साहित्य व सिनेमा समाज को दिशा निर्देश करने वाले प्रमुख मनोरंजनात्मक परंतु उद्देश्य मूलक विद्या है। साहित्य और सिनेमा दोनों पृथक विद्याएँ है। साहित्य पढ्य है वही सिनेमा दृश्य परक विद्या है। साहित्य संवेदना और अनुभूति प्रधान होता है जिसमें लालित्य की प्रधानता है, जबकि सिनेमा शुद्ध मनोरंजन प्रधान होता है, जिसमें दर्शको की माँग को ख्याल रखा जाता है। दर्शकों को जो चाहिए फिल्म इण्डस्ट्री वही परोसता है जिसका सीधा संबध व्यवसाय से होता है। साहित्य में जो साहित्यिक सामग्री होती है वह दर्शको की फरमाईश या रूचि पर आधारित नहीं होती, बल्कि साहित्यकार की निजी संवेदना और अनुभूति ही केन्द्र में होती है, जिसको ध्यान में रखकर समाज के यथार्थ रूप को सामने लाने का प्रयास साहित्यकार द्वारा किया जाता है।

      साहित्य और सिनेमा तात्विक दृष्टि से दो धरातल पर होने के बावजूद कई बिन्दुओं पर मिल भी जाते है। सिनेमा कल्पना प्रधान है भावों की अभिव्यक्ति के लिए ऐसे दृश्यों का निर्माण कर दिया  जाता है जो शब्दों के द्वारा संभव नही है। वही साहित्य शब्दों के माध्यम से जिस वातावरण का निर्माण करता है उसे दृश्य रूप में लाना फिल्मकारों के लिए कभी-कभी चुनौती भी बन जाती है। साहित्यकार शब्दों के जिस वातावरण का निर्माण करता है उसे पाठक अपनी-अपनी कल्पना द्वारा अलग-अलग भाव और दृश्य मन में बनाते है, जबकि फिल्मकार द्वारा तैयार किया गया वातावरण दर्शको के लिए एक जैसा होता है। फिल्मकार अपने अनुभव के द्वारा साहित्य से ली गई सामग्री का ज्यों का त्यों रूपान्तरण नहीं कर पाता है या करना नहीं चाहता है, क्योंकि वह साहित्य को फिल्म के रूप में परोसना चाहता है और साहित्य फिल्म के साँचे में पूर्णरूप से उत्तर नहीं पाता और यही से साहित्य और सिनमा के अंतःसंबंध में विलगाव उत्पन्न हो जाता है। ऐसे जगह पर आकार ही साहित्य अपनी सीमा को जान पाती है। प्रसिद्ध फिल्म समीक्षक विमलेन्दु जी ने साहित्य और सिनेमा के अंतःसंबंध को स्पष्ट करते हुए कहते है कि ‘‘साहित्य और सिनेमा का संबंध भी दो पड़ोसियों की तरह रहा है दोनों एक दूसरे के काम तो आते रहें लेकिन यह कभी सुनिश्चित नहीं हो पाया कि इनमें प्रेम है या नहीं।’’

      यह बात नहीं भूलनी चाहिए कि सिनेमा ने अपने शिशुन्य अवस्था में साहित्य को अपनी धात्री के रूप में अपनाकर प्राणतत्व को प्राप्त किया। साहित्य की विभिन्न विद्याओं को आधार बनाकर इसने अपनी यात्रा शुरू की। पहले पहल सिनेमा ने पौराणिक कथाओं पर आधारित फिल्में बनाई। सन् 1912 ई. में मुम्बई के ‘‘रामचन्द्र गोपाल टोन’’ द्वारा  निर्मित फिल्म पुंडरीकको अपार सफलता मिली। यह फिल्म महाराष्ट्र के ख्यातिप्राप्त हिन्दू संत के जीवन पर आधारित “रामाराव किर्तीकर’’ द्वारा लिखित नाटक पर आधारित थी। इसके बाद दादा साहब फाल्के द्धारा निर्मित राजा हरिश्चन्द्रफिल्म प्रदर्शित की गई। हरिश्चंद्र को भारतीय सिनेमा में पहली फिल्म मानी गई है। पुडलीकका निर्माण इससे पूर्व होने के बावजूद छायाकार के विदेशी होने के कारण इसे भारतीय सिनेमा मे प्रथम स्थान हासिल न हो सका। पौराणिक चरित्रों का केन्द्र में रखकर बनाई गई फिल्में भक्त प्रहलादषिवमहिमा, विष्णु अवतार, रामायण, उत्तर रामायण, संत तुकाराम, संत नामदेव, भक्त प्रहलाद जैसी बहुचर्चित फिल्में बनी। सन् 1931 में भारत में सवाक फिल्मों का आरंभ आर्देशिर ईरानी द्वारा निर्मित फिल्म आलमआरासे हो गया था। भारतीय सिनेमा का स्वरूप बहुत तेजी से बदलने लगा था। दर्शक अधिक से अधिक सवाक फिल्मों की प्रतीक्षा करने लगे। अब पौराणिक घटनाओं से हटकर सामाजिक ऐतिहासिक फिल्मों को निर्माण होने लगा, जिसमें अमृतलाल नागर, उपेन्द्रनाथ अश्क, प्रेमचंद, वृदांवन लाल वर्मा जैसे प्रसिद्ध साहित्यकारों की कृत्तियों पर बनी फिल्में ज्यादा ख्याति प्राप्त नहीं कर सकी। इसका कारण दर्शकों की मनोरंजनात्मक प्रवृत्ति के प्रति रूझान रहा। सिनेमा चूकि व्यापार का प्रमुख स्त्रोत के रूप में समाज में आया। अतः फिल्मकारों ने दर्शकों की रूचि का ध्यान में रखते हुए मनोरंजनात्मक प्रवृत्ति को ध्यान में रखकर कपोल कल्पित मनोरंजन के नाम पर अश्लील दृश्यों तथा रोमांटिक कहानियों को परोसना शुरू किया। इस तरह हम कह सकते हैं कि साहित्य सिनेमा की जननी है परंतु सिनेमा रूपी शिशु वयस्क होकर अपना अलग अस्तित्व तालाश रही है।

      साहित्य व सिनेमा के संबंध को विकसित करने मे गीत नाटक और कविता, उपन्यास की चर्चा भी अक्सर होती रही है लेकिन फिल्में केवल उपन्यासों में उमेश राठौर लिखते है ‘‘फिल्म और साहित्य का परस्पर लगाव का प्रश्न सदैव से ही जीवंत रहा है। इस पर ही नहीं बनी कथाओं पर भी निर्मित की गई। वही फिल्म समीक्षक इकबाल रिजवी का मानना है हिन्दी में साहित्यिक कृतियों पर सबसे कम सफल फिल्में बन पाई है।

      इस तरह हम देखते है कि साहित्य और सिनेमा का अन्तः संबंध होते हुए भी दोनो अलग-अलग बिन्दुओं पर अलग हो जाते हैं। सिनेमा का फलक इतना विस्तृत है कि वो संसार के सारे कलाओं को अपने में समाहित किए हुए है। सिनेमा की प्रसिद्धि जहाँ उसके गायन, नृत्य, वादन, दृश्य-पात्र संवाद आदि कई चीजों पर निर्भर करती है, वही साहित्य केवल साहित्यकार की संवेदना विचारों के आधार पर ही प्रसिद्ध हो जाता है। साहित्य ही सिनेमा का जन्मदाता है। दोनों के उद्देश्य में समानता है। दोनों का लक्ष्य समाज को दिशा निर्देश देना है, रास्ता दिखाना है परंतु सिनेमा जहाँ अपने इस लक्ष्य की आपूर्ति कई कलाओं के सहारे करता है वही साहित्य को शब्दों के सिवायकिसी वैशाखी की आवश्यकता नहीं होती। सिनेमा को बनाने के लिए एक बड़े बजट की आवश्यकता है। अतः यह एक व्यापारिक साधन होने के कारण रूचिकार सामग्रियों को परोसने का साधन हो गया है। व्यापारिक उद्देश्य के आगे उसका नैतिक उद्देश्य गौण होता दिखाई दे रहा है। इसका कारण यह कि साहित्य पढ़ते समय हम सिर्फ मनोरंजन की उम्मीद नहीं रखते पर सिनेमा देखते समय हम मनोरंजन की एक बड़ी उम्मीद की कल्पना करते हैं। सिनेमा में मनोरंजन की प्राथमिकता है। साहित्य में मानव जीवन की विभिन्न अनुभूुतियों को अभिव्यक्ति दी जाती है। साहित्यों तो विचारों का संवाहक होता है। समाज मे मूल्यों की स्थापना या एकता स्थापित करने के लिए साहित्य की महत्वपूर्ण  भूमिका रही है। उसी प्रकार सिनेमा में भी समाज में भिन्न परिवर्तन होते हम देख रहे है। सिनेमा अपने उद्देश्यों को लेकर समाज के सामने आता है। सिनेमा द्वारा मनोरंजन के साथ-साथ ज्ञानप्राप्ति  भी होती है। समाज के  विकास मे साहित्य और सिनेमा दोनों की महत्वपूर्ण भूमिका है।

      इस तरह हम कह सकते है कि सिनेमा और साहित्य का संबंध जितना सूक्ष्म है उतना व्यापक भी है। साहित्य की व्यापकता इस बात में हैं कि किसी भी देश जाति अथवा युग का साहित्य समूची मानव को प्रभावित करने की शक्ति रखता है। अतः विश्वयापी मानवता की भावना के विकास के लिए साहित्य का कार्य महत्वपूर्ण हैं। साहित्य बाहरी दुनिया के साथ-साथ हमारे मन के भीतर की दुनिया का भी चित्रण करता है। वह हमारे जीवन को हमेशा नई-नई प्रेरणाओं से भरता है। इसलिए साहित्य का मानव जीवन में शाश्वत महत्व है।

      सिनेमा लोकप्रिय और रचनात्मक माध्यम हैं वह प्रतीको को गढ़ता, रचता है। उसमें कला और तकनीक का सभ्मिश्रण है। कई विद्वान सिनेमा को आधुनिक युग का जादू कहते है। सिनेमा कला में एक तरह की व्यापकता है। वह अपनी बात को करोड़ों लोगों तक आसानी से पहुँचाता है। मनोरंजन के साथ समाज निर्माण में भी सिनेमा की भूमिका अग्रणी है। जनसंचार के एक सशक्त माध्यम के रूप में सिनेमा आज उभकर आया है। विश्व संस्कृत्ति की अवधारणा को सिनेमा ने नया आयाम दिया है। सिनेमा में सभी कलाएँ अंर्तभूत होती है फिर भी सिनेमा एक स्वतंत्रकला है। सिनेमा का आकर्षण आज पूरी दुनिया में देखा जा सकता है।

      साहित्य प्राचीन कला है और सिनेमा आधुनिक कला। मनुष्य  की वृत्तियों के उदात्तीकरण और संवेदनशीलता के विकास में साहित्य की जो भूमिका है नव प्रौद्योगिकी के युग में सिनेमा की भी है। जिस प्रकार साहित्य का समाज संस्कृति सभ्यता, इतिहास, भाषा. आदि से गहरा रिष्ता है उसी प्रकार सिनेमा का भी। साहित्य में हमें जीवन जीने की प्रेरणा औार आनंद मिलता हैं। सिनेमा से हम मनोरंजन के साथ संदेश भी ग्रहण करते है। साहित्य और सिनेमा समाज के अभिन्न अंग है। दोनों के केन्द्र में समाज ही होता है। साहित्यकार और फिल्मकार दोनों समाज से प्रभावित होते है और अपनी कला के माध्यम से समाज को प्रभावित भी करते है। भारतीय समाज पर सिनेमा का व्यापक प्रभाव है। वह सिनेमा से सबसे ज्यादा प्रभावित है,लेकिन मानव और मानव के विकास में साहित्य की भूमिका विशेष रूप में उल्लेखनीय है। आज के विज्ञान और तकनीकी युग में भी साहित्य का महत्व कम नहीं हुआ है। साहित्य और सिनेमा दोनों मे जीवनोपयोगी उपदेश देने की क्षमता विद्यमान है। साहित्य का ध्येय समाज काहित है और सिनेमा का ध्येय समाज का मनोरंजन करना है और उसे आईना दिखाना है। साहित्य और सिनेमा ने समाज और राष्ट्र निर्माण में बहुत बड़ी भूमिका अदा की है।

      साहित्यकार साहित्य निर्माण में किसी पर निर्भर नहीं लेकिन निर्देशक सिनेमा निर्माण की प्रक्रिया में ज्यादातर दूसरे लोगों पर ही निर्भर है। साहित्यकार समय सीमा में बँधा हुआ नही है लेकिन निर्देशक पर समय की पाबंदी है। उसे तय समय सीमा के अंदर ही काम करना होता है जो भी करना है फिल्म की ढ़ाई-तीन घंटे की अवधि को ध्यान में रखकर ही करना है , तात्पर्य यह है कि निर्देशक पर समय का बहुत ज्यादा दबाव होता हैं लेखक इस तरह की समय सीमा के दायरे में नहीं आता। साहित्य सस्ता माध्यम है पर सिनेमा अति महंगा माध्यम हैा साहित्य के पाठकों को यह अच्छी तरह से समझना होगा कि साहित्य और सिनेमा में अंतर है। साहित्य की कसौटी पर सिनेमा का मूल्यांकन नहीं किया जा सकता। साहत्य और सिनेमा दोनों माध्यमों में सौ प्रतिशत अंतरण असंभव है।

      साहित्य और सिनेमा दोनों कला विद्याओं में प्रस्तुतीकरण के स्तर पर भले ही  भिन्नता हो, परंतु कुछ मूलभूत बिन्दुओं पर समानता दिखाई देती हैं साहित्य में जहाँ विभिन्न विद्याएँ कहानी, उपन्यास, नाटक, कविता, आत्मकथा आदि उसके स्वरूप को निर्धारित करती है वही सिनेमा में विविध विद्याओं एवं अन्य कला विद्याओं का सुंदर समायोजन होता है। साहित्य में जिस प्रकार शब्द वाक्य अनुच्छेद होते हैं उसी प्रकार सिनेमा में शाॅट, सीन, सीक्वेल होते है। साहित्य में कथा कथोपकथन होता है। वैसे सिनेमा में पटकथा संवाद होते हैं। साहित्य में जिस प्रकार कविता होती है उसी प्रक्रार सिनेमा में गीत होते हैं। साहित्य की एक विद्या नाटक और सिनेमा में स्पष्ट अंतर होने के बावजूद भी सिनेमा का स्वरूप नाटक के अत्यंत निकट प्रतीत होता है।सिनेमा में विशेषतः हिन्दी सिनेमा में कहानी, उपन्यास, नाटक, जीवनी, आत्मकथा, कविता पत्र, डायरी, संस्मरण, गजल आदि साहित्य की कई विद्याएँ प्रस्तुत होती है सिनेमा में साहित्य की विविध विद्याएँ पूर्णतः रची बसी प्रतीत होती है।

      एक सौ उन्नीस साल पहले सिनेमा का उदभव फ्रांस में हुआ। आज उसका फैलाव दुनिया के कोने-कोने में हो चुका है। सभी कलाओं को साथ लेकर चलने की सिनेमा की शक्ति ने पूरी-पूरी दुनिया में अपना जलवा बिखेरा। दुनिया की अधिकांश आबादी आज सिनेमा से प्रभावित है। सिनेमा ने हमारी अर्थव्यवस्था को भी प्रभावित किया है वहीं साहित्य का देश की अर्थव्यवस्था से कोई लेना देना नहीं होता सिनेमा के सम्मोहन से आज कोई राष्ट्र अछूता नहीं है। इससे यह अनुमान लगा सकते हैं कि सिनेमा का विकास कितनी तेज रफ्तार से हुआ है। भारत में सिनेमा के आगमन के बाद उसका उत्तरोत्तरविकास हुआ। आज भारत में हर वर्ष औसतन एक हजार फिल्में बनती हैं। फिल्म निर्माण के क्षेत्र में भारत का दुनिया में पहला क्रमांक है। बॉलीवुड या हिन्दी सिनेमा आज भारतीय सिनेमा की पहचान बन गयी है।

      भारत में सिनेमा की शुरूआत धार्मिक विषयों से हुई। इन फिल्मों ने समाज प्रबोधन का कार्य किया। उसके बाद हम देखते है कि निर्देशकों ने धार्मिक विषयों को छोड़कर तत्कालीन सामाजिक समस्याओं पर अपना ध्यान केन्द्रित किया। देशभक्तिी पर फिल्में भी बनने लगी।इन फिल्मों ने अंग्रेजों के खिलाफ वातावरण तैयार किया और जनता में आजादी की ललक जगाई। साथ ही कुछ फिल्मों ने सामाजिक बुराईयों के प्रति देशवासियों को जगारूक किया। आजादी की लड़ाई में साहित्यिक कृतियों ने भी प्रेरणादायक भूमिका का निर्वाह किया। आजादी के बाद सिनेमा में राष्ट्रवाद का पुट दिखाई देने लगा। साथ ही मनोरंजनात्मक फिल्में भी बनने लगी। साठ का दशक नए भारत के निर्माण का दौर था। इस समय सिनेमा ने देहाती चोला छोड़कर नए परिवेश को अपनाना शुरू किया था। सांतवें दशक में हिन्दी सिनेमा दो भागों में विभाजित हुआ। समानांतर हिन्दी सिनेमा और मुख्यधारा का हिन्दी सिनेमा। सामानांतर फिल्मों में जीवन की गंभीर सच्चाई थी। इसी समय मुख्यधारा की हिन्दी फिल्में समाज में वैचारिक तथा व्यवहारिक खुलापन लेकर आ रही थी। नौवें दशक में हिन्दी सिनेमा अंतराष्ट्रीय स्तर पर दस्तक देने लगा था। इक्कीसवीं सदी तक आते-आते हिन्दी सिनेमा हिंसा और अश्लीलता के भँवर में इस कदर फँस गया है कि आज भी वह इसी के इर्द-गिर्द चक्कर काट रहा है।

      फिल्म निर्देशकों ने हिन्दी सिनेमा के उद्भव से लेकर अब तक विविध विषयों पर फिल्मों का निर्माण किया। यह विषय निश्चित रूप से समाज से जुड़े हुए थे। इसमें भारतीय समाज की विविध समस्याओं को उजागर किया गया। हिन्दी सिनेमा के विभिन्न विषय समाज से गहरा संबंध रखते हैं। भारतीय समाज जाति व्यवस्था भ्रष्टाचार, वेश्यावृति, बलात्कार, विवाहेत्तर संबंध, साम्प्रदायिकता, किसान आत्म हत्या, कन्या शिशु हत्या, समलैंगिकता आदि कई समस्याओं से घिरा हुआ है। फिल्म निर्देशकों ने इन समस्याओं को  फिल्मों के माध्यम से समाज के सामने रखा। अपने दृष्टिकोण से समस्या का समाधान, देने का प्रयास भी किया। स्पष्टतः सिनेमा के विविध विषयों में भारतीय समाज का प्रतिबिम्ब झलकता है। सिनेमा का समाज पर सकारात्मक और नकारात्मक प्रभाव देखा जा सकता है। सिनेमा के कारण आज समाज में अश्लीलता और हिंसा बढ़ी है। फिल्मों में बाजारवाद के दबाववश परोसी जानेवाली हिंसा तथा कामुकता का युवा पीढ़ी पर बुरा प्रभाव पड़ रहा है। हमारी सभ्यता और संस्कृति पर सिनेमा का हमला लगातार जारी है लेकिन दूसरा पक्ष यह भी है कि सिनेमा ने देश के हर वर्ग में भाईचारे और देश-भक्ति की भावना को प्रसारित करने में अहम भूमिका का निर्वाह किया है। सिनेमा जगत् ने पारंपरिक भारतीय मूल्यों को बचाकर रखने में भी मदद की है। हिन्दी सिनेमा ने समाज मे रचनात्मक परिवत्र्तन लाने का प्रयास किया है और अब वह मनोरंजन के साथ जागरुकता और सामाजिक परिवत्र्तन का भी महत्वपूर्ण कार्य कर रहा है। सिनेमा का विकास तकनीकी विकास के साथ दिन प्रतिदिन बढता जा रहा है। जनमानस पर इसका गहरा प्रभाव है एक अच्छी फिल्म जहाँ दुनिया के कोने काने मे देखी जाती है परन्तु एक अच्छा लेखक और उसकी कृति कुछ पाठको तक ही सीमित हो कर रह जाती है । साहित्य और सिनेमा दोनो की विषयवस्तुमानवीय जीवनप्रंसग या घटनाप्रसंग होते हैं ।साहित्य साक्षरों के लिए लिखा जाता है लेकिन सिनेमा के बारे मे साक्षर निरक्षर यह भेद नही होता स्पष्ट है कि फिल्म के माध्यम से साहित्य को आम जनता तक पहंॅुचाया जा सकता है । इस कारण एक ओर साहित्य और सिनेमा की दुनिया परस्पर पूरक बनेगी तो दूसरी ओर सिनेमा के लिए आवष्यक कथाभूमि का योगदान साहित्य देता रहेगा।फिल्म निर्माता-निर्देषकों के लिए कथा सहजता से प्राप्त होगी तो साहित्य भी सर्वव्यापक बनेगा ।

      अंततः यह कहा जा सकता है कि साहित्य और सिनेमा यह दो माध्यम अगर हाथ मे हाथ डालकर चले तो निश्चित रूप से इक्कीसवीं सदी के भविष्य को एक नई दिशा प्रदान कर सकते हैं। साहित्यकृतियों का फिल्मांकन करना मुश्किल कार्य अवश्य है परंतु नामुमकिन नहीं। अतः साहित्यिक कृतियाँ की लोकप्रिय बनाने हेतु उसे वैश्विक धरातल प्रदान करने के लिए उनका फिल्मांकन होना चाहिए तथा फिल्मों को भी मनोरंजन के नाम पर अश्लीलता पड़ोसने की जगह साहित्य की ओर मुखातिब होकर अपनी परंपराओं की तरफझाँकना चाहिए तभी समाज, राष्ट्र एवं मानवता का हित संभव है।

संदर्भ ग्रंथ सूची :

  1. साहित्य, सिनेमा, समाज- जनसत्ता दिसम्बर 11, 2016
  2. आधुनिक पत्रकारिता – डाॅ0 अर्जुन तिवारी
  3. भारतीय सिनेमा: एक अनन्त यात्रा, प्रसून सिन्हा, पृष्ट 85
  4. समकालीन सिनेमा में राष्ट्रवाद – शौव्य कुमार पांडेय (मीडिया: विमर्श सिनेमा विशेषांक- 3 जून 2013) पृष्ट 48
  5. साहित्य और सिनेमा – डॉ० शैलजा भारद्वाज।

 

डॉ. अंजु कुमारी

सहायक प्राचार्य 

वैशाली महिला महाविद्यालय, हाजीपुर

बाबा साहेब भीमराव अम्बेडकर विश्वविद्यालय 

 

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