोपीय साहित्य में भी कला शब्द का प्रयोग शारीरिक या मानसिक कौशल के लिए ही अधिकतर हुआ है। वहाँ प्रकृति से कला का कार्य भिन्न माना गया है। कला का अर्थ है रचना करना अर्थात् वह कृत्रिम है। प्राकृतिक सृष्टि और कला दोनों भिन्न वस्तुएँ हैं। कला उस कार्य में है जो मनुष्य करता है। कला और विज्ञान में भी अंतर माना जाता है। विज्ञान में ज्ञान का प्राधान्य है, कला में कौशल का। कौशलपूर्ण मानवीय कार्य को कला की संज्ञा दी जाती है। कौशलविहीन या बेढब ढंग से किये गये कार्यों को कला में स्थान नहीं दिया जाता।

संदर्भ पुस्तक सूची

  1. भारतीय नृत्य परंपरा में कथक नृत्य : एक शास्त्रीय अध्ययन – डॉ. राहुल कुमार
  2. उत्तर प्रदेश के प्रमुख नृत्य : पी.डी. एफ. पुस्तक
  3. भारतीय नृत्यकला (भाग 1) दृष्टि IAS
  4. भारतीय नृत्यकला (भाग 2) दृष्टि IAS
  5. शास्त्रीय नृत्य (पी.डी. एफ. पुस्तक)
  6. भारत के शास्त्रीय व लोक नृत्य (पी.डी. एफ. पुस्तक)
  7. भारत के प्रमुख शास्त्रीय नृत्य (पी.डी. एफ. पुस्तक)
  8. भारतीय शास्त्रीय नृत्य (पी.डी. एफ. पुस्तक)
  9. कथक नृत्य : प्रकाश नारायण (पी.डी. एफ. पुस्तक)
  10. कथक नृत्य शिक्षा भाग 1 – डॉ. पुरुदाधीच (बिंदु प्रकाशन)
  11. कथक प्रवेश – डॉ. लक्ष्मीनारायण गर्ग – संगीत कार्यालय हाथरस
  12. कथक नृत्य – देहाती पुस्तक भंडार
  13. कथक दीक्षा – राधिका मित्तल
  14. कथक (भारतीय शास्त्रीय नृत्य श्रृंखला) – शोभना नारायण
  15. kathak dance syllabi part 1 – a panel of authors – Dr. Puru Daadheech
  16. Bharatanatyam. Adavis : fundamental & Structural principles – Gayathri Keshavan
  17. Kathak : the dance of storytellers – Rachna Ramya
  18. Kathak : sundaryatmak shastriya nritya (gehan adhdhyan evam chintan) शिखा खरे।
  19. भारतीय नृत्यकला : शास्त्रीय नृत्य (इंडिगो प्रकाशन)
  20. भारतीय मानव – मूल्य एवं कथक नृत्य – चारु हांडा
  21. कथक नृत्य परिचय – संगीत सदन प्रकाशन, इलाहाबाद – पं. एच. सी.श्रीवास्तव

 शुभांगी
छात्रा -प्रयाग संगीत समिति एवं सी. आर. पी .एफ. पब्लिक स्कूल

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *