महादेवी वर्मा छायावाद की महत्वपूर्ण हस्ताक्षर रही हैं। जिन्होंने अपने विशिष्ट सृजन के माध्यम से अनुभूति का सूक्ष्म चित्रण किया है। उनका लेखन दार्शनिक गंभीरता के साथ-साथ करूणा और प्रेम  को अपने भीतर संजोता है। जिसे महादवी ने अभिव्यक्त करने हेतु रहस्यवाद का सहारा लिया है।

महादेवी को प्रेम की कवयित्री कहा जाता है।  हिंदी साहित्य के इतिहास में प्रेम में विरह के चित्रण की एक लंबी परपंरा रही है। मैथिलीशरण गुप्त ने साकेत में उर्मिला के विरह का चित्रण किया है। महादेवी के यहां जो विरह वर्णन मिलता है उसका चित्रण हृदय जनित भावों का प्रकृति के साथ तादात्म्य कर किया गया है। उन्होंने अपनी कविताओं के माध्यम से करूणा और वेदना को गौरव दिया है।  उनके अनुसार-“काव्य ने भी करुणा को विशेष महत्व दिया है। हमारे दो महान काव्यो में से एक को अरुण भाव से ही प्रेरणा मिली है और दूसरा अपने संघर्ष के अंत में करुण भाव ही में चरम परिणति पा लेता है। संस्कृत के उत्कृष्ट काव्यों में भी कवि अपने इस संस्कार को नहीं छोड़ता।”[1]

महादेवी बौद्ध दर्शन से प्रभावित थी और बौद्ध दर्शन में जीवन की क्षणभंगुरता पर प्रकाश डाला गया है। जिसके कारण उनकी कविताओं में मिलन की क्षणिकता किंतु उस क्षण में संपूर्ण जीवन के उल्लास का प्रतिबिंब  मिलता है।

“कैसे कहती हो सपना है सखि

  उस मूक मिलन की बात।”[2]

हजारी प्रसाद द्विवेदी के अनुसार-“महादेवी विराट् विश्व में व्याप्त इस क्षणिक उल्लास वेदना की महिमा की गायिका हैं।”[3]

महादेवी का काव्य स्वानुभूति प्रधान है किंतु उसमें अभिव्यक्त वैयक्तिक भावना मात्र व्यष्टि तक सीमित न रहकर समष्टि तक पहुंचती है। उनका काव्य प्रेमवादी मूल्यों से निर्मित हुआ है। जहां करूणा की प्रधानता है। उन्होंने अपनी प्रेमानुभूति की अभिव्यक्ति के लिए गीतों को अपनाया है। क्योंकि वैयक्तिकता गीत की विशेषता है। किंतु गीतों की वैयक्तिकता में सामाजिकता की परिणति हो जाती है। गीत को सुनने वाले हर व्यक्ति को उसमें अपना भाव ही नजर आता है। उन्होंने अपने काव्य में मिलन से अधिक विरह को महत्व दिया है-

“जान लो वह मिलन एकाकी विरह में है दुकेला”[4]

“उनके काव्य का केंद्रीय बिंब है विरह की अंधेरी रात में प्रेम का दीपक जलाए किसी अज्ञात प्रिय की प्रतीक्षा में बैठी विरहिणी।” [5]

विरह से उत्पन्न स्त्री मानसिकता का सूक्ष्म चित्रण सूर ने गोपियों के माध्यम किया है किंतु महादेवी ने भी स्वंय को वियोगिनी के रूप में चित्रित कर स्त्री मनोदशा का बड़ा ही सूक्ष्म चित्र प्रस्तुत किया है। जहां महादेवी अनेक अंतर्दशाओं में भटकती हुई नजर आती हैं। कहीं तो मिलन की चाह है और कहीं वियोग से उत्पन्न वेदना में आनंद की अनुभूति जिसे वे बनाए रखना चाहती हैं। विरह के कारण जो जिंदगी में सूनापन छा जाता है। उस सूनेपन में भी महादेवी के भीतर कहीं भी निराशा का भाव नजर नहीं आता है।

“अपने इस सूनेपन की, मैं हूँ रानी मतवाली

   प्राणों का दीप जलाकर करती रहती दीवाली।”[6]

              विरह कामनाओं को जन्म देता है। ये कामनाएं मिलन होने पर क्या-क्या घटित होगा, उसके सपने दिखाने लगती हैं। यदि प्रियतम आ जाते तो क्या-क्या घटित होता उसकी कल्पना करते हुए महादेवी कहती हैं-

“हँस उठते पल में आद्र नयन

धुल जाता ओठों से विषाद,

छा जाता जीवन में वसंत

लुट जाता चिर संचित विराग ;

आँखें देतीं सर्वस्व वार !

जो तुम आ जाते एक बार।”[7]

              महादेवी के भीतर प्रिय से मिलने की जो इच्छा है उसमें अंतर्विरोध नजर आता है। कहीं तो उनकी कविताओं में मिलन की तीव्र इच्छा अभिव्यक्त हुई और कहीं वे मिलन की इच्छा को छोड़ विरह की वेदना में ही रहना स्वीकार करती हैं “मिलन का मत नाम ले मैं विरह में चिर हूँ”। और कहीं प्रिय के आने के भान से ही हर्ष और उल्लास के भाव उनके भीतर क्रीडाएं करने लगते हैं-

“नयन श्रवणमय श्रवण नयनमय आज हो रही कैसी उलझन !

रोम रोम में होता री सखि एक नया उर का सा स्पंदन!

पुलकों से भरे फूल बन गए

जितने प्राणों के छाले हैं।”[8]

              “वेदना से इन्होंने अपना स्वाभाविक प्रेम व्यक्त किया है, उसी के साथ वह रहना चाहती हैं। उसके मिलन-सुख को भी वे कुछ नहीं गिनतीं।”[9]

       महादेवी जो अपने प्रणयी भावों की अभिव्यक्ति कर रहीं थीं और जो सपने सजा रही थीं उनमें भारतीय स्त्रियों के सपनों का प्रतिबिंब मिलता है। प्रेम और प्रेम में विरह की पीड़ा का बोध स्त्री को अधिक सताता है। सामाजिक परिप्रेक्ष्य में देखा जाए तो नैतिकता का बंधन स्त्री को स्वच्छंद प्रेम की अनुमति नहीं देता है। जब महादेवी कहती हैं कि “मैं पलकों में पाल रही हूँ यह सपना सुकुमार किसी का” तो इस सपने में स्त्री जाति की भावनाओं का प्रतिबिंब है।

प्रेम में विरह एक ऐसी सच्चाई है जिसे इतिहास द्वारा प्रमाणित किया जा सकता है। सीता का धरती में समा जाना और राधा का व्रज में रह जाना और उर्मिला का राज महल में अपने पति का विरह भोगना विरह के भाव का ही उद्घाटन है। विरह प्रेम की कसौटी होती है। जिस प्रकार अग्नि में तपकर ही कुन्दन सोना बनता है ठीक उसी प्रकार प्रेम विरह की राह से गुजरकर ही परिपक्व होता है। संयोग में जहां स्थिरता होती है वहीं वियोग में सक्रियता होती है। विरह में व्यापकता होती है। महादेवी के प्रेम  में परिपक्वता है उसमें मिलन की इच्छा तो है किन्तु छटपटाहट नहीं है और जीवन प्रति पूर्ण आस्था और विश्वास है-

“तुम मानस में बस जाओ

छिप दुख की अवगुंठन से,

                               मैं तुम्हें ढूंढने के मिस

                                    परिचित हो लूं कण कण से।”[10]

उपसंहार

महादेवी के काव्य में चित्रित विरह वर्णन अज्ञात प्रियतम के प्रति प्रणय निवेदन है। विरह का वर्णन प्रकृति के माध्यम से किया है। विरह अवस्था में विरह आनंद की अनुभूति में परिणित होने लगता है। विरह महादेवी की पूंजी है। “अपने एकांत निजी क्षणों को कविता का विषय बनाने के कारण महादेवी में प्रयत्न-साधित सूक्ष्मता और प्रतीकात्मकता मिलती है। उनका संयम तथा संकोच एक दार्शनिक आवरण का रूप ले लेता है।”[11]

 संदर्भ ग्रंथ – 

 [1] महादेवी वर्मा की विश्व दृष्टि- तोमोको किकुचि, बी.के.ऑफसेट, प्रथम संस्करण,2009, पृ. 60

 [2] वही

[3] महादेवी, डॉ.परमानंद श्री वास्तव, लोकभारती प्रकाशन, प्रथम संस्करण 1976 पृ. 70

[4] वही, पृ.70

[5] महादेवी संचयिता, निर्मला जैन(संपादक),वाणी प्रकाशन, प्रथम संस्करण 2002, पृ. 17

[6] महादेवी, यामा, लोकभारती प्रकाशन, तीसरा संस्करण:2014,पृ.3

[7] महादेवी की कविता का नेपथ्य-विजय बहादुर सिंह,  किताबघर प्रकाशन, प्रथम संस्करण 2009 पृ. 48

[8] वही

[9] महादेवी की कविता का नेपथ्य- विजय बहादुर सिंह, किताबघर प्रकाशन, प्रथम संस्करण 2009,पृ. 48

[10] महादेवी,यामा, लोकभारती प्रकाशन, तीसरा संस्करण:2014,पृ 77

[11] (विश्वनाथ प्रसाद तिवारी महादेवी संपादक-डॉ. परमानंद श्रीवास्तव लोकभारती प्रकाशन प्रथम संस्करण 1976, पृ. 6

प्रियंका भाकुनी
परास्नातक(हिंदी)
इन्दिरा गांधी राष्ट्रीय मुक्त विश्वविद्यालय

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