शिल्प शब्द का अर्थ है निर्माण अथवा बनावट। साहित्य के संदर्भ में किसी रचना के निर्माण अथवा उसकी बनावट में जिस जिस सामग्री का उपयोग होता है उसे शिल्प के तत्व अथवा शिल्प सामग्री कहा जा सकता है ।कविता के संदर्भ में शिल्प शब्द से आशय सौंदर्य के उन तमाम साधनों ,तत्वों से है जिनके माध्यम से कविता का सौंदर्य उजागर होकर पाठकों के सम्मुख प्रस्तुत होता है । इसके तत्वों के संदर्भ में सर्वप्रथम भाषा के महत्व को रेखांकित किया जा सकता है ।कविता के संदर्भ में भाषा के महत्व पर अज्ञेय ने लिखा है कि “गोचर अनुभव भले ही भाषा के बिना भी हो सकते हैं लेकिन जब हम उनको नाम देकर पहचानते हैं जिसका दूसरे तक संप्रेषण भी हो सकता है तो यह भाषा के बिना नहीं होता” [1]इसी प्रकार रघुवीर सहाय भी कविता में भाषा के महत्व को स्वीकार करते हुए कविता के भाव बोध और भाषा के परस्पर संबंध को ही महत्व देते हैं।

               काव्य भाषा के संबंध में डॉ रामविलास शर्मा ने लिखा है कि “अपनी प्रतिभा के अनुसार कवि ऐसे शब्दों को खोज निकालता है जो उसके भाव को उसकी अनुभूति के अनुकूल पाठक के हृदय में उतारते हैं। शब्द संकेतों के बिना दूसरा व्यक्ति कवि के भाव को समझ नहीं सकता अतः कवि की कला का एक प्रधान अंग शब्दों का चुनाव है। वह भावुक अथवा विचारक होकर भी तब तक सफल कवि नहीं हो सकता जब तक अपने भावों और विचारों को भाषा में मूर्त करने के लिए उचित शब्दों को ना सुन सके। बड़े कवि वह होते हैं जिनके भावों और विचारों के साथ उनकी भाषा में शिथिलता नहीं आने पाती ।उनका शब्दों पर ऐसा अधिकार होता है कि वे उनकी रूचि पर निर्भर उनकी आज्ञा का पालन करते हैं। उनमें ऐसा जीवन रहता है कि वे अर्थ को पुकारते चलते हैं [2]

             कविता में भाषा के अतिरिक्त लयात्मकता तभी पाठक के मन में कविता के प्रति आकर्षण पैदा करती है जब कवि अपनी संवेदनाओं और संबंधित विषय का बोध कराने के लिए उपमानों एवं प्रतीकों का प्रयोग करता है और वह इनको जीवन जगत से ही चुनता है । प्रतीकों के माध्यम से भाषा में एक नवीन शक्ति एवं सामर्थ्य पैदा हो जाती है कविता में बिंब विधान अनेक दृष्टि से महत्वपूर्ण होता है कभी अपनी काव्य भाषा को समृद्ध बनाने के लिए विंबो का उपयोग करता है। सुमित्रानंदन पंत ने बिंब के संबंध में लिखा है कि “कविता के लिए चित्रभाषा की आवश्यकता पड़ती है ,उसके शब्द सस्वर होने चाहिए जो बोलते हों, सेब की तरह जिसके रस की मधुर लालिमा भीतर न समा सकने के कारण बाहर झलक पड़े ,जो अपने भावों को अपनी ध्वनि में आंखों के सामने चित्रित कर सके ” [3]। पंत जी की इस बात को प्रमाणित करते हुए डॉ केदारनाथ सिंह जी ने लिखा है कि “पंत जी ने चित्रभाषा की आवश्यकता पर बल देकर बिंब की अनिवार्यता की ओर ही संकेत किया था ” [4]

             काव्य शिल्प के अंतर्गत विषय वस्तु का भी महत्वपूर्ण स्थान होता है। काव्य की विषय वस्तु के संबंध मे अज्ञेय लिखते हैं कि “यह बात कहने की आवश्यकता नहीं होनी चाहिए कि काव्य का विषय और काव्य की वस्तु अलग-अलग चीजें हैं ” [5]। इस प्रकार संक्षेप में कहें तो भाषा, छंद ,तुक ,उपमान, बिंब ,प्रतीक, वस्तु आदि को शिल्प तत्वों के दायरे में रखा जा सकता है ।काव्य शिल्प के तत्वों के संबंध में डॉ कैलाश बाजपेई ने लिखा है कि ” मोटे तौर पर कहा जा सकता है कि काव्य कृति के निर्माण में जिन उपादानों द्वारा काव्य का ढांचा तैयार किया जाता है वह सब काव्य शिल्प के तत्त्व कहे जाते हैं ” [6]

              भाषा मनुष्य की सबसे रहस्य पूर्ण उपलब्धि है ।भाषा ही वह समर्थ माध्यम है जिसका संबंध एक ओर मानव मन से है और दूसरी ओर जगत की वास्तविकता से भाषा के द्वारा जगत की वस्तुसत्ता और मनुष्य की बोधसत्ता शब्द संकेतों में संगठित हो जाती है। कविता एक भाषिक संरचना है। काव्य भाषा केवल अभिव्यक्ति या संप्रेषण का माध्यम मात्र नहीं है बल्कि संवेदना को नियमित एवं नियंत्रित करने वाला काव्य का जैविक अंश है। भाषा किस प्रकार संवेदना को नियंत्रित और संचालित करती है इस संबंध में रामस्वरूप चतुर्वेदी का कहना है कि ” उच्च भाव और चिंतन के स्तर पर भाषा कैसे वस्तु और संवेदना को अनुशासित करती है इसका अच्छा प्रमाण यह है कि एक बार मध्य देश में ब्रज के काव्य भाषा रूप में स्वीकृत हो जाने पर भक्ति काल तथा रीतिकाल के अधिकतर कवि राधा तथा कृष्ण को केंद्र में रखकर ही काव्य रचना करते रहे” [7]

                महादेवी वर्मा की काव्य भाषा में भावात्मकता प्रमुख रूप से विद्यमान है। गीतिकाव्य में यह भाव तत्वों ,घटना आदि के माध्यम से न उद्भूत होकर स्वयं प्रकट होता है-

                   प्रिय इन नयनों का अश्रु नीर

                   दुख से आविल सुख से पंकिल

                   बुदबुद से स्वपनों से फेनिल

                    बहता है युग युग से अधीर[8]

                   महादेवी जी की राय में ” कविता विश्व मानव के प्रति स्नेह की स्वीकृति है और उसका सर्जन स्वयं महती वेदना है” [9]। महादेवी की दृष्टि में स्थूल और सूक्ष्म सभी विषय कला के उपकरण हो सकते हैं उन्होंने कहा है कि सत्य पर जीवन का सुंदर ताना-बाना बुनने के लिए कला सृष्टि ने स्थूल सूक्ष्म सभी विषयों को अपना उपकरण बनाया है।कवि अपनी रुचि प्रवृत्ति,प्रकृति एवं धारणा के अनुसार विश्लेषण कर सकता है, महादेवी भी विषय विशेष की प्रधानता को मान्यता नही देती हैं कि क्योंकि काव्य की उत्कृष्टता किसी विशेष विषय पर निर्भर नहीं उसके लिए हमारे शब्दों को ऐसा पारस होना चाहिए जो सबको अपने स्पर्श मात्र से सोना कर दे ” [10]

                  महादेवी जी की समूची भावात्मकता एक अलौकिक सत्ता की ओर उन्मुख है ।प्रिय के प्रति आत्मसमर्पण ,वेदना करुणा और निर्वेद आदि उनके भाव चित्र की विभिन्न रेखाएं हैं ।जो करुणा और सहानुभूति उनकी कविता में गुंजित रहती है वे सार्वलौकिक बन जाती हैं जैसे-

                  मेरे हंसते अधर नहीं

                  जग की आंसू लड़ियां देखो

                  मेरे गीले पलक छुओ मत

                  मुरझाई कलियां देखो[11]

                महादेवी वर्मा के गीतों की काव्य भाषा अत्यंत संगीतात्मक है। जो काव्य समग्र जन जीवन को लय से घेर बैठेगा वह गेय होगा ,लेकिन महादेवी  काव्य में गेयता को अनिवार्य नहीं मानती हैं। पर उसमें गेयता संभव है जैसे कि संगीत के स्वरों में अर्थवत्ता संभव है परंतु अनिवार्य नहीं। काव्य के उस अंश को वे गेय घोषित करती हैं ” जो अनुभूति की तीव्रता को संगीत के लिए उपयुक्त शब्द संयोजन द्वारा व्यक्त करता है” [12]।सुख-दुख के इस भावमयी अवस्था विशेष को सिंचित करने वाले गिने-चुने शब्दों में स्वर साधना के उपयुक्त चित्रण को वे गीत की संज्ञा देती हैं ।इससे स्पष्ट है कि वे संगीतात्मक्ता और उपयुक्त भाषा को गीत के लिए आवश्यक मानती हैं। वे कहती हैं “गीत के कवि को आर्तक्रंदन के पीछे छुपे हुए भावातिरेक को दीर्घ निश्वास में छिपे हुए संयम से बांधना होगा तभी उसका गीत दूसरे के हृदय में उसी भाव का उल्लेख करने में सफल होगा” [13]। महादेवी ने अपने गीतों को लयात्मक एवम भावनुकूल बनाने के लिए  शास्त्रीय राग रागनियों का प्रयोग तो नहीं किया है परंतु उनकी पदावली कुछ ऐसी है कि संगीतात्मकता स्वयं ही उपस्थित हो जाती है ।यति ,नियम ,बंधन तथा तुक पालन का निर्वाह महादेवी की कविता में अत्यंत सुचारू रूप से हुआ है-

        पुलक पुलक उर सिहर सिहर तन

        आज नयन आते क्यों भर भर

        विस्तृत नभ का कोई कोना मेरा न कभी अपना होगा

        परिचय इतना इतिहास यही उमड़ी थी कल मिट आज चली[14]

स्वर ताल के मिलन से भी उनके गीत मधुर तम बन गए हैं –

        मधुर मधुर मेरे दीपक जल

        युग युग प्रतियुग,प्रतिपल

        प्रियतम का पथ आलोकित कर[15]

              महादेवी जी की कविताओं में वैयक्तिकता भी प्रमुखता से ऊभर करके आई है ।उनके प्राणों की विविध अनुभूतियां उनकी कविता में अनायास ही नहीं आ गई है लेकिन उसने गाथा में आलंबन अत्यंत सूक्ष्म होने के कारण वैयक्तिकता ही प्रमुख रूप से उभर कर के आई है जिनमें उनके अश्रु ,दुख, विरह और वेदना ने ही स्थान पाया है-

        पंथ रहने दो अपरिचित प्राण रहने दो अकेला

        और होंगे नयन सूखे

        तिल बुझे औ पलक रूखे

        आर्द्र चितवन में यहाँ

        शत विद्युतों ने दीप खेला[16]

      महादेवी वर्मा जी के गीतों की काव्य भाषा के संबंध में विश्वंभर मानव ने लिखा है कि उनकी भाषा अत्यंत परिष्कृत अत्यंत मधुर तथा अत्यंत कोमल है[17]

             प्रतीक हमारी जातीय अनुभव की शक्ति और सामूहिक भाव परंपरा के स्मृति चिन्ह हैं।प्रतीक शब्द का प्रयोग उस दृश्य वस्तु के लिए किया जाता है जो किसी अदृश्य विषय का प्रति विधान उसके साथ अपने साहचर्य के कारण करती है अथवा कहा जा सकता है कि किसी अन्य स्तर की समान रुप वस्तु द्वारा किसी अन्य स्तर के विषय का प्रतिनिधित्व करने वाली वस्तु प्रतीक है।[18] प्रतीकों की विविधता और कलात्मकता कविता की महान उपलब्धि है। आधुनिक युग में छायावादी कवि अभिव्यक्ति की नवीन विदग्धता लेकर साहित्य क्षेत्र में उतरे तथा नूतन प्रतीकवादी कविता का श्रीगणेश किया। कविता में बड़े से बड़े आशय एवं संदर्भ को कम से कम शब्दों में प्रभाव पूर्ण रूप से प्रकट करने के लिए प्रतीकों का प्रयोग किया जाता है ।महादेवी वर्मा ने प्रतीकों का प्रचुर मात्रा में प्रयोग अपनी कविताओं में किया है हालांकि उनके गीतों में प्राचीन साहित्य के तथा निर्गुण काव्यधारा के कुछ प्रतीक अवश्य मिल जाते हैं फिर भी छायावादी तथा स्वयं निर्मित प्रतीकों ने ही कविता में अपनी इयत्ता सिद्ध की है। महादेवी वर्मा ने अलौकिक प्रिय को अलौकिक शब्दावली में प्रतीक योजना के माध्यम से पिरोया है ।उन्होंने वेदों उपनिषदों तथा शंकराचार्य के सिद्धांतों से प्रतीकों को लेकर उनमें अपनी भावना भर दी है। महादेवी आरंभ से ही प्रतीकवादी रही हैं,अलौकिक प्रणय को लौकिक शब्दों में प्रकट करने के कारण उनकी कविता में प्रतीक योजना नितांत आवश्यक हो गई है ।”उनका नीहार निराशापूर्ण वेदना का ,रश्मि अज्ञात से मिलन की आशा का ,नीरजा अनुभूति के प्रस्फुटन का ,सांध्यगीत सुख-दुख मय शांत वेदना का और दीपशिखा निष्काम साधना का प्रतीक है” [19]

          इन हीरक के तारों को कर चूर बनाया प्याला

          पीड़ा का तार मिलाकर प्राणों का आशव ढाला।[20]

           महादेवी जी ने कई स्थानों पर एक ही प्रतीक को विभिन्न संदर्भों में प्रयुक्त किया है ।जैसे शलभ को उन्होंने साधना विहीन व्यक्ति के अर्थ में प्रयुक्त किया है तो कहीं आदर्श प्रेमी के रूप में। महादेवी जी ने अपने प्रतीक विधान के अंतर्गत हृदय की वेदना को दर्पण से, करुणा को वीणा के तारों से तथा सुख दुख में शांत वेदना और निष्काम साधना को दीपशिखा से प्रतीक दिया है। एक ही प्रतीके विभिन्न स्थलों पर भिन्न भिन्न अर्थों में प्रसंग के अनुकूल प्रयुक्त किए गए हैं। कुछ कविताओं के उदाहरण प्रस्तुत है-

मधुर मधुर मेरे दीपक जल[21],  तथा

 

टूट गया वह दर्पण निर्मम[22] ,     या

कीर का प्रिय आज पिंजर खोल दो[23]

             छायावाद तक आते-आते कविता पूरी तरह से आधुनिकता के रंग में रंग चुकी थी ।छायावादी कवियों ने अपनी निजी अनुभूतियों को काव्य का विषय बनाया तथा शिल्प के नए-नए प्रयोग प्रारंभ किये, इस युग की कविता में शिल्प की दृष्टि से अनेक नूतन प्रयोग देखने को मिलते हैं ।काव्य विंबो की दृष्टि से छायावादी कविता अत्यंत संपन्न कविता कही जा सकती है। महादेवी वर्मा के अधिकांश बिंब प्रकृति से प्राप्त हैं उन्होंने इन बिंदुओं के जरिए वस्तुओं और व्यापारों की संश्लिष्ट योजना बनाई है। इनकी रचनाओं में व्यापार विधायक विंबो की प्रचुरता है ।जैसे जलते हुए दिए और घुलती हुई मोम का बिंब विरह की संपूर्ण वेदना को व्यंजित करता है। महादेवी वर्मा द्वारा सृजित कुछ बिम्बों का उदाहरण यहां प्रस्तुत है-

भाव बिम्ब-  विरह का जलजात जीवन विरह का जलजात

               वेदना में जन्म करुणा में मिला आवास

              अश्रु चुनता दिवस इसका अश्रु गिनती रात[24]

दृश्य बिम्ब-  धीरे धीरे उतर क्षितिज से

               आ बसंत रजनी

               मुक्ताहल अभिराम बिछा दे

              चितवन से अपनी

              पुलकती आ बसंत रजनी[25]

स्पर्श बिम्ब-  झुक सस्मित शीतल चुंबन से

               अंकित कर इसका मृदुल भाल[26]

         महादेवी के काव्य में रूपको का समृद्ध भंडार भरा है विरह साधिका होने के कारण विरह संबंधी रूपक अधिक संख्या में है इस संदर्भ में-

     विरह का जलजात जीवन विरह का जलजात[27]

     प्रिय सांध्य गगन मेरा जीवन[28]

     शलभ मैं शापमय वर हूँ [29]

     सूर्य मंदिर में बनूँगी आज मैं प्रतिमा तुम्हारी[30]

आदि रूपक देखे जा सकते हैं।

         महादेवी की कविता में प्रकृति सीधे प्रकृति चित्रण के रूप में नहीं दिखाई पड़ती बल्कि यहां से उनका संवेदना स्तर प्रारंभ होता है ।प्रकृति मानवीय भावना और अन्तर्व्यापारों से स्पंदित होकर एक सजीव सत्ता सी उनके सामने आती है ।प्रकृति का यह मानवीकरण उनकी कविता में सर्वत्र देखने को मिलता है।आकाश,वर्षा ,फूल ,पल्लव ,समीर ,भ्रमर ,कमल ,रजनी और तम सभी उनकी भाव जगत के पात्र बन गए हैं ।प्रकृति का एक-एक अंग और रूप उनकी कविता पर किसी ना किसी भाव को भावित करता रहता है या प्रकृति उनकी भाव अभिव्यक्ति का साधन बनती रहती है-

            हंस देता नव इंद्रधनुष की

            स्मित में घन मिटता मिटता

            रंग जाता है विश्वराग से

           निष्फल दिन ढलता ढलता

           कर जाता संसार सुरभिमय

           एक सुमन झरता झरता

            भर जाता आलोक तिमिर में

            लघु दीपक बुझता बुझता[31]

           महादेवी वर्मा को अपने जीवन के प्रत्येक पक्ष की सुंदर अभिव्यंजना का श्रेय प्रकृति के कारण ही मिला है ,प्रकृति के माध्यम से उन्होंने अपने जीवन वीणा के सभी तारों को झंकृत करके देखा है ,प्रकृति उनकी जीवन पथ की अभिन्न सहचरी हो चली है तभी तो उसके आंसुओं से मेघ बरसने लगा और उसके अधरों की मुस्कुराहट को इंद्रधनुष साकार करने लगा था[32]

             काव्य और व्यावहारिक जीवन में उपमा का प्रयोग सर्वाधिक होता है।इसका प्रयोग जितना सरल है उतना ही कठिन भी । कठिन इसलिए कि एक ही उपमान से व्यापक अर्थ व्यापार होता है। ऐसा उपमान तलाश करना जो  व्यापक अर्थ का अभिरंजन कर सके सर्वोत्कृष्ट उपमान कहलाता है। महादेवी जी की कविताओं में इस प्रकार की उपमाओ से युक्त कुछ कविताओं का उदाहरण प्रस्तुत है-

           मोम सा मन घुल चुका अब

           दीप सा मन जल चुका है [33]

               नव मेघों को रोता था जब

              चातक का बालक मन

              मेरे मन बालसखी में

             संगीत मधुर बन जाता [34]

              विहग शावक से जिस दिन मूक

              पड़े थे स्वप्ननीड़ में प्राण[35]

               महादेवी की काव्य में अलंकारों का सहज और स्वाभाविक प्रयोग हुआ है परंतु उन्होंने चमत्कार उत्पन्न करने के लिए प्रयत्न पूर्वक अलंकारों का प्रयोग नहीं किया उनकी काव्य में प्रयुक्त कुछ अलंकारों के उदाहरण दृष्टव्य हैं-

    अनुप्रास-    युग युग प्रतिदिन प्रतिक्षण प्रतिपल प्रियतम का पथ आलोकित कर[36]

     यमक-  केकी व की नूपुर धुनि सुनि जगती जगती की मूक प्यास[37]

     श्लेष-   नीलम मरकत के सम्पुट दो,जिनमे बनता जीवन मोती[38]

   विरोधाभास- नाश भी हूं मैं अनंत विकास का क्रम भी

                  त्याग का दिन भी चरम आसक्ति का तम भी[39]

     महादेवी की काव्य भाषा में गीति संरचना और काव्य विधान का अपना एक गुणात्मक पहलू है जो एक गरिमामंडित उदात्त काव्यलोक की सृष्टि करता है। महादेवी जी का काव्य गहराई में देखने से छायावाद की शास्त्रीयता का काव्य लगता है जो प्रौढ़ है।जहां द्वंद के थपेड़े खाती कवियत्री रात की कोख में भी दिवस की चाह तलाशती है ।उनके सम्पूर्ण काव्यलोक में आंसू है ,पीड़ा है और श्रृंगार भी है, साथ में निजी जीवन की विसंगतियों का भी पारावार हिलकोरे लेता चित्रित हुआ है।महादेवी की पीड़ा बौद्ध दर्शन की दुख मूलक पीड़ा जैसी है । महादेवी अपने सारे चिंतन रुदन तथा गायन के बीच प्रिय के सानिध्य को प्राप्त करने की ही कामना व्यक्त करती रहती हैं। उनके काव्य में सर्वत्र ही विरह को प्रधानता मिली है ।विरह उनका सार्वत्रिक आराध्य और दुख उनके जीवन का एकमात्र संबल है ,महादेवी का यही दुखवाद उन्हें वैयक्तिक सुख दुख से आगे बढ़ाकर लोक की ओर उन्मुख करता है।और फिर अन्ततः यही कि उत्कृष्ट कविता अपने चरम पर पहुंचकर शिल्प स्वयं ही निर्मित कर लेती उसे किसी काव्यशास्त्रीय रूढ़ शिल्प की आवश्यकता नहीं रह जाती।

 संदर्भ ग्रंथ –

[1] अपरोक्ष-अज्ञेय सरस्वती प्रेस, दिल्ली 1979,पृष्ठ -16

[2]  भाषा युगबोध और कविता -डॉ रामविलास शर्मा,वाणी प्रकाशन नई दिलो 1981 पृ0 -16

[3] शिल्प और दर्शन- सुमित्रानंदन पंत ,इलाहाबाद 1961,पृ0- 14

[4] आधुनिक हिंदी कविता मे बिम्ब विधान- केदारनाथ सिंह ,राधाकृष्ण प्रकाशन 1994,पृ0-15

[5] तीसरा सप्तक- संपादक -अज्ञेय ,भारतीय ज्ञानपीठ प्रकाशन वाराणसी 1967,पृ0 -9

[6] आधुनिक हिंदी कविता में शिल्प- कैलाश वाजपेयी,आत्माराम एंड संस् दिल्ली1963, पृ0 -19

[7] मध्यकालीन हिंदी काव्यभाषा-रामस्वरूप चतुर्वेदी लोकभारती प्रकाशन इलाहाबाद 1991, पृ0-174

[8] नीरजा-महादेवी वर्मा,भारती भंडार इलाहाबाद सोलहवाँ संस्करण, पृ0-11

[9] पथ के साथी- महादेवी वर्मा ,भारती भंडार इलाहाबाद, प्रथम संस्करण ,पृ0 -95

[10] साहित्यकार की आस्था तथा अन्य निबंध -महादेवी वर्मा ,लोकभारती प्रकाशन इलाहाबाद  1966,पृ0- 54

[11] नीरजा – महादेवी वर्मा ,पृ0 -41

[12] साहित्यकार की आस्था तथा अन्य निबंध -महादेवी वर्मा ,लोकभारती प्रकाशन इलाहाबाद  1966,पृ0 -23

[13] साहित्यकार की आस्था तथा अन्य निबंध-महादेवी वर्मा,लोकभारती प्रकाशन इलाहाबाद 1966, पृ0-121

[14] सांध्यगीत-महादेवी वर्मा,भारती भंडार इलाहाबाद 2017 पृ0 49

[15] नीरजा -महादेवी वर्मा, भारती भंडार इलाहाबाद, सोलहवाँ संस्करण ,पृ0- 34

[16] दीपशिखा-महादेवी वर्मा, भारती भंडार इलाहाबाद, संवत 2011, पृ0 -69

[17] महादेवी की रहस्य साधना-विश्वम्भर मानव,लोकभारती प्रकाशन इलाहाबाद 1969, पृ0-179

[18] हिंदी साहित्य कोष- प्रधान सं0 -धीरेन्द्र वर्मा ,ज्ञानमंडल लिमिटेड वाराणसी 2000 ,पृ0 -398

[19] महादेवी के काव्य में लालित्य विधान- मनोरमा शर्मा,साहित्य संस्थान कानपुर 1976, पृ0 -249

[20] यामा-महादेवी वर्मा ,भारती भंडार इलाहाबाद 1971,पृ0- 22

[21] नीरजा-महादेवी वर्मा ,भारती भंडार इलाहाबाद सोलहवां संस्करण, पृ0 -145

[22] वही ,पृ0 -58

[23] सांध्यगीत – महादेवी वर्मा, भारती भंडार इलाहाबाद 2017 पृ0 -61

[24] यामा -महादेवी वर्मा ,भारती भंडार इलाहाबाद1971 पृ0 -142

[25] वही पृ0- 134

[26] वही पृ0 -145

[27] वही पृ0 -138

[28] वही पृ0 -203

[29] वही पृ0 -218

[30] वही पृ0- 212

[31] नीरजा -महादेवी वर्मा ,पृ0 -41

[32] महादेवी का साहित्य:एक नया दृष्टिकोण-पद्म सिंह चौधरी ,अपोलो प्रकाशन सन 1974 ,पृ0 -156

[33] दीप शिखा -महादेवी वर्मा ,पृ0- 23

[34] यामा-महादेवी वर्मा, पृ0- 84

[35] वही ,पृ0 -105

[36] वही ,पृ0 -149

[37] वही ,पृ0-145

[38] दीपशिखा -महादेवी वर्मा ,पृ0-114

[39] यामा -महादेवी वर्मा ,पृ0 -143

 

डॉ. संतोष कुमार पांडेय
असिस्टेंट प्रोफेसर
हिंदी विभाग
फीरोज़ गांधी कॉलेज रायबरेली,उत्तर प्रदेश

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