श्रीधर के घर जब पहली बार खुशियों का दिन आया , तब उतना उत्साह न था। बेटी जो हुई थी। जब आज वही दिन फिर आया। वह फूले न समा रहे हैं। कभी दरवाजे के पास जायें, फिर बाहर भागे, तो कभी अन्दर……….। यही क्रम सुबह से दोपहर तक कई बार हो चुका था। उत्सुकता उन्हें बैठने का अवकाश न दे रही थी। वह बाहर चबूतरे में बैठे थे, अचानक उनके कानों में रोने की आवाज सुनाई दी। पहले तो उनके खुशी का ठिकाना न रहा, फिर वह दुःख के सागर में डूब गये। मन कह रहा था इस बार बेटी नही बेटा होगा। सोचते सोचते उनके शरीर में उत्साह का ऐसा झोका आया कि उठे भीतर की ओर लपके, देखे रूक गये। समाने से उन्हीं की मां आ रही थीं।
बोली -‘ मिठाई मगवाओ, बधाई हो, तुम्हें भगवान ने एक …………………। ’
‘ एक, एक क्या मां जी। ’
‘ नही, पहले मिठाई लाओ। ’
‘ मां, मेरे सब्र का अब और इन्तहा न लो, बताओ न, मै तुम्हारे पैरों पड़ता हॅू। ’
‘ अरे, तुम्हे पुत्र रत्न की प्राति हुई है। ईश्वर ने तुम्हारी सुन ली। चलो, जल्दी जाओ, मिठाई बटवाओ और हां मेरा नेग। ’
‘ हां, हां सब मिल जायेगा। ’
कहते श्रीधर गांव में दोस्तों की ओर भागे। मां जी कह रही थी – ‘ अरे ! रूक, रूक जा बदमाश, रूक तो।’ श्रीधर के पैरों में पर लग गये थे। उड़े जा रहा थे। तीन-चार महिनों तक तो गांव भर की औरतों का जमावड़ा यही पर लगा रहता। कोई सोहर गाती, तो कोई बालक को खिलाती। यह नन्हा शिशु घर का खिलौना तो था ही, पूरे गांव का चहेता भी। ननिहाल से खटोला, खेलने की बैल गाड़ी, गले का चद्रमा, छुन-छुन करता घुघरू, हाथे का चूड़ा, कपड़े का तो कहना ही क्या। बधाव आया, गांव गुलजार हो गया। ज्योतिषाचार्य जी गुण-दोष देख, नामकरण किया। नाम पड़ा माधव। माधव कब पाॅच वर्ष का हो गया, कुछ मालूम ही न पड़ा। श्रीधर के घर में उसकी मां, पत्नी एक बेटी और माधव है। घर में माधव का बड़ा आदर रहा। जो कहता दादी, मां और श्रीधर चाहे आसमान से लाये लेकिन लाये। पहले वह घर भर में खेलता, जिद पर बाहर भी जाने लगा। मां उसको पान के जैसे रखवाली करती। अब वह धीरे-धीरे विद्यालय भी जाने लगा। पाचवां, छठवां दर्जा कब पास हो गया कुछ पता ही न चला। सातवें दर्जे में पहुचते ही पता नही क्या हुआ। अब उसकी उतनी रूचि पढ़ने में न थी, जितना खेलने में। सुबह विद्यालय के लिये निकलता, पर रास्ते में जाकर अरहर के खेत के बीच में बैठा रहता। जब उधर से बच्चों के आने का समय होता, वह कुछ आगे-आगे घर पहुंचता। एक दिन गुरू जी का सामना श्रीधर से हो गया। गुरू जी श्रीधर से बच्चे के कई दिनों से विद्यालय न जाने की बात कही। श्रीधर अवाक् रहे। बोले -‘ वर्मा जी क्या बात करते हैं ? माधव रोज विद्यालय जाता है। नही जाता तो कल जरूर जायेगा। ’ सुबह हुई माधव ने वही राग फिर पकड़ी। इतनी मार पड़ी की क्या कहे। माधव तब से कभी अरहर के खेत में न गया। सातवां दर्जा वह प्रथम श्रेणी में उतीर्ण हुआ। जब श्रीधर को परीक्षा परिणाम मालूम हुआ उसके खुशी का ठिकाना न रहा। सीना ताने पत्नी के पास गया, प्यार से दोनों हाथ कंधे में रखते हुये-
‘ तुम्हारा माधव अच्छे दर्जे से पास हुआ। बोलो क्या कहती हो ? ’
‘ मेरा क्यों ? आपका नही है क्या ? ’
‘ अब देख लेना माधव ही बुढ़ापे का सहारा होगा। हमारा लड़का लाखों में एक है। मुन्नी तो कुछ दिनों में चली जायेगी ससुराल। अब माधव जिस दिन सेना में भर्ती हो गया। एक दो साल में बहू भी ला दॅूगा। हां। ’
‘ अभी से आप बहू-बहू रट लगा दिये। नही, बहू तो तभी आयेगी। जब तक वह कह न दे। ’
‘ अरे ! भाग्यवान, क्या आप शादी करने को अपने माता-पिता से कहीं थीं ? कि वह भी कहेगा। कुछ लम्पट होंगे इस दुनिया में मैं कब कहता हॅू । हमारे माधव में ऐसा गुण कहा। ’ श्रीधर माधव की ओर से सफाई दी। वह बोली-
‘ आज कल के बहुओं का कोई भरोसा नही, कब चूल्हा अलग कर ले, हमसे बेटा भी छीन जाये। ’ देवकी के चेहरे पर वह चिंता दिख रही थी जो एक मां के चेहरे में दिखती है।
श्रीधर अफसोस जताते हुये बोले- ‘ तुम एक औरत होकर, उन्हीं के बारे में ऐसा सोचती हो।
’ मैं कुछ नही सोचती, बस एक और………………..। ’
‘ नही, नही, माधव का परिवार ही हमारा सहारा बनेगा। ’
‘ यह तो वक्त ही बतायेगा। ’ देवकी जैसे ऐसी बात बहुत सुन चुकी हो।
श्रीधर को जब कुछ न सूझा जोर से देवकी को अपनी ओर खिचते हुये और करीब लाना चाहा। देवकी माधव केे आने का बहाना कर पानी लेने चली। श्रीधर कुछ देर तक खड़े रहे, फिर हारे योध्दा की भाॅति बाहर निकले, हल उठाया, बैलों को खोला, खेत की राह ली।
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माधव अब बड़ा हो गया। आठवें दर्जे का विद्यार्थी है। श्रीधर को बच्चों से कोई गिला-शिकवा न था। अपने कामों में मस्त। कुछ महिनों में माधव बच्चों के संगत में पड़ जाने से क्रिकेट खेलने का आदी हो गया। वह क्रिकेट का कीड़ा था। गांव के सारे लड़के उससे टक्कर लेने से ड़रते थे। अब विद्यालय कभी-कभी जाता। देवकी को उतना नही जितना वह श्रीधर से ड़रता। श्रीधर की आखें ही बहुत थी। उनसे हमेशा कटता रहता। जब सामने पड़ जाता सीधे विद्यालय की राह लेता। आज उसके साथ वही हुआ। जैसे ही वह क्रिकेट के लिये निकला पिता जी ने कहा-‘ जा कर बकरी चरा ला। ’ करता क्या न मरता। मन में कुछ भुनभुनाते बकरी की रस्सी पकड़े घसीटते खेत की राह ली। वह छटपटा रहा था, मन भी ललचा रहा था। दोस्तों की चालाकी याद आते वह झुझला उठता। सहसा उसे आज के रोचक मुकावले की याद आयी। ‘ अब टाॅस उछला, अरे ! यह क्या ? राधे तो बैटिंग की सोची थी, बेचारे को फिल्ंिड़ग मिला। कोई बात नही, मैं होता तो बच्चू क्या नाटी (गलती ) कर लेता। ’ सोचते मन-ही-मन पछता रहा था। अब उसकी यही दिनचर्या थी।
एक दिन माधव का दोस्त उसके घर के व्दार पर मिला। पूछा- ‘ यार , तुम क्रिकेट खेलने क्यों नही आते ? क्या क्रिकेट खेलना छोड़ दिया ? क्या तुम खेल में कोई नयी चीज ला रहे हो ? ऐसे ही प्रश्नों की बौछार लगा दी। बेचारे को कुछ समझ नही आ रहा था कि क्या जबाव दे। बोला – क्या बताऊ यार, किस समस्या में पड़ा हंू। पिता जी बकरी चराने का भार मेरे ऊपर ड़ाल दिया है। इसलिये……………………। ’ तू होता तो मजाल क्या कोई दूसरा इनाम ले जाता। खैर, कोई बात नही। ’ कहते कुछ गुपचुप बातें होने लगी। अन्दर से मुन्नी ने कहा – भइया, बकरी चराने ले जाओ, समय हो गया। ’ यद्यपि मुन्नी माधव से बड़ी थी फिर भी भइया ही कहती थी। माधव बकरी खूटे से खोला, झौआ (बांस की टोकरी ) लिया चला खेत। पता नही दोनों दोस्तों में क्या बातें हुई। वह आज बकरी लेद्दा दादा के अरहर के खेत मेें छोड़ आया। बकरी दस मिनट में खा के मस्त हो गई। माधव ने बकरी को दोनों ओर देखा जैसे पेट में दो और बच्चें आ गये हो। रस्सी ली ‘ हुर्रे-हुर्रे ’ करते ला कर बांध दिया। और बोला- मां बकरी अघा गई। ’ देवकी ने देखा दंग रह गयी।
बोली – तू किसके खेत का सत्यानाश कर आया।
किसी के तो नही। वह लेद्दा दादा के खेत……………………।
तू , किसी दिन हाथ-पैर तुड़वायेगा और कुुछ नहीं। आज तुझे पिटवाऊ न तो कहना। जा हरियार (हरी मुलायम घास) ला।
तिवारी के खेत में अच्छी राई पत्तेदार मूड़-मूड़ भर की लहलहा रही थी। यह पहले खेत में अकरी (एक प्रकार की घास) उखाड़ी फिर राई के खेत में घुसा। पत्ते तोड़कर झौआ के नीचे रख ऊपर से अकरी। करीब बीस-पच्चीस मिनट में आया। गड़ास उठाया, छोटे-छोटे टुकड़े कर भूसे में मिलाकर नाद में ड़ाल , चला क्रिकेट के मैदान। जैसे कोई जंग जीत लिया हो। यह अब उसका प्रतिदिन का काम था। सोमवार का दिन था। माधव बकरी ले के उसी खेत में छोड़ आया। पास के खेत में अकरी उखाड़ने लगा। उसे बकरी का ख्याल न रहा। बकरी जब खा के मस्त हो गई तो लगी ‘ मेंए -मेंए ’ करने। उधर से लेद्दा आ रहे थे। इतनी मार पड़ी कि क्या कहे।
माधव मार खाने का अभ्यस्त-सा हो गया। अब वह चोरी भी करने लगा। कभी मां के ड़ोल्ची साफ करता , कभी श्रीधर का जेब। पूरा घर उसके आतंक से भयभीत था। चाहे आग बरसे या माघ- पूस की ठारी, कोई वस्तु माधव को पसन्द आयी, उसे ले के ही दम लेता।
बड़कामन बटाई के खेत में अच्छी सब्जियों की बगिया लगाये थे। एक बीघे से कम न थी। एक तरफ आलू लगा था, कूले में मूली। कई क्यारियों में पालक, चार क्यारी तो देशी-विदेशी मिर्चे थे। कुछ हरे, कुछ ललछर। चूकन्दर, धनिया, लहसुन की तो बात ही क्या। दूसरी तरफ बढ़िया मुलायम गाजर, टमाटर, भाटा। सामने तरफ कुटिया। कुटिया के बगल में हरहराता मोटरपम्प। शांम को मुरवाती के लिये मां ने चार रूपये दे कर माधव को भेजा। वह बगिया में घुसने ही वाला था कि बड़कामन सामने दिख पड़े। चार रूपये की मूली ली और घर की ओर चल दिया। बगिया का नजारा देख उसकी आंखें निकली आ रही थी। रास्ते में सोचा सीधे मुंह बात बनने वाली नही। रात में ही कुछ करना पड़ेगा। ‘ कैसे सुन्दर-सुन्दर भाटा लटक रहे थे। गोभी, बन्धा जैसे पंगत में बैठे भोजन का इन्तजार कर रहे हो। आज रात मैं इन्तजार कराऊंगा। रात तो हो। ’ कुछ देर में बगिया की बाड़ी याद आयी। शरीर कांप सा गया। सोच रहा था। ‘ कितने कटीले बमूल की बाड़ी। शरीर में घुस जाये तो घिनौनी ही हो। बगिया में घुसना देश की सीमा लांघने जैसे है। ’ फिर सोचा ‘ चोरों का काम जोखिम भरा होता ही है। ’ मन बांध के मन-ही-मन निश्चय किया। ‘ बार्ड़र तो पार करना ही है चाहे जैसे। चाहे आतंकी बड़कामन गोली क्यों न मार दे। सोचेगें बगिया में पहुचकर सीने में गोली खायी, शहीद हो गये। तब मां-बाबू का सीना गर्भ से ऊंचा होगा। हाय ! सचमुच सेना में हो के करता तो जरूर होता। ’ अन्त यह हुआ चोरी तो करना ही है। सोचते माधव घर पहंुचा। बड़कामन बैलों को चारा-पानी, बियारी करने चले। दस बजते-बजते बड़कामन बगिया में आये , हुक्का गुड़गुड़ाने लगे। झपकी आयी आंखे मुद गई। पर सोते कुुकुरनिदिया ही। बीच-बीच हॅू-हा करते रहते।
माध की ठारी में हाड़मांस कपा देने वाली हू-हू करती ठण्ड़ हवा, कुहरा चारों ओर ढ़का हुआ था। कुहरा जैसे रात को अपने आगोश में ले लिया हो। बैलों की घण्टी, चमगादड़, परेबा की आवाज साफ-साफ आ रही थी। माधव एक हाथ लोटे में पानी दूसरे में ड़ण्ड़ा लिया, चद्दर ओढ़ा और चला अनीति से किला फतह करने। उसे समूचा रास्ता नही सूूझ रहा था किन्तु अपनी राह चला जा रहा था। मानो कोई तपस्वी सत्य की खोज करने जा रहा हो। कुछ क्षण उसे लगा लौट चले। लालच और चाहत लौटने न दिया। ड़ण्ड़े के सहारे चुपके-चुपके पैर बाड़ी की ओर बढ़ा रहा था। अचानक उसका एक पैर धप्प से गढ्ढ़े में जा घुसा। गढ्ढ़े में पानी कम कीचड़ ज्यादा था। पूरे कमर तक भीग गया। आंख, नाक , मुंह में कहीं-कहीं कीचड़ भरे पानी की छींटे पड़ गये थे, पोंछते सम्हलते आगे बढ़ा। सहसा उसे खांसने की आवाज आयी। वहीं लोटा-ड़ण्ड़ा लिये बैठ गया। कुछ क्षण प्रतीक्षा की। आवाज शांत होते ही फिर चला तो बाड़ी के पास पहुचा। आहिस्ता-आहिस्ता ड़ण्ड़े से बाड़ी के कांटे हटाने लगा। इस बीच न जाने कितने बेर, बमुल के काटे चुभे होंगे, कह नही सकते। रास्ता तैयार हुआ। वह घुसा और एक कांटा उसके पीठ में चुभ गया। अर्रराते आगे बढ़ा। बड़कामन जोर से खांसे, चोर का कलेजा कितना, अन्दर तक कांप गया। चुप-चाप बैठा रहा। सोचा रास्ता बन ही गया, कल आऊंगा, कहीं पकड़ा गया तो नाहक फजीहत होगी। फिर सोचा आया तो कुछ हाथ लगाये लिये ही जाऊं। हाथ बढ़ाया। उसे किसी भारी फल का अन्दाजा हुआ। फिर लेटे-लेटे आगे बढ़ा उसका हाथ क्यारी में पड़ा, क्यारी में पत्ते झड़े पड़े थे, समझा सांप है, चिल्लाने ही वाला था कि भयंकर अनिष्ट होने की वजह से मन, मुंह दोनों को वश में किया। अंधेरा इतना था कि उसे मालूम नही हो रहा था कि क्या तोड़ रहा है। पर खूब तोड़ा। दबे पांव निकल रहा था, तभी बड़कामन राम-राम करते बाहर निकले। जैसे बिल्ली चूहे को देखकर दुबक जाती, वैसा हाल माधव का रहा। सोच रहा था यदि बच गया तो चोरी हमेशा हमेशा के लिये छोड़ दूंगा। रास्ता साफ देख, झट उठा, पोटरी उठाई, बाहर निकला। चद्दर, लोटा लिया घर की राह ली। इस बीच उसकी नजर ऐसे थी जैसे कोई छांछ पीने बिल्ली जा रही हो। घर पहुंचा, भीतर अपने कमरे में गया, लालटेन जलाई। प्रकाश से कोठरी जगमगा उठी, जैसे संदेश दे रही हो तुम्हारी जीत हुई। किन्तु पाया क्या कुछ भी नही। सामने देखा चालीस-पैंतालिस शिमला मिर्च। उसे आभास हुआ कि वह कितना बड़ा मूर्ख है। आज उसे दूसरी बार लज्जित होना पड़ा। उस बार तो श्रीधर थे इस बार यह दीपक। उसे पता नही क्या हुआ। हाथ लालटेन के ऊपर रख कसम खाई-‘ अब कभी चोरी नही करूंगा। पढ़ाई करूंगा। ’ शिमला की ओर तिरष्कार नजर ड़ाली। किन्तु अनिष्ट हो जाने पर भी फेंक न सका। ले जाकर रसोई घर में रख दिया। माधव आज सच में अपने ऊपर विजय पाई थी। व्यक्ति जब स्वयं कोई निर्णय लेता है तब वह ज्यादा प्रभावी होती है।
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माधव उस दिन उठा, बैलों को भूसा दिया। जाकर पढ़ने बैठ गया। उसे किसी ने कुछ न कहा। नहाया, खाया और विद्यालय चला गया। आया खाया फिर काम करने चला। शांम को क्रिकेट की जगह पढ़ने बैठा। ग्यारह बजे तक पढ़ता। यह अब उसकी दिनचर्या थी। श्रीधर समझ नही पा रहे थे कि यह क्या करामात हो रहा है। अब जो करता उसी में वाहवाही मिलती। बारहवीं का परिणाम आया। विद्यालय भर में प्रथम स्थान। गुरू राधेश्याम वर्मा जी घर आये। श्रीधर को बुलाया। पूरे गांव को एकठ्ठा किया। उसके सिर पर हाथ फेरते बोले – ‘ माधव तुम्हारे गांव का शान है श्रीधर। यह लड़का जरूर एक दिन कुछ अच्छा बनेगा।’ माधव अब ऐसा विनम्र था कि अभिमान, घमण्ड़ उससे कोसों दूर भाग चले थे। उसके चेहरे पर स्वाभिमान साफ-साफ झलक रहा था। बड़कामन सामने खड़े मुस्कुरा रहे हैं, शायद चोरी वाली घटना पर। पर किसी से कभी न कहा था। आज भी न कुछ कहा। क्यों ? कह नही सकता। पीठ पर हाथ रखते बोले-‘ हां, माधव अब बदल गया है। यह ईश्वरीय चत्मकार है।’ आठवें दर्जे के बाद श्रीधर पहली बार माधव को देखा था। पुत्र प्रेम की ज्वाला में श्रीधर का मन जलने को उतावला हो उठा। वह देखता है एक हट्टा-कट्टा जवान, सात फीट का, उसके सामने सिर झुकाये खड़ा है। जैसे कह रहा हो, ‘ मुझे दण्ड़ दो, मैंने आप लोगों को बहुत तंग किया। ’ पुत्र प्रेम में अपराध कहा दिखता है। सब क्षमा ही क्षमा। कब बड़ा हो गया। श्रीधर को कुछ खबर ही न रहा। कंजी-कंजी आंखें, भरे दोनों गाल, गोरा रंग, गठीला बदन, चैड़ी छाती जैसे कोई फौजी हो। बोले-‘ आओ, फौजी बेटे, मेरे गले लग जाओ।
माधव को एक ही धुन सवार हुई। फौज में जाना है तो जाना है। चार बजे उठता पूरे गांव का चार पांच चक्कर लगाता। यहां तक की सारा घर सोता रहता, वह सैकड़ों उठक-बैठक, बैलों के खाने का प्रबन्ध कर चुका होता। खेती किसानी का काम भी समय पाते करता। हल भी चलाने जाता। घर में पानी भी भर लाता। श्रीधर और देवकी बहुत खुश थे। मुन्नी भी। दादी का अन्तिम समय में भी क्या कहना। यहां तक की पूरा गांव अपने लड़कों को उदाहरण स्वरूप उसी का नाम लेते। गांव के कई लड़के सेना भर्ती में जा रहे थे, माधव भी तैयार हुआ। सभी गये किन्तु दो-तीन दिन में सब-के- सब लौट आये। पर माधव नही। कुछ ने घर आकर अपने अपने पिता सेे कहा-‘ पत्थरहाव हो गया , तो जान ले के भागे। ’
कल्लू ने कहा- ‘ अगर दीवाल फांद के न भागता, तो आज यहां मैं नही, मेरी लाश होती।
अरे ! बच्चू मैं अगर न होता, तो तुम यहां इतनी बड़ी-बड़ी बातें करने के लिये न होते।’ रामभरोसे ने उसकी बात को और मजबूती दी।
श्रीधर जब माधव के बारे में पूछा, सभी कहने लगे- दादा, यहां सबको अपनी अपनी लगी थी, दूसरे का कहा ख्याल। क्या माधव नही आया ?
बोले- आया होता तो थोड़े ही पूछता।
एक दिन, दो दिन, हफ्ते, दो हफ्ते तक बहुत खोजा पर कही पता न चला। तीन-चार महिना बीत गया। जब माधव न मिला। ‘ भगदड़ में कही माधव भी…….., फिर कभी ‘कोई बैरी -दुश्मन कुछ खिला-पिला दिये होगें। ’ सोचते श्रीधर मन को तसल्ली देते आस छोड़ चुके थे। पर देवकी का मन कुछ और कहता था। छठवां माह भी बीत चला, पर उसका कोई पता नही। श्रीधर खेत में पानी लगा के लौट रहे थे, रास्ते में एक झोला लिये व्यक्ति श्रीधर से श्रीधर के घर का पता पूछा।
क्या आप श्रीधर का घर बतायेंगे।
कहिये, वह अभागा मैं ही हंू।
कैसी बातें करते हैं ? आपका लड़का लाखों में एक है।’ झोले से एक चिठ्ठी निकालते हुये ड़ाकिये ने खेद व्यक्त की।
क्या ?
हां , यह चिठ्ठी उसी की है। लिजिये, यहा अपना नाम लिख दीजिए। ’
श्रीधर के खुशी का ठिकाना न रहा। उसे विश्वास ही न था कि माधव अब उसे कभी मिलेगा। पहले तो सहमे, फिर चिठ्ठी को झट से खोली और एक सांस में पूरा पढ़ गये। चिठ्ठी में लिखा था –
पूज्यनीय पिता जी सादर प्रणाम। आशा है आप सभी सकुशल होंगे। मैं भी अच्छा हॅू। जब से गांव छूटा मन बिल्कुल उदास रहता है। आप सभी लोगों की याद एक पल को भी नही जाती। क्या बताऊं, यहां काम बहुत करना होता है। जिस कारण पत्र नही लिख पाया। अगले माह बीस तारीख को प्रशिक्षण पूरा हो रहा है। पच्चीस तक आपके चरणों में होऊंगा। दीदी की शादी भी जल्द करनी है। लड़के देख लेना, आते ही सब ठीक हो जायेगा। दादी को दवाई देते रहना। जरा सी गलती गफ़लत में डाल देगी। मां जी तो बहुत नराज होंगी। कैसे कहॅू। सशस्त्र सीमा बल पुलिस का प्रशिक्षण होता ही ऐसा है कि पल भर को समय नही मिलता। मैं बहुत पतला हो गया। घर आते ही मोटा हो जाऊंगा। सभी अच्छे होगें, है न। लेद्दा दादा के खेत में अब कोई न बकरी ले जायेगा। बड़कामन काकू तो अच्छे होगें, बगिया अभी होगी। सब्जी बचा के रखेगें, अबकी जी भर कर चोरी करूंगा। सच पिता जी, अब कोई आपको चोर का पिता नही कहेगा। एक बार पुनः गांव के देवताओं को चरणस्पर्श।
माधव
श्रीधर इतना खुश है कि मैं कह नही सकता। मेरी लेखनी उस खुशी को व्यक्त करने में असमर्थ है। वह तोते की भाॅति पूरे गांव में यह खत एक व्यक्ति को दो-दो, तीन-तीन बार सुना चुके। प्रेम मेें विह्वल एक दिन बैलों के पास सुना रहे – तुम्हारा मालिक आ रहा है। तुम्हे पेट भर भूसा- खरी खिलायेगा। मैं तो अब बूढ़ा हो गया। तुुम्हे कैसे खिला सकता हॅू। ’ घर में आते ही शुरू हो जाते। मुन्नी से कहते – लाओ, एक बार माधव का खत तो पढ़ लंू। ’ श्रीधर को मां के जितना जाने का दुःख था, उससे कहीं ज्यादा माधव की खुशी। वह मूछ काला करते, भौंह बनाते, कपड़े मेें महिनों से स्त्ररीय नही किये थे अब दूसरे दिन स्त्ररीय होता। देवकी और मुन्नी का भी यही हाल है।
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मुन्नी और देवकी सुबह के चार बजे से ही साफ-सफाई में मसगूल थीं। श्रीधर जैसे आज पूरा गांव चमका ड़ालेगेें। गांव के लोगों को माधव के आने का पहले से ही पता था। बड़कामन के रिश्तेदार भोलेनाथ चांदी से आये हुये थे। मुन्नी की बात श्रीधर उनके लड़के से तय कर चुके थे। इन्तजार था तो केवल माधव का। वह भी कुछ क्षण में पूरा होने को है। श्रीधर चबूतरे पर बैठे रस्सी कात रहे थे। पैर में जकड़न आयी, खड़े हुये, गर्दन सीधे किये, देखे, भीतर भागे। देवकी सुन्दर साड़ी पहने, हाथ में थाली, थाली में दीपक, अगरबत्ती, हल्दी, अक्षत लिये मुन्नी के साथ व्दार पर निकली। उधर लड़को के साथ माधव फौजी वर्दी में चले आ रहे हैं। गांव के छोटे-छोटे लड़के चिल्ला रहे थे- शेर आया शेर, भागो-भागो। ’ बड़कामन पीठ पर भारी भरकम बैग लादे खड़े हैं। पसीने से तरबतर। उनको या तो किसी ने ध्यान ही न दिया, जो दिया उसकी हलात ऐसी थी जैसे शादी में दूल्हा को देख बारातियों की। बड़ी मशक्कत के बाद अपने से ही बैग उतारे, तौलिये से मुंह पोछते किनारे दम लेने लगे। आज श्रीधर का कलेजा गज-गज भर का था। बेटे को पा कर आत्मा तृप्त हो गई थी। देवकी चट से हल्दी-चन्दन की रोली लगाई, आरती की, बलैया ली। माधव माॅ से लिपट गया, आॅखों से झर-झर आंसुओं की धार लग गई। प्रेम आज अपने चरम सीमा के करीब पहुच चुका था। फिर कुशल क्षेम, देश-दुनिया की बातें। घर में वह खुशी न थी, जो बचपन या कहें कि जाते वक्त। उस समय दादी थीं, उनकी कमी खल रही थी। दादी की याद आते ही आंखें डबडबा आयीं। बड़कामन से न रहा गया, रास्ते में दादी के स्वर्गवास की बात कह दी थी। मुन्नी के चरण छुआ, गले लगा लिया। दोपहर का भोजन बड़कामन, भोले और कुछ गांव के भद्र पुरूष श्रीधर के आंगन में चख रहे हैं। इन्ही में से एक थे केशवचन्द। भोजन कम, माधव जो फटाफट कचैड़िया ड़ाल रहा है पर गड़ाये हुये थे। भोले ने कहा ‘ भई केशव, यार खाते क्यों नही। खाओ नही तो कचैड़िया ठण्ड़ी पड़ जायेगी। ऐसा अवसर तो कभी-कभी आता। जम के खा लो। ’ माधव आज ऐसा चमक रहा था जैसे कीचड़ के बीच कमल। पंगत उठी पानी ले माधव हाथ धुलाने पहुचा। फगुहार आ चुके थे। फाग श्रीधर के यहाॅ का आज कुछ खास था। आषाढ़ में मुन्नी की शादी भोले के लड़के से सम्पन्न हुई। इस शादी में एक लड़की अपने दोस्त के साथ आयी थी । माधव उसकी सुन्दरता का कायल था। नाम था शीतल। शीतल यथा नाम तथा गुण थी। लेकिन माधव पूछे तो किससे ?
देवकी उसके मन को भांप कर बोलीं – ‘माधव अब मुझसे खाना नहीं बनाया जाता। बुरा न मानो तो एक बात कहॅू।
कौन सी बात मां ? कहो न ?
नहीं, रहने दो।
कहिये तो क्या बात है ?
बेटा, मुन्नी के शादी में जवा से एक लड़की आयी थी। वह कैसी है ?
‘ ठीक तो दिख रही थी। ’ शकुचाते नेत्रों से जैसे कह रहा हो मां जब मेरे मन की बात जान गई तो क्यों पूछती हो, आंखों ही आंखों मां के प्रश्नों का जवाब दे दिया। श्रीधर शांम को जब आये देवकी को देख बोले- क्या बात है, आज बहुत खुश हंै ?
हां , खुश तो हॅू और खुश क्यों न रहॅू ? यह खुशी आपकी ही तो दी हुई हैै।
मेरी ?
और क्या , भइया शादी को तैयार हो गये।
सच ?
हां।
मैं बड़कामन के यहां जा रहा हॅू। ’ बालों में पानी चुपरते, धोती समियाते रात का भोजन वहीं पर करने की बात कहते लाठी ठोकते बड़कामन के घर की ओर चले। देवकी यह गीत गुनगुनाते झाडू लगाने लगी-
बन्ना के लम्बे – लम्बे केश, नजरिया लाग जईहै रे।
दूसरे दिन तार भेजा गया। संदेशा पाते केशव इटौरा पहुचे। बड़कामन उनका खूब आदर – सत्कार किये। शांम को दोनों श्रीधर के घर पहुचे। श्रीधर चैपाल में बढ़िया साफ गद्दा बिछाये हुये थे। गद्दा कहीं – कहीं फटे थे जिस पर ऊपर से चद्दर डाल रखे थे। यद्यपि माधव के मना करने पर भी चद्दर डाल दिया गया। गांव के कुछ भद्र पुरूष के साथ केशव, बड़कामन शादी की बात कर रहे थे। श्रीधर अपराधी की भाॅति हाथ कोहनी पर रखे एक – दूसरे की ओर नजर दौडाये हुये थे। बीच – बीच में ‘ हां , हूँ, हा भई , कर रहे थे। चातुर वक्ताओं के बीच में कम बोलने वाले वक्ताओं को चुप रहने में ही भलाई है। इस बात को श्रीधर अच्छी तरह जानते थे। अन्दर माधव जलपान तैयार कर बीच – बीच में देता रहता। भीतर से देवकी घुघट काढ़े व्दार पर एक किवाड बन्द किये, दूसरे के ओलट में खड़ी हाथ से साड़ी के एक कोर से एक – एक के बातों को सुन रहीं थीं। उसे इतनी खुशी अपनी शादी मेें भी न मिली थी जितना आज मिल रही है। शादी तय हुई, बिना मांग – जांच के। मुहूर्त निकला मई महिने के पच्चीस तारीख को। दो दिन बाद माधव को जाना था। वह दिन भी आया। मां रास्ते तक पहुचाने आयी। श्रीधर, बड़कामन बस चढ़ाने चले। माधव की पहली नियुक्ति असम रायफल से जम्मू के पुछ में हुई। छः माह बाद हिमाचल प्रदेश के कल्पा में अपनी सेवा दी। खेल में निपुण होने के कारण वह सूबेदार रायबहादुर का खासमखास सलाहकार और कर्नल लखविन्दर का कृपापात्र बना। आखिर में वह दिन आ गया, जिसके लिये उसे इन्तजार था। शादी के दिन। छुट्टी की अर्जी दी , छुट्टी तो मिल गई किन्तु कर्नल लखविन्दर को गहरा सदमा लगा। शायद कर्नल माधव को अपना दामाद मान बैठे थे। मई में शादी थी, जून तक की छुट्टी मिल गई। सभी दोस्तों से बधाई लेते हुये विदा हुआ। मन में कई अरमान पाले माधव ट्रेन पकड़ी। दो दिन, दो रात बीतते-बीतते भोर में डभौरा स्टेशन पहुंचा।
श्रीधर चबूतरे में बैठे, बहू के गहने का हिसाब – किताब लगा रहे, पास में ही देवकी बैठी थी। उसे जोड़गाठ में उतना मजा न आ रहा था जितना की सुनने में। इतने में बड़कामन भी पहुंच गये।
श्रीधर ने कहा – ‘ एक जोड़ा लच्छन, मुदरी , गोड़ाहरा और हर्रइया साथ में गले का हसुली , बाजूबन्द। करीब एक किलो से ज्यादा चांदी और सोना, मूल्य तीस हजार से कम की न होगी। ’ बडे मसक्कत के बाद बता पाये।
नहीं भइलो, मैं कहता हॅू यह पचास हजार के उपर जायेगी, देख लेना।’ बड़कामन ने कार्य में तत्परता दिखाते तसल्ली दी।
अरे , बड़कामन वो नाक , कान में क्या पहनते हैं ? उसको भी जोड़ लेना। और हां देखना भई, कोई कमी न रह जाये । श्रीधर ने काम में गम्भीरता दिखाई।
क्या जोड़ लंू ? नाक , कान ? मैं डाॅक्टर थोड़े ही हूँ । ’ बड़कामन मुस्कुराहट के साथ मुन्नी के बच्ची को खिलाने लगे।
अब तुम्हारी यही ठाकुर सुहाती मुझे अच्छी नही लगती। भई मैं रोज – रोज शादी -ब्याह थोड़े ही करता हंू कि हर बात मालूम हो। श्रीधर बनावटी नराजगी व्यक्त की। देवकी – मुन्नी के बाबू काहे परेशान हो , सब तैयारी हो चुकी है।
सारे महेमान आ चुके, कमी थी तो माधव की। माधव भी पहुंच गया। खुशियों और बढ़ी चली। शादी का दिन आया , माधव को उबटन लगाया गया। व्दार पर बाजा अपने रंग में था। महिलायें गीत गा रही हैं। बच्चे इधर से उधर उछल कूद मचा रहे थे। बड़कामन ने कहा – भइया सिद्धू अभी तैयार नही हुये , जल्दी करिये। परछन हो चुका। क्या सबेरे बारात जाना है ? बासी भोजन मिलेगा , फिर न कहना कि खाना अच्छा नही था। ’ तैयार हो गया बडकू। सब ठीक है न , कुछ छूटा तो नही ? श्रीधर मूछ में हाथ फेरते तैयारी समाप्त की। माधव दूल्हा बना, ब्याहने चला। श्रीधर और देवकी का सीना गज – गज भर का हो चला। माधव की शादी खूब धूम धाम से सम्पन्न हुई। केशवचन्द की लाडली शीतल ससुराल आयी। श्रीधर का घर पुष्प की वाटिका हो चली। गांव की महिलाएं आयी। मुंह दिखाई दे गई। शीतल जब पहली बार आयी थी तब लोगों को उतना आकर्षित न की थी। गेहुआ रंग, गठीला बदन। छोटी-छोटी बेल्लौरी आंखें, भरे हुये कपोल, उस पर केशो की सजावट चार चांद लगा रहे थे। होठों के ऊपर छोटा – सा तिल। मानो केसर के फूल पर बैठा भवरा फूलों का रसपान कर रहा हो। जब कोई बात पर मुस्कुराती तब मानो जैसे कोई अप्सरा हो। जैसे रंग – रूप वैसे ही गुण भी। जब सारा घर सो रहता, शीतल चूल्हा – चैकी कर चुकी होती। मुन्नी को यहां तक एक तिनका तक न उठाने देती। देवकी गुडिया बनी थी। देवकी का श्रृंगार शीतल के जिम्मे। श्रीधर का तो कहना ही क्या। गांव में ऐसा कोई स्त्री-पुरूष, बडे-बूढे़ न बचे थे जो शीतल की वाहवाही न की हो। किन्तु शीतल का मन कहीं और ही टिका था। समय बीता और माधव की छुट्टी समाप्त हुई। माधव छुट्टी से पहले शीतल का नाम बैंक मेें नामिनी के तौर पर दर्ज करा चुके थे। शांम को जाना था इस लिये सारी तैयारी हो चुकी थी। बडकामन समान बैलगाडी में रख चुके थे। अन्दर माधव शीतल को समझा रहे थे, ’ पगली तेरे बिन तो जी मेरा भी न लगेगा। पर क्या करू ? जाना तो पडेगा ही। ’ बाहर मुन्नी ने आवाज दी – भइया समान सब रख गया है। ’ माधव कह रहा था – शीतल मां बाबू का ख्याल रखना। हमारी कमी नहीं खलनी चाहिये।’ सभी की आखें नम थी। पर जीवन सुखद लग रहा था। ऐसा फौजी हीरा को पाकर कौन नही गर्व से सीना ऊंचा करेगा। मुन्नी ने पुनः आवाज दी। माधव बाहर निकला बैलगाडी में बैठा और चलने को तैयार हुआ। अन्दर किसी बर्तन के जोर से गिरने की आवाज आयी। शीतल अन्दर ही थी, मुन्नी अन्दर भागी। बैलगाडी आगे बढ़ी। कुछ देर में देवकी भी पहुंची। अन्दर का नजारा देख अचेत सी हो गयी। रसोईघर में बिल्ली ने दूध का डिब्बा गिरा दिया था, जिससे ढक्कन खुल जाने से दूध बिखर गया था, कुछ पास के ओखल में भी भर गया था। देवकी मूर्छित हो वही गिर पडी। मुन्नी बैलगाडी रोकने बाहर भागी। तब तक बहुत देर हो चुकी थी।
कर्नल लखविन्दर की सैन्य टुकडी भारत- पाक सीमा में आतंकी गतिविधियों को रोकने में तैनात थी। माधव को रायबहादुर के साथ पेंढर सेक्टर में तैनात कर दिया गया। यहां पर उसकी पहरेदारी गज़ब़ की थी। मजाल क्या कोई परिंदा पर मार जाये। छः महिने यहां पर लगातार डटा रहा। फिर बदली हुयी और पोस्टिंग खलिस्तान में हो गई। यहां से आतंकवादी अपने मिशन की तैयारी कर रहे थे। सैनिक तो थे किन्तु स्थिति भयावह होती जा रही थी। तीन माह तक माधव को यहां आये हो गये थे। एक दिन शांम को सभी मित्रों के साथ भोजन कर रहे थे। सूबेदार ने कहा – माधव घर से फोन आया है भाभी जी का, बात कर लो। आज माधव को अजीब सी बेचैनी थी। सीमा की स्थिति माथे से अब स्वर तक पहुंच चुकी थी। रिसीवर बाहर ही रखा था, फोन हाथ में लिया।
उधर से मां ने कहा- क्यों बेटे फोन नही करते ?
क्या बताऊं मां ।
अरे, क्या हुआ, जी अच्छा नही है क्या ?
नही, मां। अच्छा हूँ ।
फिर ?
बस, ऐसे ही।
शीतल की याद आ रही है ?
नहीं मां, मैं तो अब शीतल में ही हंू। मां शीतल को कष्ट न देना। बिन मां की बच्ची, कैसे रहेगी इस दुनिया में।
आज तू कैसी बात करता है रे ? अच्छा, ले शीतल से बात कर ले। मन हल्का हो जायेगा।
प्यारी शीतल , तेरी बहुत याद आती है, पर …………… अच्छा मां बाबू का ख्याल रखना।
इतने में श्रीधर आ गये। तो शीतल रिसीवर रख वहां से हट गयी। श्रीधर ने कहा- क्यों रे ? अपने बाप को भूल गया। कहां है ? सब ठीक है न ?
नहीं पिता जी…….. आप लोगों को कैसे भूल सकता हंू। सब ठीक है। एक बात कहंू पिता जी ?
कहो बेटे, क्या बात है ?
यदि मैं न रहूं तो शीतल की शादी किसी अच्छे व्यक्ति से कर देना।
क्या हुआ बेटे ?
बस कुछ नही।
हेलो, हेलो ….
हलो ………. शायद फोन कट चुका था।
माधव और रायबहादुर ने टाॅर्च ली , पानी और कारतूस का झोला, बन्दूक कन्धे रख चल दिये। निश्चित् स्थान में पहंुच अपनी जिम्मेदारी सम्भाली। कुछ दूरी पर अन्य सैनिक तैनात थे। पीपल का पेड़ था, उसके पचास मीटर पर भारत – पाक की सीमा रेखा। पीपल के पेड में से चमगादड, परेबा के फडफडाने व कुछ विशेष प्रकार के जीवों की आवाज आ रही थी। माधव पलभर के लिये वही बैठ गया। फिर बन्दूक में गोली भरी। भरते ही उसे शीतल की याद आ गयी। वह देखता है कि शीतल सफेद साडी पहने गिलास में दूध लिये उसी की ओर चली आ रही है। पता नही क्या हुआ, शीतल के हाथ से गिलास गिरा। माधव की आंख खुली। समाने से छः बन्दूकधारी आतंकवादी सीमा रेखा को पार कर उसी ओर आ रहे थे। माधव ने बन्दूक सम्भाली, पहला निशाना लगाया। एक दाढी वाला धराशायी हो गया। झट से पीपल के आड में आया, दूसरे-तीसरे निशाने में दो और काल के गाल में समा गया। जैसे ही निशाना साधने आगे बढा, एक गोली उसके जांघ में जा धसी। माधव वहीं चट से गिरा गया। गिरा ही रहा। शत्रु ने मरा समझ उसके करीब पहुंचे। अभी आठ – दस फर्लांग दूर ही थे। वह सिंह की भाॅति दहाडते उठा, चार फायरिंग में दो और चल बसे। तब तक माधव को भी कई गोलियां लग चुकी थी। अंतिम गोली में पकी दाढी वाले पठान का काम तमाम कर माधव पीपल से टिक गया और आंख मुद ली। मुठभेड की यह खबर आस-पास के कई और सैनिक जाने, वह भी घटना स्थल पहुंचे। माधव के शरीर से बहुत सा रक्त बह चुका था, सांसे अब भी चल रही थी। उसे चिकित्सालय लाया गया। राते में ही सांसे टूट चुकी थीं। डाॅक्टर ने जांच के बाद मृत घोषित कर दिया। श्रीधर का लाल भारतमाता की गोद में सो गया। धन्य हो ऐसा वीर जो छः खूंखार आतंकियों को धराशायी किया।
जिसको भी जानकारी मिली, नंगे पैरों दौडा आया। यह खबर आंधी की तरह फैल गई। ऐसे लाल के अंतिम दर्शन को लोगों का हुजूम उमड पडा। शव को तिरंगे से सुसज्जित कर्नल लखविन्दर, मुख्यमंत्री, क्षेत्रिय मंत्री और पूरा जिला प्रशासन इटौरा पहुंचा। देवकी, मुन्नी, शीतल को एकाध घडी को होश आया हो तो आया हो, नही तो पूरे समय बेहोश ही रही। श्रीधर पुत्र शोक में अचेत से रहे। बडकामन, भोलेनाथ, लेद्दा दादा, तिवारी भीड को बैठने की व्यवस्था कर रहे थे। कहीं-कहीं पानी की टण्की रख दिये थे। चिता बनाई गयी। अब अंतिम दर्शन को माधव का चेहरा खोला गया, कुछ प्रत्यक्ष, कुछ दूर से दर्शन किये। गांव की महिलाओं ने देवकी, मुन्नी, शीतल के चेहरे पर पानी के छीटे मारे, दांत बैठ गया था, एक ने अगंुली से मंुह खोला चम्मच भर पानी डाला। पकडकर दर्शन स्थल ले गये। ऐसा हृदय विदारक चींखे निकल रही थी कि सुनने वाले का कलेजा दहल जाता था। फौजी बाजा बजा, गाॅड आॅफ आॅनर दिया गया। सभी ने सैल्यूट किया। माधव का शरीर पंचतत्व में विलीन हुआ।
मुख्यमंत्री ने मंच से घोषणा की – शहीद माधव की कुर्बानी बेकार नही जायेगी। धन्य है शहीद माधव के माता-पिता जिनके लाल ने आज पूरे क्षेत्र को गौरवान्वित किया है। हमारी संवेदना पूरे परिवार के साथ है। माधव के सम्मान में गांव का नाम बदल कर माधवपुर और मुख्यमार्ग मेें माधव के नाम तोरण व्दार होगा। परिवार को पच्चीस लाख आर्थिक सहायता दी जायेगी।
अब इटौरा माधवपुर है, गईला सडक में बदल चुका है। मुख्यमार्ग के तोरण व्दार मेें माधवपुर लिखा है, साथ ही माधव की दोनों ओर कन्धे में बन्दूक रखे, मूंछ पकडे की मूर्ति बनी है। गांव वही है किन्तु रौनकता अब नही दिखती। इस घटना को बीते छह माह भी नही हुये। देवकी , श्रीधर की उम्र सत्तर वर्ष के बूढे सी हो गयी है। शीतल का जीवन अपूर्ण।
सुबह का समय था। श्रीधर के द्वार में नीम का पेड है। पेड के चारों तरफ कच्चा चबूतरा है। गांव के बच्चों के खेलने का यही स्थान है। खाली समय में महिलायें भी चबूतरे पर बैठा करती। अब शीतल कभी न बैठती, न ही कभी किसी से हस कर बात ही करती। उसके चेहरे से वह मुस्कान अब गायब हो चुकी थी। उसका जीवन असह्यय हो गया था। द्वार से ही महिलाओं को देखती रहती। आज वह देख रही है कि एक माता अत्यन्त प्रसन्न मुद्रा में बैठी बच्चे को स्तनपान करा रही है। बालक आॅचल के बाहर झांकता है फिर छिप जाता है। यह दृश्य उसे और घुलाये दे रही थी। नारी का ममत्व उसके संतानोपत्ति से जन्म लेता है। मातृत्व पे्रम कितना आनन्दमय होता है। ’ काश ! मेरा भी जीवन इस माता की भाॅति खिल उठता। हाय! मेरा भाग्य।’ ऐसे ही शीतल सोच रही थी। कुछ दिन बाद शीतल बाजार गई, बाजार में उसका दोस्त मिला। बातों ही बातों में दोस्ती प्यार में बदल गयी। प्यार अपने परवान चढा। आखिर मामला पच्चीस लाख का था। माधव के शादी में जितना खर्चा बडकामन ने किया था, वह अब तगादा करने लगे थे। श्रीधर खेत बेचना नही चाहते थे। खेत – खलिहान किसान के प्रतिष्ठा का केन्द्र बिन्दु है। परिस्थियों ने बेचने को विवश कर दिया। वह किसान से मज़दूर हो गये। मज़दूरी ने बीमारी पैदा की। केशवचन्द शीतल को बुलाने आये, शीतल सारा गहना, पासबुक की काॅपी और कुछ आवश्यक सामग्री डोल्ची में रख चली मायके। मायके से एक दिन शहर भाग गयी। वही दोस्त जो मुन्नी की शादी में शीतल के साथ आया था, उसी के साथ। जब श्रीधर के पास कुछ न बचा, तब वह पासबुक की खोज की। पासबुक न मिलने की बात श्रीधर ने बडकामन से कही। बडकामन ने कहा – जिसने सारा जीवन पुत्र को पालने-पोसने में खपा दिया कि बुढापे में सहारा बनेगा। वह कपोल कल्पित सिद्ध हुआ। देश के कानून और सरकारों की दोहरे मानसिकता वाली नीति ने भइया आपकी पासबुक ले के चली गई।
जब-जब गांव जाता हॅू, और वह बूढा श्रीधर मेरे सामने भीख मागते हाथ फैला देता है, तब आंखे भर आती हैं किन्तु मैं अभी विद्यार्थी हॅू। क्या दे सकता हॅू। देने वाले कानूनों ने अपने हाथ बांध रखे हैं। मुझ जैसे व्यक्ति देने को तैयार है किन्तु उसका हाथ खाली है।

 

उमेश ’दास’

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