दोपहर का खाना खत्म कर, मै अपने कलाकृतियों पर नज़र दौडा रहा था ।

टेलीफोन की घण्टी लगातार बज़ रही थी ।

हेलो…कौन ? मैने पूछा

’कौन बात कर रहा है’ ? प्रश्न के उत्तर के बदले प्रश्न ही जब पूछा जाये तो क्या कह सकते है ?

’आपको कौन चाहिए’ मैने पूछा?

’तम्मण्णा’ है क्या ?

’ नही, यह आपके तम्मण्णा का घर नहीं है…..’ यह कहने से पहले फोन बन्द हो गया ।

फिर वही ट्रिन-ट्रिन की आवाज़ बज़ उठी । हाथ में उठाया हुआ ब्रश मैने नीचे रखा, हेलो ! ? कहा ।

वही तमण्णा, वही प्रश्न

’आपका नम्बर क्या है’ पूछा

उनका – मेरे नम्बर में एक अंक का अंतर नज़र आया । समस्या क्या है, यह मै समझ गया ।

’यह रॉग नम्बर है ’ आपका डायल करने वाला नम्बर सही है क्या ? , यह देख लीजिए । यह मेरा नम्बर है और आप ढूँढ रहे तम्मण्णा का घर यह नहीं है ।

उस तरफ से निराशा झलकी ।

उस व्यक्ति को फोन उपयोग  की जानकारी नहीं है, यह मुझे स्पष्ट हुआ ।

’ठीक है स्वामी …’ यह कह उसने फोन नीचे रखा ।

मैने अपना काम शुरू किया ।

आधे घण्टे के बाद फिर से फोन पर ट्रिन – ट्रिन की घण्टी बजी ।

अनमने भाव से यह सोचकर, कहीं वहीं व्यक्ति तो नहीं ,यह सोच मैने फोन उठाया । मेरे सोच के अनुसार वहीं व्यक्ति निकला ।

बड़े ही शांत मन से, उस व्यक्ति को जिसमें थोड़ी सी भी बात करने की शिष्टता नहीं थी, बडे ही सावधानी के साथ, मैने समझाया ।

यह तम्मण्णा जी का घर नही है । उनके नम्बर और मेरे नम्बर के बीच अंतर है । आपने जो लिखा है वह सही है क्या ? यह देख लीजिए । नही तो आप अभी जहाँ से फोन कर रहे है उस टेलीफोन वाले से पूछ लीजिए । वह आपकी सहायता कर सकता है ।

इतना कहना ही था कि फिर से उसने पूछा ’सर, आप गलत न समझे,  क्या यह तम्मण्णा का घर नही है? उसने एक ही प्रश्न मुझसे और टेलीफोनबूत के लड़के से पूछा ।

यह जानकर अब उस व्यक्ति को समझाने से कोई फायदा नहीं,  मैने कहा..उस टेलीफोनबूत के लड़के को फोन दो….मै उसे समझाता हूँ ।

सौभाग्य से उसने, कुछ न पूछ कर टेलीफोन, टेलीफोनबूत के लड़के को दे दिया ।

तब यह समझ में आया.. उस देहाती ने अपने चिट पर नम्बर सही लिखा था, टेलीफोनबूत के लड़के ने गलत लिखा था । इस कारण से मेरे घर का नम्बर लग रहा था ।

”सॉरी सर’ यह कह लड़के ने फोन रखा ।

बडे ही सहजता के साथ, मैने भी फोन रख दिया।

इतने में मै भूल गया कि मै क्या काम कर रहा था । एक मिनट चुप-चाप बैठा ।

फिर से वहीं फोन का प्रहार । अब वह व्यक्ति नहीं हो सकता, यह सोच मैने फोन उठाया ।

गलत नहीं समझियेगा सर, मैने आपको अनजाने में कष्ट दिया । इस लड़के ने गलत नम्बर लिखा था, इसलिए यह सब हुआ । अभी-अभी मुझे तम्मण्णा मिला । अब मै आपको कष्ट नही दूँगा । प्रणाम ।

उत्तर जानने से पहले उसने फोन रख दिया ।

मै शांत होकर उस अन्जान व्यक्ति के बारे में सोचने लगा ।

तीन-चार कॉल बर्बाद करने के बावजूद भी उस टेलीफोनबूत के लड़के की गलती को सहजता से स्वीकार कर, मुझे भी फोन करके अपने द्वारा हुई गलती के लिए मॉफी मॉगने का यह सज्जनतापूर्ण व्यवहार, उसमें देख, मुझे आश्चर्य हुआ ।

उस व्यक्ति के साथ जब भी मेरी बातचीत हुई, मेरे मन की असंतुष्टता को कहीं उसने भांप तो नही लिया इस पर भी मुझे शर्मिन्दगी महसूस हुई ।

इस घटना के संदर्भ में जब मेरी चर्चा मेरे मित्र के साथ हुई, तब मेरे मित्र ने भी अपने साथ घटी इसी प्रकार की घटना को मुझसे सांझा किया, जो मै आपको बता रहा हूँ ।

मेरे मित्र आधी रात के समय जब गहरे नींद में थे, फोन की घण्टी बजती है । फोन उठाने पर वह रॉग नम्बर था । फिर से जब फोन की घण्टी बजी, फिर से वह रॉग नम्बर निकला । लगातार फोन और गहरी नींद के कारण, गुस्सा आना स्वाभाविक था । लेकिन तीसरी बार जब फिर से फोन की घण्टी बजती है, तब मेरे मित्र बडे ही धैर्य से काम लेते है । मुम्बई के अस्पताल से वह फोन था । तत्काल हुए अपने बेटे की मृत्यु की खबर, एक शोकास्त पिता बैंगळूरू में स्थित अपने परिवार तक पहुँचाना चाहते थे ।

इसी कारण से हर बार रॉग नम्बर लग रहा था । छटपटाते-तड़पते उस पिता की व्यथा को समझते हुए, उनके घर का पता पूछ तत्काल ही, आधी रात के समय मेरे मित्र उनके घर खुद जाकर यह महत्वपूर्ण शोक सूचना परिवार के सदस्यों को देते है ।

इतना कह के मेरे मित्र भावुक हो गये थे ।

मुझे अपने मित्र पर गर्व हुआ । यह मै समझ गया की उनकों और मुझे आये रॉग नम्बर, रॉग नम्बर नहीं थे ।

प्रतिदिन अपने ही झंझटों में फँसे हम लोग अपनों के प्रति सहनशीलता का भाव रखते है, वहीं अंजान लोगों के लिए असहनशीलता का व्यवहार रखते है ।

यह सब तनावपूर्ण, झंझट से भरी, जोखिमभरा लगने पर भी, यही जीवन की सच्चाई है, यह जानकर, शांतचित होकर, बड़े ही धीरज के साथ, जीवन जीना जरूरी है तब ही हमारे चेहरे की मुस्कान एक स्वाभाविक मुस्कान होगी ।

लेखक परिचय-

कर्नाटक के  प्रसिद्ध लेखक, ललित कलाकार एम.एस.मूर्ति का जन्म १९६० ई में बैंगलूरू में हुआ । उन्होंने १९८२ में ललित कला और मॉडलिंग में डिप्लोमा किया ।  राज्य, राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय प्रदर्शनियों में उन्होंने भाग लिया । २००३ में ईरान कला अकादमी से अंतर्राष्ट्रीय द्विवार्षिक पुरस्कार जीता । २००६ में निबंध संग्रह  ’ देसी नगू ’ के लिए कर्नाटक साहित्य अकादमी सम्मान मिला । २०१० में कर्नाटक सरकार ने कला के क्षेत्र में उनकी उपलब्धि को देख  ’राज्योत्सव पुरस्कार’ से सम्मानित किया । २०१० में हम्पी विश्वविद्यालय ने डॉक्टरेट, डी.लिट की उपाधी से नवाज़ा । महात्मा बुद्ध के जीवन चरित्र पर आधारित उनका पहला नाटक ’ यशोधरे मलगिरल्लिल्ला ’ आकाशवाणी, बैंगलोर द्वारा सर्वश्रेष्ठ क्षेत्रीय नाटक के रूप में चुना गया ।  उपन्यास ’दृश्या ’ जो विश्व का पहला दृश्य उपन्यास है जिसके लिए कर्नाटक सरकार ने बेस्ट बुक ऑफ द इयर पुरस्कार से सम्मानित किया । निबन्ध संग्रह ’ निजदा नेरळु ’ के लिए २०१६ में मैसूरू कला गौरवा प्रशस्ति से सम्मानित किया गया । २०१७ में कर्नाटक सरकार ने लाइफटाइम अचीवमेंट अवार्ड ’वर्णशिल्पी वेंकटप्पा प्रशस्ति ’ से सम्मानित किया ।

प्रस्तुत लेख प्रसिद्ध लेखक, ललित कलाकार एम.एस.मूर्ति द्वारा लिखित लेख  ’रॉग नंबर ’ निबंध संग्रह ’ देसी नगू ’ से लिया गया है । जिसमें उन्होंने मनुष्य की आधुनिक जीवन शैली और दिनचर्या पर प्रकाश डालते हुए कई सवाल उठाये है । आज मनुष्य संवेदनहीन और अपना धैर्य खोता चला जा रहा है । उसका परिणाम भयंकर भी हो सकता है ।

अनुवादक-
१. डॉ. गगन कुमारी हळवार
हिन्दी प्राध्यापिका, डॉ.एन.एस.ए.एम महाविद्यालय
बैंगलूरू, कर्नाटक
२. डॉ. हेमावती
कन्नड़ा प्राध्यापिका, डॉ.एन.एस.ए.एम महाविद्यालय
बैंगलूरू, कर्नाटक
 

 

 

 

 

 

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