जादूगरनी हो तुम ! कितने सजीले रंग चुनती हो । चित्र की एक-एक रेखा हू-ब-हू ऐसे खींच डालती हो कि सच्चाई भी फीकी लगने लगे । उस पर ये मिश्रित रंगों का चयन ….उफ़्फ़ मेरी तो टक-टकी बंध जाती है इन पर । जानती हो ! तुम्हारी इतनी पेंटिंग्स है लेकिन ये ‘दीवार पर दीवार वाली’ भीतर तक छू जाती है । ये पेंटिंग तो तुम शादी के बाद लेती ही जाना और यदि तुम्हें पसंद नहीं, तो मुझे दान कर देना ।

यह पेंटिंग तो मुझे भी प्रिय है, पर क्यूँ? ऐसा क्या छिपा है इसमें? मात्र एक दीवार से जुड़ी लोहे की रेलिंग और उससे सटे खड़े दो प्रेमी जोड़े । कुमुद, तुम्हें क्या दीखता है ऐसा, जो भीतर तक छू जाता है ?

मुझे !…अम्मम्मम्म… यार क्या-क्या नहीं है इसमें,…देख कर ही लगता है कि ब्रश एक कोने से शुरू होते हुए बस अंतिम पड़ाव पर आकर ही थमा होगा । एक बड़ी-सी दीवार से जुड़ा ये छोटा सा छज्जा या  दीवार… जैसे एक घरनुमा कोई आकृति खड़ी है सामने । और जगह-जगह टूटती किनारी से ना जाने ये कौन सा जंगली पौधा मुस्करा रहा है । कहीं कोई फूल नहीं, फिर भी दीवार पर छिटके रंग, फूलों की अनुकृति से लगते हैं । दीवार के दूसरी ओर बनी लोहे की रेलिंग की बनावट मानो सभी आधुनिक बनावटों से बेहतरीन हो । उस पर औंह्दें पड़ी ये दो आकृत्तियां …बस यही कुछ अटपटी-सी हैं, तुम्हारे जैसी बिल्कुल नहीं लगती । फिर भी कितना कुछ दीखता है इन दोनों आकृत्तियों में ….

उसके इस डूबे मुंह को देखते ही मेरी हँसी फूट पड़ी – बस इतना ही या ओर भी कुछ बाकी है मेरी प्रेमी सखी ।

   देख तू आज ऐसे हँस रही है मुझ पर …मैं ले जाऊँगी तुझसे छीनकर… ले जाऊँगी इसे …चिल्लाती हुई कुमुद मेरे घर की दीवारी लाँग चुकी थी कि मेरी आँख चौंक कर खुली और सामने कुछ बचा था तो बस वही पेंटिंग । कुमुद से मिले तो जैसे जमाना हो गया था । न जाने आज कहां होगी ?… कैसी दिखती होगी ?

कितना कोहराम मचाया था मैनें इस पेंटिंग के लिए…. नहीं,.. कुमुद से नहीं …अपनी साँस आशादेवी से ।

पहले-पहल जब उनका परिवार दिल्ली के छोटे से दरियागंज से मेरे घर बड़े से लखनऊ में आया था । तब कितनी भायी थी उन्हें मेरी ये रंगा-रंगी । परिवार के नाम पर कुल 4 ही लोग थे । 1 बेटा और 2 बेटियाँ, चौथी वह खुद । ससुर दूसरी बेटी के तीसरे जन्मदिन पर चल बसे थे । घर की स्त्री-पुरुष दोनों ही आशादेवी थी, यूँ तो पति के रहते भी बांगडोर वही कसे हुई थी । उनके परिवार के साथ मेरे घरवाले मेल-मिलाप कर दिखावे की हँसी पहने कुछ-कुछ बेमतलब की बातें किए जा रहे थे । तभी किसी ने बड़े जोरों से पुकारा – अरे आज लड़की भी दिखाओगे या उसकी चित्रकारी से रिश्ता तय होगा । कुमुद भागी हुई अंदर आई और आते ही झींकते हुए बोली – तेरा होने वाला तो बड़ा शर्मिला है भई , नजरें ही नहीं उठाता । बस जाने कब से धरती में उसकी खोज चल रही हैं । रास्ते भर पुल बाँध रही थी साली होने के कुछ तो करतब दिखाउंगी, लेकिन जनाब ने तो नमस्ते भी ऐसे की जैसे लड़की मैं नहीं वो हो, हाय और इस अदा से मेरी शरारतों के सारे मनसूबे फेल कर दिए जालिम ने ।

चुप हो जा बेशर्म ..तेरी आवाज़ बाहर तक जा रही होगी ।

अच्छा !! अभी से पति की तरफ़दारी, चलो भई ! लड़की अब अपनी नहीं रही… कहती हुई वह मुझे उस दिखावे की भीड़ में ले आई ।

सुंदर-सुशील-गुणवती-बुद्धिमती-रूपवती-कलावती…. न जाने क्या-क्या कहकर एक बुढ़िया मुझे संवारने लगी । मैनें भी मौका पाकर चोर नजर से देखा और जो देखा वह देखते ही रह गई । लड़के के सामने मेरा रूप कुछ भी नहीं था, उसकी नीलिमायुक्त आँखें जैसे मुझे कहीं गहरे डूबोए ले जा रही थी, पर कहां ? दरियागंज ! धत्त! मन ही मन मैं मुस्कुराने लगी । फिर याद आया अरे पगली दरियागंज में कहां डूबेगी वहां तो कोई दरिया भी नहीं । भीड़भाड तो बहुत है दिल्ली में । आज क्या-क्या सोच रही हूँ मैं । तभी एक ओर बुढ़िया नाक-मुंह सिखोड़ते हुई आई और बोली – हाँ लड़की में रूप-गुण तो हैं पर मेरा लड़का भी इकलौता है भाई साहब । मुझे शादी में किसी भी तरह की कोई कमी नहीं चलेगी और हुई तो वो लम्बी खलेगी ।

आज एक बरस हो चला है, शादी के बाद सबको जिसकी लालसा थी, उसका कहीं कोई अता-पता नहीं था । मेरी ननदें सहेली कम मेरी चौकीदार अधिक निकली । मेरे उठने-बैठने-चलने-फिरने सबकी लंका लगाने में दोनों अव्वल थी । घर के काम-काज में मैं ऐसी उलझी कि मुझे अपना होश ही नहीं रहता था । यूँ तो संख्या बढ़कर अब 5 थी, पर मैं अकेली ही थी क्योंकि विपक्षी दल के 4 सदस्य लम्बे समय के साथी थे । इसलिए कोई भी मुद्दा लगता ; मेरी हार निश्चित होती । विपक्षी दल की लीडर आशादेवी बाकी सब कठपुतली । ननदों को सही-गलत समझाना व्यर्थ था क्योंकि वे अपनी माँ के खिलाफ़ कहां कुछ बोल पाती । रही बात उनके सुपुत्र की यानी मेरे ‘पति’ जिनमें पति जैसा अभी तक मैं कुछ खोज ही नहीं पाई तो उनसे क्या बुलवाती ।

          एक रोंज खूब कहा-सुनी हुई – मेरे और आशादेवी के बीच । बाकी सदस्य कोने पकड़े एक ओर खड़े रहे । लम्बी बहस और थोड़ी हाथा-पाई के बीच आज जीत मेरी हुई । मैनें इतना गुस्सा कभी किसी पर नहीं किया था, लेकिन आज जो फूटा था उससे आशादेवी की झूठी-प्रतिष्ठा चकनाचूर हो गई थी । मैनें अपनी प्रिय पेंटिंग उठा कर वापिस उसी दीवार पर करीने से सजा दी, जहाँ से थोड़ी देर पहले बेदबी से उतार कर फैंक दी गई थी । बात सिर्फ पेंटिंग की नहीं थी, उसके जरिए बहस जिस परिणाम तक पहुंची उससे पूरे परिवार की नींव काँप गई थी ।

मैं जादूगरनी हूँ, यही कहती थी ना कुमुद, बस छड़ी कही खो गई है । नहीं, मैं कोई जादूगरनी नहीं, होती तो मन चाहा सब खुशनुमा बना देती । कैसे बोल गयी मैं आज अपनी माँ स्वरूप साँस को – कि आज तक तेरे बेटे ने मुझे छुआ ही नहीं तो पोता कहां से लाकर दूँ । साल भर से ज्यादा जिस दर्द को अपने भीतर समेटे थी कैसे खोल दी वे गाँठे सबके बीच ।

आशादेवी बिस्तर थामे पड़ी रही कुछ दिन शांत-निच्छल, वैसे ही जैसे जानती थी वह सब कुछ । उसने अपने बच्चों पर जिस झूठे मान-सम्मान का फंदा कसा हुआ था, यह शादी भी उसी चुप्पी का परिणाम थी । इसी डर के कारण आकाश ने यह शादी का खेल खेला था । समाज ने विवाह-संस्था को जिस कसौटी पर रखा है, वहाँ अधिकांशत: सम्बन्धों को मात्र औपचारिकता ही मिलती हैं । ऐसे खोखले समाज के आड़े व्यक्ति इतना छोटा हो जाता है कि अपने बच्चों की खुशियों का दम घोटते हुए भी एक बार आह तक नहीं भरता । और आज इन आहों के कोई मायने नहीं थे ।

चुप मैं भी थी, चुप ही रहती, लेकिन क्यूँ और कब तक, नहीं जानती ।

सत्ताधारी की सत्ता जब हाथ से जाने लगती है तो खोखले शासक का डरपोक व्यक्तित्व ओर स्पष्ट दिखाई देने लगता है । जिस दिखावे और चापलूसी पर वह टिका होता है, वे भी शक्ति छिनते ही रंग बदल लेते है । आशादेवी का डर मैं पहचान चुकी थी और उनके सदस्य पार्टी बदल चुके थे । समाज में अपनी इज्जत- शोहरत का ढोल पीटने वाली आशा आज-कल घर का कोना पकड़े निराशा में ही डूबी रहती है ।

गर्मियों की सूनी दोपहर हमेशा से मुझे काटने को दौड़ती है । दूर-दूर तक फैला सन्नाटा और इस सन्नाटे को चीरती रूखी गर्म सांय-सांय करती हवाएं, जैसे ये रूखापन मेरे भीतर के रूखेपन को ललकारने ही आया हो । आज मैनें एक निर्णय किया है कि आकाश से खुलकर बात करूंगी, परिणाम जो भी होगा देखा जाएगा । क्या सचमुच देखा ही जाएगा ? यदि ना देख सकी तब भी क्या हम आँखें फेर लेते है ? देख ही लेते है जैसे-तैसे मन कचोट कर । यूँ तो शादी से पहले भी दो बार मेरी ही जिद पर हम मिले थे । क्या तब भी खुलकर हो पाई थी कुछ बातें ? और जितनी हुई उनसे क्या जाना-पहचाना था मैनें ? बस प्रेम में डूबी उनकी आँखों और खुशबू में ही खोई रहती थी । और आकाश मेरे पास होते हुए कही दूर बैठा रहता । पर अब जरूरत उससे ज्यादा की है, वैसे भी सबसे ज्यादा डिमांडिंग हम प्यार में ही होते है तो तुम्हें भी आज वह सब सुनना होगा जिससे आज तक तुम कतराते रहें हो । दबे पांवों की आहट पाते ही मैं चौंकी – और आकाश को अकेला पाकर हाथ पकड़े कमरे में खींचें ले गई और कुण्डी लगा दी । मेरा पूरा बदन पसीने से तर-ब-तर हो रहा था, जैसे बरसों की कोई आग मुझे अंदर-ही-अंदर राख किए जा रही हैं । मैंनें साड़ी का पल्लू एक ओर फैंकते हुए पूछा– बताओ आकाश क्या कमी हैं ?….क्या मैं सुंदर नहीं हूँ ?…क्या तुम्हारा जी नहीं होता मुझे यहाँ-वहां छूने का ? बोलो ..कुछ तो बोलो …क्या हुआ है तुम्हें? क्या तुम्हें कोई ओर पसंद है ?….उसके सीने से अपना सीना सटाए क्या कुछ नहीं कहा मैनें … देखो यह विपरीत छुअन सिरहन बन कर फूटती है और तुम…तुम तो ऐसे ठंडे पड़ जाते हो जैसे मैं …कुछ नहीं..  देखो मैं कैसे तपती हूँ दिन-रात, तुम्हें जरा-भी फ़िक्र नहीं इसकी…प्यार-दुलार नहीं तो कम-से कम एक ब…बच्चा ..च्चा…

हर बार की तरह ये ‘बच्चा’ शब्द सुनकर उसकी झल्लाहट सामने आ जाती । मुझे पीछे धकेल वह खिड़की पर आकर बिलख पड़ा । उसको रोते छोड़ गुस्से से तमतमाई जून के आंधी-तूफान को चीरती मैं बाजार के बींचोबीच आ पहुंची । लेना-देना तो कुछ नही था कि इतने में मेरा पैर गोबर में जा सना । उफ़्फ़ !! ये भीड़भाड़ में कचरा-पचरा और गोबर की चिपचिपाहट ने मेरे भीतर के तूफ़ान को दूसरा रूख दे दिया । आस-पास पानी पूछती मैं जैसे ही आगे बढ़ी कि सामने एक आकृत्ति पानी की बोतल लिए अपने सख्त गर्म हाथ से मेरा पैर साफ़ करनी लगी । मैनें झेंपते हुए कहा – छोड़िए भी मेरा पैर…आप क्यूँ …उसके हाथ की नरमाई मुझे भीतर तक सालने लगी ही थी कि मैं सब कुछ छोड़-छाड़ कर तेजी से घर की ओर ऐसी भागी कि पीछे मुड़कर देखने की जहमत भी नहीं की ।

घर की मनहूस शांति औरदिनभर की चिल-पौं को थकान में समेटे मैं अपनी चारदीवारी में दाखिल हुई कि दरवाजे पर ही ठिठक गई । आकाश खिड़की पर खड़े किसी को इशारे कर रहा हैं … पर किसे? इधर से तो कोई स्पष्ट दिखाई नहीं पड़ता । मैनें बालकनी से झाँकने का प्रयास किया तब कुछ लाल-लाल सा कपड़ा दिखाई पड़ा । कौन है वह ? …किसे इतनी रात वह हँस-हँस कर इशारे कर रहा है । मैं चुपचाप अंदर आई उसने मुझे देखते ही खिड़की बंद कर दी । मैं कनखियों से उसके चेहरे के आव-भाव पढ़ने की कोशिश करने लगी । उसको इतना खुश पहले कभी नहीं देखा था । ना जाने क्यूँ उस पर तरस –सा गया और उसको ऐसे मुस्कुराते देख मेरे होठों के किनारे भी अर्धवृत्त में बदल गए । कितना पागल हो जाता है इन्सान इस प्यार के खुमार में । ख़ैर खुमार तो मेरा कब का हवा हो चुका है पर उसकी ख़ुशी आज भी जरुरी है और कल भी रहेगी… कल ! क्या पता कल क्या हो? जानने को हम इतना तो जानते ही है कि कल क्या-क्या होना है पर न जाने क्या-क्या कल, कल में ही बदल जाए ।

आकाश बिस्तर पर नहीं था, सुबह – से ही कहीं गायब है । अब नौकरी तो करता नहीं, तो कहां गया होगा । मैं ब्रश–रंगदानी लेकर खिड़की पर खड़ी कुछ उकेरने लगी । रंगों में इतना डूब गयी कि मेरे बदन से लिपटा पल्लू कब जमीन पर झूलने लगा उसका होश तब आया, जब सामने से किसी को झांकते हुए देखापाया । वही आकृत्ति जिसकी छुअन ने सरे बाजार मेरा रोम-रोम पुलकित किया था । आज फिर वहीं नजरें न जाने कैसे देख रही थी…पर क्या? मेरे माथे पर खीचीं रंगीन आड़ी रेखाएँ या मेरे सीने के उभार के बीच खींची नुकीली रेखा…? मैनें झेंपते हुए पल्लू उठाया और थपाक से खिड़की बंद कर दी ।

मेरी पेंटिंग्स के यूँ तो अच्छे खरीददार मिल जाते थे, लेकिन आज बाजार के नुक्कड़ पर खुली एक नई दुकान पर भी बात करके कुछ आडर्र ले आई । बाजार की रंग-रौनक के बीच धीरे-धीरे मेरी चित्रकारी भी अपना स्थान बना रही थी । बाजार पर ज्यादा दिन तक कोई राज नहीं कर सकता । बहुत जल्द बाजार आपको अपनी रौनक से उखाड़ बाहर फेंक देता है इसलिए टिके रहना है तो कुछ नया पेश करते चलो । घर की ओर लौट ही रही थी कि किसी ने आवाज दी – सुनो, मैं मुड़ी तो सामने वही खिड़की से झांकती नजरों वाला आदमी । मुझे घेरते हुए मेरा हाथ पकड़कर धीमे से खींचते हुए उसने कहा – दीपमाला, तुम्हारे होंठ बहुत खूबसूरत है । मैं सुनकर सन्न रह गई कि कौन है यह आदमी, जिसे मेरा नाम भी मालूम है । उसे परे धकेल मैं कुछ कदम आगे बढ़ी ही थी कि आकाश को गुस्से से लाल-पीला देख जरा सहम-सी गई । लेकिन भीतर डर कम ख़ुशी ज्यादा थी कि आज कम से कम जनाब में बारूद भड़का तो सही । बारूद की चिंगारी क्षण भर में मुझे भस्म कर गई जब घर पहुंचते ही आकाश ने मुझे बैड पर धकेलते हुए गुस्से से चीखते हुए कहा – कि दूर रहो उससे….वह सिर्फ मेरा है समझी ।

‘मेरा है’….’मेरा है ? कानों ने सुनकर भी जैसे कुछ नहीं सुना या वह सुना जिसकी कल्पना भी नहीं थी । जो उसको कहना चाहिए, वह मुझे कहा गया । पर क्यूँ? और कौन है वह उसका?

न जाने क्यूँ आज कुमुद बहुत याद आ रही है, काश वह होती यहाँ । यूँ तो होने को बहुत संगे-सम्बन्धी होते हैं हमारे आस-पास । पर क्या सही मायनों में वे हमारे उतने पास होते हैं, जितना हम महसूस करते हैं और महसूस करने वाले भी कहां रह पाते है संगे-सम्बन्धी बनकर । मेरे भीतर कई-कई आत्माएं एक साथ बोलने लगी । कुमुद की तरह छोड़-छाड़ कर भाग निकले इस गंदगी से ! किसे गंदगी बोल रही है उसे जिसे तूने प्यार किया ? कैसा प्यार जिसने कभी नजर उठाकर देखा भी नहीं । नजरें उठाकर शरीर नापना ही तो प्यार नहीं ? ओह कुमुद ! कहा हो तुम ? कितना सुखद होगा तुम्हारा जीवन अपने प्रेमी के साथ । जिस दिन मैंनें यहाँ डेरा जमाया था उसी दिन तुमने भी लखनऊ छोड़ कही नया बसेरा बनाया था । पूरा दिन यादों में डूबी-उतरती मैं कपड़े संभाले खिड़की पर आ टिकी । साँझ की लालिमा जितनी सुखद होती है उतनी ही उदासी से भरी भी । मेरी उथल-पुथल को उसने चौगुनी कर अपने सारे रंग छिटककर कालिमा बिखेर दी ।

आशादेवी सब कुछ चुपचाप देख रही थी, मैं भी चुप थी । हम चुप रहते हुए भी कई बार बहुत कुछ कह जाते है और सुनने वाले कितना कुछ सुन जाते है बिना कुछ कहे । मैनें उनके बेदम चेहरे के भावों से बीते दिनों की सारी व्यथा भाप ली कि जैसे वह चीख-चीख कर कह रही है कि उसका बेटा एक उम्र से ही लड़कियों से नहीं, लड़कों से लिपटा रहता हैं । अपनी बहनों के कपड़े पहन खुद को शीशे में घंटों निहारता रहता है । लड़कों को देखकर लड़कियों की तरह शर्माता है । वह एक लड़के से प्यार करता है । कहते हुए आशादेवी जमीन पर बैठकर सिसकने लगी और थोड़ी देर बाद बोली- सोचा था शादी के बाद सुंदर लड़की के रूप-जाल, प्यार में पड़कर इसके भाव बदल जाएंगे, किन्तु ऐसा नहीं हुआ । इससे उसकी मुश्किलें ओर प्रबल हो गयी । दीपक वही लड़का है जिसके पीछे आकाश ने स्कूल से लेकर नौकरी सब कुछ छोड़ा है बेटी, …(दीपमाला स्वयं से) ये क्या सुना मेरे कानों ने ‘बेटी’ … बेटी सुनकर मेरा गुस्सा कही भीतर ही भीतर मानो पिघल गया । होश में आकर मुंह से बस “हम्म” भर निकला ।

          बेटी, मैनें बहुत कोशिशें की, कि यह लड़का ठीक हो जाए । पर इसकी हरकतें ही ऐसी है कि सारा मोहल्ला नए-नए नाम रखता फिरता हैं । कहते-कहते आशादेवी रोते हुए बाहर निकल गई ।

जमीन पर बैठी मैं बस इतना ही सुन पाई … “ठीक हो जाए”….ठीक …किससे ? बीमारी? नहीं नहीं यह कोई बीमारी तो नहीं कि जिसकी दवाई दी जाए और ठीक हो जाए । पढ़ी-लिखी आशादेवी से ऐसी भूल मुझे गंवारा न हुई और उनकी ना समझी पर एक उलाहने भरी हँसी-सी आ गई । आशा देवी जिसे आपने ठीक करने की कोशिश की, उसकी बजाए आपने आकाश से खुलकर बात की होती तो एक जिन्दगी बर्बाद नहीं होती ।

आकाश आज वही शर्ट पहने है, जो शादी से पहले उसके जन्मदिन पर मैनें दी थी । कितनी खुशामद की थी पर उसने आज तक छुआ भी था इस पीली कमीज को । उसका साफ धुलता रंग पीले रंग में ऐसे घुल गया है मानों एक बिंदू मेरी रंगदानी से ही छिटका हो । आज पहली बार आकाश ने मुझे गले से लगाया और ऐसे देखा जैसे हम पहली-पहली दफ़ा किसी को देखते हैं । मुस्कुराते हुए बोला- दीपमाला, तुम बहुत अच्छी हो । तुम्हारी ये पेंटिंग्स भी मुझे बहुत अच्छी लगती हैं । मैं थक गया था, एक साधारण लड़के की तरह व्यवहार करते-करते । भीतर ही भीतर बहुत घुट रहा था इस झूठी पहचान के नाटक से । मैं तुम्हारा शुक्रगुजार हूँ, तुमने मुझे इस कैद से रिहा किया है । तुमने मुझे मेरा प्यार-सम्मान वापिस किया है । और भी ना जाने क्या-क्या आज वह बोले जा रहा था मैं तो बस उसका खिलखिलाता चेहरा और नीली आँखों से बीच उलझी इतना ही कह पाई – जाओ ! तुम मुक्त हो, अपना आकाशदीप चुनने के लिए ।

सही कहती थी तुम, मेरी दुष्ट दर्शक ! उन प्रेमी जोड़ों में मैं नहीं थी…कहीं नहीं थी ।

 

डॉ० सिम्मी चौहान
सहायक प्राध्यापक (तदर्थ पद)
 मोतीलाल नेहरू महाविद्यालय
दिल्ली विश्वविद्यालय

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