सभ्यता के आरंभ से ही आम जनजीवन में स्वर्ण सबसे मूल्यांकन धातू माना गया है। अतएव किसी भी उपलब्धि अथवा उपयोगिता का मूल्यांकन जब सोने को मापदंड मानकर किया जाता है तो निष्चित ही वह ‘स्वर्ण युग’ सर्वोत्तम होता होगा। हिन्दी साहित्य के  भक्तिकाल को हिन्दी साहित्य का स्वर्ण-युग माना गया है। यह काल एक प्रकार से इतिहास के संधि-युग का परिचायक है। भक्तियुगीन समाज आर्थिक रूप से असुरक्षित और कुलीनतंत्रीय व्यवस्था से त्रस्त था। हिन्दू धर्म में कर्मकांड और पाखंड का खूब जोर था। अध्यात्म और चिंतन को धर्म से लगभग खारिज कर दिया गया था। बहुसंख्यक जन केवल हिन्दू रह गये थे। बौद्ध धर्म देष से खदेड़ा जा चुका था। इस्लाम का एकेष्वरवाद और अस्पृष्यताविहीन सामाजिक सरोकार लोगों के लिये कौतुक का विषय था। इन्हीं परिस्थितियों में भक्ति साहित्य का जन्म हुआ, जिसकी हुंकार आज भी एक नये संकल्प को पोषित, पल्लवित करने के लिए पर्याप्त है।

भक्तिकाल महानतम काव्यकारों का काल था। कबीर, जायसी, सूर तथा तुलसी इस काल के प्रधान ज्योति-स्तम्भ तो थे ही कई छोटे शहरों में भी अप्रतिम कवि थे। उन्होंने भक्तिकाल की संपूर्णता को स्वर्ण कणों से भर दिया। रामचन्द्र शुक्ल के इतिहास में स्त्री कवयित्रियों का वर्णन कम आया है जबकि अलग से शोध करने पर कई ऐसी रचनाकारों में अपूर्व और अपरिमित साहित्य हमें देखने को मिलता है। साहित्य इतिहास के शुक्ल- ग्रंथ में सहजोबाई का जिक्र तो है लेकिन उनकी मौसेरी बहन दयाबाई का जिक्र तक नहीं है जिनकी असंख्य बहुमूल्य रचनायें राजस्थान और विषेषकर अलवर के क्षेत्र में घर-घर में पढ़ी और गाई जाती हंै।

राजस्थान की निर्गुणमार्गी कवयित्री दयाबाई जी सहजोबाई की चचेरी बहन का जन्म वि.सं. 1750 से 1775 के बीच हुआ था। इनका जन्म मेवात के डहरा नामक गांव में हुआ था और ये मेवात  (अलवर) के रहने वाले चरणदास की षिष्या थी। गुरु की सेवा में रहते हुये इन्होंने वि.सं. 1818 में अपने ग्रंथ ‘दयाबाई’ की रचना की थी। इनका दूसरा ग्रंथ ‘विनय मालिका’ नाम से प्रकाषित है। इस ग्रंथ में एक और भक्त कवि दयादास जी की भी रचनायें संकलित है। डाॅ. सावित्री सिन्हा ने श्री निर्मल जी का हवाला देते हुए उनके द्वारा रचित ‘स्त्री कवि कौमुदी’ में कुंवरि शब्द के आधार पर उन्हें किसी राजवंष से ताल्लुक माना है। दयाबाई जी ने अपनी रचनाकाल के प्रारंभ के बारे में अपनी रचना ‘दयाबोध’ में संकेत दिये हैं जिसके आधार पर इनकी रचनाकाल का आरंभ 1818 ही माना जा सकता है। वे लिखती हैं-

‘‘संवत ठारा सै समै, पुनि ठारा गये बीति।

चैत सुदी तिथि सातवी, भयो ग्रंथ सुभ रीति।’’

दयाबाई ने निर्गुणमार्गी काव्य परम्परानुसार गुरुमहिमा, सुमिरन, प्रेम आदि विषयों पर अपने दोहे रचे। इनकी रचनाओं में कोमलता, मधुरता, प्रेम की सरयता देखने को मिलती है। दयाबाई ने स्वयं को चातक और प्रभु को बादल की उपमा देते हुए कहीं उन्हें चन्द्र और सूरज कहते हुए ईष्वर के प्रति अपनी एकनिष्ठता जाहिर की है-

‘‘चकई कल में होत हैं, भान उदय आनंद।

दयादास के दृगन तें, पल न ठरो ब्रज-चंद।

जैसे सूरज के उदय, सकल तिमिर नस जाय।

मेहर तुम्हारी है प्रभु, क्यों अज्ञान रहाय।’’

दयाबाई की भाषा में जो सहज ही चुटीलापन है वह रचना को जैसा विषद बनाता है, वह अन्यत्र दुर्लभ है-

‘‘देह धरो संसार में, तेरो कहि सब कोय

हांसी होय तो तेरी ही, मेरी कहू न होय।

बड़े बड़े पापी अधम, तारन लगी न बार

पूंजी लगे न कछु अंद की, हे प्रभु हमरी बाय।’’

गुरु ब्रह्म काल ही प्रतिरूप होता है। जो लोग उसे नर रूप में देखते हैं, उन्हें कवयित्री ने मूर्ख प्राणी कहा है और उनके जीवन को पषु तुल्य बताया है। जैसे-

‘‘सतगुरु ब्रह्मस्वरूप हैं, मनुष भाव मत जान

देह भाव भानै ‘दया’ ते हैं पसू समान’’

दयाबाई की भाषा में मेवाती भाषा का पुत्र है। लोक-भाषा का संरक्षण आज की मौलिक समस्या है। भक्तिकाल में विभिन्न प्रदेषों और जातियों के रचनाकार अपनी-अपनी मौलिकता लिये जो रच रहे थे उनमें दयाबाई की भाषा की यह बानगी दृष्टव्य है-

‘‘गुरु सब्दन कूँ ग्रहण करि विषयन कूँ दे पीठ।

गोविन्द रूपी गदा मारो कमरन ठीठ।

जग तजि हरि भजि दया गहि क्रूर कपट सब छांड

हरि सन्मुख गुरु ज्ञान गहि मनही सूं रन मांड।’’

‘वैराग का अंग’ शीर्षक दोहों में दुनियादारी के संबंधों की मिथ्याई को वे स्पष्ट करती हैं-

‘‘दयाकुँवर या जगत में नहीं अपनी कोय

स्वारथ-बंधी जीव है राम नाम चित जोय।’’

‘साध को अंग’ नामक शीर्षक दोहों में दयाबाई ने सत्संगति का महत्व प्रतिपादित किया है। जीव अपने कर्मों की वजह से ही भव के अंधकूप में पड़ता है।

साधक को आदर्ष जीवन जीने के लिए सत्संग की आवष्यकता पड़ती है। लेकिन सत्संग जिन साधुओं  द्वारा हो, उनके लक्षण भी निर्मल होने आवष्यक हैं। वे कहती है सच्चे साधु का मिलन दुर्लभ है। अपने प्रिय जनों का साथ तो सभी निभाते हैं पर रामस्नेही साधु का संगत करने वाला ही सच्चा साधक बन पाता है-

‘‘जगत सनेही जीवन है राम सनेही साध

तनम न धन तजि हरि भजै जिनका मता अगाध

साध साध सब कोड कहे दुरलभ साधू सेव।

जग संगति है साधु की तब पावै सब मेव।।’’

भक्तिकाल में केवल कबीर ने ही अनहद नाद नहीं सुना, ब्रह्म ज्योति का साक्षात्कार नहीं किया बल्कि वहाँ जिस नारी को ‘माया महा ठगिनि’ का तिरस्कार मिला, वह स्त्री भी गुरु चरणदास जी से हरि-स्मरण की दीक्षा पाकर नासिका के अग्र भाग पर दृष्टि जमा सकी, पद्मासन लगाया और अजपा जाप प्रारंभ किया। यही नहीं, गुरु कृपा से जब ब्रह्मारन्ध्र में अन्हदनाद गूंजने लगा तो निर्वाद पद की प्राप्ति करके वह गाने लगी-

‘‘चरणदास गुरुकृपा ने मनुवां भयो अपंग

सुनत नाद अनहद ‘दया’ आठौ जाम अभंग।

गगन मध्य मुरली बजै में जु सुनी निज कान।

‘दया’ दया गुरुदेव की परस्यौ पद निर्बान।’’

भारतीय वाड्मय में चार पुरुषार्थ हैं- धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष। स्त्री के लिये कहीं कुछ उपादान नहीं। हो सकता है स्त्री ने सबकुछ प्राप्त किया हो लेकिन साहित्य और इतिहास की रचना पुरुषों द्वारा हुई। इसलिए स्त्री द्वारा अर्जित चारों कामनाओं को वर्णन से बाहर रखा गया। इस दृष्टि से भी दयाबाई की रचनाओं का पुर्नमूल्यांकन होना चाहिए, जो अत्यंत महत्वपूर्ण है।

 

संदर्भ ग्रन्थ

  1. मध्यकालीन भारत, डॉ. वी.डी. महाजन, एसचंद एंड कम्पनी, प्रा.लि. 2013, पृ. 243-246
  2. भारत अलबरूनी, नूर नबी अबासी, नेषनल बुक ट्रस्ट, पृ. 52
  3. उत्तरी भारत की संत-परम्परा, परषुराम चतुर्वेदी, भारती भंडार, प्रयाग, पृ. 558-564
  4. दयाबाई की वाणी, वेलवेडियर प्रेस, प्रयाग, सन् 1923 ई. (भूमिका से) 5. मध्यकालीन हिन्दी कवयित्रियां-डॉ. सावित्री सिन्हा, पृ. 67
डॉ. रूपा सिंह
एसोसिएट प्रोफेसर
बी.एस.आर.गवर्नमेंट कॉलेज,अलवर,राजस्थान

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