चित्रा मुद्गल का ‘भूख’ कहानी संग्रह 2001 ई. में प्रकाशित हुआ, जिसमें ‘इस हमाम में’ कथा संकलन की सारी कहानियां शामिल की गयी. इसमें ‘भूख’ शीर्षक कहानी भी शामिल है. इस कहानी में छोटे–बड़े कई चित्र हैं. यह कहानी एक साथ कई मार्मिक बिन्दुओं को समेटे हुए है. इसे पढ़ कर यह तय करना मुश्किल है कि ‘भूख’ शीर्षक के चित्रों को कहानी कहा जाय अथवा जीवन. यह जीवन ही तो है-बेबस, बेसहारे, निरपराध और भूखे इंसानों की दारुण व्यथा. दृश्य शुरू होता है लक्ष्मा की भाड़े वाली कोठरी से. लक्ष्मा और सावित्री अक्का की बातचीत से लक्ष्मा की बदहाल जिंदगी आँखों के सामने उतर आती है. लक्ष्मा अपने मिस्त्री पति की मृत्यु के बाद अपना और बच्चों का पेट पालने के लिए संघर्ष करती है. यहाँ लक्ष्मा नाम पढ़ कर महादेवी की लछमा का याद आना स्वाभाविक है. दोनों की कहानी और परिवेश में अंतर होते हुए भी एक बात समान है उनका संघर्ष और उनकी बेबसी जो अलग-अलग परिस्थितियों से उपजी है.

बहरहाल, सावित्री अक्का के प्रश्न, ‘कालोनी गयी होती तो…’ के बदले लक्ष्मा के उतरे चेहरे और उसकी बातों से फ़्लैट में रहने वाले शहरी लोगों का दृश्य और उनका व्यवहार सामने आता है. लक्ष्मा कहती है, ‘दरवाजा किदर खोलते फिलाटवाले एक-दो ने खोला तो पिच्छू पूछी मैं कि भांडी-कटका के वास्ते बाई मंगता तो बोलने को लगे कि किदर रेती? किदर से आई? तेरा पेचाने वाली कोई बाई आजू-बाजू में काम करती क्या? करती तो उसको साथ ले के आना. हम तुमको पेचानते नईं, कैसा रक्खेगा. और पूछा, ये गोदी का बच्चा किसका पास रक्खेगी जब काम कू आएगी. मैं बोली, बाकी दोनों बच्चा पन मेरा छोटा-छोटा. सँभालने कू घर में कोई नई. साथेच रक्खेगी. तो दरवाजा वो मेरा मूंपेच बंद कर दिए.’[1]

यहाँ दो समस्याओं की ओर ध्यान जाता है पहला, फ़्लैट में रहने वाले लोगों के बारे में और दूसरा, काम खोजती लक्ष्मा के साथ होने वाले व्यवहार के बारे में. शहर में रहने वाले लोग घरों में होने वाली चोरी के लिहाज से सतर्कता बरतते हैं. इसकारण घरों में नौकर रखने से पहले वे आश्वस्त होना चाहते हैं. समाचारों के माध्यम से ऐसी खबरें पता चलती हैं जिनमें घरेलू नौकरों ने हाथ साफ किया हो. कई बार घरों में अकेले रहने वाले बुजुर्गों के साथ हादसे भी हो जाते हैं. पुलिस के यहाँ कई ऐसे मामले दर्ज़ कराये जाते हैं जिनमें घरेलू नौकर के द्वारा चोरी की गयी अथवा करवाई गयी. घटनाओं के लिहाज़ से देखें तो संशय होना स्वाभाविक है, किन्तु लक्ष्मा सरीखी बेबस औरत की पीड़ा और दुरदुराये जाने वाले दृश्य आहत करते हैं. घरेलू नौकरों से दुर्व्यवहार का मामला भी नया नहीं है. लक्ष्मा को भले ही घरों में काम नहीं मिलता है, किन्तु यहाँ घरेलू नौकरों की स्थिति पर थोड़ी चर्चा करने की आवश्यकता अवश्य है, जिसकी झलक हमें ‘भूख’ कहानी में लक्ष्मा के काम ढूंढने और फ़्लैट वालों का उसके मुंह पर दरवाजा बंद करने के प्रसंग में मिल जाती है. तृप्ति लाहिड़ी अपनी पुस्तक ‘मेड इन इंडिया’ में घरेलू नौकरों से जुड़ी अनेक बातें लिखती हैं. वे उनके ऊपर होने वाले अत्याचारों को भी सामने लाती हैं. वे लिखती हैं, ‘उदारीकरण के अगले दशक में घरेलू नौकरों की संख्या में 120 फीसदी की वृद्धि दर्ज की गयी. इस असंगठित क्षेत्र में कार्यबल का दो तिहाई हिस्सा महिलाएं भरती हैं और उनमें से अधिकतर झारखण्ड, पश्चिम बंगाल और असम जैसे देश के पिछड़े इलाकों से आती हैं. इनमें से भी अधिकतर अल्पायु में ही काम शुरू कर देती हैं और उन्हें सरकार द्वारा निर्धारित न्यूनतम वेतन से भी कम वेतन दिया जाता है. इन्हें नौकरी देने वाले लोगों में देश के धनाढ्य वर्ग से लेकर नव धनाढ्य होते हैं, जिनमें से अधिकतर अभी भी मालिक और नौकर के बीच के पारंपरिक अंतर में विश्वास करते हैं. गृह सहायिका के रूप में काम करने वाली इन महिलाओं के साथ गाली-गलौच, मानसिक, शारीरिक एवं यौन शोषण सामान्य सी बात है.’[2]

वास्तविक रूप में यह कहानी उस समय प्रारंभ होती है जहाँ लक्ष्मा के पति की मृत्यु हो जाती है और उसका मालिक लक्ष्मा को काम पर नहीं रखता. कहानी में एक छोटा हिस्सा इसका चित्र खींचता है. ‘सावित्री झोपड़े से बाहर आई तो लक्ष्मा की दयनीय स्थिति से मन चिंतित हो आया. मजे में गृहस्थी कट रही थी. ऐसी पनौती लगी कि सब उजड़ गया. मरद मिस्त्री था. तीस रुपया दिहाड़ी लेता. एक सुबू पच्चीस माले ऊँची इमारत में काम शुरू किया ही था कि बंधे बांसों के सहारे फल्ली पर टिके पांव बालकनी पर पलस्तर चढ़ाते फिसल गये. पन्द्रहवें माले सेजो पके कटहल सा चुआ तो ‘आह’ भी नहीं कर पाया गुंडप्पा. सेठ खडूस था. साबित कर दिया कि मिस्त्री बाटली चढ़ाये हुए था. अलबत्ता रात को जरुर वह बोतल चढ़ा के सोया था, पर सुबू एकदम होश में काम पर गया. मुंह से दारु की बास नहीं गयी तो और बात. हजार रुपया लक्ष्मा को टिका के टरका दिया हरामी ने.’[3] काम करने वाले मजदूरों की दशा किसी से छुपी नहीं है. देश में ऐसे हादसे आम हैं जिनमें मजदूर तंग और बंद फैक्ट्रियों में जिन्दा जल जाते हैं याख़राब और लीपापोती के दायरे में बनने वाली बिल्डिंगों से गिरकर उनकी मौत हो जाती है. ऐसी स्थिति में उनके परिवार को औने पौने पैसे देकर भगा दिया जाता है. लक्ष्मा भी दर-दर ठोकरें खाने के लिए छोड़ दी जाती है. कहानी का यह छोटा सा हिस्सा अनगिनत मृत मजदूरों की पत्नियों की करुण हकीकत है.

गर्भवती लक्ष्मा सेठों के यहाँ काम करने के लिए भटकती और उनके यहाँ से भगाई जाती. ‘सबने बोला ठेकेदार सेठ को, मगर उसने लक्ष्मा को काम पर नहीं रखा. बोला, इसका तो पेट फूला है. बैठ के मजूरी लेगी. बैठ के मजूरी देने को उसके पास पैसा नहीं. मिस्त्री मरा तो वह पेट से थी. सातवाँ महीना चढ़ा हुआ था.’[4] ‘भूख’ कहानी का यह पड़ाव भीष्म साहनी की कहानी ‘गंगों का जाया’ की याद दिलाता है. ‘गंगो खड़ी सोच ही रही थी कि कहीं से मकान की परिक्रमा लेता हुआ ठेकेदार सामने आ पहुंचा. छोटा-सा, पतला शरीर, घनी-घनेरी मूँछों में से बीड़ी का धुआँ छोड़ता हुआ, गंगो को देखते ही चिल्ला उठा –खड़ी देख क्या रही है ? उठाती क्यों नहीं, जो पेट निकला हुआ था तो आई क्यों थी?’…गंगों ने जवाब दिया–काम क्यों नहीं करुँगी? छत पर ईंटें पकड़ने का काम दे दो, वह कर लूंगी.गंगो ने निश्चय करते हुए कहा.

‘तेरे बाप का मकान बन रहा है, जो जी चाहा करेगी? चल, भाग यहाँ से. आधे दिन के पैसे ले और दफ़ा हो जा. हरामखोर आ जाते हैं …’

‘तुम्हें क्या फ़रक पड़ेगा, दूलो मेरा काम कर लेगी, मैं उसकी जगह चली जाऊँगी, काम तो होता रहेगा.’

‘पहले पेट खाली कर के आओ, फिर काम मिलेगा.’ क्षण भर में ठेकेदार का रजिस्टर खुल गया और गंगो के नाम पर लकीर फिर गयी.’[5]

एक ओर गंगों की नौकरी छूटती है और दूसरी ओर लक्ष्मा नौकरी के लिए भटकती है और गर्भवती होने के कारण दुरदुराई जाती है. ‘सेठ ने छूटते ही उसे टका-सा जवाब दिया, ‘कइया रक्खेगा तुमेरा को? बड़ा बच्चा वाली औरत को पड़वता नई. पीछे एक बच्चा वाली औरत को रक्खा होता. उसने इतना घोटाला किया कि क्या बोलूँ. वो काम पर बइठती नई कि उसका एक-न-एक बच्चा मिलने को आताच रैता.’[6]

बेबस लक्ष्मा को सावित्री अक्का एक राह सुझाती है. इसे सुनकर रोंगटें खड़े हो जाते हैं. भूख की आग आखिर है ही ऐसी जिसमें सब कुछ जल जाता है. ‘अक्का अपनी ही धुन में डूबी हुई उसके उत्साह को अधैर्य के अर्थ में लेकर धैर्य बंधाती सी बोली-देख, तू घबरा नईं! एक अउर भी रास्ता हय, मेरे को कलाबाई बोली कि एक औरत हय, वो छोटे बच्चे को गोद लेती हय, संभालती हय. शाम कू बच्चा परत देती. साथ में पइसा भी देती. मेरे को बात जमा. बच्चे का वास्ते तेरे को काम नई मिलता न. फिर काम करने को सकेगी. मैं सुबूच उसको अपने झोपड़े पर बुलाई.’[7] काम न मिलने पर बच्चों को कैसे पालती लक्ष्मा. अपनी आने वाली दुर्दशा के बारे में सोचते-सोचते, ‘सहसा बिजली-सा एक विचार दिमाग में तड़का. बच्चे बच सकते हैं. उपाय है- अगर वह छोटू को उस भिखमंगी औरत को किराये पर उठा दे तो? छोटू का पेट भरेगा ही भरेगा, दो रूपये जो ऊपर से मिला करेंगे. उसमें किल्लो भर मोटा चावल आ जायेगा. बड़े और मंझले के पेट में भी दाने पड़ जायेंगे. फिर कौन उसे हमेशा के लिए किराये पर उठाएगी. कुछ ही दिन की तो बात है.’[8]

कितना भयावह है यह. अपने बच्चे को किसी को भीख मांगने के लिए दे देना. बढ़ती भूख और कुछ लोगों द्वारा भीख को पेशा बनाये जाने से ये सारी घटनाएँ तेजी से बढ़ी हैं. ‘सामाजिक न्याय एवं अधिकारिता मंत्रालय के आंकड़ों के अनुसार, देश में 14 साल तक से 3,72,217 बच्चे भिक्षावृत्ति में लगे हैं और खानाबदोश की जिंदगी जी रहे हैं. भिक्षावृत्ति की स्थिति यह है कि एक पूरा गिरोग इसमें संलग्न है जो मौसम के हिसाब से लोगों की भावनाओं से खेलता है और भीषण गर्मी और कंपकपाती ठंड में छोटे-छोटे बच्चों का इस्तेमाल करता है.’[9] महानगरों में भीख एक धंधे के रूप में जड़ जमाये हुए है. इसमें बच्चों का बहुत इस्तेमाल हो रहा. ‘चेतना’ के निदेशक संजय गुप्ता का कहना है कि बच्चों से भीख मंगवाने या उनके जरिये भीख मांगने का पूरा धंधा बहुत सुनियोजित है. इनमें बच्चों के साथ महिलाओं का भी इस्तेमाल होता है. अगर पुरुष भीख मांगेगे तो लोग उन्हें टोकने के आलावा पैसे देने से भी हिचकिचाते हैं. लोगों को भावुक बना कर पैसे आसानी से निकलवाया जा सकता है. इस धंधे में शामिल लोग इसी भावनात्मक पहलू के सहारे धंधे को आगे बढ़ा रहे हैं. सर्दियों और गर्मियों के दिनों में इनका धंधा फलता-फूलता है. कंपकपाती ठंड और भीषण गर्मी में अगर कोई महिला छोटे बच्चे को लेकर भीख मांगती है तो अधिकतर लोगों का दिल पसीज जाता है  और वे पैसे दे देते हैं. हमें यह भी लगा जो महिलाएं बच्चे लिए रहती हैं उनमें से अधिकांश के अपने बच्चे भी नहीं होते.’[10]

ऐसी स्थिति में इस बात से कतई इनकार नहीं किया जा सकता कि बच्चों के गायब होने के पीछे इन गिरोहों का हाथ नहीं हो सकता. ‘दिल्ली के चौराहे हर स्टेट के भिखारियों से घिरे पड़े हैं. देश में लगभग चार लाख भिखारियों में 45 हजार बच्चे हैं.’[11]

किराये पर बच्चों को लेकर भीख मांगना, चुराए गये बच्चों के अंग-भंग कर उनसे भीख मंगवाना दिल दहला देने वाली घटनाएँ हैं. लक्ष्मा का छोटू भी इसी दलदल में गिर गया है. भीख मांगने वाले लोग बच्चों को अधिक यातना इसलिए देते हैं ताकि लोगों को दया आये और वे भीख दे दें. डाक्टर ने छोटू के मरने का कारण भूख बताया. भूख से उसकी आंते चिपक गयी थीं. कहानी का यह हिस्सा वाकई साँसे थाम लेता है-‘समय-कुसमय का संकोच त्याग कर काम्बले ताई अपना क्षोभ नहीं रोक पाई. भर्त्सना भरे स्वर में बोली, अब रोने से क्या! भिकारिन ने बच्चा पूजा के वास्ते नई लिया होता. वो छिनाल बच्चे का पेट भरती तो बच्चा आराम से गोदी में सोता, पिच्छू उसको भीक कौन देता? अरे, वो बच्चे को फ़कत भुक्खाच नई रखते, रोता नई तो चिकोटी काट-काट के रुलाते कि लोगों का दिल पिघलना…अभागिन, काय कूं दी तू उसको अपना छोटू रे? ढह रही लक्ष्मा को कुछ सुनाई नहीं दे रहा. उसे सिर्फ दिखाई दे रही है दूध भरी बोतल, बिस्कुट का डब्बा, चिपकी आंते और एक बच्चे की लाश.’[12]

कहानीका ताना- बाना बुनने की आवश्यकता ही नहीं पड़ी लेखिका को. वे कटु सचाई को एक के बाद एक रखती चली गयी जिसके भीतर से अनेक दारुण प्रसंग फूटते चले गये. कहानी की भाषा में मुम्बईया हिन्दी का प्रयोग है. जिस तरह से चित्रा मुद्गल ने जीवन के इस हिस्से को कहानी में ढाला है उससे राह चलते हमेशा सामना होता है और लोग आँखें बचाते चले जाते हैं. हिन्दी में इस विषय पर शायद बहुत ही कम रचना लिखी गयी जबकि हम हमेशा ऐसी स्थिति से रूबरू होते हैं. बेबस बच्चे, बेबस भूखी माँ हमारे समाज की सचाई है.

संदर्भ ग्रंथ – 

[1] https://www.hindisamay.com/content/10978/1/%E0%A4%9A%E0%A4%BF%E0%A4%A4%E0%A5%8D%E0%A4%B0%E0%A4%BE-%E0%A4%AE%E0%A5%81%E0%A4%A6%E0%A5%8D%E0%A4%97%E0%A4%B2-%E0%A4%95%E0%A4%B9%E0%A4%BE%E0%A4%A8%E0%A4%BF%E0%A4%AF%E0%A4%BE%E0%A4%81-%E0%A4%AD%E0%A5%82%E0%A4%96.cspx

[2] https://www.gaonconnection.com/desh/in-india-domestic-servant-victims-of-misbehavior

[3] https://www.hindisamay.com/content/10978/1/%E0%A4%9A%E0%A4%BF%E0%A4%A4%E0%A5%8D%E0%A4%B0%E0%A4%BE-%E0%A4%AE%E0%A5%81%E0%A4%A6%E0%A5%8D%E0%A4%97%E0%A4%B2-%E0%A4%95%E0%A4%B9%E0%A4%BE%E0%A4%A8%E0%A4%BF%E0%A4%AF%E0%A4%BE%E0%A4%81-%E0%A4%AD%E0%A5%82%E0%A4%96.cspx

[4] https://www.hindisamay.com/content/10978/1/%E0%A4%9A%E0%A4%BF%E0%A4%A4%E0%A5%8D%E0%A4%B0%E0%A4%BE-%E0%A4%AE%E0%A5%81%E0%A4%A6%E0%A5%8D%E0%A4%97%E0%A4%B2-%E0%A4%95%E0%A4%B9%E0%A4%BE%E0%A4%A8%E0%A4%BF%E0%A4%AF%E0%A4%BE%E0%A4%81-

[5]http://www.hindikahani.hindi-kavita.com/%E0%A4%97%E0%A4%82%E0%A4%97%E0%A5%8B-%E0%A4%95%E0%A4%BE-%E0%A4%9C%E0%A4%BE%E0%A4%AF%E0%A4%BE-%E0%A4%AD%E0%A5%80%E0%A4%B7%E0%A5%8D%E0%A4%AE-%E0%A4%B8%E0%A4%BE%E0%A4%B9%E0%A4%A8%E0%A5%80.php

[6] https://www.hindisamay.com/content/10978/1/%E0%A4%9A%E0%A4%BF%E0%A4%A4%E0%A5%8D%E0%A4%B0%E0%A4%BE-%E0%A4%AE%E0%A5%81%E0%A4%A6%E0%A5%8D%E0%A4%97%E0%A4%B2-%E0%A4%95%E0%A4%B9%E0%A4%BE%E0%A4%A8%E0%A4%BF%E0%A4%AF%E0%A4%BE%E0%A4%81-%E0%A4%AD%E0%A5%82%E0%A4%96.cspx

[7] https://www.hindisamay.com/content/10978/1/%E0%A4%9A%E0%A4%BF%E0%A4%A4%E0%A5%8D%E0%A4%B0%E0%A4%BE-%E0%A4%AE%E0%A5%81%E0%A4%A6%E0%A5%8D%E0%A4%97%E0%A4%B2-%E0%A4%95%E0%A4%B9%E0%A4%BE%E0%A4%A8%E0%A4%BF%E0%A4%AF%E0%A4%BE%E0%A4%81-%E0%A4%AD%E0%A5%82%E0%A4%96.cspx

[8] https://www.hindisamay.com/content/10978/1/%E0%A4%9A%E0%A4%BF%E0%A4%A4%E0%A5%8D%E0%A4%B0%E0%A4%BE-%E0%A4%AE%E0%A5%81%E0%A4%A6%E0%A5%8D%E0%A4%97%E0%A4%B2-%E0%A4%95%E0%A4%B9%E0%A4%BE%E0%A4%A8%E0%A4%BF%E0%A4%AF%E0%A4%BE%E0%A4%81-%E0%A4%AD%E0%A5%82%E0%A4%96.cspx

[9] https://navbharattimes.indiatimes.com/metro/delhi/other-news/beggars-make-fool-of-people-says-a-report/articleshow/52390038.cms

[10] https://navbharattimes.indiatimes.com/metro/delhi/other-news/beggars-make-fool-of-people-says-a-report/articleshow/52390038.cms

[11]https://yourstory.com/hindi/73094f8f8c-beggars-begging-for-ti

[12]https://www.hindisamay.com/content/10978/1/%E0%A4%9A%E0%A4%BF%E0%A4%A4%E0%A5%8D%E0%A4%B0%E0%A4%BE-%E0%A4%AE%E0%A5%81%E0%A4%A6%E0%A5%8D%E0%A4%97%E0%A4%B2-%E0%A4%95%E0%A4%B9%E0%A4%BE%E0%A4%A8%E0%A4%BF%E0%A4%AF%E0%A4%BE%E0%A4%81-%E0%A4%AD%E0%A5%82%E0%A4%96.cspx

डॉ. मधुलिका बेन पटेल
सहायक प्राध्यापक
हिन्दी विभाग
तमिलनाडु केन्द्रीय विश्वविद्यालय, तिरुवारूर

 

 

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