साहित्य, समाज, सामाजिक परिस्थितियों, काल अथवा समसामयिकता से गहरे स्तर पर प्रभावित होता है ,किन्तु वह संस्कृति का, संस्कृति की पहचान का, उसकी गरिमा और गौरव का और उसकी विशिष्टता का संवाहक भी होता है । अतः वह समाज की संस्कृति की शाश्वतता – सनातनता को समसामयिक परिदृश्य में नवीनीकरण के साथ प्रस्तुत करता है । अतः स्पष्ट है कि सहित्य के लिए कालचेतना और मिथक चेतना एक ही सिक्के के दो पहलू है । साहित्य में यथार्थ, कालचेतना और मिथक चेतना का अन्तः सम्बन्ध और भी अधिक महत्वपूर्ण है, क्योंकि इससे साहित्य अधिक मनोरंजक और आकर्षक और आवाम से जुड़ता  है। इसलिए वर्तमान समय में साहित्य में मिथक का प्रयोग महत्वपूर्ण होता जा रहा है ।
         ‛मिथ’ जिस आदर्श चेतना का निर्माण करना चाहता है, इतिहास की चेतना का उससे कोई विरोध नहीं है। मिथकी चेतना इतिहास के प्रसंगो को नकार कर  नहीं चलती । यह हमेशा सामाजिक, राजनितिक, इतिहास तथ्यों से प्रभावित रहती है । जिस तरह इतिहास और संस्कृति मिथको से जीवित है, उसी तरह मिथक की सरंचना, वस्तु, और दिशा इतिहास और संस्कृति से प्रभावित होती। मिथक इतिहास का विरोधी नहीं वरन वह इतिहास का प्रतिपक्ष है। मिथक का अर्थ, उसकी प्रासंगिकता समय के अनुसार बदलती रहती है।प्रत्येक काल और समयावधि में मिथक के विशेष अर्थ है, उस अवधि में जैसी परिस्थितियां निर्मित होती है मिथक का स्वरूप भी बदलता रहता है | इन्ही परिस्थितियों का संधान है  कुँवर नारायण की कविताओं में ।
         कुँवर नारायण की कविता मिथकों को आज के सन्दर्भ में लाकर हमे परम्परा और आधुनिकता के द्वंद्व के विवाद से दूर ले जाकर उस समन्वय पर बल देती है जिससे होकर ही समाज का हित हो सकता है और मानवता के लिए शुभ हो सकता है । ‘चक्रव्यूह’ कविता की यह पंक्ति युगों -युगों के संघर्ष की उसी मिथकीय चेतना को वर्तमान से जोड़ती है-
                                “यह महासंग्राम ,
                                युग -युग से चला आता महाभारत ,
                                हजारों युद्ध ,उपदेशों ,उपाख्यानों ,कथाओ में
                                छिपा वह पृष्ठ मेरा है
                                जहां सदियों पुराना व्यूह ,जो दुर्भेद्य था ,टूटा ,
                                जहां अभिमन्यु कोई भयों के आतंक से छूटा :
                                जहां उसने विजय के चंद घातक पलों में जाना
                                कि छल के लिए उद्दत व्यूह-रक्षक वीर -कायर हैं ,
                               -जिन्होनें पक्ष अपना सत्य से ज्यादा बड़ा माना –
                               जहां तक पहुँच उसने मृत्यु के निष्पक्ष ,समयातीत घेरे में
                               घिरे अस्तित्व का हर पक्ष पहिचाना।”
           उपर्युक्त पंक्ति में कुँवर नारायण ने युद्ध कालीन आज की मानसिकता को उद्घाटित किया है कि किस प्रकार साम्राज्यवादी देश और लोग छल, बल और कूटनीति के प्रयोग से सत्य को पराजित करने में सफल है ।अभिमन्यु यहां वह प्रतीक है जिसे अंततः इस व्यवस्था में अपनी बलि ही देनी है –
                                “मैं नवागत  वह अजित अभिमन्यु हूँ ,
                               प्रारब्ध जिसका गर्भ से ही हो चुका निश्चित “
           यह प्रारब्ध सिर्फ अभिमन्यु का नहीं बल्कि उन सबका भी है जो राष्ट्रों  , सीमाओं और कृत्रिम विभाजनों के द्वारा पैदा किए गए संघर्षो में भाग लेने को  विवश है । कुँवर नारायण कि कविता उस सत्य को ढूढ़ती है जिसे बिसार दिया जा रहा ।तभी तो उनकी कविता इतिहास और मिथक को आज के धरातल पर लाकर हमें  मूल्यांकन के लिए प्रेरित करती है | प्रकृति द्वारा सर्वाधिक क्षमतावान बनाया गया मानव अपनी क्षमता का प्रयोग अपने ही समुदायों के संहार के लिए करेगा यह उसके विवेकवान होने पर प्रश्न खड़ा करता है।आज भी युद्ध और संघर्ष में शहीद हुए बलिदानी का महिमामंडन कहीं न कहीं उस व्यवस्था का पोषण करता है जिसमे चंद लोगो के स्वार्थ के कारण सैनिकों को अपने जीवन को बलिदान करना पड़ रहा , युद्ध में शहादत कि उद्दात्तता  उसी मानसिकता का  परिचायक है जिसमें अभिमन्यु जैसे योद्धा मारे जाने को विवश है –
                              “मैं बलिदान इस संघर्ष में ,
                              कटु व्यंग्य हूँ उस तर्क पर
                              जो जिंदगी के नाम पर हारा गया ,
                              आहूत हर युद्धाग्नि में
                              वह जीव हूँ निष्पाप
                              जिसको पूज कर मारा गया ,
                              वह शीश जिसका रक्त सदियों तक बहा ,
                              वह दर्द जिसको बेगुनाहों ने सहा।”
              यह कविता जहाँ सत्ता के पूँजीवादी और साम्राज्यवादी स्वरूप  पर प्रश्न उठाता है ,जिसमें आवाम बिना किसी स्वार्थ की पूर्ति,बिना किसी व्यक्तिगत इच्छा  के अपने हुक्मरानों के आदेशों के सामने विवश है तो वही कुँवर नारायण इस साम्राजयवाद के सत्ताधारी स्वरूप के मूल को पहचानते हुए परिवार में पिता के सत्ता को भी उद्घाटित करते है।पिता जिसे सिर्फ आदेश देने के लिए जाना जाता है ,जिसका  स्वरूप एक विशेष पैटर्न पर फिक्स कर दिया गया है ।उससे स्वयं के निर्णय का मूल्यांकन करने का  आग्रह करना भी अनैतिक और उसके आदेशों का अवमानना माना जाता है । उसी पिता से नचिकेता प्रश्न करता है –
                               “तुम्हारी दृष्टि में मैं विद्रोही हूँ
                               क्योंकि मेरे सवाल तुम्हारे मान्यताओं का उल्लंघन करते है ।
                               नया  जीवन- बोध  संतुष्ट नहीं होता
                               ऐसे जवाबों से जिसका सम्बन्ध
                               आज से नहीं अतीत से है।”
                    नचिकेता और उसके पिता का जो पीढ़ी संघर्ष है ,उसे यहाँ स्पष्ट करने  का प्रयास है ।वर्तमान में पिता कि छवि काफी उदार हुई है, लेकिन यह एक सत्ता जैसा व्यवहार करती थी इससे परिवार में लोकतंत्र और अभिव्यक्ति को वह ‛स्पेस’ नहीं मिल पाता था जिसकी जरूरत हमारे सम्पूर्ण विकास के लिए है।सत्ता जिस भी प्रकार की हो  वह अपने विरोध में खड़े व्यक्ति का मजबूत प्रतिकार करती है । देश, धर्म यहाँ तक की परिवार की सत्ता भी हमे स्पेस देना नहीं चाहती –
                            “कितनी शक्ति है इस स्थिति में
                            जिससे भिन्न सोचते ही मैं विधर्मी हो जाता हूँ
                            इस तरह ,
                           की शेष समर्थ बना रहना गलत भी ,
                           एक सही भी ,अनर्थ हो जाता है ।”
                    इस प्रकार नचिकेता का पिता के धर्म और उसके आडंबरों पर प्रश्न उठाना उसे मृत्यु  का भागी बना देता है | नचिकेता हो या अभिमन्यु दोनों के नियत सत्ता के मद में बर्बाद होने की है | स्थापित व्यवस्था किसी को अवसर नहीं देना चाहती | वर्तमान में पूँजीवादी और विकसित राष्ट्र  , धर्म के ध्वजाधारी और सत्ता में बैठे लोग जिस तरह मूल्यांकन से दूर होकर विरोध की आवाज को दबाने का  प्रयास कर रहे है  वह निश्चित तौर पर मानवता के विकास के लिए शुभ नहीं है |कुँवर नारायण लिखते है –
                        “ असहमति को अवसर दो ,सहिष्णुता को आचरण दो
                          की बुद्धि सिर ऊंचा रख सके …
                          उसे हताश मत करो काइयाँ तर्कों से हरा – हराकर |
                         अविनय को स्थापित करो ,
                          उपेक्षा से खिन्न न हो जाए कहीं
                          मनुष्य की साहसिकता।”
      इस प्रकार कुँवर नारायण की कविता  जीवन के सत्य को स्थापित करने वाली कविता है | हाँ,यह सत्य बदली परिस्थिति में कैसा होगा इसे समझना आवश्यक है और इस सत्य को स्वीकार करके ही हम एक नए समाज का निर्माण कर सकते है , जो मानवता के लिए अधिक उपयोगी और मनुष्य के विकास में ज्यादा सहायक होगा | परन्तु इस सत्य में हमें समन्वय करना होगा क्योंकि –
                         “सत्य ,जिसे हम सब इतनी आसानी से
                         अपनी -अपनी तरफ मान लेते है ,सदैव
                         विद्रोही -सा रहा है ।”
       इस अंतर्विरोध के पीछे के मर्म को पहचानना होगा,जिसे पहचानकर ही हम मनुष्यता के विकास में भागी बन सकते है ।बदले दौर में मूल्यों और मान्यताओं में आए बदलाव से रूबरू होकर ही नए समाज का निर्माण हो सकता है ,यह नयापन रूप के स्तर पर ही नही मूल्य के स्तर पर भी होगा । परन्तु इस नयेपन को समझने और समाहित करने के लिए जो सर्वाधिक जरूरी है वह है -नवीनता के प्रति सम्मान ,उत्साह और सहिष्णुता ।
सन्दर्भ ग्रन्थ –
1. प्रतिनिधि कविताएं -कुँवर नारायण ,राजकमल प्रकाशन ,२०१५ ,पृष्ठ .३९
2. वही
3. वही
4. वही ,पृष्ठ .६९
5. वही .७१
6. वही ,पृष्ठ -६९
7. वही ,पृष्ठ -६९
                                                              बीरज पांडेय
                                                               शोधार्थी
                                                              दिल्ली विश्वविद्यालय

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